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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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अष्टादश अध्याय ३५९
होगा; क्योंकि अनुराग ही अर्जुन है। अतः मानवमात्र इसका प्रत्याशी बन
सकता है।
निष्कर्ष-
यह गीता का समापन अध्याय है। आरम्भ में ही अर्जुन का प्रश्न है-
प्रभो! मैं त्याग और संन्यास के भेद और स्वरूप को जानना चाहता हूँ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस पर प्रचलित चार मतों की चर्चा की। इनमें एक सही
भी था। इससे मिलता-जुलता ही निर्णय योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दिया कि यज्ञ,
दान और तप किसी काल में त्यागने योग्य नहीं हैं। ये मनीषियों को भी पवित्र
करनेवाले हैं। इन तीनों को रखते हुए इनके विरोधी विकारों का त्याग करना ही
वास्तविक त्याग है। यह सात्त्विक त्याग है। फल की इच्छा के साथ त्याग
राजस है, मोहवश नियत कर्म का ही त्याग करना तामस त्याग है और संन्यास
त्याग की ही चरमोत्कृष्ट अवस्था है। नियत कर्म और ध्यानजनित सुख सात्त्विक
है। इन्द्रियों और विषयों का भोग राजस है और तृप्तिदायक अन्न की उत्पत्ति से
रहित दुःखद सुख तामस है।
मनुष्यमात्र के द्वारा शास्त्र के अनुकूल अथवा प्रतिकूल कार्य होने में
पाँच कारण हैं- कर्त्ता (मन), पृथक्-पृथक् करण (जिनके द्वारा किया जाता
है। शुभ पार लगता है तो विवेक, वैराग्य, शम, दम करण हैं। अशुभ पार
लगता है तो काम, क्रोध, राग, द्वेष इत्यादि करण होंगे), नाना प्रकार की
इच्छाएँ (इच्छाएँ अनन्त हैं, सब पूर्ण नहीं हो सकतीं। केवल वह इच्छा पूर्ण
होती है, जिसके साथ आधार मिल जाता है।), चौथा कारण है आधार (साधन)
और पाँचवाँ हेतु है दैव (प्रारब्ध या संस्कार)। प्रत्येक कार्य के होने में यही
पाँच कारण हैं, फिर भी जो कैवल्यस्वरूप परमात्मा को कर्त्ता मानता है, वह
मूढ़बुद्धि यथार्थ नहीं जानता। अर्थात् भगवान नहीं करते, जबकि पीछे कह
आये हैं कि अर्जुन! तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर रह, कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ।
अन्ततः उन महापुरुष का आशय क्या है?
वस्तुतः प्रकृति और पुरुष के बीच एक आकर्षण सीमा है। जब तक
मनुष्य प्रकृति में बरतता है, तब तक माया प्रेरणा करती है और जब वह इससे