यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
About this granth
Yatharth Geeta (यथार्थ गीता), "the Gita as it truly is", is Swami Adgadanand's Hindi commentary on the Bhagavad Gita, subtitled Manav Dharmashastra, "the scripture of humanity". Its cover presents it as an eternal explanation of the Gita "after a gap of 5,200 years". The author is a disciple of Paramahamsa Parmanand of the Anusuiya ashram at Chitrakoot, and the commentary draws on the meditative practice of that lineage.
The publisher's note describes him as a monk without academic degrees who regarded writing as a distraction from devotion but undertook this commentary as a divine command. The commentary reads the war of the Gita as an inner struggle, and yajna and karma as stages of meditative practice.
That reading shows in its chapter names, such as "Doubt and Despondency", "Inquiry into Action", "Incentive to Destroy the Foe", "Elucidation of the Yajna", "Yoga of Practice" and "Awakening of the Royal Knowledge", closing with a concluding section called Upasham. The scanned edition, from about 2015, is published by the Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.
३४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
क्रमशः चलकर वह वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणपर्यन्त दूरी तय करके, वर्णों को
भी पार करके ब्रह्म में प्रवेश पा जायेगा। स्वभाव परिवर्तनशील है। स्वभाव के
परिवर्तन के साथ वर्ण-परिवर्तन हो जाता है। वस्तुतः ये वर्ण अति उत्तम,
उत्तम, मध्यम और निकृष्ट चार अवस्थाएँ हैं, कर्मपथ पर चलनेवाले साधकों
की ऊँची-नीची चार सीढ़ियाँ हैं। कर्म एक ही है, नियत कर्म। श्रीकृष्ण कहते
हैं कि परमसिद्धि की प्राप्ति का यही एक रास्ता है कि स्वभाव में जैसी योग्यता
है, वहीं से लगे। इसको देखें-
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।४५।।
अपने-अपने स्वभाव में पायी जानेवाली योग्यता के अनुसार कर्म में
लगा हुआ मनुष्य 'संसिद्धिम्'- भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को प्राप्त होता
है। पहले भी कह आये हैं-इस कर्म को करके तू परमसिद्धि को प्राप्त होगा।
कौन-सा कर्म करके? अर्जुन! तू शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म यज्ञार्थ कर्म
कर। अब स्वकर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ मनुष्य
परमसिद्धि को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह विधि तू मुझसे सुन। ध्यान दें-
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।४६।।
जिस परमात्मा से सब भूतों की उत्पत्ति हुई है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्
व्याप्त है, उस परमेश्वर को 'स्वकर्मणा'- अपने स्वभाव से उत्पन्न हुए कर्म
के द्वारा अर्चन कर मानव परमसिद्धि को प्राप्त होता है। अतः परमात्मा की
भावना, परमात्मा का ही सर्वांगीण अर्चन और क्रमशः चलना आवश्यक है।
जैसे, कोई बड़ी कक्षा में बैठ जाय तो छोटी भी खो देगा और बड़ी तो मिलेगी
ही नहीं। अतः इस कर्मपथ पर सोपानशः चलने का विधान है। जैसे ३/३५ में।
इसी पर पुनः बल देते हुए कहते हैं कि आप अल्पज्ञ ही क्यों न हों, वहीं से
आरम्भ करें। वह विधि है- परमात्मा के प्रति समर्पण।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।
अष्टादश अध्याय ३४७
अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी स्वधर्म
परमकल्याणकारी है। ‘स्वभावनियतम्’- स्वभाव से निर्धारित किया हुआ
कर्म करता हुआ मनुष्य पाप अर्थात् आवागमन को प्राप्त नहीं होता। प्रायः
साधकों को उच्चाटन होने लगता है कि हम सेवा करते ही रहेंगे, वे तो
ध्यानस्थ हैं, अच्छे गुणों के कारण उनका सम्मान है-तुरन्त वे नकल करने
लगते हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार नकल या ईर्ष्या से कुछ मिलेगा नहीं। अपने
स्वभाव से कर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म करके ही कोई परमसिद्धि
पाता है, छोड़कर नहीं।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८॥
कौन्तेय! दोषयुक्त (अल्पज्ञ अवस्थावाला है तो सिद्ध है कि अभी दोषों
का बाहुल्य है, ऐसा दोषयुक्त भी) ‘सहजं कर्म’- स्वभाव से उत्पन्न सहज
कर्म को नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धुएँ से अग्नि के सदृश सभी कर्म
किसी-न-किसी दोष से आवृत्त हैं। ब्राह्मण श्रेणी ही सही, कर्म तो करना पड़
रहा है। स्थिति नहीं मिली, तब तक दोष विद्यमान है, प्रकृति का आवरण
विद्यमान है। दोषों का अन्त वहाँ होगा, जहाँ ब्राह्मण श्रेणी का कर्म भी ब्रह्म में
प्रवेश के साथ विलय हो जाता है। उस प्राप्तिवाले का लक्षण क्या है, जहाँ
कर्मों से प्रयोजन नहीं रह जाता?-
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥४९॥
सर्वत्र आसक्ति से रहित बुद्धिवाला, स्पृहा से सर्वथा रहित, जीते हुए
अन्तःकरणवाला पुरुष ‘संन्यासेन’- सर्वस्व के न्यास की अवस्था में परम
नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त होता है। यहाँ संन्यास और परम नैष्कर्म्य-सिद्धि
पर्याय हैं। यहाँ सांख्ययोगी वहीं पहुँचता है, जहाँ कि निष्काम कर्मयोगी। यह
उपलब्धि दोनों मार्गियों के लिये समान है। अब परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त
हुआ पुरुष जैसे ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसका संक्षेप में चित्रण करते हैं-
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥
३४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कौन्तेय! जो ज्ञान की परानिष्ठा है, पराकाष्ठा है, उस परमसिद्धि को प्राप्त
हुआ पुरुष ब्रह्म को जैसे प्राप्त होता है, उस विधि को तू मुझसे संक्षेप में जान।
अगले श्लोक में वही विधि बता रहे हैं, ध्यान दें-
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।५१।।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।५२।।
अर्जुन! विशेष रूप से शुद्ध बुद्धि से युक्त, एकान्त और शुभदेश का
सेवन करनेवाला, साधना में जितना सहायक हो उतना ही आहार करनेवाला,
