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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(234) अगस्त्य-संहिता
यस्तु गेहे हनूमन्तं सर्वदैव प्रपूजयेत्।।३२।।
अर्चयेतेन मन्त्रेण तस्य लक्ष्मीरचंचला।
दीर्घमायुर्ल्लभेदेव सर्वतो विजयी भवेत्।।३३।।
मायादिभूतसंक्षोभस्तस्य देशे न जायते।
नान्यत्साधनमस्त्येव मन्त्रात्तस्माद्धनूमतः।।३४।।
चौरादिव्याधिभूतानामयमेव परायणम्।
परापहृतराज्यानां¹ घर्षितानां परैः पुनः।।३५।।
सन्नाहभाजां युद्धेषु बद्धानां परसैनिकैः।
शत्रवः सर्वदा मित्रभावेनैवासते सदा।।३६।।
जो अपने घर में इस मन्त्र से प्रतिदिन हनुमान् की पूजा करते हैं उसके घर
लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। वह दीर्घायु तो होता ही है, सभी जगत उसकी जीत
होती है। माया आदि तथा भूतों का प्रकोप और कफ, पित्त और वायु का दोष
नहीं होता। हनुमान् के उस मन्त्र को छोड़कर उनके लिए दूसरा साधन है ही
नहीं। चोर, मानसिक सन्ताप, व्याधि और भूतों का भी यहीं पलायनु है। दूसरे ने
जिनका राज्य छीन लिया हो या दूसरे ने कुचल डाला हो या जो कवच पहनकर
युद्धों में लड़ रहे हों या शत्रु के सैनिकों ने पकड़ लिया हो ऐसे संकट में पड़े लोगों
के शत्रु हमेशा मित्र की भाँति व्यवहार करने लगते हैं।
शैवानां वैष्णवानां वै षट्कर्मार्त्र प्रदर्शितम् ।।²
वैष्णवों एवं शैवों के लिए यहाँ केवल छह कर्म प्रदर्शित किए गये हैं।
यात्राकाले हनूमन्तं स्मरन् यस्तु स्वकाद् गृहात्।।३७।।
निर्गच्छति स वेगेन इष्टार्थमपि गच्छति।
यात्रा के समय जो हनुमान् का स्मरण कर अपने घर से निकलते हैं, वे
शीघ्र ही अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचते हैं।
स्वापकाले स्मरन्नित्यं चौरभूतादिकं जपेत्।।३८।।
यद्वयं वासुदेवाय हनूमन्तपदन्ततः।
फलेति च फलि पदं धगेति धगितेति च।।३९।।
आयुरा ख फ डा डे हि सद्यः प्रत्ययकारकः।
चतुर्विंशत्यक्षरकोऽमोघमन्त्रोऽयं प्लीहरोगनुत्।।४०।।

  1. ग. पगपद्रतराज्यानां। 2. बंगाल की प्रति में इसी स्थल पर ग्रन्थ की समाप्ति हो
    जाती है।

५. पञ्चरात्र सिद्धान्त, ज्ञान-योग व उपसंहार

द्वातत्रिंशोऽध्यायः (235)
नागवल्लीदलं चैवमष्टप्रगुणितं शुभम्।
वंशजं सकलं स्थाप्य क्रमात् प्लीहोदरोपरि।।41।।
जप्त्वारण्योपलाग्नौ च दर्भमुष्टिं प्रजापयेत्।
मन्त्रेणानेनाभिमन्त्र्य सप्तवारं तथा पुनः।।42।।
तथाभिमन्त्रयेदेवं सप्तभिस्तु विचक्षणः।
स्फोटद्वारा भवेत् प्लीहो भस्मीभूतो न संशयः।।43।।
सोते समय नित्य हनुमान् का ध्यान करते हुए चौरभूतादि मन्त्र का जप
करें। ‘वासुदेवाय हनूमते फल फलि धग धगि आयुराखफडाडे’ इस चौबीस अक्षरों
के इस मन्त्र के जप से प्लीहा से ग्रस्त उदर पर रखकर बाँस का पत्ता उसपर क्रम
से रखकर जंगली पत्थर से उत्पन्न आग जलाकर एक मूँठ कुश को इस मन्त्र से
सात बार गर्म करें और उससे पेट पर सात बार अभिमन्त्रित करें। इससे फोड़ा
बनकर प्लीहा भस्म हो जाएगा। इसमें सन्देह नहीं।
तारं हकारोऽग्निसमः षड्दीर्घस्वरविन्दुमान्।
प्रणवान्ततोऽष्टाक्षरको मूलमन्त्र उदाहृतः।।44।।
तारक (ॐ) के बाद अग्नि समान हकार छह दीर्घ स्वरों के साथ बोलें
अन्त में पुनः प्रणव (ॐ) बोलें। यह हनुमान् अष्टाक्षर मन्त्र है।
ताराद्यं वज्रकायेति वज्रतुण्डेति ह्युद्धरेत्।
कपिलपिङ्गलप्रोक्ता ऊर्ध्वकेशं महाबलम्।।45।।
रक्तमुखतडिजिह्वा महारौद्रपदं ततः।
महादृढप्रहारश्च लंकेश्वरवधाय च।।46।।
महासेतुबन्धपदं महाशैलप्रवाह च।
गगने चर एह्येहि भगवंस्त्वं महापदम्।
बलपराक्रमपदं भैरवाज्ञां जयेति च।।47।।
एह्येहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय।
वैरिणं भञ्जयपदं द्विरुक्तो हं फडन्तकः।।48।।
पंचविंशत्याह्यधिकः प्रोक्तो मन्त्रः शताक्षरः।
मालाख्योऽयं ज्वरादीनां रोगानामन्तकः स्मृतः।।49।।

