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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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अष्टादश अध्याय ३६१
व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है। उसी योग्यता का नाम पराभक्ति है।
पराभक्ति के द्वारा ही वह तत्त्व को जानता है। तत्त्व है क्या? बताया- मैं जो हूँ,
जिन विभूतियों से युक्त हूँ, उसको जानता है अर्थात् परमात्मा जो है, अव्यक्त,
शाश्वत, अपरिवर्तनशील जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला है, उसे जानता है
और जानकर वह तत्क्षण मुझमें स्थित हो जाता है। अतः तत्त्व है परमतत्त्व, न
कि पाँच या पचीस तत्त्व। प्राप्ति के साथ आत्मा उसी स्वरूप में स्थित हो जाता
है, उन्हीं गुणधर्मों से युक्त हो जाता है।
ईश्वर का निवास बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! वह
ईश्वर सम्पूर्ण भूतों के हृदय-देश में निवास करता है; किन्तु मायारूपी यन्त्र में
आरूढ़ होकर लोग भटक रहे हैं, इसलिये नहीं जानते। अतः अर्जुन ! तू हृदय
में स्थित उस ईश्वर की शरण जा। इससे भी गोपनीय एक रहस्य और है कि
सम्पूर्ण धर्मों की चिन्ता छोड़कर तू मेरी शरण में आ, तू मुझे प्राप्त होगा। यह
रहस्य अनधिकारी से नहीं कहना चाहिये। जो भक्त नहीं है उससे नहीं कहना
चाहिये; लेकिन जो भक्त है उससे अवश्य कहना चाहिये। उससे दुराव रखें तो
उसका कल्याण कैसे होगा? अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पूछा- अर्जुन! मैंने
जो कुछ कहा, उसे तूने भली प्रकार सुना-समझा, तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि
नहीं? अर्जुन ने कहा- भगवन् ! मेरा मोह नष्ट हो गया है। मैं अपनी स्मृति को
प्राप्त हो गया हूँ। आप जो कुछ कहते हैं वही सत्य है और अब मैं वही करूँगा।
संजय, जिसने इन दोनों के सम्वाद को भली प्रकार सुना है, अपना
निर्णय देता है कि श्रीकृष्ण महायोगेश्वर और अर्जुन एक महात्मा हैं। उनका
सम्वाद बारम्बार स्मरण कर वह हर्षित हो रहा है। अतः इसका स्मरण करते
रहना चाहिये। उन हरि के रूप को याद करके भी वह बारम्बार हर्षित होता है।
अतः बारम्बार स्वरूप का स्मरण करते रहना चाहिये, ध्यान करते रहना
चाहिये। जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ महात्मा अर्जुन हैं, वहीं श्री है।
विजय-विभूति और ध्रुवनीति भी वहीं है। सृष्टि की नीतियाँ आज हैं तो कल
बदलेंगी। ध्रुव तो एकमात्र परमात्मा है। उसमें प्रवेश दिलानेवाली नीति ध्रुवनीति
भी वहीं है। यदि श्रीकृष्ण और अर्जुन को द्वापरकालीन व्यक्ति-विशेष मान
लिया जाय तब तो आज न अर्जुन है और न श्रीकृष्ण। आपको न विजय