जीते हुए मन, वाणी और शरीरवाला, दृढ़ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ
पुरुष निरन्तर ध्यानयोग के परायण और ऐसी धारणा से युक्त अर्थात् इसी सब
को धारण करनेवाला तथा अन्तःकरण को वश में करके शब्दादिक विषयों को
त्यागकर, राग-द्वेष को नष्ट करके तथा-
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।५३।।
अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध, बाह्य वस्तुओं और आन्तरिक
चिन्तनों का त्याग कर, ममतारहित और शान्त अन्तःकरण हुआ पुरुष परब्रह्म
के साथ एकीभाव होने के लिये योग्य होता है। आगे देखें-
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।।५४।।
ब्रह्म के साथ एकीभाव होने की योग्यतावाला वह प्रसन्नचित्त पुरुष न तो
किसी वस्तु के लिये शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है।
सब भूतों में समभाव हुआ वह भक्ति की पराकाष्ठा पर है। भक्ति अपना
परिणाम देने की स्थिति में है, जहाँ ब्रह्म में प्रवेश मिलता है। अब-
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।५५।।
अष्टादश अध्याय ३४९
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझे तत्त्व से भली प्रकार जानता है। वह
तत्त्व है क्या? मैं जो और जिस प्रभाववाला हूँ; अजर, अमर, शाश्वत जिन
अलौकिक गुणधर्मोंवाला हूँ, उसे जानता है और मुझे तत्त्व से जानकर तत्काल
ही मुझमें प्रवेश कर जाता है। प्राप्तिकाल में तो भगवान दिखायी पड़ते हैं और
प्राप्ति के ठीक बाद, तत्क्षण वह अपने ही आत्मस्वरूप को उन ईश्वरीय
गुणधर्मों से युक्त पाता है कि आत्मा ही अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और
सनातन है।
दूसरे अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- आत्मा ही सत्य है, सनातन
है, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है; किन्तु इन विभूतियों से युक्त आत्मा को
केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। अब वहाँ प्रश्न स्वाभाविक है कि वस्तुतः तत्त्वदर्शिता
है क्या? बहुत से लोग पाँच तत्त्व, पचीस तत्त्व की बौद्धिक गणना करने लगते
हैं; किन्तु इस पर श्रीकृष्ण ने यहाँ अठारहवें अध्याय में निर्णय दिया कि
परमतत्त्व है परमात्मा, जो उसे जानता है वही तत्त्वदर्शी है। अब यदि आपको
तत्त्व की चाह है, परमात्मतत्त्व की चाह है तो भजन-चिन्तन आवश्यक है।
यहाँ श्लोक उनचास से बचपन तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया
कि संन्यास मार्ग में भी कर्म करना है। उन्होंने कहा, ‘संन्यासेन’- संन्यास के
द्वारा (अर्थात् ज्ञानयोग के द्वारा) कर्म करते-करते इच्छारहित, आसक्तिरहित
तथा जीते हुए शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष जिस प्रकार नैष्कर्म्य की परमसिद्धि
को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में कहूँगा। अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध, मद,
मोह इत्यादि प्रकृति में गिरानेवाले विकार जब सर्वथा शान्त हो जाते हैं और
विवेक, वैराग्य, शम, दम, एकान्त-सेवन, ध्यान इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली
योग्यताएँ जब पूर्णतया परिपक्व हो जाती हैं, उस समय वह ब्रह्म को जानने
योग्य होता है। उस योग्यता का नाम ही पराभक्ति है। इसी योग्यता द्वारा वह
तत्त्व को जानता है। तत्त्व है क्या? मुझे जानता है (भगवान जो है, जिन
विभूतियों से युक्त है उसे जानता है) और मुझे जानकर तत्क्षण मुझमें ही स्थित
हो जाता है। अर्थात् ब्रह्म, तत्त्व, ईश्वर, परमात्मा और आत्मा एक दूसरे के
पर्याय हैं। एक की जानकारी के साथ ही इन सबकी जानकारी हो जाती है। यही
परमसिद्धि, परमगति, परमधाम भी है।
३५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अतः गीता का दृढ़ निश्चय है कि संन्यास और निष्काम कर्मयोग दोनों
ही परिस्थितियों में परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को पाने के लिये नियत कर्म (चिन्तन)
अनिवार्य है।
अब तक तो संन्यासी के लिये भजन-चिन्तन पर बल दिया और अब
समर्पण कहकर उसी वार्त्ता को निष्काम कर्मयोगी के लिये भी कहते हैं-
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।५६।।
मुझ पर विशेष रूप से आश्रित हुआ पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता
हुआ, लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर करता हुआ मेरे कृपा-प्रसाद से शाश्वत
अविनाशी परमपद को प्राप्त होता है। कर्म वही है- नियत कर्म, यज्ञ की
प्रक्रिया। पूर्ण योगेश्वर सद्गुरु के आश्रित साधक उनके कृपा-प्रसाद से शीघ्र
पा जाता है। अतः उसे पाने के लिये समर्पण आवश्यक है।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।
अतः अर्जुन ! सम्पूर्ण कर्मों को (जितना कुछ तुझसे बन पड़ता है) मन
से मुझे अर्पित करके, अपने भरोसे नहीं बल्कि मुझे समर्पण करके मेरे परायण
हुआ बुद्धियोग अर्थात् योग की बुद्धि का अवलम्बन करके निरन्तर मुझमें चित्त
लगा। योग एक ही है, जो सर्वथा दुःखों का अन्त करनेवाला और परमतत्त्व
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाला है। उसकी क्रिया भी एक ही है- यज्ञ की
प्रक्रिया, जो मन तथा इन्द्रियों के संयम, श्वास-प्रश्वास तथा ध्यान इत्यादि पर
निर्भर है। जिसका परिणाम भी एक ही है- 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्।' इसी पर
आगे कहते हैं-
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।
इस प्रकार मुझमें निरन्तर चित्त को लगानेवाला होकर तू मेरी कृपा से
मन और इन्द्रियों के सम्पूर्ण दुर्गों को अनायास ही तर जायेगा। 'इन्द्रीं द्वार
झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय
अष्टादश अध्याय ३५१
बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी।।' ( रामचरितमानस, ७/११७/११-
१२)- ये ही दुर्जय दुर्ग हैं। मेरी कृपा से तू इन बाधाओं का अतिक्रमण कर
जायेगा; किन्तु यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को नहीं सुनेगा तो विनष्ट हो
जायेगा, परमार्थ से च्युत हो जायेगा। इस बिन्दु को योगेश्वर ने कई बार दृढ़ाया
है। देखें- १६/१८-१९, १७/५-६। १६/२३ में वे कहते हैं- इस शास्त्रविधि
को त्यागकर अन्य-अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न सुख है,
