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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

[ २६ ]
कुलचाररताः सन्ति गुरवो बहवो मुने ।
कुलाचारविहीनस्तु गुरुरेको हि दुर्लभः ॥ १६ ॥
हे मुने, कौलों के आचार में रत बहुत से गुरु हैं, किन्तु कौलाचार से
विहीन एक ही गुरु है उसका प्राप्त होना सरल नहीं है ॥ १६ ॥
पुष्पात् प्रकाशते यद्वत् फलं पुष्पविघातकम् ।
देहात्प्रकाशते तत्त्वं तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १७ ॥
जैसे फूल से फल प्रकट होता है परन्तु फल फूल का विनाशक है वैसे ही
देह से तत्त्व प्रकट होता है पर तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १७ ॥
फलप्रकाशकं पुष्पं फलं पुष्पविनाशकम् ।
तत्त्वप्रकाशको देहस्तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १८ ॥
फूल फल का प्रकाशक है, फल फूल का विनाशक है। देह तत्त्व की
प्रकाशक है, तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १८ ॥
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति ।
गोपः कक्षगते छागे कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥¹
जैसे मूर्ख ग्वाला बकरी के बच्चे के बगल में रहते भी मूर्खतावश उसे कुएँ
में झांकता फिरता है वैसे ही मूढ़ पुरुष अपने में स्थित तत्त्व को न जानकर
शास्त्रों में मोह को प्राप्त होते हैं अर्थात् व्यर्थ शास्त्रों में भटकते हैं ॥ १६ ॥
नमोऽस्तु गुरवे तुभ्यं सहजानन्दरूपिणे ।
यस्य वाक्यामृतं हन्ति संसारमोहनामयम् ॥ २० ॥
सहजानन्द रूपी आप गुरु के लिए नमस्कार है जिनका वाक्य-रूपी अमृत
संसार मोहरूपी व्याधि का विनाश करता है ॥ २१ ॥
१. अन्यत्र भी कहा है—शुष्कशास्त्रविवादेषु नैवायुः क्षपयेद् बुधः ।
नहि दीपकवार्तायामन्धकारो विनश्यति ॥

[ ३० ]
अमृतोद्दीपिनी विद्या निरपाया निरंजना ।
अमनस्का कला कापि जयत्यानन्ददायिनी ॥ २१ ॥
यह अमनस्का विद्या अमरता को उद्दीप्त करनेवाली, कभी विनष्ट न होने-
वाली और किसी भी प्रकार के कालुष्य से रहित है । यह आनन्दप्रदायिका
लोकोत्तर कला सबसे उत्कृष्ट होने के कारण सर्ववन्दनीय है ॥ २१ ॥
प्राणाष्टोच्छ्वासनिःश्वासविध्वस्तविषयग्रहः ।
निश्चेष्टो निर्गतारम्भोह्यानन्द एव योगिनः ॥ २२ ॥
प्राण वायु के आठ उच्छ्वास और निःश्वासों से जिसमें रूप आदि विषयों
का ग्रहण नहीं होता, जिसमें हस्त, पाद आदि अंगों की चेष्टाएँ नहीं होतीं
अर्थात् निश्चलतायुक्त एवं किसी प्रकार का कार्यारम्भ जिसमें नहीं होता
अर्थात् निष्क्रियता सम्पन्न आनन्द ही योगी का है ॥ २२ ॥
उच्छिन्नसर्वसंकल्पो निश्शेषाशेषचेष्टितः ।
स्वावगम्यो लयः कोऽपि जगतां वागगोचरः ॥ २३ ॥
जिसमें सब प्रकार के संकल्प छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, सब चेष्टाएँ निःशेष
गई हैं, केवल अपने अनुभव से ज्ञेय कोई अद्भुत लय लोगों की वाणी
अगोचर है, उसका वाणी द्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥२३॥
वदन्त्येव परं ब्रह्म बुद्धिमन्तो हि सूरयः ।
सर्वबोधकलालापकुशला दुर्लभा भुवि ॥ २४ ॥
बुद्धिमान् विद्वान् पुरुष परम ब्रह्म को वाणी से कहते भर हैं सबको बोध
( ज्ञान ) कराने की कला के आलाप में कुशल पुरुष पृथ्वी में दुर्लभ हैं । या
सब बोधकलाओं ( ज्ञान कलाओं ) के उपदेश में कुशल पुरुष पृथ्वी पर
दुर्लभ हैं ॥ २४ ॥
विन्दन्त्यनात्मनोऽभावं वेदान्तोपनिषद्‌विदः ।
रहस्यमुपदिश्यापि स्वयं नानुभवन्ति ते ॥ २५ ॥
वेदान्त उपनिषदों के मर्मज्ञ अनात्मा के अभाव को तत्त्व जानते हैं । वे
उसका उपदेश देते हैं पर स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं ॥ २५ ॥

