अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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यथा निरंकुशो हस्ती कामान् प्राप्य निवर्तते ।
अवारितं मनस्तद्वत् स्वयमेव विलीयते ॥ ७३ ॥
जैसे निरंकुश हाथी अपने अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर लौट जाता है
वैसे ही अवारित ( न रोका गया ) मन भी अपनी इच्छा पूरी कर अपने आप
शान्त हो जाता है ॥ ७३ ॥
निवार्य्यमाणं यत्नेन तत्कर्तुं नैव शक्यते ।
न तिष्ठति क्षणेनैव मारुतस्य वशोदयात् ॥ ७४ ॥
मन प्रयत्नपूर्वक निवारित करने पर भी निवारित नहीं किया जाता है ।
वह ( मन ) वायु के वशीभूत रहने के कारण एक क्षण के लिये भी स्थिर
नहीं रहता ॥ ७४ ॥१
दुर्निवार्यं मनस्तद्वद्यावत्तत्त्वं न विन्दति ।
विदिते तु परे तत्त्वे मनो नौस्तम्भकाकवत् ॥ ७५ ॥
वैसे ही जब तक तत्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक इधर उधर भागता हुआ
मन दुर्निवार्य है । पर-तत्त्व जब प्राप्त हो जाता है तब मन समुद्र में जहाज के
( स्तम्भ ) मस्तूल पर बैठे हुए कौए की तरह स्थिर हो जाता है ॥ ७५ ॥
यथा तुलां तुलाधारश्चंचलां कुरुते स्थिराम् ।
याने सौख्ये सदाभ्यासान्मनोवृत्तिस्तदात्मनि ॥ ७६ ॥
जैसे तराजू से तोलनेवाला बनिया चंचल तराजू को स्थिर कर देता है
उसी प्रकार सदा के अभ्यास से यान में तथा सुख में मनोवृत्ति सदा आत्मा में
स्थिर रहती है ॥ ७६ ॥
निष्पन्नाखिलभावशून्यनिस्तृजः ( मनसः ? ) स्वान्तःस्थितस्तत्क्षणा त्
निश्चेष्टश्लथपाणिपादकरणग्रामो विकारोज्झितः ।
१. चञ्चलं हि मनःकृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ( श्री० गीता ६/३४ )