न शान्ति है, न सिद्धि है और न परमगति ही है। वह सबसे भ्रष्ट हो जाता है।
यहाँ कहते हैं-यदि अहंकारवश तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो विनष्ट हो जायेगा।
अतः लोक-समृद्धि और परमश्रेय की प्राप्ति के लिये सम्पूर्ण साधन-क्रम का
आदिशास्त्र योगेश्वर श्रीकृष्णोक्त यही 'गीता' है। पुनः इसी पर बल देते हैं-
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर ऐसा मानता है कि युद्ध नहीं करूँगा, तो
यह तेरा निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे बलात् युद्ध में लगा देगा।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ।।६०।।
कौन्तेय! मोहवश तू जिस कर्म को नहीं करना चाहता, उसको भी अपने
स्वभाव से उत्पन्न हुए कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा। प्रकृति के संघर्ष
से न भागने का तुम्हारा क्षत्रिय श्रेणी का स्वभाव तुम्हें बरबस कर्म में लगायेगा।
प्रश्न पूरा हुआ। अब वह ईश्वर रहता कहाँ है? इस पर कहते हैं-
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।
अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूतप्राणियों के हृदय-देश में निवास करता
है। इतना समीप है तो लोग जानते क्यों नहीं? मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर
सबलोग भ्रमवश चक्कर लगाते ही रहते हैं, इसलिये नहीं जानते। यह यन्त्र
बड़ा बाधक है, जो बार-बार नश्वर कलेवरों (शरीरों) में घुमाता रहता है। तो
शरण किसकी लें?-
३५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।
इसलिये हे भारत! सम्पूर्ण भाव से उस ईश्वर की (जो हृदय-देश में
स्थित है) अनन्य शरण को प्राप्त हो। उसके कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति,
शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा। अतः ध्यान करना है तो हृदय-देश में करें।
यह जानते हुए भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च या अन्यत्र खोजना समय बरबाद
करना है। हाँ, जानकारी नहीं है तब तक स्वाभाविक है। ईश्वर का निवास-
स्थान हृदय है। भागवत के चतुःश्लोकी गीता का सारांश भी यही है कि वैसे
तो मैं सर्वत्र हूँ; किन्तु प्राप्त होता हूँ तो हृदय-देश में ध्यान करने से ही।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।
इस प्रकार बस इतना ही गोपनीय से भी अतिगोपनीय ज्ञान मैंने तेरे लिये
कहा है। इस विधि से सम्पूर्ण रूप से विचार कर; फिर तू जैसा चाहता है वैसा
कर। सत्य यही है, शोध की स्थली यही है, प्राप्ति की स्थली भी यही है। किन्तु
हृदयस्थित ईश्वर दिखायी नहीं देता, इस पर उपाय बताते हैं-
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।।
अर्जुन! सम्पूर्ण गोपनीय से भी अति गोपनीय मेरे रहस्ययुक्त वचन को
तू फिर भी सुन। (कहा है, किन्तु फिर भी सुन। साधक के लिये इष्ट सदैव खड़े
रहते हैं) क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, इसलिये यह परम हितकारक वचन
मैं तेरे लिये फिर भी कहूँगा। वह है क्या?-
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।।
अर्जुन! तू मेरे में ही अनन्य मनवाला हो, मेरा अनन्य भक्त हो, मेरे प्रति
श्रद्धा से पूर्ण हो (मेरे समर्पण में अश्रुपात होने लगे), मेरे को ही नमन कर।
ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा। यह मैं तेरे लिये सत्य प्रतिज्ञा करके
कहता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। पीछे बताया- ईश्वर हृदय-देश में
अष्टादश अध्याय ३५३
है, उसकी शरण जा। यहाँ कहते हैं- मेरी शरण आ। यह अति गोपनीय रहस्ययुक्त
वचन सुन कि मेरी शरण आओ। वास्तव में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहना क्या
चाहते हैं? यही कि साधक के लिये सद्गुरु की शरण नितान्त आवश्यक है।
श्रीकृष्ण एक पूर्ण योगेश्वर थे। अब समर्पण की विधि बताते हैं-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥
सम्पूर्ण धर्मों को त्यागकर (अर्थात् मैं ब्राह्मण श्रेणी का कर्त्ता हूँ या शूद्र
श्रेणी का, क्षत्रिय हूँ अथवा वैश्य- इसके विचार को त्यागकर) केवल एक
मेरी अनन्य शरण को प्राप्त हो। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक
मत कर।
इन सब ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि वर्णों का विचार न कर (कि इस कर्म-
पथ में किस स्तर का हूँ) जो अनन्य भाव से शरण हो जाता है, सिवाय इष्ट के
अन्य किसी को नहीं देखता, उसका क्रमशः वर्ण-परिवर्तन, उत्थान तथा पूर्ण
पापों से निवृत्ति (मोक्ष) की जिम्मेदारी वह इष्ट सद्गुरु स्वयं अपने हाथों में ले
लेते हैं।
प्रत्येक महापुरुष ने यही कहा। शास्त्र जब लिखने में आता है तो लगता
है कि यह सबके लिये है; किन्तु है वस्तुतः श्रद्धावान् के लिये ही। अर्जुन
अधिकारी था, अतः उसे बल देकर कहा। अब योगेश्वर स्वयं निर्णय देते हैं
कि इसके अधिकारी कौन हैं?-
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७॥
अर्जुन! इस प्रकार तेरे हित के लिये कहे इस गीता के उपदेश को किसी
काल में भूलकर भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिये, न भक्तिरहित
के प्रति कहना चाहिये, न बिना सुनने की इच्छावाले के प्रति कहना चाहिये
और जो मेरी निन्दा करता है, यह दोष है, वह दोष है- इस प्रकार झूठी
आलोचना करता है, उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिये। महापुरुष ही तो थे,
जिनके समक्ष स्तुतिकर्त्ताओं के साथ-साथ कतिपय निन्दक भी रहे होंगे। इनसे
३५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
तो नहीं कहना चाहिये; किन्तु प्रश्न स्वाभाविक है कि कहा किससे जाय? इस
पर देखें-
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८॥
जो मनुष्य मेरी पराभक्ति को प्राप्त कर इस परम रहस्ययुक्त गीता के
उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा। अर्थात् वह
भक्त मुझे ही प्राप्त होगा, जो सुन लेगा; क्योंकि उपदेश को भली प्रकार सुनकर
हृदयंगम कर लेगा, तो उस पर चलेगा तथा पार पा जायेगा। अब उस उपदेशकत्र्त्ता
के लिए कहते हैं-
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९॥
न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्यों में कोई
है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यन्त प्यारा पृथिवी में दूसरा कोई होगा। किससे?
