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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय

Page 282Permalink

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
वनस्पति देव देवों के देव और सुनहरे पत्तों वाले फलों के स्वामी हैं. वनस्पति
देव अश्विनीकुमारों तथा सरस्वती देवी ने इंद्र देव को अच्छे मीठे फल से पाया. इंद्र
देव में ओज तथा बल धारण कराया. अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव की आंखों में दृष्टि
की स्थापना की. इंद्र देव धनधारी हैं. हमारे लिए धन धारें. धन के इच्छुक यजमान
उस के लिए कल्याणकारी यज्ञ करने की कृपा करें. (५६)
देवं बर्हिर्वारितीनामध्वरे स्तीर्णमश्विभ्यामूर्णम्रदाः सरस्वत्या स्योनमिन्द्र ते सदः.
ईशायै मन्यु १६ राजानं बर्हिषा दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५७)
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ने यज्ञसदन में इंद्र देव के लिए कुश का
आसन बिछाया. इन्होंने इंद्र देव में मन्यु (क्रोध) तथा वैभव धारण कराया. (५७)
देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवान्यक्षद्यथायथ १४ होताराविन्द्रमश्विना वाचा वाच १७
सरस्वतीमग्नि १४ सोम १४ स्विष्टकृत् स्विष्ट ऽ इन्द्रः सुत्रामा सविता वरुणो भिषगिष्टो
देवो वनस्पतिः स्विष्टा देवा ऽ आज्यपाः स्विष्टो अग्निरग्निना होता होत्रे स्विष्टकृद्यशो
न दधदिन्द्रियमूर्जमपचिति १४ स्वधां वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (५८)
भलीभांति लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, इंद्र देव, सविता
देव, वनस्पति देव तथा घी पीने वाले अन्य देवों ने अग्नि द्वारा ग्रहण की हुई हवि
को ग्रहण किया. देवगण यजमानों द्वारा किए गए यज्ञ से प्रसन्न हुए. देवगण ने
यजमानों के लिए यश, इंद्रिय शक्ति, बल तथा पराक्रम धारण किया. (५८)
अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन् पक्तीः पचन् पुरोडाशान् बध्नन्नश्विभ्यां
छाग १४ सरस्वत्यै मेषमिन्द्राय ऋषभ १४ सुन्वन्नश्विभ्या १४ सरस्वत्या ऽ इन्द्राय सुत्राम्णे
सुरासोमान्.. (५९)
इस यजमान ने आज होता अग्नि का वरण किया. सरस्वती देवी के लिए मेष
से पुरोडाश पकाया. अश्विनीकुमारों के लिए छाग से पुरोडाश पकाया. इंद्र देव के
लिए ऋषभ से पुरोडाश पकाया. सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु
सुरा (ओषधियों का तीखा रस) और सोम भेंट किया. (५९)
सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदश्विभ्यां छागेन सरस्वत्यै मेषेणेन्द्राय
ऋषभेणाक्षँस्तान् मेदस्तः प्रति पचतागृभीषतावीवृधन्त पुरोडाशैरपुरश्विना सरस्वतीन्द्रः
सुत्रामा सुरासोमान्.. (६०)
आज वनस्पति देव यज्ञ में पधारें. उन्होंने छाग से अश्विनीकुमारों को प्रसन्न
किया. उन्होंने मेष से सरस्वती देवी को प्रसन्न किया. उन्होंने ऋषभ से इंद्र देव को
प्रसन्न किया. तीनों देव इस से आनंदित हुए. इन ओषधियों से पुरोडाश पकाया.
सरस्वती देवी तथा अश्विनीकुमारों ने इंद्र देव हेतु सुरा (ओषधियों का तीखा रस)
और सोम भेंट किया. (६०)
२८२ - यजुर्वेद