अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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यथा सुप्तोत्थितः कश्चिद् विषयान् प्रतिपद्यते ।
जागर्त्येव ततो योगी योगनिद्राक्षये तथा ॥ ६५ ॥
जैसे सोकर उठा हुआ कोई पुरुष रूप, रसादि विषयों को प्राप्त करता
है वैसे योगनिद्रा के समय में योगी जागता ही रहता है, इसलिए वह योगी
है ॥ ६५ ॥१
सर्वतो भविता दृष्टिः प्रत्याभू (नी ?)ता शनैः शनैः ।
परतत्त्वमनादर्शं पश्यत्यात्मानमात्मना . ॥ ६६ ॥
चारों ओर फैलाई हुई दृष्टि जब धीरे धीरे प्रत्याहृत होकर लौटती है तब
साधक परतत्त्व को अपने में अपने आप देखता है ॥ ६६ ॥२
प्रथमं निःसृतादृष्टिः संगता यत्र कुत्रचित् ।
स्थिरीभूता च यत्रैव विनश्यति शनैः शनैः ॥ ६७ ॥
पहले निकली हुई ( निर्गत ) दृष्टि जहाँ कहीं संलग्न होती है वहीं पर स्थिर
होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है ॥ ६७ ॥३
त्रिपुरा रहस्य ज्ञानखण्ड में भी कहा है कि—
निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा ।
मध्ये संविद्वययोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ६ । ९४ ॥
एतत्पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यति ।
एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ६ । ९५ ॥
१. साधारण व्यक्ति निद्रा की अवस्था से जाग करके जैसे विषय का ग्रहण
करते हैं वैसे योगी योगनिद्रा समय में भी विषय ग्रहण करते हुए जागता
ही रहता है । अर्थात् लौकिक दृष्टि से प्रतीत होता है कि वह साधा-
रण मनुष्य के सदृश जागता है परन्तु वास्तव में यह योगी निद्रा में ही
स्थित है ।
२. दृष्टि प्रत्याहृत करना = अंतर्मुख करना ।
३. नष्ट हो जाती है = उसी में लीन हो जाती है ।