जो मेरे भक्तों में मेरा उपदेश करेगा, उनको उधर उस पथ पर चलायेगा;
क्योंकि कल्याण का यही एक स्रोत है, राजमार्ग है। अब देखें अध्ययन-
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७०॥
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के सम्वाद का 'अध्येष्यते'- भली
प्रकार मनन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा अर्थात् ऐसा यज्ञ
जिसका परिणाम ज्ञान है, जिसका स्वरूप पीछे बताया गया है, जिसका तात्पर्य
है साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी- ऐसा मेरा निश्चित मत है।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥७१॥
जो पुरुष श्रद्धा से युक्त और ईर्ष्यारहित होकर केवल सुनेगा, वह भी
पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
अर्थात् करते हुए भी पार न लगे तो सुना भर करें, उत्तम लोक तब भी है; क्योंकि
वह चित्त में उन उपदेशों को ग्रहण तो करता है। यहाँ सड़सठ से इकहत्तर तक
अष्टादश अध्याय ३५५
पाँच श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने यह बताया कि गीता का उपदेश अनधिकारियों
को नहीं कहना चाहिये; किन्तु जो श्रद्धावान् है उससे अवश्य कहना चाहिये।
जो सुनेगा, वह भक्त मुझे प्राप्त होगा; क्योंकि अतिगोपनीय कथा को सुनकर
पुरुष चलने लगता है। जो भक्तों में कहेगा, उससे अधिक प्रिय करनेवाला मेरा
कोई नहीं है। जो अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा।
यज्ञ का परिणाम ही ज्ञान है। जो गीता के अनुसार कर्म करने में असमर्थ है;
किन्तु श्रद्धा से मात्र सुनेगा, वह भी पुण्यलोकों को प्राप्त होगा। इस प्रकार
भगवान् श्रीकृष्ण ने इसके कहने, सुनने तथा अध्ययन का फल बताया। प्रश्न
पूरा हुआ। अब अन्त में वे अर्जुन से पूछते हैं कि कुछ समझ में आया?
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।७२।।
हे पार्थ! क्या मेरा यह वचन तूने एकाग्रचित्त होकर सुना? क्या तेरा
अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ? इस पर अर्जुन बोला-
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।७३।।
अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। मुझे स्मृति प्राप्त हुई
है। (जो रहस्यमय ज्ञान मनु ने स्मृति-परम्परा से चलाया, उसी को अर्जुन ने
प्राप्त कर लिया।) अब मैं संशयरहित हुआ स्थित हूँ और आपकी आज्ञा का
पालन करूँगा। जबकि सैन्य निरीक्षण के समय दोनों ही सेनाओं में स्वजनों को
देख अर्जुन व्याकुल हो गया था। उसने निवेदन किया- गोविन्द! स्वजनों को
मारकर हम कैसे सुखी होंगे? ऐसे युद्ध से शाश्वत कुलधर्म नष्ट हो जायेगा,
पिण्डोदक-क्रिया लुप्त हो जायेगी, वर्णसंकर उत्पन्न होगा। हमलोग समझदार
होकर भी पाप करने को उद्यत हुए हैं। क्यों न इससे बचने के लिये उपाय करें?
शस्त्रधारी ये कौरव मुझ शस्त्ररहित को रण में मार डालें, वह मरना भी श्रेयस्कर
है। गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा- कहता हुआ वह रथ के पिछले भाग में बैठ
गया था।
३५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार गीता में अर्जुन ने योगेश्वर श्रीकृष्ण के समक्ष प्रश्न-परिप्रश्नों
की श्रृंखला खड़ी कर दी। जैसे- अध्याय २/७- वह साधन मेरे प्रति कहिये
जिससे मैं परमश्रेय को प्राप्त हो जाऊँ? २/५४- स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण
क्या हैं? ३/१- जब आपकी दृष्टि में ज्ञानयोग श्रेष्ठ है तो मुझे भयंकर कर्मों में
क्यों लगाते हैं? ३/३६- मनुष्य न चाहता हुआ भी किसकी प्रेरणा से पाप का
आचरण करता है? ४/४- आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म
बहुत पुराना है, तो मैं यह कैसे मान लूँ कि कल्प के आदि में इस योग को
आपने सूर्य के प्रति कहा था? ५/१- कभी आप संन्यास की प्रशंसा करते हैं तो
कभी निष्काम कर्म की। इनमें से एक निश्चय करके कहिये जिससे मैं परमश्रेय
को प्राप्त कर लूँ? ६/३५- मन चंचल है, फिर शिथिल प्रयत्नवाला श्रद्धावान्
पुरुष आपको न प्राप्त होकर किस दुर्गति को प्राप्त होता है? ८/१-२- गोविन्द !