[ ३१ ]
विज्ञाय योगशास्त्राणि नानागुरुमतानि च ।
निबद्धः स्वावबोधो यं सद्यः प्रत्ययकारकः ॥ २६ ॥
विविध योगशास्त्रों का तत्त्व भलीभाँति जानकर तथा नाना गुरुजनों के
मतों को भी भली प्रकार जानकर यह अमनस्क नामक स्वावबोध (आत्म-
बोध) रचा गया है । यह सद्यः ज्ञानकारक है ॥ २६ ॥
सकलं समनस्कं च सापायं च सदा त्यज ।
निष्कलं निर्मनस्कं च निरायासं सदा भज ॥ २७ ॥
समनस्क जो सकल ( प्राणादि नामान्त कलाओं से युक्त ) और विनश्वर
है, का सदा त्याग करो और निर्मनस्क ( अमनस्क ), जो [कलारहित और
आयासविहीन है१, का सदा सेवन करो ॥ २७ ॥
दुग्धाम्बुवत् संमिलितौ तुल्यक्रियौ मानसमारुतौ च ।
यावन्मनस्तत्र मरुत्प्रवृत्तिर्यावन्मरुच्चापि मनः प्रवृत्तिः ॥२८॥२
मन और वायु दूध और जल की तरह परस्पर मिले हुए हैं उन दोनों
की क्रिया भी एक सी ही है । उन दोनों में जब तक मन • रहेगा तब तक
वायु की प्रवृत्ति भी रहेगी और जबतक वायु रहेगा तब तक मन की भी
प्रवृत्ति रहेगी ॥ २८ ॥
तत्रैकनाशादपरस्य नाशः एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्तिः ।
अभ्यस्तयोरिन्द्रिय३ वर्गवृद्धिर्विध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धिः॥२९॥
उन दोनों में एक के विनाश से दूसरे का विनाश हो जाता है और एक
की प्रवृत्ति से दूसरे की प्रवृत्ति होती है। उन दोनों के प्रवृत्त होने पर
इन्द्रियवर्ग की वृद्धि ( रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श आदि की ओर अधिक
आकर्षण ) होती है और उनके विध्वस्त होने पर मुक्ति प्राप्त होती
है ॥ २९ ॥
१. 'निरपायम्' ऐसा पाठ मानने पर 'अविनाशी है' । यह अर्थ होगा ।
२. चले वाते चले चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ॥ (हठयोगप्रदीपिका२।२)
३. अभ्यस्तयोस्तत्र त्रिवर्गवृद्धिः इतिपाठः समीचीनः प्रतिभाति । अर्थात् मन
और वायु के अभ्यस्त होने पर त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि
होती है ।

[ ३२ ]
तत्राप्य१साध्यः पवनस्य नाशः
षडंगयोगादिनिषेवणेन ।
मनोविनाशस्तु गुरुप्रसादा-
न्निमेषमात्रेण सुसाध्य एव ॥३०॥
उन दोनों में वायु का विनाश षडंग-योग आदि के कौशलके साथ सेवन
से साध्य है और मन का विनाश तो श्री गुरुदेव के अनुग्रह से एक पलभर
में ही सुसाध्य होता है ॥ ३० ॥
तस्मान्मनोनाशवतोऽमनस्कता
यन्नाशतो नश्यति वायुरग्रे ।
तस्मात्सुबुद्धीन्द्रियदेहनाशा-
दद्वैतबुद्धिः सहजस्थितस्य ॥३१॥
इसलिए जिसके मन का विनाश हो चुका उसे अमनस्कता ( अमनस्क
योग ) प्राप्त है । मन के नाश के पहले वायु विनष्ट हो जाता है । वायु
और मन के विनाश से बुद्धि, इन्द्रिय और देह का विनाश होने के कारण
अमनस्क योगी को (सहजतत्त्व में स्थित योगी को) अद्वैतबुद्धि होती है ॥३१॥
जित्वा वायुं विविधकरणैः क्लेशमूलैः कथंचित्,
कृत्वा यत्नं निजतनुगताशेषनाडीप्रचारान् ।
अश्रद्धेयां परपुरगतिं साधयित्वापि नूनम्,
विज्ञानेऽपि व्यसनसुखिनो नास्ति तत्त्वस्यसिद्धिः ॥३२॥
कष्टकारी विविध साधनों से किसी प्रकार कठिनाई से वायु पर विजय प्राप्त
कर और उसका प्रयत्नपूर्वक अपने शरीर की सम्पूर्ण नाडियों से संचार कर,
अश्रद्धेय ( अविश्वसनीय ) परकायप्रवेश को असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर विज्ञान
में व्यसन से सुख माननेवाले भी अर्थात् विज्ञानार्जन में अत्यन्त परिश्रमशील
साधक को तत्त्व की सिद्धि नहीं होती है ॥ ३२ ॥
१. थ।

[ ३३ ]
केचिन्मूत्रं पिवन्ति स्वमलमथ तनौ केचिदुज्झन्ति लालां
केचित्काष्ठां प्रविष्टा युवतिभगगतं विन्दुमूद्ध्र्वं नयन्ति।
केचित्खादन्ति धातून् अखिलतनुशिरावायुसंचारदक्षा-
नैतेषां देहसिद्धिर्विगतनिजमनोराजयोगादृते स्यात् ॥ ३३ ॥
कुछ अघोरपंथी अपना मूत्र पीते हैं, कोई अपना मल ग्रहण करते हैं,
कोई अपने शरीर पर राख पोतते हैं, दुराचरण की पराकाष्ठा को प्राप्त हुए
कोई युवती जनों के गुह्यांग की बूंदों को ऊपर खींचते हैं, कोई विविध प्रकार
की धातुओं (रसों) का सेवन करते हैं और कोई शरीर की समस्त नाड़ियों में
वायु का संचार करने में निपुण हैं परन्तु इन सबको कार्यसिद्धि प्राप्त नहीं
होती । कार्यसिद्धि का अमनस्क ( जिससे अपना मन विलोन हो गया ऐसे )
राजयोग के सिवा दूसरा साधन नहीं है ॥ ३३ ॥
केचित्तर्कवितर्ककर्कशधियोऽहंकारदर्पोद्धताः
केचिज्जातिगताभिमानभरिता ध्यानादिकर्माकुलाः ।
प्रायः प्राणिगणा विमूढमनसो नानाविकारान्विता
दृश्यन्ते नहि निर्विकारसहजानन्दैकभोगाकुलाः ॥३४॥
नाना तर्कों के ऊहापोह से कर्कश बुद्धिवाले कोई लोग निविड़ अहंकार से
उद्धत रहते हैं एवं कोई जातिगत अभिमानान्वित होकर ध्यान आदि कर्मों में
व्यग्र रहते हैं । पृथ्वी पर प्रायः सभी प्राणी मूढमन ( विकृत मस्तिष्क ) हैं तथा
नाना प्रकार की विकृतियों से युक्त हैं । एकमात्र निर्विकार सहजानन्द का
उपभोग करनेवाले कोई नहीं दिखाई देते हैं ॥३४॥
एकदण्डत्रिदण्डादि जटाभस्मादिकं तथा ।
केशमुंचननग्नत्वे रक्तचीवर धारणम् ॥३५॥
उन्मत्ततामभोज्यान्नपानं पाखण्डवृत्तितः ।
इत्यादिर्लिंगग्रहणं नानादर्शनदर्शनम् ॥३६॥
कोई एक दण्डधारी हैं तो कोई त्रिदण्ड आदि धारण करनेवाले हैं, कोई
जटाधारी हैं तो कोई सर्वाङ्ग में खूब भभूत रमाये हुए हैं, कोई मुण्डित-मस्तक
३