(236) अगस्त्य-संहिता
तार (ॐ) आदि में बोलकर 'वज्रकायं, 'वज्रतुण्ड' कहें। तब 'कपिलपिंगल'
यह कहकर 'ऊर्ध्वकेश' और 'महाबल' कहें। 'रक्त मुखतडिज्जिह्वा' कहकर 'महारौद्र'
पद कहें। तब 'महादृढप्रहार' और लंकेश्वरवधाय' कहें। इसके बाद 'महासेतुबन्ध'
पद कहकर 'महाशैलप्रवाह' कहें। इसके बाद 'गगने चर', एहि एहि, भगवँस्त्वं
और 'महा' कहें। तब 'बलपराक्रम' यह कहकर 'भैरवाज्ञां जय' ऐसा कहकर 'एहि
एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय' और वैरिणं भञ्जय' यह शब्द बोलकर दो बार
'हुं' कहकर 'फट्' शब्द से अन्त करें। इस प्रकार यह मन्त्र होगा- ॐ वज्रकाय
वज्रतुण्ड कपिलपिंगल ऊर्ध्वकेश महाबल रक्तमुखतडिज्जिह्वा महारौद्र महादृढप्रहार
लंकेश्वरवधाय महासेतुबन्ध महाशैलप्रवाह गगने चर एहि एहि भगवँस्त्वं
महाबलपराक्रम भैरवाज्ञां जय एहि एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय वैरिणं भञ्जय
भञ्जय हुं फट् । पचीस पदों से अधिक का यह शताक्षर मन्त्र है, जो ज्वर आदि
रोगों का नाश करनेवाला हनुमन् का मालामन्त्र है।
आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने ।
दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्वाच्चतुरस्रकम् ॥ ५० ॥
सर्वलक्षणसंव्यक्तं साध्याख्याकर्मगर्भितम् । '
तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमान्मथम् ॥ ५१ ॥
ततस्तत् पंचबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने ।
पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत् ॥ ५२ ॥
षडङ्गानग्निकोणादिकोणेष्वेव क्रमाल्लिखेत् ।
तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं द्वे विलिखेत्ततः ॥ ५३ ॥
हुं बीजं प्रतिकोणाग्रे केसराग्रेषु च स्वरान् ।
मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युश्चत्वारिंशच्च सप्त च ॥ ५४ ॥
वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट्पञ्चाष्टमके दले ।
पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैस्तत्सर्वं च तपोधन ॥ ५५ ॥
दिग्विदिनु लिखेद बीजे नारसिंह वराहयोः ।
क्रौं हुं चेति पूर्वादिभूगृहे चतुरस्रके ॥ ५६ ॥
यन्त्रेऽस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।

द्वात्रिंशोऽध्यायः (237)
सबसे पहले षट्कोण लिखें, तब उसके बाहर एक वृत्त लिखें। इसके बाद
आठ दल लिखें। तब चतुर्भुज बनावें। इस यन्त्र के मध्यभाग में सभी लक्षणों को
स्पष्ट करते हुए साध्य का नाम बीच में लिखकर दोनों ओर क्रिया लिखें। तब
उसका बीज बार कामबीज (क्लीं) के सम्पुटित कर लिखें। तब उन पाँच बीजाक्षरों
को फिर दुहरावें। पुनः दशाक्षर मन्त्र से उसे वेष्टित करें। अग्निकोण से आरम्भ
कर क्रम में लिखें। कोणों के दोनों कपोलों पर 'ह्रीं श्रीं' दो बार लिखें। प्रत्येक
कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसरों के अग्रभाग में सोलह स्वर लिखें।
मालामन्त्र में सैंतालीस वर्ण हैं, जिनमें छह छह वर्ण सात दलों में और पाँच आठवें
दल में लिखें। पूर्व दिशा से आरम्भ कर 'क' से ह तक व्यंजनों से सबको वेष्टित
करें। दिशाओं और दिक्कोणों में नरसिंह (औं) और वराह के बीज (ह्रौं) लिखें।
पूर्व दिशा से आरम्भ कर चतुर्भुज भू-पुर पर 'क्रौं हुं' यह लिखें। इस मन्त्र पर
सम्यक् रूप से आराधना कर साधक भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं।
एतद्यन्त्रं समालिख्य सौवर्णे राजते पटे।।57।।
भूर्जे वा सम्यगालिख्य गुलिकीकृत्य धारयेत् ।।58।।
अपुत्रो लभते पुत्रान् अधनो धनमाप्नुयात्।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं नृणाम्।।59।।
यन्त्रमेतत्समाख्यातं धारणात् पातकापहम्।
इस यन्त्र को सोना, चाँदी, कपड़ा या भोजपत्र पर लिखकर गोली बनाकर
धारण करें। इससे अपुत्र पुत्र प्राप्त करते हैं, निर्धन धन पाते हैं अधिक क्या
कहना! यह मनुष्यों के लिए सभी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। इसे धारण करने से
पापों को नाश होता है। यह यन्त्र इस प्रकार कहा गया।
षट्कोणादिमनोहरान्तं यन्त्रं लिखित्वा तस्य मध्ये साध्याख्या
कर्मगर्भितं रामबीजं लिखेत्। तत्सर्वं मन्मथेन क्रोडीकृत्य
अवशिष्टैर्मन्त्रार्णैर्मन्मथेन वेष्टयेत्।।60।। अष्टदलाद्बहिर्द्वारं
दशाक्षरवेष्टनम्। इति वसिष्ठ कल्पभेदः। शेषं स्पष्टम्। षट्कोणादिरथ
पूर्ववद् विलिखेत्। अथ तस्य मध्ये लिखेत्कर्म षट्सुकोणेष्वपि
क्रमात्।।61।।

