अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ]
कुलचाररताः सन्ति गुरवो बहवो मुने ।
कुलाचारविहीनस्तु गुरुरेको हि दुर्लभः ॥ १६ ॥
हे मुने, कौलों के आचार में रत बहुत से गुरु हैं, किन्तु कौलाचार से
विहीन एक ही गुरु है उसका प्राप्त होना सरल नहीं है ॥ १६ ॥
पुष्पात् प्रकाशते यद्वत् फलं पुष्पविघातकम् ।
देहात्प्रकाशते तत्त्वं तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १७ ॥
जैसे फूल से फल प्रकट होता है परन्तु फल फूल का विनाशक है वैसे ही
देह से तत्त्व प्रकट होता है पर तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १७ ॥
फलप्रकाशकं पुष्पं फलं पुष्पविनाशकम् ।
तत्त्वप्रकाशको देहस्तत्त्वं देहविनाशकम् ॥ १८ ॥
फूल फल का प्रकाशक है, फल फूल का विनाशक है। देह तत्त्व की
प्रकाशक है, तत्त्व देह का विनाशक है ॥ १८ ॥
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति ।
गोपः कक्षगते छागे कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥¹
जैसे मूर्ख ग्वाला बकरी के बच्चे के बगल में रहते भी मूर्खतावश उसे कुएँ
में झांकता फिरता है वैसे ही मूढ़ पुरुष अपने में स्थित तत्त्व को न जानकर
शास्त्रों में मोह को प्राप्त होते हैं अर्थात् व्यर्थ शास्त्रों में भटकते हैं ॥ १६ ॥
नमोऽस्तु गुरवे तुभ्यं सहजानन्दरूपिणे ।
यस्य वाक्यामृतं हन्ति संसारमोहनामयम् ॥ २० ॥
सहजानन्द रूपी आप गुरु के लिए नमस्कार है जिनका वाक्य-रूपी अमृत
संसार मोहरूपी व्याधि का विनाश करता है ॥ २१ ॥
१. अन्यत्र भी कहा है—शुष्कशास्त्रविवादेषु नैवायुः क्षपयेद् बुधः ।
नहि दीपकवार्तायामन्धकारो विनश्यति ॥