यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।
हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस परम कल्याणकारी और अद्भुत
सम्वाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ। अतः इस
सम्वाद को सदैव स्मरण करना चाहिये और इसी स्मृति से प्रसन्न रहना चाहिये।
अब उनके स्वरूप का स्मरण कर संजय कहते हैं-
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः।।७७।।
हे राजन्! हरि के (जो शुभाशुभ सर्व का हरण कर स्वयं शेष रहते हैं,
उन हरि के) अति अद्भुत रूप को पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान्
आश्चर्य होता है और मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ। इष्ट का स्वरूप बार-बार
स्मरण करने की वस्तु है। अन्त में संजय निर्णय देते हैं-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।
राजन्! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन (ध्यान ही धनुष है,
इन्द्रियों की दृढ़ता ही गाण्डीव है अर्थात् स्थिरता के साथ ध्यान धरनेवाला
महात्मा अर्जुन) हैं, वहीं पर 'श्रीः'-ऐश्वर्य, विजय-जिसके पीछे हार नहीं है,
ईश्वरीय विभूति और चल संसार में अचल रहनेवाली नीति है, ऐसा मेरा मत है।
आज तो धनुर्धर अर्जुन है नहीं। यह नीति, विजय-विभूति तो अर्जुन
तक सीमित रह गयी। तत्सामयिक थी यह। यह तो द्वापर में ही समाप्त हो
गयी। लेकिन ऐसी बात नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि मैं सबके
हृदय-देश में निवास करता हूँ। आपके हृदय में भी वे हैं। अनुराग ही अर्जुन है।
अनुराग आपके अन्तःकरण की इष्टोन्मुखी लगन का नाम है। यदि ऐसा अनुराग
आप में है तो सदैव वास्तविक विजय है और अचल स्थिति दिलानेवाली नीति
भी सदैव रहेगी, न कि कभी थी। जब तक प्राणी रहेंगे, परमात्मा का निवास
उनके हृदय-देश में रहेगा, विकल आत्मा उसे पाने का इच्छुक होगा और उनमें
से जिसके भी हृदय में उसे पाने का अनुराग उमड़ेगा, वही अर्जुन की श्रेणीवाला