(238) अगस्त्य-संहिता
षट्कोण से सुन्दर भूपूर तक यन्त्र लिखकर उसके बीच में साध्य का नाम
लिखना चाहिए और क्रिया से सम्पुटित कर रामबीज (रां) लिखें। सबको कामबीज
से सम्पुटित कर मन्त्र के शेष वर्णों से और कामबीज से वेष्टित करें। अष्टदल के
बाहर द्वार बनाकर दशाक्षर मन्त्र से वेष्ठित करें- यह वसिष्ठ कल्प में भिन्नता है।
शेष स्पष्ट है। षट्कोणादि भी पूर्वोक्त विधि से लिखें। इसके बाद षट्कोण के मध्य
में अभीष्ट कार्य लिखें और छह कोणों में भी क्रमशः लिखें।
मूलमन्त्राक्षराण्य़ेव सन्धिष्वङ्गं च मन्मथम्।
माया गण्डेषु किञ्जल्के स्वराणां लेखनं मतम्।।62।।
रेखाओं की सन्धियों पर मूलमन्त्र और रेखाओं पर कामबीज (क्लीं)
लिखें। कोण के कपोलों पर माया (ह्रीं) और केसरों पर सोलह स्वर लिखें।
पत्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः। क्रमेण हि दशाक्षरेण संवेष्ट्य
काद्यानि व्यञ्जनानि च।।63।।
पत्रों पर पूर्वोक्त रीति से मालामन्त्र लिखें। क्रमशः दशाक्षर मन्त्रों से
वेष्ठित कर 'क' आदि व्यञ्जनों से वेष्टित करें।
दिग्वि दिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः।
एतद् यन्त्रवरं चात्र साङ्गावरणमर्चयेत्।।63।।
सौवर्णे राजते भूर्जे लिखित्वाचनमाचरेत्।
फलं तु पूर्ववज्ज्ञेयं यन्त्रस्यास्य विचक्षणैः।।64।।
दिशाओं और कोणों में नरसिंह (क्ष्रौं) और वराह का बीजमन्त्र (फट्)
लिखें। यह यन्त्रराज है, इसका पूजन अंग और आवरण के साथ करें। सोना,
चाँदी या भोजपत्र पर लिखकर इसका पूजन करें। इस यन्त्र की आराधना का
फल विद्वान् वहीं जानें जो पूर्व में कहा गया है।
अगस्त्य उवाच
वक्ष्यामि रामचन्द्रस्य यन्त्रं कवचसंज्ञितम्।
धारणात् तस्य मर्त्यानां जायन्ते सर्वसिद्धयः।।65।।
नश्यन्ति सर्वपापानि विपदो यान्ति संक्षयम्।
भूतप्रेतपिशाचाद्याः पलायन्ते च दर्शनात्।।66।।

द्वातत्रिंशोऽध्यायः (239)
मित्राणि स्थिरतां यान्ति शत्रवो यान्ति मित्रताम्।
ग्रहाः प्रसादमायान्ति दास्यं यान्ति महीभृतः।।67।।
किमत्र बहुनोक्तेन नास्त्यनेन सुदुर्ल्लभम्।
यन्त्रेण रामचन्द्रस्य वज्रपञ्जरसंज्ञितम्।।68।।
अब मैं श्रीराम का वह यन्त्र बतलाता हूँ, जिसे कवच कहा गया है। इस
यन्त्र के धारण करने से मनुष्यों को सभी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। सभी पाप नष्ट
हो जाते हैं, सारी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती है। भूत, प्रेत पिशाच आदि देखने से
ही भाग जाते हैं। उनकी मित्रता स्थिर होती है, शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, ग्रह
प्रसन्न होते हैं और राजागण उस व्यक्ति के दास बन जाते हैं। अधिक क्या
कहना! श्रीरामचन्द्र के वज्रपंजर नामक यन्त्र के धारण करने से कुछ भी दुर्लभ
नहीं रहता।
कोष्ठैः सहैकविंशत्या पंक्तिद्वयविभूषितम्।
विन्यसेदुत्तमं चक्रमेतस्मिन् कवचं लिखेत्।।69।।
इक्कीस कोष्ठों के साथ दो पंक्तियों में सुसज्जित उत्तम चक्र लिखें और इसमें
कवच लिखें।
द्वादशाक्षरवर्णानि गृहाद्यन्त्रेषु विन्यसेत्।
अनुलोमविलोमाभ्यां प्राग्दाक्षिण्यक्रमेण च।।70।।
भू-पुर से यन्त्र तक द्वादशाक्षर मन्त्र अनुलोम और प्रतिलोम की विधि से
पूर्व-दक्षिण क्रम से लिखें।
राघवादीनि नामानि नमस्कारेण योजयेत्।
मे शिरः पात्विति च स्यात् सर्वतो वाक्ययोजना।।71।।
राघव आदि नाम नमस्कार के साथ लिखकर 'मे शिरः पातु' इत्यादि सभी
स्थलों पर वाक्य योजना होगी।
साध्याख्यसंयुतां षष्ठ्यां स्वाहेत्येकादशे गृहे।
स्वकामशक्तिवाग्वर्म नारसिंहमतः परम्।।72।।
लक्ष्मीपाशाङ्कुशार्णानि वाराहं फट्स्वरूपके।
स्वाहेति रामभद्रस्य द्वादशाक्षरमीरितम्।।73।।

(240) अगस्त्य-संहिता
छठे कोष्ठ में साध्य का नाम लिखकर ग्यारहवें कोष्ठ में स्वाहा लिखें। तब
स्वबीज (रं) , इसके बाद कामबीज (क्लीं), शक्ति( ह्रीं), वाग्बीज( ऐं), वर्म(हुं)
तथा नरसिंह बीज (ह्रौं), लक्ष्मीबीज (श्रीं), पाश (आं), अंकुश (क्रौं) और
वाराहबीज (फट्) लिखकर स्वाहा लिखे। यह श्रीराम का द्वादशाक्षर मन्त्र कहा
गया है- रं क्लीं ह्रीं ऐं हुं ह्रौं श्रीं आं क्रौं फट् स्वाहा।
सौवर्णे राजते पात्रे भूर्जे वा सम्यगालिखेत्।
अथवा ताम्रपत्रे च गुलिकीकृत्य धारयेत्।।74।।
सोना, चाँदी, भोजपत्र या ताँबा के पत्र भलीभाँति लिखें और गोली बना
कर धारण करें।
यावज्जीवं तु सौवर्णे रौप्ये विंशतिवर्षकम्।
भूर्जे द्वादशवर्षाणि तदर्द्धे ताम्रपत्रके।।75।।
सोना पर लिखा हुआ जीवनपर्यन्त, चाँदी पर बीस वर्ष, भोजपत्र पर
बारह वर्ष और ताँबा पर लिखा हुआ छह वर्ष तक यन्त्र प्रभावशाली रहता है।
एवं लिख्य विशेषेण यन्त्रशक्तिं प्रतिष्ठिताम्¹।
एतां ²रामबलोपेतामित्यादिश्लोकषट्कम्।।76।।
यन्त्राद् बहिःप्रदेशे तु वृत्ताकारं यथालिखेत्।