जिसका आपने वर्णन किया, वह ब्रह्म क्या है? वह अध्यात्म क्या है? अधिदैव,
अधिभूत क्या है? इस शरीर में अधियज्ञ कौन है? वह कर्म क्या है? अन्त
समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं? सात प्रश्न किये। अध्याय १०/
१७ में अर्जुन ने जिज्ञासा की कि- निरन्तर चिन्तन करता हुआ मैं किन-किन
भावों द्वारा आपका स्मरण करूँ? ११/४ में उसने निवेदन किया कि- जिन
विभूतियों का आपने वर्णन किया उन्हें मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। १२/१- जो
अनन्य श्रद्धा से लगे हुए भक्तजन भली प्रकार आपकी उपासना करते हैं और
दूसरे जो अक्षर अव्यक्त की उपासना करते हैं, इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन
है? १४/२१- तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है
तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? १७/१- जो
मनुष्य उपरोक्त शास्त्रविधि को त्यागकर किन्तु श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते
हैं उनकी कौन-सी गति होती है? और १८/१ हे महाबाहो! मैं त्याग और
संन्यास के यथार्थ स्वरूप को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
इस प्रकार अर्जुन प्रश्न करता गया। जो वह नहीं कर सकता था उन
गोपनीय रहस्यों को भगवान ने स्वयं दर्शाया। इनका समाधान होते ही वह
प्रश्नों से विरत हो गया और बोला- गोविन्द ! अब मैं आपकी आज्ञा का पालन
करूँगा। वस्तुतः ये प्रश्न मानवमात्र के लिये हैं। इन सभी प्रश्नों के समाधान
अष्टादश अध्याय ३५७
के बिना कोई भी साधक श्रेय-पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। अतः सद्गुरु
के आदेश का पालन करने के लिये, श्रेय-पथ पर अग्रसर होने के लिये
सम्पूर्ण गीता का श्रवण अति आवश्यक है। अर्जुन का समाधान हो गया। साथ
ही योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत वाणी का उपसंहार हुआ। इस पर
संजय बोला-
(ग्यारहवें अध्याय में विराट् रूप का दर्शन करा लेने पर योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं इस प्रकार देखने को (जैसा
तूने देखा है), तत्त्व से जानने तथा प्रवेश करने को सुलभ हूँ (११/५४)। इस
प्रकार दर्शन करनेवाले साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं और यहाँ अभी
अर्जुन से पूछते हैं- क्या तुम्हारा मोह नष्ट हुआ? अर्जुन ने कहा- मेरा मोह नष्ट
हो गया। मैं अपनी स्मृति को प्राप्त हो गया हूँ। आप जो कहते हैं, वही करूँगा।
दर्शन के साथ तो अर्जुन को मुक्त हो जाना चाहिये था। वस्तुतः अर्जुन को तो
जो होना था, हो गया; किन्तु शास्त्र भविष्य में आनेवाली पीढ़ी के लिये होता
है। उसका उपयोग आप सबके लिये ही है।)
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४॥
इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन (अर्जुन एक महात्मा है,
योगी है, साधक है, न कि कोई धनुर्धर जो मारने के लिये खड़ा हो। अतः
महात्मा अर्जुन) के इस विलक्षण और रोमांचकारी सम्वाद को सुना। आप में
सुनने की क्षमता कैसे आयी? इस पर कहते हैं-
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥७५॥
श्री व्यासजी की कृपा से, उनकी दी हुई दृष्टि से मैंने इस परम गोपनीय
योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना है। संजय श्रीकृष्ण
को योगेश्वर मानता है। जो स्वयं योगी हो और दूसरों को भी योग प्रदान करने
की क्षमता रखता हो, वह योगेश्वर है।
३५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।
हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस परम कल्याणकारी और अद्भुत
सम्वाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ। अतः इस
सम्वाद को सदैव स्मरण करना चाहिये और इसी स्मृति से प्रसन्न रहना चाहिये।
अब उनके स्वरूप का स्मरण कर संजय कहते हैं-
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः।।७७।।
हे राजन्! हरि के (जो शुभाशुभ सर्व का हरण कर स्वयं शेष रहते हैं,
उन हरि के) अति अद्भुत रूप को पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान्
आश्चर्य होता है और मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ। इष्ट का स्वरूप बार-बार
स्मरण करने की वस्तु है। अन्त में संजय निर्णय देते हैं-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।
राजन्! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन (ध्यान ही धनुष है,
इन्द्रियों की दृढ़ता ही गाण्डीव है अर्थात् स्थिरता के साथ ध्यान धरनेवाला
महात्मा अर्जुन) हैं, वहीं पर 'श्रीः'-ऐश्वर्य, विजय-जिसके पीछे हार नहीं है,
ईश्वरीय विभूति और चल संसार में अचल रहनेवाली नीति है, ऐसा मेरा मत है।
आज तो धनुर्धर अर्जुन है नहीं। यह नीति, विजय-विभूति तो अर्जुन
तक सीमित रह गयी। तत्सामयिक थी यह। यह तो द्वापर में ही समाप्त हो
गयी। लेकिन ऐसी बात नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि मैं सबके
हृदय-देश में निवास करता हूँ। आपके हृदय में भी वे हैं। अनुराग ही अर्जुन है।
अनुराग आपके अन्तःकरण की इष्टोन्मुखी लगन का नाम है। यदि ऐसा अनुराग
आप में है तो सदैव वास्तविक विजय है और अचल स्थिति दिलानेवाली नीति
भी सदैव रहेगी, न कि कभी थी। जब तक प्राणी रहेंगे, परमात्मा का निवास
उनके हृदय-देश में रहेगा, विकल आत्मा उसे पाने का इच्छुक होगा और उनमें
