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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
दिया। अध्याय २/१६ में उन्होंने कहा- अर्जुन! असत् वस्तु का तो अस्तित्व
नहीं है और सत् का तीनों कालों में अभाव नहीं है। भगवान होने के कारण यह
मैं अपनी ओर से नहीं कह रहा हूँ बल्कि इनका अन्तर तत्त्वदर्शियों ने देखा;
और वही मैं कहने जा रहा हूँ। तेरहवें अध्याय में उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का वर्णन
उसी प्रकार किया, जो ‘ऋषिभिर्बहुधागीतम्’- ऋषियों द्वारा प्रायः गाया जा
चुका था। अठारहवें अध्याय में त्याग और संन्यास का तत्त्व बताते हुए उन्होंने
चार मतों में से एक का चयन किया और उसे अपना समर्थन दिया।
संन्यास- कृष्णकाल में अग्नि को न छूनेवाले तथा चिन्तन का भी
त्याग करके अपने को योगी, संन्यासी कहनेवालों का सम्प्रदाय भी पनप रहा
था। इसका खण्डन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग,
दोनों में से किसी भी मार्ग के अनुसार कर्म को त्यागने का विधान नहीं है, कर्म
तो करना ही होगा। कर्म करते-करते साधना इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि
सर्वसंकल्पों का अभाव हो जाता है, वह पूर्ण संन्यास है। बीच रास्ते में संन्यास
नाम की कोई वस्तु नहीं है। केवल क्रियाओं को त्याग देने से तथा अग्नि न छूने
से न तो कोई संन्यासी होता है और न योगी। (जिसे अध्याय दो, तीन, पाँच,
छः और विशेषकर अठारह में देखा जा सकता है।)
कर्म- ऐसी ही भ्रान्ति कर्म के सम्बन्ध में भी मिलती है। अध्याय २/३९
में उन्होंने बताया- अर्जुन! अब तक यह बुद्धि तेरे लिये सांख्ययोग के विषय
में कही गयी और अब इसी को तू निष्काम कर्म के विषय में सुन। इससे युक्त
होकर तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश कर सकेगा। इसका थोड़ा भी
आचरण महान् जन्म-मरण के भय से उद्धार करानेवाला होता है। इस निष्काम
कर्म में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है, बुद्धि एक ही है, दिशा भी एक ही है।
लेकिन अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली है, इसलिये वे कर्म के
नाम पर अनेक क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। अर्जुन! तू नियत कर्म कर।
अर्थात् क्रियाएँ बहुत-सी हैं वे कर्म नहीं हैं। कर्म कोई निर्धारित दिशा है। कर्म
कोई ऐसी वस्तु है, जो जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे शरीरों की यात्रा का
अन्त कर देता है। यदि एक भी जन्म लेना पड़ा तो यात्रा पूरी कहाँ हुई?