  1. क. यंत्रशक्तिंप्रतिष्ठिता।
  2. ये छह श्लोक बुधकौशिक-प्रोक्त रामरक्षास्तोत्र में इस प्रकार उपलब्ध होते
    हैं- एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी
    विनयी भवेत्।।10।। पाताल-भूतल-व्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि
    शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।11।। रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
    नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।12।। जगज्जैत्रैकमन्त्रेण
    रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।13।।
    वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।14।।
    आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो
    बुधकौशिकः।।15।। (रामरक्षास्तोत्र श्लोक सं.10-15)

द्वात्रिंशोऽध्यायः (241)

इस प्रकार विशेष रूप से लिखकर यन्त्रशक्ति के रूप में 'एतां रामबलोपेतां'
आदि छह श्लोक लिखकर प्रतिष्ठित करें। यन्त्र के बाहर वृत्त बनावें।
सर्वदुष्टोपशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् ।।77।।
आयुरारोग्यमैश्वर्यंपुत्रपौत्रप्रवर्द्धनम् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकं¹ च गच्छति।।78।।
यह यन्त्र सभी दुष्टों को शान्त करता है, सभी उपद्रवों का नाश करता है,
आयु आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि करता है। इसे धारण करनेवाले
सभी कामनाओं को प्राप्त करते हैं और विष्णुलोक भी जाते हैं।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये श्रीरामकवचोद्धारकथनं नाम
द्वात्रिंशोऽध्यायः।²
समाप्तश्चायं ग्रन्थः

  1. क. विष्णुलोके। 2. क. हनुमन्मन्त्रयंत्रश्रीरामकवचोद्धारकथनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः।

परिशिष्ट 1
हेमाद्रि-कृत 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' में उद्धृत 'अगस्त्य-संहिता'
(कमलाकर भट्ट-कृत 'निर्णय-सिन्धु' में उद्धृत)
उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम्। A.S.-28.5a-b
तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।। A.S.-28.5c-d
सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्त्यैकसाधनः। A.S.- 26.11a-b
अशुचिर्वापि पापिष्ठः कृत्वेदं व्रतमुत्तमम्। A.S.-26.11c-d
पूज्यः स्यात् सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः। A.S.-26.12a-b
यस्तु रामनवम्यान्तु भुङ्क्ते मोहाद् विमूढधीः। A.S.-26. 12c-d
कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः।। A.S.-26.13a-b
अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वव्रतोत्तमम्। A.S.-26.15 a-b
व्रतान्यन्यानि कुरुते न तेषां फलभाग् भवेत्।। A.S. -26.12c-d
प्राप्ते श्रीरामनवमीदिने मर्त्यो विमूढधीः। A.S.-27.9a-b
उपोषणं न कुरुते कुम्भीपाकेषु पच्यते।। A.S.-27.9c-d
आचार्यं चैव सम्पूज्य वृणुयात्प्रार्थयेन्निशि। A.S. 26.25 a-b
श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम। A.S.-26.25c-d
भक्त्याचार्यो भव प्रीतः श्रीरामोऽसि त्वमेव च।। A.S.-26.25e-f
तथा-
स्वगृहे चोत्तरे देशे दानस्योज्जवलमण्डपम्।
शङ्खचक्रहनूमद्भिः प्राग्द्वारे समलंकृतम्।। A.S.-26.35a-b
गरुत्मच्छाङ्गिबाणैश्च दक्षिणे समलंकृतम्। A.S.-26.35c-d
गदाखड्गाङ्गदैश्चैव पश्चिमे सुविभूषितम्।। A.S.26.36a-b
पद्मस्वस्तिकनीलैश्च कौबेरे समलंकृतम्। A.S- 26.36c-d

मध्ये हस्तचतुष्काढ्यं वेदिकायुक्तमायतम् ।। A.S.26.37a-b
ततः संकल्पयेद्देवं राममेव स्मरन्मुने। A.S.-26.38a-b
अस्यां रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः ।। A.S.-26.39a-b
उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि। A.S.-26.39c-d
इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां च प्रयत्नतः। A.S.-26.40a-b
श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते। A.S.-26.40c-d
प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहूनि मे ।। A.S.-26.41a-b
अनेकजन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च। A.S.-26.41c-d
ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमात्रतः ।। A.S.-26.42a-b
निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामाङ्कस्थितजानकीम्। A.S.-26.42c-d
बिभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां महामुने ।। A.S.-26.43a-b
वामेनाधःकरेणाराद्देवीमालिङ्ग्य संस्थिताम्। A.S.-26.43c-d
सिंहासने राजतेऽत्र पलद्वयविनिर्मिते ।।' A.S.-26.44a-b
तथा-
‘अशक्तो यो महाभागः स तु वित्तानुसारतः। A.S.-27.2a-b
पलेनार्धतदर्धेन तदर्धार्धेन वा मुने ।। A.S.-27.2c-d
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद्रघुनन्दम्। A.S.-28.25c-d
पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ धृतच्छत्रकरावुभौ ।। A.S.-28.26a-b
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं चापि कारयेत्। A.S.-28.26c-d
दक्षिणाङ्गे दशरथं पुत्रावेक्षणतत्परम् ।।
मातुरङ्कगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम्। A.S.-28.27a-b
पञ्चामृतस्नानपूर्वे संपूज्य विधिवत्ततः ।।
कौसल्यामन्त्रस्तु-
‘रामस्य जननी चासि रामरूपमिदं जगत्।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि लोकमातर्नमोऽस्तु ते ।।
नमो दशरथायेति पूजयेत् पितरं ततः ।।'
अत्र दशावरणपञ्चावरणादिपूजाऽन्यत्र ज्ञेया।
'अशोककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं दद्याद्विचक्षणः।
दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। A.S.-28.36a-b
राक्षसानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च। A.S.-28.36c-d
परित्राणाय साधूनां जातो रामः स्वयं हरिः ।। A.S.-28.37a-b