ावबोधस्य ह्युदासीनस्य सर्वतः । सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यते(orएकमप्युपयुज्यते). Yes! एकमप्युपयुज्यते! Wait, is the dot an anusvara or just म? If someone wrote एकमप्युपयुज्यते, with a smudge, or एकम्प्युपयुज्यते. Let's write सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यतेorसदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकमेक...? Wait, look at the dot above म: it is right above the right vertical of म. That's where an anusvara sits on म. So सदाभ्यासरतस्यैतेष्वेकम्प्युपयुज्यते` is visually what's printed!

  • Next verse:
    सदा दृष्टिविशेषांश्च विविधान्यासनानि च ।
    अन्तःकरणभावश्च योगिनो नोपयोगिनः ॥३८॥

  • Hindi:
    सदा दर्शनविशेष अर्थात् निरन्तर विविध प्रकार की दृष्टियों का अभ्यास
    ( त्राटक आदि ), नाना प्रकार के आसनों का अभ्यास तथा अन्तःकरण भाव
    ( एकाग्रता का अभ्यास ) ये सब योगी के उपयोगी नहीं हैं ॥ ३८ ॥

[ ३५ ]
संकल्पमूलःध्यानादि चिन्ताशास्त्रे समाकुलाः ।
क्लेशेनापि न विन्दन्ति प्राप्तव्यस्थानमीप्सितम् ॥४०॥
संकल्पमूलक ध्यान आदि की विचार-चर्चा से भरे हुए शास्त्रों में
श्राकुलमति लोग क्लेश से भी अपने अभीष्ट गन्तव्य स्थान को नहीं जान
पाते हैं ॥ ४० ॥
वेदान्ततर्कोक्तिभिरागमैश्च
नानाविधैः शास्त्रकदम्बकैश्च ।
ध्यानादिभिः सत्करणैर्नगम्यं
चिन्तामणिं ह्येकगुरुं विहाय ॥४१॥
चिन्तामणिस্বরূপ एकमात्र गुरु के अनुग्रह के सिवा वेदान्त प्रतिपादित
महावाक्यों के उपदेशों से, तर्कशास्त्र में प्रतिपादित युक्तियों के कथनों से,
श्रागमों के अध्ययन से विविध प्रकार के अन्यान्य शास्त्रों के ज्ञानार्जन से
ध्यानादि उत्तम साधनों से अपने गन्तव्य स्थान की प्राप्ति संभव नहीं है ॥४१॥
तस्मान्नूनं सकलविषया निष्कलाध्यात्मयोगाद्
वायोर्नाशस्तदनु मनसस्तद्विनाशाच्च मोक्षः ।
स्याच्चेदेवं सहजममलं निर्विकारं निरीहं
ज्ञात्वा यत्नं कुरुत कुशलाः पूर्वमेवामनस्के ॥४२॥
इसलिए यह निश्चित है कि सब विषय निष्कल अध्यात्मयोग से विनष्ट
होते हैं। आत्मयोग से ही वायु का विनाश होता है, वायु विनाश के उपरान्त
मन का विनाश होता है और मनके विनाश से मोक्ष होता है। यदि सहज,
निर्मल, निर्विकार और निरीह आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ऐसा होता हो
तो हे कुशल पुरुषो, पहले ही अमनस्क के सम्बन्ध में अर्थात् अमनस्क प्राप्ति
के लिए यत्न करो ॥ ४२ ॥
अभ्यस्तैः किमुदीर्घकालममलैर्व्याधिप्रदैर्दुष्करैः
प्राणायामशतैरनेककरणैर्दुःखात्म कैदुर्जयैः।

[ ३६ ]
यस्मिन्नभ्युदिते विनश्यति बली वायुः स्वयं तत्क्षणात्
प्राप्त्यैतत्सहजं स्वभावमनिशं सेवध्वमेकं गुरुम् ॥ ४३ ॥
विविध व्याधियां उत्पन्न करनेवाले, बड़ी कठिनाई से करने योग्य, दुःखरूप,
दुर्जय तथा अनेक साधनों से सम्पन्न होनेवाले सैंकड़ों प्राणायामों के सुदीर्घ
काल तक अभ्यास करने से क्या लाभ ? जिसके उदित होने पर बलवान् वायु
स्वयं तत्क्षण विनष्ट हो जाता है उसी सहज स्वभावभूत अमनस्क की प्राप्ति के
लिए निरन्तर एकमात्र गुरु की सेवा करो ॥ ४३ ॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुदेवात्परं नास्ति तस्मात्तं पूजयत्सदा ॥ ४४ ॥
गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही देवाधिदेव महादेव हैं । गुरुदेव से
बढ़कर दूसरा कोई नहीं है । इसलिए सदा गुरु की पूजा-अर्चा करनी
चाहिये ॥ ४४ ॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विना निमेषाद् ,
वायुः स्थिरो यस्य विना निरोधात् ।
चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बात् ,
स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ ४५ ॥१
जिसकी निमेष ( पलक गिरने ) के बिना ही दृष्टि स्थिर हो, निरोध के
बिना ही जिसका वायु स्थिर हो, बिना किसी अवलम्ब के जिसका चित्त स्थिर
हो वही योगी है वही गुरु है, उसीकी सेवा करनी चाहिये ॥ ४५ ॥
अमनस्कं सुशिष्येषु संक्राम्येन्द्रियजं सुखम् ।
निवारयन्ते ते वन्द्या गुरवोऽन्ये प्रतारकाः ॥ ४६ ॥
जो सुशिष्यों में 'अमनस्क' को संक्रान्त कर इन्द्रियजन्य सुख को हटाते हैं,
निवृत्त करते हैं वे गुरु वन्दनीय हैं उनसे अन्य गुरु-गुरु नहीं हैं वंचक हैं ॥४६॥
१. प्रथमखण्ड के १४ वें श्लोक में यही भाव व्यक्त है ।

