अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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त्यक्त्वा सर्वमिदं.........१मत्वा मनो विभ्रमं ,
देहान्ते तदवाच्यमेकममनस्कत्वं बुधैः सेव्यताम् ॥१११।
ओंकारादि विभिन्न करणों से प्राण का संयोजन (१) हृदयकमल में ज्योति-
श्चिन्तन, (२) महाशून्य रूप आकाश का आलम्बन अर्थात् चित्त का निरा-
लम्बन, (३) इन सबका, मन के विभ्रम हेतु, त्यागकर अन्तिम समय में ज्ञानियों
को एकमात्र अवाच्य अमनस्क का सेवन करना चाहिये ॥ १११ ॥
अन्यजन्मकृताभ्यासात्स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ।
सुप्तोत्थितः प्रत्यूषे ह्युपदेशाद् विना प्रबुद्ध्यते ॥ ११२ ॥
अन्य जन्मों में किये गये अभ्यास से तत्त्व स्वयं प्रकाशित होता है । सोकर
जागा हुआ पुरुष प्रातःकाल उपदेश के बिना ही जैसे सब कुछ जान
जाता है ॥ ११२ ॥
शुद्धाभ्यासस्य शान्तस्य सदैव गुरुसेवया ।
गुरु प्रसादात्तत्रैव तत्त्वज्ञानं प्रकाशते ॥ ११३ ॥
सदैव गुरुसेवा से जिसका अभ्यास शुद्ध है ऐसे शान्त पुरुष को गुरु के
साद से उसी जन्म में तत्त्वज्ञान प्रकाशित हो जाता है ॥ ११३ ॥
इति श्री ईश्वरवामदेव संवादेऽमनस्के योगशास्त्रे द्वितीयो लयः
॥ समाप्त ॥
१. (ख) करो नरवरं ।