अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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यदा यदा सदाभ्यासात् संकल्पविलयो भवेत् ।
योगिनो भवति श्रेयान् कर्मत्यागस्तदा तदा ॥ १०६ ॥
जब जब सदा अभ्यास से संकल्प का विनाश होता है तब तब योगी का
न्त श्रेयान् कर्मत्याग होता है ॥ १०६ ॥
दान्तानां कुशलानां च सततं मोक्षमिच्छताम् ।
श्रद्धावतां सुशिष्याणां शास्त्रमेतत्प्रकाशयेत् ॥ १०७ ॥
इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुके एवं सदा मोक्ष की इच्छा रखनेवाले
दक्ष श्रद्धावान् सत् शिष्यों के लिए इस शास्त्र को प्रकट करना चाहिये ॥१०७॥
शास्त्रमेतत् प्रयत्नेन सदाभ्यस्यं मुमुक्षुभिः ।
यस्य धारणामात्रेण स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ॥ १०८ ॥
मुमुक्षु पुरुषों को इस शास्त्र का जतन से सदा अभ्यास करना चाहिये,
जिसके धारणामात्र से तत्त्व अपने आप प्रकाश में आता है ॥ १०८ ॥
न दिवा जागरितव्यं स्वपितव्यं नैव रात्रिभागेऽपि ।
रात्रावह्नि च सहजे स्वपितव्यं योगिना नित्यम् ॥ १०९ ॥
योगी को न तो दिन में जागरण करना चाहिये और न रात्रि में शयन ।
योगी को नित्य रात में और दिन में सहजतत्त्व में शयन करना चाहिये ॥१०९॥
निर्मनः सहजस्थिते पुरुषे न दिवारात्रिशब्दोऽस्ति ।
जागरणशयनवर्जित चिन्मात्रानन्दस्थानात् ॥११०॥¹
अमनस्करूप सहजतत्त्व में स्थित पुरुष के विषय में दिन और रात्रि शब्द
लागू नहीं होते हैं, क्योंकि वह जागरण और शयन से रहित चिन्मात्रानन्द में
स्थित रहता है ॥ ११० ॥
ॐ कारप्रमुखैर्विचित्रकरणैः प्रायस्य वा यो जपः²,
तेजाश्चिन्तनमन्तरालकमले शून्याम्बरालम्बनम् ।
१. स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित् ।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥
( अवधूतगीता ४-१७)
२. 'प्राणस्ययोजनम्' इतिपाठान्तरम् ।