[ ३७ ]
गुरुणा दर्शिते तत्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् ।
विमुक्तं मन्येतात्मानं मुच्यते नात्र संशयः ॥४७॥
श्री गुरु द्वारा उसके अर्थात् अमनस्क योग के प्रदर्शित किये जाने पर
शिष्य को तत्क्षण तन्मय हो जाना चाहिये और अपने को विमुक्त समझना
चाहिये । इस प्रकार का शिष्य अवश्य मुक्त हो जाता है, इसमें संशय
नहीं है ॥ ४७ ॥
यथा सिद्धरसस्पर्शात् ताम्रं भवति काञ्चनम् ।
गुरूपदेशश्रवणाच्छिष्यस्तत्त्वमयस्तथा ॥४८॥
जैसे सिद्ध ( शोधे गये ) पारे के स्पर्श से तांबा सोना हो जाता है, वैसे ही
गुरु के उपदेश सुनने से शिष्य तत्त्वमय हो जाता है । ४८ ॥
तस्मादुपासनात् सम्यक् सहजं प्राप्यते गुरोः ।
अनायासेन सततमात्माभ्यासरतो भवेत् ॥४६॥
इसलिए गुरु की भलीभांति उपासना करने से वह सहज तत्त्व (अमनस्क)
अनायास गुरु से प्राप्त होता है । शिष्य को उसको प्राप्त कर निरन्तर आत्मा-
भ्यास करना चाहिये ॥४६॥
विविक्ते विजने देशे पवित्रेऽतिमनोहरे ।
समासने सुखासीनः पश्चात् किंचित्समाश्रयेत् ॥५०॥
सुखस्थापितसर्वाङ्गः सुस्थिरात्मा सुनिश्चलः ।
बाहुदण्डप्रमाणेन कृतदृष्टिः समभ्यसेत् ॥५१॥
पवित्र निर्जन मनोहर प्रदेश में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर तनकर
सुखपूर्वक आसीन होकर१ सुख से सब अंगों को यथास्थान स्थापित कर,
सुस्थिर चित्त और निश्चल होकर एक हाथ तक आगे की ओर दृष्टि लगाकर
अभ्यास करे ॥ ५०, ५१ ॥
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१—देखिये श्री गीता—
“समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६।१३॥”
एवं श्री पातञ्जल योगसूत्र, ‘स्थिरसुखमासनम्’ ॥२।४६॥

[ ३८ ]
शिथिलीकृतसर्वाङ्ग आनखाग्रशिखाग्रतः ।
सबाह्याभ्यन्तरे सर्व चिन्ताचेष्टाविवर्जितः ॥ ५२ ॥
यदा भवेदुदासीनस्तदा तत्त्वं प्रकाशते ।
स्वयं प्रकाशिते तत्त्वे स्वानन्दस्तत्क्षणाद् भवेत् ॥ ५३ ॥
पैर के नख से लेकर शिखा के अग्रभाग तक सम्पूर्ण अंगों को शिथिल कर
योगी बाहरी और भीतरी सब चिन्ता और चेष्टा का त्याग कर जब उदासीन
होगा तब अमनस्क तत्त्व का प्रकाश होता है । उक्त तत्त्व के स्वयं प्रकाश में
आने पर आत्मानन्द तत्क्षण प्राप्त होता है ॥ ५२,५३ ॥१
आनन्देन च सन्तुष्टः सदाभ्यासरतो भवेत् ।
सदाभ्यासे स्थिरीभूते न विधिर्नैव च क्रमः ॥ ५४ ॥
आनन्द से सन्तुष्ट होकर सदा अभ्यास में निरत रहना चाहिये । सदा
अभ्यास के स्थिर होने पर फिर न कोई विधि है और न कोई क्रम है ॥५४॥२
न किंचिच्चिन्तयेद् योगी औदासीन्यपरो भवेत् ।
न किंचिच्चिन्तनादेव स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ॥ ५५ ॥
योगी कुछ भी चिन्तन न करे, औदासीन्यपरायण हो । कुछ चिन्तन न
करने से ही तत्त्व स्वयं प्रकाश में आ जाता है ॥ ५५ ॥३
१. देखिये श्री गीता, अध्याय ६, श्लोक १४ एवं १५ ।
२. विधि = कर्तव्य निश्चय । क्रम = पूर्वापरभाव ( प्रथम, द्वितीय, तृतीय )
अर्थात् करणीय कर्म किस नियम से, किस समय में, किस प्रकार करना
चाहिये, यह सब जानने की आवश्यकता नहीं है ।
३. “चिंतन न करने का अभ्यास करना चाहिये” अर्थात् गीता के
६।२५ ( शनैःशनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न
किंचिदपि चिन्तयेत् ) के अनुसार आत्मस्वरूप में मन को बैठाकर सर्वप्रकार
के विषयों का चिंतन वर्जन करे और चित्त कर्तृत्वबोधशून्य रहे ।