से जिसके भी हृदय में उसे पाने का अनुराग उमड़ेगा, वही अर्जुन की श्रेणीवाला
अष्टादश अध्याय ३५९
होगा; क्योंकि अनुराग ही अर्जुन है। अतः मानवमात्र इसका प्रत्याशी बन
सकता है।
निष्कर्ष-
यह गीता का समापन अध्याय है। आरम्भ में ही अर्जुन का प्रश्न है-
प्रभो! मैं त्याग और संन्यास के भेद और स्वरूप को जानना चाहता हूँ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस पर प्रचलित चार मतों की चर्चा की। इनमें एक सही
भी था। इससे मिलता-जुलता ही निर्णय योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दिया कि यज्ञ,
दान और तप किसी काल में त्यागने योग्य नहीं हैं। ये मनीषियों को भी पवित्र
करनेवाले हैं। इन तीनों को रखते हुए इनके विरोधी विकारों का त्याग करना ही
वास्तविक त्याग है। यह सात्त्विक त्याग है। फल की इच्छा के साथ त्याग
राजस है, मोहवश नियत कर्म का ही त्याग करना तामस त्याग है और संन्यास
त्याग की ही चरमोत्कृष्ट अवस्था है। नियत कर्म और ध्यानजनित सुख सात्त्विक
है। इन्द्रियों और विषयों का भोग राजस है और तृप्तिदायक अन्न की उत्पत्ति से
रहित दुःखद सुख तामस है।
मनुष्यमात्र के द्वारा शास्त्र के अनुकूल अथवा प्रतिकूल कार्य होने में
पाँच कारण हैं- कर्त्ता (मन), पृथक्-पृथक् करण (जिनके द्वारा किया जाता
है। शुभ पार लगता है तो विवेक, वैराग्य, शम, दम करण हैं। अशुभ पार
लगता है तो काम, क्रोध, राग, द्वेष इत्यादि करण होंगे), नाना प्रकार की
इच्छाएँ (इच्छाएँ अनन्त हैं, सब पूर्ण नहीं हो सकतीं। केवल वह इच्छा पूर्ण
होती है, जिसके साथ आधार मिल जाता है।), चौथा कारण है आधार (साधन)
और पाँचवाँ हेतु है दैव (प्रारब्ध या संस्कार)। प्रत्येक कार्य के होने में यही
पाँच कारण हैं, फिर भी जो कैवल्यस्वरूप परमात्मा को कर्त्ता मानता है, वह
मूढ़बुद्धि यथार्थ नहीं जानता। अर्थात् भगवान नहीं करते, जबकि पीछे कह
आये हैं कि अर्जुन! तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर रह, कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ।
अन्ततः उन महापुरुष का आशय क्या है?
वस्तुतः प्रकृति और पुरुष के बीच एक आकर्षण सीमा है। जब तक
मनुष्य प्रकृति में बरतता है, तब तक माया प्रेरणा करती है और जब वह इससे
३६० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ऊपर उठकर इष्ट को समर्पित हो जाता है और वह इष्ट जब हृदय-देश से रथी
हो जाता है, फिर भगवान करते हैं। ऐसे स्तर पर अर्जुन था, संजय भी था और
सबके लिये इस (कक्षा) में पहुँचने का विधान है। अतः यहाँ भगवान प्रेरणा
करते हैं। पूर्णज्ञाता महापुरुष, जानने की विधि और ज्ञेय परमात्मा- इन तीनों
के संयोग से कर्म की प्रेरणा मिलती है। इसलिये किसी अनुभवी महापुरुष
(सद्गुरु) के सान्निध्य में समझने का प्रयास करना चाहिये।
वर्ण-व्यवस्था के प्रश्न को चौथी बार लेते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
बताया कि इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, एकाग्रता, शरीर-वाणी और मन
को इष्ट के अनुरूप तपाना, ईश्वरीय जानकारी का संचार, ईश्वरीय निर्देशन पर
चलने की क्षमता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली योग्यताएँ ब्राह्मण श्रेणी के
कर्म हैं। शौर्य, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव, कर्म में
प्रवृत्त होने की दक्षता क्षत्रिय श्रेणी का कर्म है। इन्द्रियों का संरक्षण, आत्मिक
सम्पत्ति का संवर्द्धन इत्यादि वैश्य श्रेणी के कर्म हैं और परिचर्या शूद्र श्रेणी का
कर्म है। शूद्र का अर्थ है अल्पज्ञ। अल्पज्ञ साधक जो नियत कर्म चिन्तन में दो
घण्टे बैठकर दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता। शरीर अवश्य बैठा है,
लेकिन जिस मन को टिकना चाहिये, वह तो हवा से बातें कर रहा है। ऐसे
साधक का कल्याण कैसे हो? उसे अपने से उन्नत अवस्थावालों की अथवा
सद्गुरु की सेवा करनी चाहिये। शनैः-शनैः उसमें भी संस्कारों का सृजन
होगा, वह गति पकड़ लेगा। अतः इस अल्पज्ञ का कर्म सेवा से ही प्रारम्भ
होगा। कर्म एक ही है- नियत कर्म, चिन्तन। उसके कर्त्ता की चार श्रेणियाँ-
अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं।
मनुष्य को नहीं बल्कि गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा गया।
गीतोक्त वर्ण इतने में ही है।
तत्त्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि- अर्जुन ! उस परमसिद्धि की
विधि बताऊँगा, जो ज्ञान की परानिष्ठा है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, धारावाही
चिन्तन और ध्यान की प्रवृत्ति इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी
योग्यताएँ जब परिपक्व हो जाती हैं और काम, क्रोध, मोह, राग, द्वेषादि प्रकृति
में घसीटकर रखनेवाली प्रवृत्तियाँ जब पूर्णतः शान्त हो जाती हैं, उस समय वह
अष्टादश अध्याय ३६१
व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है। उसी योग्यता का नाम पराभक्ति है।
पराभक्ति के द्वारा ही वह तत्त्व को जानता है। तत्त्व है क्या? बताया- मैं जो हूँ,
जिन विभूतियों से युक्त हूँ, उसको जानता है अर्थात् परमात्मा जो है, अव्यक्त,
शाश्वत, अपरिवर्तनशील जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला है, उसे जानता है
और जानकर वह तत्क्षण मुझमें स्थित हो जाता है। अतः तत्त्व है परमतत्त्व, न