(244) अगस्त्य-संहिता
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ।| A.S.-28.37c-d
पुष्पाञ्जलिं पुनर्दत्त्वा यामे यामे प्रपूजयेत्।।
दिवैवं विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणं ततः।
ततः प्रातः समुत्थाय स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः।। A.S.-26.51a-b
समाप्य विधिवद्रामं पूजयेद्विधिवन्मुने। A.S.-26.51c-d
ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।। A.S.-26.52a-b
पूर्वोक्तपद्मकुण्डे वा स्थण्डिले वा समाहितः। A.S.-26.52c-d
लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टोत्तरं ततः।। A.S.-26.53a-b
साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः। A.S.-26.53c-d
ततो भक्त्या सुसंतोष्य आचार्यं पूजयेन्मुने।। A.S.-26.54a-b
ततो रामं स्मरन् दद्यादेवं मन्त्रमुदीरयेत्। A.S.-26.55c-d
“इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलंकृताम्।। A.S.-26.56a-b
चित्रवस्त्रयुगच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते। A.S.-26.56c-d
श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः।।” A.S.-26.57a-b
इति दत्त्वा विधानेन दद्याद्वै दक्षिणां भुवम्। A.S.-26.58c-d
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।।” A.S.-26.60c-d
इति।

(245)

परिशिष्ट 2
'रामतापिनीयोपनिषद्' में उद्धृत रामोपासना की फलश्रुति
गाणपत्येषु शैवेषु शाक्तसौरेष्वभीष्टदः। A.S.-19.1^(c-d)
वैष्णवेष्वपि सर्वेषु राममन्त्रः फलाधिकः ।।4।। A.S.-19.2^(a-b)
गाणपत्यादिमन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिकः। A.S.-19.2^(c-d)
मन्त्रस्तेष्वप्यनायासफलदोऽयं षडक्षरः ।।5।। A.S.-19.3^(a-b)
षडक्षरोऽयं मन्त्रः स्यात् सर्वाघौघनिवारणः। A.S.-19.3^(c-d)
मन्त्रराज इति प्रोक्तः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ।।6।। A.S.-19.4^(a-b)
कृतं दिने यद्दुरितं पक्षमासर्तुवर्षजम्। A.S.-19.4^(c-d)
सर्व दहति निःशेषं तूलराशिमिवानलः ।।7।। A.S.-19.5^(a-b)
ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च। A.S.-19.5^(a-b)
स्वर्णस्तेयसुरापानगुरूल्पायुतानि च ।।8।। A.S.-19.6^(c-d)
कोटिकोटिसहस्राणि उपपातकजान्यपि। A.S.-19.7^(a-b)
सर्वाण्यपि प्रणश्यन्ति राममन्त्रानुकीर्तनात् ।।9।। A.S.-19.7^(c-d)
भूतप्रेतपिशाचाद्याः कूष्माण्डब्रह्मराक्षसाः। A.S.-19.8^(a-b)
दूरादेव प्रधावन्ति राममन्त्रप्रभावतः ।।10।। A.S.-19.8^(c-d)
ऐहलौकिकमैश्वर्यं स्वर्गाद्यं पारलौकिकम्।
कैवल्यं भगवत्त्वं च मन्त्रोऽयं साधयिष्यति ।।11।।
ग्राम्यारण्यपशुघ्नत्वं संचितं दुरितं च यत्। A.S.-24.35c-d
मद्यपानेन यत्पापं तदप्याशु विनाशयेत् ।।12।। A.S.-24.37^(a-b)
अभक्ष्यभक्षणोत्पन्नं मिथ्याज्ञानसमुद्भवम्। A.S.-24.37^(c-d)
सर्व विलीयते राममन्त्रस्यास्यैव कीर्तनात् ।।13।। A.S.-24.38^(a-b)
श्रोत्रियस्वर्णहरणाद्यच्च पापमुपस्थितम्। A.S.-24.38^(c-d)
रत्नादेश्चापहारेण तदप्याशु विनाशयेत् ।।14।। A.S.-24.39^(a-b)
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं हत्वा च किल्विषम्।

(246) अगस्त्य-संहिता

संचिनोति नरो मोहाद्यद्यत्तदपि नाशयेत् ।। 15 ।।
गत्वापि मातरं मोहादगम्यैश्च योषितः। A.S.-24.39c-d
उपास्यानेन मन्त्रेण रामस्तदपि नाशयेत् ।। 16 ।। A.S.-24.40a-b
महापातकपापिष्ठसङ्गत्या संचितं च यत्। A.S.-24.40c-d
नाशयेत्तत्कथालापशयनासनभोजनैः ।। 17 ।। A.S.-24.41a-b
पितृमातृवधोत्पन्नं बुद्धिपूर्वमघं च यत्। A.S.-24.41c-d
तदनुष्ठानमात्रेण सर्वमेतद्विलीयते ।। 18 ।। A.S.-24.44a-b
यत्प्रयागादितीर्थोक्तप्रायश्चित्तशतैरपि। A.S.-24.45c-d
नैवापनोद्यते पापं तदप्याशु विनाशयेत् ।। 19 ।। A.S.-24.46a-b
पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु कुरुक्षेत्रादिषु स्वयं। A.S.-24.46c-d
बुद्धिपूर्वमघं कृत्वा तदप्याशु विनाशयेत् ।। 20 ।। A.S.-24.47a-b
कृच्छ्रैस्तप्तपराकाद्यैर्नानाचान्द्रायणैरपि।
पापं च नापनोद्यं यत्तदप्याशु विनाशयेत् ।। 21 ।।
आत्मतुल्यसुवर्णादिदानैर्बहुविधैरपि। A.S.-24.47c-d
किंचिदप्यपरिक्षीणं तदप्याशु विनाशयेत् ।। 22 ।। A.S.-24.48a-b
अवस्थात्रितयेष्वेव बुद्धिपूर्वमघं च यत्।
तन्मन्त्रस्मरणेनैव निःशेषं प्रविलीयते ।। 23 ।।
अवस्थात्रितयेष्वेवं मूलबन्धमन्त्रं च यत्।
तत्तन्मन्त्रोपदेशेन सर्वमेतत्प्रणश्यति ।। 24 ।।
आब्रह्मबीजदोषाश्च नियमातिक्रमोद्भवाः। A.S.-21.10a-b
स्त्रीणां च पुरुषाणां च मन्त्रेणानेन नाशितः।। 25 ।। A.S.-21.10c-d
येषु येष्वपि देशेषु रामभद्र उपास्यते। A.S.-21.11c-d
दुर्भिक्षादिभयं तेषु न भवेत्तु कदाचन ।। 26 ।। A.S.-21.12a-b
शान्तः प्रसन्नवदनो ह्यक्रोधो भक्तवत्सलः। A.S.-21.12c-d
अनेन सदृशो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते ।। 27 ।। A.S.-21.13a-b
सम्यगाराधितो रामः प्रसीदत्येव सत्वरम्। A.S.-21.13c-d
ददात्यायुष्यमैश्वर्यमन्ते विष्णुपदं च यत् ।। 28 ।। A.S.-21.14a-b