[ ३६ ]
स्वयं प्रकाशिते तत्त्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् ।
इदं तदिति तद्वक्तुं गुरुणापि न शक्यते ॥ ५६ ॥
तत्त्व जब स्वयं प्रकाशित होता है तब तत्क्षण उपासक (योगी) तत्त्वमय
हो जाता है । 'यह वह (तत्त्व) है' इस प्रकार उसका प्रतिपादन गुरु भी
नहीं कर सकते ॥ ५६ ॥१
वाङ्मनःकाय-संक्षोभं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ।
शिलाचित्रमिवात्मानं सुस्थिरं धारयेत्तदा ॥ ५७ ॥
वाणी, मन तथा शरीर के क्षोभ का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये
अर्थात् साधक सदा ऐसा प्रयत्न करे कि जिससे वाणी, मन और शरीर में
क्षोभ न आवे । तब शिला की प्रतिमा के समान अपने शरीर को खूब सुस्थिर
(निश्चल) रखना चाहिये ॥ ५७ ॥
यावत्प्रयत्नलेशोऽस्ति यावत्संकल्पकामना ।
अहं त्वमिति सम्प्राप्तिस्तावत्तत्त्वस्य का कथा ॥ ५८ ॥
जब तक थोड़ा सा भी प्रयत्न रहेगा, जब तक संकल्प-कामना होगी,
अहं त्वम् (मैं तुम का ज्ञान है अर्थात् मैं और तुम इस प्रकार का द्वैत बोध
रहेगा तब तक तत्त्व की बात कहां ? ॥ ५८ ॥
औदासीन्यामृतौघेन वर्धमानेन योगिनाम् ।
उन्मूलितमनोमूलो जगद्वृक्षः पतिष्यति ॥ ५६ ॥
योगियों के निरन्तर बढ़ रहे औदासीन्यरूपी अमृत के प्रवाह से मन रूपी
मूल (जगत् की जड़) के उखड़ जाने पर, उन्मूलित हो जाने पर जगद्रूपी
वृक्ष गिर जाएगा ॥ ५६ ॥
सदा जाग्रदवस्थायां स्वप्नवद् योऽवतिष्ठते ।
निःश्वासोच्छ्वासहीनस्तु निश्चितं मुक्त एव सः ॥ ६० ॥
जो योगी सदा जाग्रत् अवस्था में स्वप्नवत्, निःश्वास और उच्छ्वास से
विहीन रहता है वह निश्चय मुक्त ही है ॥ ६० ॥
१—"इदं तत्"=प्रत्यभिज्ञा होना ।

[ ४० ]
स्वप्नजागरणोपेता जन्तवो जगतीं गताः।
योगिनस्तत्त्वसम्पन्ना न जाग्रति न शेरते ॥ ६१ ॥
संसार को प्राप्त जीव अर्थात् सांसारिक लोग स्वप्न और जागरणवाले
हैं अर्थात् वे सोते भी हैं और जागते भी हैं। किन्तु तत्त्वसम्पन्न योगी जन न
जागते हैं और न सोते हैं; वे स्वप्नजागरणविहीन हैं ॥ ६१ ॥
स्वप्ने चिदंशशून्यत्वं जागरे विषयग्रहः ।
स्वप्नजागरणातीतमतस्तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ ६२ ॥
स्वप्न में चिदंश नहीं रहता और जागरण में विषयों का ग्रहण होता है,
इसलिए विद्वान् पुरुष तत्त्व को स्वप्न और जागरण से अतीत कहते हैं ।
अथवा इसलिए स्वप्न और जागरण से अतीत को तत्त्व कहते हैं ॥ ६२ ॥
भावाभावद्वयातीतं स्वप्नजागरणातिगम्।
मृत्युजीवननिर्मुक्तं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः ॥१ ६३ ॥
तत्त्व के जानकर विद्वान् तत्त्व को भाव और अभाव दोनों से अतीत,
स्वप्न और जागरण से परे एवं मरण और जीवन से रहित जानते हैं ॥६३॥
निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपपद्यते ।
तं भावं भावयेद् योगी निश्चितं मुक्त एव सः ॥ ६४ ॥
निद्रा के आदि में और जागरण के अन्त में जो भाव होता है उस भाव
की जो योगी भावना करे वह निश्चय रूप से मुक्त ही है ॥ ६४ ॥२
१. अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चा परे ।
समतत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ( अवधूत गीता १/३५ )
२. जागृत अवस्था के अन्त में जब विषयज्ञान तिरोहित हो जाता है और
निद्रा के आदि में जब जड़त्वज्ञान ( अज्ञान ) का उदय होता है, इन
दो अवस्थाओं के बीच में ( सन्धि में ) क्षणभर के लिए जिस अवस्था
का स्फुरण रहता है वही शुद्ध चैतन्य अवस्था है । इसे सायंसंध्या कहते
हैं। निद्रा भंग होने के बाद और विषयज्ञान उदय होने से पूर्व ठीक इसी
प्रकार की सन्धि अवस्था में शुद्ध चैतन्य का उदय होता है जिसे प्रातः-
सन्ध्या कहते हैं ।

[ ४१ ]
यथा सुप्तोत्थितः कश्चिद् विषयान् प्रतिपद्यते ।
जागर्त्येव ततो योगी योगनिद्राक्षये तथा ॥ ६५ ॥
जैसे सोकर उठा हुआ कोई पुरुष रूप, रसादि विषयों को प्राप्त करता
है वैसे योगनिद्रा के समय में योगी जागता ही रहता है, इसलिए वह योगी
है ॥ ६५ ॥१
सर्वतो भविता दृष्टिः प्रत्याभू (नी ?)ता शनैः शनैः ।
परतत्त्वमनादर्शं पश्यत्यात्मानमात्मना . ॥ ६६ ॥
चारों ओर फैलाई हुई दृष्टि जब धीरे धीरे प्रत्याहृत होकर लौटती है तब
साधक परतत्त्व को अपने में अपने आप देखता है ॥ ६६ ॥२
प्रथमं निःसृतादृष्टिः संगता यत्र कुत्रचित् ।
स्थिरीभूता च यत्रैव विनश्यति शनैः शनैः ॥ ६७ ॥
पहले निकली हुई ( निर्गत ) दृष्टि जहाँ कहीं संलग्न होती है वहीं पर स्थिर
होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है ॥ ६७ ॥३
त्रिपुरा रहस्य ज्ञानखण्ड में भी कहा है कि—
निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा ।
मध्ये संविद्वययोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ६ । ९४ ॥
एतत्पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यति ।
एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ६ । ९५ ॥
१. साधारण व्यक्ति निद्रा की अवस्था से जाग करके जैसे विषय का ग्रहण
करते हैं वैसे योगी योगनिद्रा समय में भी विषय ग्रहण करते हुए जागता
ही रहता है । अर्थात् लौकिक दृष्टि से प्रतीत होता है कि वह साधा-
रण मनुष्य के सदृश जागता है परन्तु वास्तव में यह योगी निद्रा में ही
स्थित है ।
२. दृष्टि प्रत्याहृत करना = अंतर्मुख करना ।
३. नष्ट हो जाती है = उसी में लीन हो जाती है ।