कि पाँच या पचीस तत्त्व। प्राप्ति के साथ आत्मा उसी स्वरूप में स्थित हो जाता
है, उन्हीं गुणधर्मों से युक्त हो जाता है।
ईश्वर का निवास बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! वह
ईश्वर सम्पूर्ण भूतों के हृदय-देश में निवास करता है; किन्तु मायारूपी यन्त्र में
आरूढ़ होकर लोग भटक रहे हैं, इसलिये नहीं जानते। अतः अर्जुन ! तू हृदय
में स्थित उस ईश्वर की शरण जा। इससे भी गोपनीय एक रहस्य और है कि
सम्पूर्ण धर्मों की चिन्ता छोड़कर तू मेरी शरण में आ, तू मुझे प्राप्त होगा। यह
रहस्य अनधिकारी से नहीं कहना चाहिये। जो भक्त नहीं है उससे नहीं कहना
चाहिये; लेकिन जो भक्त है उससे अवश्य कहना चाहिये। उससे दुराव रखें तो
उसका कल्याण कैसे होगा? अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पूछा- अर्जुन! मैंने
जो कुछ कहा, उसे तूने भली प्रकार सुना-समझा, तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि
नहीं? अर्जुन ने कहा- भगवन् ! मेरा मोह नष्ट हो गया है। मैं अपनी स्मृति को
प्राप्त हो गया हूँ। आप जो कुछ कहते हैं वही सत्य है और अब मैं वही करूँगा।
संजय, जिसने इन दोनों के सम्वाद को भली प्रकार सुना है, अपना
निर्णय देता है कि श्रीकृष्ण महायोगेश्वर और अर्जुन एक महात्मा हैं। उनका
सम्वाद बारम्बार स्मरण कर वह हर्षित हो रहा है। अतः इसका स्मरण करते
रहना चाहिये। उन हरि के रूप को याद करके भी वह बारम्बार हर्षित होता है।
अतः बारम्बार स्वरूप का स्मरण करते रहना चाहिये, ध्यान करते रहना
चाहिये। जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ महात्मा अर्जुन हैं, वहीं श्री है।
विजय-विभूति और ध्रुवनीति भी वहीं है। सृष्टि की नीतियाँ आज हैं तो कल
बदलेंगी। ध्रुव तो एकमात्र परमात्मा है। उसमें प्रवेश दिलानेवाली नीति ध्रुवनीति
भी वहीं है। यदि श्रीकृष्ण और अर्जुन को द्वापरकालीन व्यक्ति-विशेष मान
लिया जाय तब तो आज न अर्जुन है और न श्रीकृष्ण। आपको न विजय
३६२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
मिलनी चाहिये और न विभूति। तब तो गीता आपके लिये व्यर्थ है। लेकिन
नहीं, श्रीकृष्ण एक योगी थे। अनुराग से पूरित हृदयवाला महात्मा ही अर्जुन है।
ये सदैव रहते हैं और रहेंगे। श्रीकृष्ण ने अपना परिचय देते हुए कहा कि- मैं
हूँ तो अव्यक्त, लेकिन जिस भाव को प्राप्त हूँ, वह ईश्वर सबके हृदय-देश में
निवास करता है। वह सदैव है और रहेगा। सबको उसकी शरण जाना है। शरण
जानेवाला ही महात्मा है, अनुरागी है और अनुराग ही अर्जुन है। इसके लिये
किसी स्थितप्रज्ञ महापुरुष की शरण जाना नितान्त आवश्यक है; क्योंकि वही
इसके प्रेरक हैं।
इस अध्याय में संन्यास का स्वरूप स्पष्ट किया गया कि सर्वस्व का
न्यास ही संन्यास है। केवल बाना धारण कर लेना संन्यास नहीं है; बल्कि
इसके साथ एकान्त का सेवन करते हुए नियत कर्म में अपनी शक्ति समझकर
अथवा समर्पण के साथ सतत प्रयत्न अपरिहार्य है। प्राप्ति के साथ सम्पूर्ण
कर्मों का त्याग ही संन्यास है, जो मोक्ष का पर्याय है। यही संन्यास की
पराकाष्ठा है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'संन्यासयोगो' नामाष्टादशोऽध्यायः।।१८।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'संन्यास योग' नामक अठारहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'संन्यासयोगो'
नामाष्टादशोऽध्यायः।।१८।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'संन्यास योग' नामक अठारहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
उपशम
उपशम
प्रायः टीकाओं में लोग नयी बात खोजते हैं; किन्तु वस्तुतः सत्य तो
सत्य है। वह न नया होता है और न पुराना पड़ता है। नयी बातें तो अखबारों
में छपती रहती हैं, जो मरती-उभरती घटनाएँ हैं। सत्य अपरिवर्तनशील है तो
कोई दूसरा कहे भी क्या? यदि कहता है तो उसने पाया नहीं। प्रत्येक महापुरुष
यदि चलकर उस लक्ष्य तक पहुँच गया तो एक ही बात कहेगा। वह समाज के
बीच दरार नहीं डाल सकता। यदि डालता है तो सिद्ध है उसने पाया नहीं।
श्रीकृष्ण भी उसी सत्य को कहते हैं जो पूर्व मनीषियों ने देखा था, पाया था
और भविष्य में होनेवाले महापुरुष भी यदि पाते हैं तो यही कहेंगे।
महापुरुष और उनकी कार्य-प्रणाली- महापुरुष दुनिया में सत्य के
नाम पर फैली और सत्य-सी प्रतीत होनेवाली कुरीतियों का शमन करके
कल्याण का पथ प्रशस्त कर देते हैं। यह पथ भी दुनिया में पहले से रहता है;
किन्तु उसी के समानान्तर, उसी की तरह भासनेवाले अनेक पथ प्रचलित हो
जाते हैं। उनमें से सत्य को छाँटना कठिन हो जाता है कि वस्तुतः सत्य क्या है।
महापुरुष सत्यस्थित होने से उनमें सत्य की पहचान करते हैं, उसे निश्चित
करते हैं और उस सत्य की ओर अभिमुख होने के लिये समाज को प्रेरित करते
हैं। यही राम ने किया, यही महावीर ने किया, यही महात्मा बुद्ध ने किया, यही
ईसा ने किया और यही प्रयास मुहम्मद ने किया। कबीर, गुरुनानक इत्यादि
सबने यही किया। महापुरुष जब दुनिया से उठ जाता है, तो पीछे के लोग
उसके बताये मार्ग पर न चलकर उसके जन्मस्थल, मृत्युस्थल और उन स्थलों
को पूजने लगते हैं, जहाँ वे गये थे। क्रमशः वे उनकी मूर्ति बनाकर पूजने लगते
हैं। यद्यपि आरम्भ में वे उनकी स्मृति ही सँजोते हैं किन्तु कालान्तर में भ्रम में
पड़ जाते हैं और वही भ्रम रूढ़ि का रूप ले लेता है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी तत्सामयिक समाज में सत्य के नाम पर पनपे
