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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 128 में से

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पृष्ठ 119

[ ४७ ]
यथा संह्रियते सर्वमस्तं गच्छति भास्करे ।
कर जालं तथा सर्वममनस्के विलीयते ॥ ६० ॥
जैसे सूर्य के अस्त होने पर किरणजाल संहृत (छिन्न-भिन्न) हो जाते हैं
वैसे ही योगी के अमनस्क होने पर सब (विश्व) लीन हो जाता है ॥ ६० ॥
इन्द्रियग्राहनिर्मुक्ते निर्वाते निर्मलाम्ते ।
अमनस्कह्रदे स्नातः परामृतमुपाश्नुते ॥ ६१ ॥
जिस प्रकार मगर आदि जल जन्तुओं से मुक्त, वायुशून्य निर्मल जलवाले
सरोवर में स्नान करने पर तृप्ति-लाभ होता है उसी प्रकार इन्द्रियों के प्रभाव
से मुक्त तथा प्राण, अपान आदि क्रिया से शून्य अमनस्क अवस्था में अवगाहन
करने पर परा शान्ति (परमसुख) प्राप्त होती है ॥ ६१ ॥
इत्युक्तमेतत् सहजामनस्कं,
शिष्यप्रबोधाय शिवेन साक्षात् ।
नित्यं हि नूनं विगतप्रपंचं,
वाचामवाच्यं स्वयमेव बोध्यम् ॥ ६२ ॥
साक्षात् भगवान् शिव जी ने शिष्यों के प्रबोध (ज्ञान) के लिए यह सहज
अमनस्क योग इस प्रकार कहा । यह नित्य नूतन निष्कल, निष्प्रपंच, वाणी
द्वारा कथनीय नहीं है । इसे स्वयं ही जानना चाहिये अर्थात् यह स्वानुभवैक-
वेद्य है ॥ ६२ ॥
चित्ते चलति संसारोऽचले मोक्षः प्रजायते ।
तस्माच्चित्तं स्थिरीकुर्यादौदासीन्यपरायणः ॥ ६३ ॥१
चित्त के चंचल होने पर संसार का भान होता है और निश्चल होने पर
मोक्ष का उदय होता है । अतएव उदासीन (निष्क्रिय) होकर चित्त को स्थिर
करना चाहिये ॥ ६३ ॥
चतुविधा मनोवस्था विज्ञातव्या मनीषिभिः ।
विश्लिष्टं च गतायातं सुश्लिष्टं च सुलीनकम् ॥ ६४ ॥
विद्वान् पुरुषों को मनोवस्था चार प्रकार की जाननी चाहिये--१ विश्लिष्टा-
वस्था, २ गतागतावस्था, ३ सुश्लिष्टावस्था और ४ सुलीनावस्था ॥ ६४ ॥
१. चित्तमेव हि संसार । (मैत्रेयी उपनिषद्)