[ ४२ ]
प्रसह्य संकल्पपरम्पराणामुच्छेदने संततसावधानाम् ।
आलम्बभावादपचीयमाना शनैः शनैः शान्तिमुपैतिदृष्टिः ॥ ६८ ॥
संकल्प-परम्पराओं के बलात् उच्छेद में (विनाश करने में) सदा साव-
धान दृष्टि आलम्बन के अभाव से नष्ट (क्षीण) होती हुई धीरे-धीरे शान्त हो
जाती है ॥ ६८ ॥
यथा यथा सदाभ्यासान्मनसः स्थिरता भवेत् ।
वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ ६६ ॥
सदा के अभ्यास से जैसे जैसे मन में स्थिरता आती है वैसे वैसे वायु,
वाणी और शरीर में स्थिरता आ जाती है ॥ ६६ ॥
दृश्यं पश्यति (!) येन सत्प्रियकरं श्राव्यं तथा शृण्वतः
घ्रातव्यं परिजिघ्रतोऽथवदतो ध्येयं सदा ध्यायतः ।
स्पर्शं च स्पृशतो निरन्धनशिखा प्रख्यं मनोऽत्र क्रमाद्
अद्वैताख्यपदस्य तत्त्वपदवीं प्राप्तस्य सद्योगिनः ॥ ७० ॥
सुन्दर दृश्य को देख रहे, मनोहारी श्रव्य को सुन रहे, सूंघने योग्य सुन्दर
पदार्थों को सूंघ रहे, वक्तव्य वचनों को बोल रहे, ध्येय तत्त्व का हृदय में ध्यान
कर रहे, स्पृश्य वस्तु का स्पर्श कर रहे, अद्वैत पद के तत्त्व को प्राप्त हुए सद्योगी
का मन क्रम से निरन्धन अग्निशिखा के तुल्य शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥
यदा यत्र यथा यत्र स्थिरं भवति मानसम् ।
तदा तत्र तथा तस्माद् न तु चाल्यं कदाचन ॥ ७१ ॥
अतः जब जहाँ पर जिस प्रकार मन स्थिर हो तब वहाँ उसी प्रकार उसको
रहने देना चाहिये । वहाँ से उसे कदापि नहीं हटाना चाहिये ॥ ७१ ॥
यत्र यत्र मनो याति न निवार्यं ततस्ततः ।
अवारितं क्षयं याति वार्यमाणं तु वर्द्धते ॥ ७२ ॥
जहाँ जहाँ मन जाय वहाँ वहाँ से उसे निवृत्त करना (हटाना) नहीं
चाहिये । अवारित मन (न हटाया गया, न रोका गया मन) क्षय को प्राप्त
हो जाता है । यदि उसे रोका जाय तो वह बढ़ता है ।: ७२ ॥

[ ४३ ]
यथा निरंकुशो हस्ती कामान् प्राप्य निवर्तते ।
अवारितं मनस्तद्वत् स्वयमेव विलीयते ॥ ७३ ॥
जैसे निरंकुश हाथी अपने अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर लौट जाता है
वैसे ही अवारित ( न रोका गया ) मन भी अपनी इच्छा पूरी कर अपने आप
शान्त हो जाता है ॥ ७३ ॥
निवार्य्यमाणं यत्नेन तत्कर्तुं नैव शक्यते ।
न तिष्ठति क्षणेनैव मारुतस्य वशोदयात् ॥ ७४ ॥
मन प्रयत्नपूर्वक निवारित करने पर भी निवारित नहीं किया जाता है ।
वह ( मन ) वायु के वशीभूत रहने के कारण एक क्षण के लिये भी स्थिर
नहीं रहता ॥ ७४ ॥१
दुर्निवार्यं मनस्तद्वद्यावत्तत्त्वं न विन्दति ।
विदिते तु परे तत्त्वे मनो नौस्तम्भकाकवत् ॥ ७५ ॥
वैसे ही जब तक तत्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक इधर उधर भागता हुआ
मन दुर्निवार्य है । पर-तत्त्व जब प्राप्त हो जाता है तब मन समुद्र में जहाज के
( स्तम्भ ) मस्तूल पर बैठे हुए कौए की तरह स्थिर हो जाता है ॥ ७५ ॥
यथा तुलां तुलाधारश्चंचलां कुरुते स्थिराम् ।
याने सौख्ये सदाभ्यासान्मनोवृत्तिस्तदात्मनि ॥ ७६ ॥
जैसे तराजू से तोलनेवाला बनिया चंचल तराजू को स्थिर कर देता है
उसी प्रकार सदा के अभ्यास से यान में तथा सुख में मनोवृत्ति सदा आत्मा में
स्थिर रहती है ॥ ७६ ॥
निष्पन्नाखिलभावशून्यनिस्तृजः ( मनसः ? ) स्वान्तःस्थितस्तत्क्षणा त्
निश्चेष्टश्लथपाणिपादकरणग्रामो विकारोज्झितः ।
१. चञ्चलं हि मनःकृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ( श्री० गीता ६/३४ )