(247)

परिशिष्ट 3
'अगस्त्य-संहिता' से उद्धृत रामनवमी-व्रत-कथा
पाण्डुलिपि 'अ' में लिखित रामनवमीपूजा विधि
अथ रामनवमीपूजाविधिः। सुवर्णप्रतिमां कारयित्वा मृण्मयीं वा प्रातः
कृतनित्यक्रियः आचम्य पूर्व्ववत् ताम्रपात्रमादाय उदङ्मुख उत्तिष्ठन् ॐ भगवन् सूर्य्य
भगवत्यो देवता यूयमत्र साक्षिण्योऽद्यादिप्रतिवत्सरं चैत्रशुक्लनवम्यां
श्रीरामनवमीव्रतमहमाचरिष्यामीति निवेद्य कुशत्रय-तिल-जलान्यादाय सङ्कल्पङ्कुर्य्यात्।
ॐ कुलकोटिसमुद्धरणपूर्व्वक-विष्णुलोकमहितत्त्व-कामनया अद्यादि-प्रतिवत्सरं
चैत्रशुक्लनवम्यां भगवन्तं ससीतलक्ष्मणराममहं पूजयिष्ये।
ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञꣳसमिमं दधातु।
विश्वेदेवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ। । ३ॐ ससीतरामलक्ष्मण इह सुप्रतिष्ठितो भव।
इति प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात्।
ततो दूर्वादलश्यामं पद्मपत्राक्षं पीतवाससम् द्विभुजं धनुर्द्धरं कवचिनं ध्यात्वा
रां रामाय नम इति स्नपनं ॐ भूर्भुवःस्वर्भगवन् राम इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य
स्नापयित्वा
ॐ सीतापते नमस्तुभ्यं रावणस्यान्तकारक।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कौशल्यानन्दवर्द्धन।।
एषोर्घ्यः रां रामाय नमः। इदमनुलेपनं ३। एते तिलाः। एते यवाः रां
रामाय नमः। पुष्पाण्यादाय
सीतापते नमस्तुभ्यं रावणस्यान्तकारक।
गृहाण कुसुमं देव कौशल्यानन्दवर्द्धन।।
एतानि पुष्पाणि रां रामाय नमः।

(248) अगस्त्य-संहिता
इमे यज्ञोपवीते बृहस्पतिदैवते रां (रामाय नमः।) इदं वस्त्रं बृहस्पति दैवतं
रां (रामाय नमः।)
एतानि गन्धपुष्पधूपदीप्ताम्बूलनैवेद्यानि रां रामाय नमः।
ॐ सीते इहागच्छ इह तिष्ठ। तत्रार्घदानमन्त्रः-
ॐ सीते देवि नमस्तुभ्यं रामचन्द्रप्रिये सदा।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं वरदा भव शोभने।।
एषोऽर्घ्यः ॐ सीतायै नमः। एवं पञ्चोपचारैः पूजयेत्।
तथैव कौशल्यां पूजयेत्। कौशल्ये इहागच्छ इह तिष्ठ। अर्घ्यदानमन्त्रः-
ॐ कौशल्ये प्रणमामि त्वां राममातः सुशोभने।
अदिते त्वं गृहाणार्घ्यं वरदा भव सर्वदा।।
एषोऽर्घ्यः ॐ कौशल्यायै नमः। एवं पञ्चोपचारैः पूजयेत्।
ततः ॐ कैकेयि इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ कैकेयि प्रणमामि त्वां रावणस्यान्तकारिणि।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं वरदा भव शोभने।।
एषोऽर्घ्यः ॐ कैकेय्यै नमः। एवं चन्दनादिना पूजयेत्।
ततः सुमित्रापूजा।
ॐ सुमित्रे इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ सुमित्रे त्वां नमस्यामि शेषमातर्नमोऽस्तु ते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं वरदा भव सुन्दरि।।
एषोऽर्घ्यः ॐ सुमित्रायै नमः। एवं चन्दनादिना पूजयेत्।
ॐ दशरथ इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ अजपुत्र महाबाहो श्रीमद्दशरथ प्रभो।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रामतात नमोऽस्तु ते।।
एषोऽर्घ्यः ॐ दशरथाय नमः। एवं पूजयेत्।
ॐ भरत इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ दाशरथे त्वां नमस्यामि रामभक्त नृपात्मज।
मया समर्पितं तुभ्यमर्घोऽयं प्रतिगृह्यताम्।।
एषोऽर्घ्यः ॐ भरताय नमः।
ॐ लक्ष्मण इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ लक्ष्मणत्वं महाबाहो इन्द्रजिद्वधकारक।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सुमित्रातनय प्रभो।।
एषोऽर्घ्यः ॐ लक्ष्मणाय नमः। एवं पूजयेत्।

परिशिष्ट 3 (249)