हुए रीति-रिवाजों का खण्डन करके समाज को प्रशस्त पथ पर खड़ा कर
३६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
दिया। अध्याय २/१६ में उन्होंने कहा- अर्जुन! असत् वस्तु का तो अस्तित्व
नहीं है और सत् का तीनों कालों में अभाव नहीं है। भगवान होने के कारण यह
मैं अपनी ओर से नहीं कह रहा हूँ बल्कि इनका अन्तर तत्त्वदर्शियों ने देखा;
और वही मैं कहने जा रहा हूँ। तेरहवें अध्याय में उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का वर्णन
उसी प्रकार किया, जो ‘ऋषिभिर्बहुधागीतम्’- ऋषियों द्वारा प्रायः गाया जा
चुका था। अठारहवें अध्याय में त्याग और संन्यास का तत्त्व बताते हुए उन्होंने
चार मतों में से एक का चयन किया और उसे अपना समर्थन दिया।
संन्यास- कृष्णकाल में अग्नि को न छूनेवाले तथा चिन्तन का भी
त्याग करके अपने को योगी, संन्यासी कहनेवालों का सम्प्रदाय भी पनप रहा
था। इसका खण्डन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग,
दोनों में से किसी भी मार्ग के अनुसार कर्म को त्यागने का विधान नहीं है, कर्म
तो करना ही होगा। कर्म करते-करते साधना इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि
सर्वसंकल्पों का अभाव हो जाता है, वह पूर्ण संन्यास है। बीच रास्ते में संन्यास
नाम की कोई वस्तु नहीं है। केवल क्रियाओं को त्याग देने से तथा अग्नि न छूने
से न तो कोई संन्यासी होता है और न योगी। (जिसे अध्याय दो, तीन, पाँच,
छः और विशेषकर अठारह में देखा जा सकता है।)
कर्म- ऐसी ही भ्रान्ति कर्म के सम्बन्ध में भी मिलती है। अध्याय २/३९
में उन्होंने बताया- अर्जुन! अब तक यह बुद्धि तेरे लिये सांख्ययोग के विषय
में कही गयी और अब इसी को तू निष्काम कर्म के विषय में सुन। इससे युक्त
होकर तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश कर सकेगा। इसका थोड़ा भी
आचरण महान् जन्म-मरण के भय से उद्धार करानेवाला होता है। इस निष्काम
कर्म में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है, बुद्धि एक ही है, दिशा भी एक ही है।
लेकिन अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली है, इसलिये वे कर्म के
नाम पर अनेक क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। अर्जुन! तू नियत कर्म कर।
अर्थात् क्रियाएँ बहुत-सी हैं वे कर्म नहीं हैं। कर्म कोई निर्धारित दिशा है। कर्म
कोई ऐसी वस्तु है, जो जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे शरीरों की यात्रा का
अन्त कर देता है। यदि एक भी जन्म लेना पड़ा तो यात्रा पूरी कहाँ हुई?
उपशम ३६५
यज्ञ- वह नियत कर्म है कौन-सा? श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि
‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः'- अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया
ही कर्म है। इसके अतिरिक्त दुनिया में जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक
का बन्धन है, न कि कर्म। कर्म तो इस संसार-बन्धन से मोक्ष दिलाता है। अब
वह यज्ञ क्या है, जिसे क्रियान्वित करें तो कर्म सम्पादित हो सके? अध्याय
चार में श्रीकृष्ण ने तेरह-चौदह तरीके से यज्ञ का वर्णन किया, जो सब
मिलाकर परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाली विधि-विशेष का चित्रण है- जो
श्वास से, ध्यान से, चिन्तन और इन्द्रिय-संयम इत्यादि से सिद्ध होनेवाला है।
श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भौतिक द्रव्यों से इस यज्ञ का कोई
सम्बन्ध नहीं है। भौतिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ अत्यल्प हैं, आप करोड़
का हवन ही क्यों न करें। (४/३३) सम्पूर्ण यज्ञ मन और इन्द्रियों की अन्तःक्रिया
से सिद्ध होनेवाले हैं। पूर्ण होने पर यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस अमृत-
तत्त्व की जानकारी का नाम ज्ञान है। उस ज्ञानामृत को पान करनेवाले योगी
सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। जिसमें प्रवेश पाना था पा ही लिया, तो फिर
उस पुरुष का कर्म किये जाने से कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये यावन्मात्र कर्म
उस साक्षात्कारसहित ज्ञान में शेष हो जाते हैं। कर्म करने के बन्धन से वह मुक्त
हो जाता है। इस प्रकार निर्धारित यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। कर्म का शुद्ध
अर्थ है- आराधना।
इस नियत कर्म, यज्ञार्थ कर्म अथवा तदर्थ कर्म के अतिरिक्त गीता में
अन्य कोई कर्म नहीं है। इसी पर श्रीकृष्ण ने स्थान-स्थान पर बल दिया।
अध्याय छः में इसी को उन्होंने ‘कार्यम् कर्म' कहा। अध्याय सोलह में बताया
कि काम, क्रोध और लोभ के त्याग देने पर ही वह कर्म आरम्भ होता है, जो
परमश्रेय को दिलानेवाला है। सांसारिक कर्मों में जो जितना व्यस्त है, उसके
पास काम, क्रोध और लोभ उतने ही अधिक सजे-सजाये दिखते हैं, समृद्ध
पाये जाते हैं। इसी नियत कर्म को उन्होंने शास्त्र-विधानोक्त कर्म की संज्ञा दी।
गीता अपने में पूर्ण तथा प्रथम शास्त्र है। सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में भी
शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म, नियत कर्म, कर्तव्य कर्म और पुण्य कर्म से इंगित
करके उन्होंने बारम्बार दृढ़ाया कि नियत कर्म ही परमकल्याणकारी है।