[ ४४ ]
निर्मूलप्रविनष्टमारुततया निर्जीवकाष्ठोपमो
निर्वातस्थितदीपवत् १ सहजवान् यस्याः स्थितेर्लक्ष्यते २ ॥ ७७ ॥
जिस पुरुष का मन सब प्रकार के भावों से विहीन हो चुका उसकी तुरन्त
आत्मनिष्ठा हो जाती है । जिसमें निष्ठा होने पर सहजवान् पुरुष के हाथ,
पैर आदि इन्द्रिय-समूह निश्चेष्ट और शिथिल हो जाते हैं, विकार हट जाते
हैं, वायु के निर्मूल ( उखाड़ा हुआ ) अतएव विनष्ट होने के कारण वह
निर्जीव काठ के तुल्य तथा निर्वात स्थान पर स्थित दीपक की तरह निश्चल
दिखाई देता है ॥ ७७ ॥
निक्षिप्तं कनकं विहाय कलुषं यद्वद् भवेन्निर्मलं
निर्वातस्थितनिस्तरंगमुदकं स्वच्छस्वभावं परम् ।
तद्वत् सर्वमिदं विहाय सकलं देदीप्यते निष्कलं
तत्त्वं तत्सहजं स्वभावममलं जातेऽमनस्के ध्रुवम् ॥ ७८ ॥
अग्नि में डाला हुआ सोना जैसे कालिमा का त्याग कर निर्मल हो जाता
है एवं जैसे निर्वात ( वायु रहित ) स्थान पर जल तरंगरहित तथा स्वच्छ
स्वभाव रहता है वैसे ही अमनस्क हो जाने पर सकल ( कला-सहित ) तत्त्व
निश्चय ही इस प्रपंच का त्याग कर निर्मल, निष्कल सहज स्वभाव हो
जाता है ॥ ७८ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासंगि मुक्तये निर्विषयं मनः ॥ ७६ ॥
मन ही मनुष्यों के बन्ध और मोक्ष का हेतु है । विषयों में आसक्त मन
बन्धन के लिए और निर्विषय मन मुक्ति के लिए कारण होता है ३ ॥ ७६ ॥
१. गीता ६।१६ देखिये ।
२. स्थितिलक्ष्यते ।
३. आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ गीता ० ६ । ५ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्तिर्निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( पंचदशी )

[ ४५ ]
मनोदृश्यमिदं सर्वं यत् किंचित्सचराचरम् ।
मनसोऽप्युन्मनीभावेऽद्वैतभावः प्रकल्पते ॥ ८० ॥
जो कुछ चराचर जगत् है यह सब मन से दृश्य है । मन का उन्मनी भाव
( अर्थात् विलय ) होने पर अद्वैतभाव हो जाता है ॥ ८० ॥
जायमानामनस्कस्य ह्युदासीनस्य तिष्ठतः ( सर्वतः ? ) ।
मृदुत्वं च परत्वं ( लघुत्वं ? ) च शरीरस्याथ जायते ॥ ८१ ॥
अमनस्कता जिसमें उत्पन्न हो रही है और जो चारों ओर से सर्वं विषयों
में उदासीन रहता है और जो स्थितिशील हो गया है ऐसे योगी का शरीर
कोमल और श्रेष्ठ हो जाता है ॥ ८१ ॥
अमनस्के क्षणात्क्षीणां कामक्रोधादिवन्धनम् ।
नश्यतिष्करणस्तम्भं देहगेहं श्लथं भवेत् १ ॥ ८२ ॥
अमनस्क भाव का उदय होने पर क्षणभर में काम क्रोधादि बन्धन क्षीण
हो जाते हैं, इन्द्रिय-स्तम्भ ( इन्द्रियसमूह ) नष्ट हो जाते हैं, देहरूपी घर
शिथिल हो जाता है ॥ ८२ ॥
सहजेनामनस्केन मनःशल्ये नियोजिते ।
आतपत्रमिवास्तम्भं शरीरं शिथिलायते ॥ ८३ ॥
सहज अमनस्क के द्वारा मनरूपी कांटे को निकाल फेंकने पर शरीर बिना
डंडे के छाते के सदृश शिथिल पड़ जाता है ॥ ८३ ॥
अमनस्कखनित्रेण समूलोन्मूलने कृते २ ।
अन्तःकरणशल्ये तु सुखी संजायते मुनिः ॥ ८४ ॥
अमनस्क रूपी कुदारी से अन्तःकरण ( मन ) रूपी शल्य ( कांटे ) के
समूल ( जड़ सहित ) उन्मूलित होने ( उखाड़ फेकने ) पर तो मुनि ( योगी )
सुखी हो जाता है ॥ ८४ ॥
१. भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्व संशयाः ।
क्षीयन्ते चास्यकर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ( श्रुति )
इस श्लोक का अंतिम चरण श्रीमद्भागवत ( ११.२०. ३० ) में इस
प्रकार है—"मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ।"
२. समूलोन्मूलिते सति ( कृते ) ।

[ ४६ ]
कदलीव महामाया समनस्केन्द्रिये सदा ।
अमनस्क फलं दत्त्वा सर्वथैव विनश्यति ॥ ८५ ॥
कदली (केले के पेड़) के सदृश महामाया समनस्केन्द्रिय पुरुष को एक
बार अमनस्करूप फल प्रदान कर सर्वदा के लिए विनष्ट हो जाती है ॥८५॥
इन्द्रियग्राहपदयोः निश्वासोच्छ्वासपक्षयोः ।
संक्षीणयोर्मनः पक्षी स्थिरसत्त्वोऽवसीदति ॥ ८६ ॥
मनरूपी पक्षी, जिसके निःश्वास और उच्छ्वास रूप दो पंख हैं, जो
इन्द्रिय तथा विषयालम्बन से युक्त है, के सम्यक् रूप से क्षीण होने पर उसकी
सत्ता स्थिर हो जाती है और नाश को प्राप्त हो जाता है१। ॥ ८६ ॥
श्वाससूत्रशतोपेतमिन्द्रियालय संकुलम् ।
त्रोटयित्वा मनोजालं मीनवज्जायते सुखी ॥ ८७ ॥
जैसे मत्स्य शत सूत्रों से बने हुए और बहुत छिद्र सम्पन्न जाल को तोड़ने
पर निश्चिंत हो जाता है उसी प्रकार योगी श्वास-प्रश्वास से युक्त और इन्द्रियों
से प्रभावित मन का नाश कर सुखी हो जाता है ॥ ८७ ॥
प्रशान्तेन्द्रियपादातो बुद्धिशक्तिसमन्वितः ।
वायुयानयुतश्छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत्२॥ ८८ ॥
अत्यन्त शान्त इन्द्रियां ही जिसकी पैदल सेना हैं, बुद्धि ही जिसके पास
शक्ति (शक्ति नामक शस्त्र) है एवं वायु ही जिसकी सवारी है ऐसा योगी
मनरूपी शत्रु को नष्ट कर सुखी हो ॥ ८८ ॥
गुणत्रयमयीं रज्जुं सुदृढामात्मबन्धनीम् ।
अमनस्कक्षुरेणैव च्छित्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ८६ ॥
योगी सत्त्व, रज और तम रूपी तीन गुणों की बनी (माया) जो आत्मा
को बांधनेवाली मजबूत रस्सी है, को अमनस्क योग रूपी छुरे से ही काटकर
मोक्ष को प्राप्त हो ॥ ८६ ॥
१. अर्थात् श्वास के नष्ट होने पर मन का नाश हो जाता है ।
२. “प्रशान्तेन्द्रियपादातं बुद्धिशक्तिसमन्वितम् ।
वायुयानयुतं छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत् ॥”
यह पाठ उपयुक्त प्रतीत होता है ।