ॐ शत्रुघ्न इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ शत्रुघ्न प्रणमामि त्वां लवणस्यान्तक प्रभो।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रामभक्तं प्रयच्छ मे।।
एषोऽर्घ्यः ॐ शत्रुघ्नाय नमः।
एताँयँथोक्तविधिना पञ्चोपचारैः पूजयेत्। ततः प्रत्येकमपरे पूजनीयाः।
ॐ सुग्रीव इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ सुग्रीवाय नमस्तुभ्यं दशग्रीवान्तकप्रिय।
गृहाणार्घ्यं महावीर किष्किन्धानाय़क प्रभो।।
एषोर्घ्यः ॐ सुग्रीवाय नमः। एवं पूजयेत्।
ॐ हनुमन् इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ कूर्मकुम्भीरसंकीर्णस्वात्तीर्णोऽसि महार्णवम्।
हनूमते नमस्तुभ्यं गृहाणार्घ्यं महामते।।
एषोर्घ्यः ॐ हनूमते नमः। एवं पूजयेत्।
विभीषण अंगद धृष्टि जय विजय जयन्त सुराष्ट्र राष्ट्र अशेष नल नील
द्वारपाल सुमन्त एते सचिवाः पूज्याः। ततो वज्र दण्ड पाश खड्ग शूल अम्बुज चक्र
शङ्ख गदा शार्ङ्ग बाण वसिष्ठ वामदेव जाबालि गौतम विष्क्सेनप्रभृतयः पूजनीयाः।
एवम्।
पाण्डुलिपि 'आ' में लिखित रामनवमीपूजा विधि
(1) राम (15) नल
(2) सीता (16) नील
(3) लक्ष्मण (17) धृष्ट
(4) दशरथ (18) जय
(5) कौशल्या (19) विजय
(6) कैकेयी (20) सुराष्ट्र
(7) सुमित्रा (21) राष्ट्र
(8) भरत (22) कोपन
(9) शत्रुघ्न (23) अकोपन
(10) सुग्रीव (24) सुमन्त्र
(11) हनुमान् (25) इन्द्रादिदशदिक्पाल
(12) जाम्बवान् (26) अनन्त
(13) विभीषण (27) ब्रह्मा
(14) अंगद

(250) अगस्त्य-संहिता

ततोऽत्र पूजयेत् पुष्पाक्षतैः ॐ वज्राय नमः, ॐ शक्त्यै नमः, ॐ
दण्डाय नमः, ॐ शङ्खाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ गदाय नमः, ॐ शूलाय
नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ अङ्कुशाय नमः। ततः
सूर्यादिनवग्रहाः इति।
अथ घृतदीपम्।
नमोऽस्यां रात्रौ चैत्रशुक्लरामनवम्यां सकलपापविनिर्म्मुक्तिपूर्व्वक-ज्योतिष्मद्
विमानकरणक-विष्णुलोकगमनकामनयामुं घृतदीपं श्रीरामचन्द्रायहन्ददे॥
प्राणप्रतिष्ठामन्त्रः। ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं
यज्ञग् समिमं दधातु। विश्वेदेवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ।।। श्रीरामचन्द्र
साङ्ग-सायुध-सवाहन-सपरिवार इह सुप्रतिष्ठितो भव। इति
छन्दोगानां प्राणप्रतिष्ठामन्त्रः ॐ वाङ्मनः प्राणापानौ व्यान चक्षुः श्रोत्रं
शर्म्मवर्म्मभूतिः प्रतिष्ठा ॐ श्रीरामचन्द्र साङ्ग-सायुध-सवाहन-सपरिवार इह
सुप्रतिष्ठितो भव॥
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वोपविश्य-
नमो नमस्ते देवेश सुरासुरपते जय।
जय कामद भक्तानां जय दाशरथे प्रभो।।
जय सीतापते नाथ जय भग्नेशकार्मुक।
जब ब्रह्माण्डखण्डेश जय रावणमर्द्दन।।
जय बालिकपीशघ्न जय सुग्रीवराज्यद।
जय द्विजगणानन्द जय वायुसुतप्रिय।।
इति संकीर्त्य देवेशं प्रणिपत्य पुनः पुनः।
सर्वान् कामानवाप्नोति ततो मोक्षमवाप्नुयात्।।
एष पुष्पाञ्जलिः नमो भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।।
।। श्रीरामचन्द्राय नमः।।
अथ रामनवमीपूजाविधिः
मृण्मयीं प्रतिमां विधाय ॐ रामोऽसीति नाम कृत्वा ॐ
मनोजूतिरित्य़ादिमन्त्रेण प्रतिष्ठां कृत्वा रामं ध्यायेत्-
कोमलाङ्गं विशालाक्षमिन्द्रनीलसमप्रभम्।
दक्षिणांशे दशरथं पुत्रावेक्षणतत्परम्।।

परिशिष्ट 3 (251)
पृष्ठतो लक्ष्मणन्देवं सैच्छत्रं कनकप्रभम्।
पार्श्वे भरत शत्रुघ्नौ तालवृन्तकरावुभौ॥
अग्रेऽप्यग्रं हनूमन्तं रामानुग्रहकांक्षितम्।
एवं ध्यात्वा प्रतिमां स्वशाखोक्तविधिना संस्थापयेत्।
ॐ इन्द्राग्निर्यमश्चैव निर्ऋतोवरुणोऽनिलः।
कुबेर ईशो ब्रह्मा च दिक्पालाः स्नापयन्तु ते॥
इत्यनेन स्नापयेत्।
ततो यवमादाय ॐ ह्रौं श्रीं महावीर समरवीरपते श्रीरामचन्द्र इहागच्छ
इह तिष्ठ इत्यावाह्य स्थापयित्वा फल-पुष्पाम्बुसम्पूर्ण-चूताशोक-तुलसीदल-
संयुक्तमुज्ज्वलं शङ्खं गृहीत्वा।
दशग्रीवविनाशाय जातोऽसि रघुनन्दन।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं प्रसीद परमेश्वर॥
एषोऽर्घ्यः भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
सुगन्धिचन्दनं दिव्यं कर्पूरादिमिश्रितम्।
सीतया भार्य्यया सार्द्धं रक्षोघ्नं परिगृह्यताम्॥
इदमनुलेपनं भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
पुष्पमादाय
पुष्पन्तु परं दिव्यं पुण्यं सुरभिसंयुतम्।
गृहाण परया भक्त्या मया दत्तं जगत्पते॥
इदं पुष्पं भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
ततो यज्ञोपवीतमादाय
श्रीरामविबुधाधीश सुरासुरवरप्रद।
यज्ञोपवीतं मद्दत्तं परिधत्स्व रघुनन्दन॥
इमे यज्ञोपवीते बृहस्पतिदैवते भगवते श्री रामचन्द्राय नमः।
ततो वासोयुगलमादाय
ॐवासो युगं गृहाणेश तन्तुसन्तानकल्पितम्।
सीतया भार्य्यया सार्द्धं रक्षोघ्नं परिधीयताम्॥
इमे वासोयुगे बृहस्पतिदैवते भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
ॐरामचन्द्र सुरश्रेष्ठ जानक्या भ्रातृभिः सह।
पूजितोऽसि मया देव धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
एष धूपः भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।