[ ४७ ]
यथा संह्रियते सर्वमस्तं गच्छति भास्करे ।
कर जालं तथा सर्वममनस्के विलीयते ॥ ६० ॥
जैसे सूर्य के अस्त होने पर किरणजाल संहृत (छिन्न-भिन्न) हो जाते हैं
वैसे ही योगी के अमनस्क होने पर सब (विश्व) लीन हो जाता है ॥ ६० ॥
इन्द्रियग्राहनिर्मुक्ते निर्वाते निर्मलाम्ते ।
अमनस्कह्रदे स्नातः परामृतमुपाश्नुते ॥ ६१ ॥
जिस प्रकार मगर आदि जल जन्तुओं से मुक्त, वायुशून्य निर्मल जलवाले
सरोवर में स्नान करने पर तृप्ति-लाभ होता है उसी प्रकार इन्द्रियों के प्रभाव
से मुक्त तथा प्राण, अपान आदि क्रिया से शून्य अमनस्क अवस्था में अवगाहन
करने पर परा शान्ति (परमसुख) प्राप्त होती है ॥ ६१ ॥
इत्युक्तमेतत् सहजामनस्कं,
शिष्यप्रबोधाय शिवेन साक्षात् ।
नित्यं हि नूनं विगतप्रपंचं,
वाचामवाच्यं स्वयमेव बोध्यम् ॥ ६२ ॥
साक्षात् भगवान् शिव जी ने शिष्यों के प्रबोध (ज्ञान) के लिए यह सहज
अमनस्क योग इस प्रकार कहा । यह नित्य नूतन निष्कल, निष्प्रपंच, वाणी
द्वारा कथनीय नहीं है । इसे स्वयं ही जानना चाहिये अर्थात् यह स्वानुभवैक-
वेद्य है ॥ ६२ ॥
चित्ते चलति संसारोऽचले मोक्षः प्रजायते ।
तस्माच्चित्तं स्थिरीकुर्यादौदासीन्यपरायणः ॥ ६३ ॥१
चित्त के चंचल होने पर संसार का भान होता है और निश्चल होने पर
मोक्ष का उदय होता है । अतएव उदासीन (निष्क्रिय) होकर चित्त को स्थिर
करना चाहिये ॥ ६३ ॥
चतुविधा मनोवस्था विज्ञातव्या मनीषिभिः ।
विश्लिष्टं च गतायातं सुश्लिष्टं च सुलीनकम् ॥ ६४ ॥
विद्वान् पुरुषों को मनोवस्था चार प्रकार की जाननी चाहिये--१ विश्लिष्टा-
वस्था, २ गतागतावस्था, ३ सुश्लिष्टावस्था और ४ सुलीनावस्था ॥ ६४ ॥
१. चित्तमेव हि संसार । (मैत्रेयी उपनिषद्)

[ ४८ ]
विश्लिष्टं तामसं प्रोक्तं राजसं च गतागतम् ।
सुश्लिष्टं सात्त्विकं प्रोक्तं सुलीनं गुणवर्जितम् ॥ ६५ ॥
विश्लिष्टावस्था तामस कही गई है, गतागतावस्था राजस, सुश्लिष्टा-
वस्था सात्त्विक और सुलीनावस्था निर्गुण कही गई है ॥ ६५ ॥
विश्लिष्टं च गतायातं विकल्पविषयग्रहम् ।
सुश्लिष्टं च सुलीनं च विकल्प विषनाशनम् ॥ ६६ ॥
विश्लिष्ट और गतागत अवस्था में विकल्प और विषयों का ग्रहण होता
है। सुश्लिष्ट और सुलीन अवस्था में विकल्प रूपी विष का नाश हो
जाता है ॥ ६६ ॥
ततोऽभ्यासनियोगेन निरालम्बो भवेद् यदि ।
तदा सरिसभूतानि (सहजभूतात्मा ?) परमानन्द एव सः ॥६७॥
तदुपरान्त निरन्तर अभ्यासयोग से यदि योगी निरालम्ब हो जाय तो
उसका आत्मा सहजावस्था को प्राप्त करके परमानन्द ही बन जाता है ॥६७॥ १
अभ्यस्यतो मनःपूर्वं विश्लिष्टं चलमुच्यते ।
ततश्च निश्चलं किंचित् सानन्दं च गतागतम् ॥ ६८ ॥
सानन्दं निश्चलं चेतः ततः सुश्लिष्टमुच्यते ।
अतीव निश्चलीभूतं सानन्दं च सुलीनकम् ॥ ६६ ॥
अभ्यास कर रहे योगी का मन पहले चल रहने के कारण विश्लिष्ट
कहा जाता है। उसके बाद किंचित् निश्चल होने पर सानन्द कहा जाता है।
और अत्यन्त निश्चल हो जाने पर उसे सुलीन कहा जाता है ॥ ६८, ६६ ॥
बभूव तस्य कर्माणि पापपुण्यस्य संक्षयः ।
प्रयान्ति नैव लिम्पन्ति क्रियमाणानि साधुना ॥१००॥
साधु द्वारा किये जा रहे कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसे लिप्त नहीं करते हैं,
क्योंकि उसके पाप और पुण्य का संक्षय हो चुका रहता है ॥ १०० ॥
१. यहाँ पर "सरिसभूतानि" शब्द उचित प्रतीत नहीं हो रहा है अतः 'सहजभू-
तात्मा" शब्द ही योग्य है ।