(252) अगस्त्य-संहिता
ॐ मारीचघ्न महाबाहो सङ्ग्रामव्यसन प्रभो।
दीपोऽयं गृह्यतां देव त्रैलोक्यध्वान्तनाशनः॥
एष दीपः भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
इदं ताम्बूलं भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
नैवेधं फल पक्वान्नं शर्कराघृतपाचितम्।
गृहाण जगतां सर्व्वैर्बन्धुजनैस्सह॥
एतानि नैवेधानि ॐ भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
ॐ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष त्राहि मां भवसागरात्।
सर्वपापप्रणाशार्थं दण्डवत् प्रणमाम्यहम्॥
इत्यनेन दण्डवत् प्रणामं कुर्य्यात्।
ॐ यानि कानि कृतानीह पापानि मम जन्मनि।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे॥
अनेन मन्त्रेण प्रदक्षिणं कुर्य्यात्। ततः उपविश्य पठेत्।
ॐ नमस्ते देव देवेश सुरासुरपते जय।
जय कामद भक्तानां जय दाशरथे प्रभो॥
जय सीतापते नाथ जय भग्नेशकार्मुक।
जय ब्रह्माण्ड खण्डेश जय रावणमर्द्दन॥
जय बालीकपीशघ्न जय सुग्रीवराज्यद।
जय द्विजगणानन्द जय वायुसुतप्रिय॥
इति संकीर्त्य देवेशं प्रणिपत्य पुनः पुनः।
सर्वान् कामानवाप्नोति ततो मोक्षमवाप्नुयात्॥
एष पुष्पाञ्जलिः नमो भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः।
ततः सीतापूजा।
ॐ सीते इहागच्छ इह तिष्ठ इत्यावाह्य
ॐ दशाननविनाशाय जाता धरणिसंभवा।
मैथिली शीलसम्पन्ना पातु नः पतिदेवता॥
एषोऽर्घ्यः ॐ सीतायै नमः। इदमनुलेपनम्। इदं सिन्दूरम्। इदमक्षतम्। इदं
पुष्पम्। एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-नैवेद्यानि ॐ सीतायै नमः।
ततो लक्ष्मण इहागच्छ इह तिष्ठ इत्यावाह्य
ॐ निहतो रावणियेन शक्रजिच्छत्रुघातिना।
सः पातु लक्ष्मणो धन्वी सुमित्रानन्दवर्द्धन॥
एषोऽर्घ्यः भगवते श्री लक्ष्मणाय नमः।

परिशिष्ट 3 (253)
ततोऽष्टदलमध्ये पूर्वदले ॐ दशरथ इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य
ॐ नानाविधगुणागार गृहाणार्घ्यं नृपोत्तम।
रविवंशप्रदीपाय नमो दशरथाय वै॥
एषोऽर्घ्यः दशरथाय नमः।
एवं गन्धादिना पूजयेत्। आग्नेयदले कौशल्यामावाहयेत्।
ॐ कौशल्ये इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ गृहाणार्घ्यं मया देवि रम्ये दशरथप्रिये।
जगदानन्दवन्द्यायै कौशल्यायै नमो नमः॥
एषोऽर्घ्यः कौशल्यायै नमः। इदमनुलेपनम्। इदं सिन्दूरम्। इदमक्षतम्।
इत्यादिना पूजयेत्।
याम्यदले कैकेयि इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ दृढप्रतिज्ञे कैकेयि मातर्भरतवन्दिते।
गृहाणार्घ्यं महादेवि रक्ष मां भक्तवत्सले॥
एषोऽर्घ्यः कैकेय्यै नमः। इदमनुलेपनम्। इदं सिन्दूरम्। इदमक्षतम्। इत्यादिना
पूजयेत्।
नैर्ऋत्यदले सुमित्रे इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ शुभलक्षणसम्पन्ने लक्ष्मणानन्दकारिणि।
सुमित्रं देहि मे देवि सुमित्र्यै वै नमो नमः॥
एषोऽर्घ्यः सुमित्रायै नमः। एवं गन्धादिना पूजयेत्।
पश्चिमदले भरत इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ भक्तवत्सल भक्त्यात्म रामभक्तिपरायण।
भक्त्या दत्तं गृहाणार्घ्यं भरताय नमो नमः॥
ॐ एषोऽर्घ्यः ॐ भरताय नमः। इदमनुलेपनेम्। एते तिलाः। इदं पुष्पम्।
एवं पूजयेत्।
ततः वायव्यदले शत्रुघ्न इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ लवणान्तक शत्रुघ्न शत्रुकाननपावक।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं प्रसीद कुरु मे शुभम्॥
एषोऽर्घ्यः ॐ शत्रुघ्नाय नमः। एवं गन्धादिना पूजयेत्।
उत्तरदले सुग्रीव इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ सुग्रीवाय नमस्तुभ्यं दशग्रीवान्तकप्रिय।
गृहाणार्घ्यं महावीर किष्किन्धानायक प्रभो॥
एषोर्घ्यः ॐ सुग्रीवाय नमः।