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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५
१५१-देवदत्तो गच्छतीत्युपचारादभिमा-
नात्तावच्छरीरप्रत्यक्षोऽहङ्कारः ॥१५॥
(देवदत्तः) देवदत्त (गच्छति) जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्)
बोलचाल से (अभिमानात्) और अभिमान से (तावत्) प्रथम तो (अह-
ङ्कारः) “मैं” ऐसा कथन (शरीरप्रत्यक्षः) शरीरविषयक प्रत्यक्ष है ॥
अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, विष्णुमित्र चलता है, चैत्रः
पढ़ता है, मैत्र पढ़ाता है, इत्यादिक बोलचाल से, और मैं गोरा हूं, तू काला-
है, वह मोटा है, मैं पतला हूं, इत्यादिक अभिमान से अहङ्कार का प्रत्यक्ष
शरीरविषयक ही जान पड़ता है, इस लिये हमारे पक्ष में संदिग्ध नहीं किन्तु
शरीरविषयक उपचार निश्चित है ॥१५॥ फिर शङ्का करते हैं कि-
१५२-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १६ ॥
(उपचारः) बोलचाल वा लक्षणा का उपचार (तु) तो (संदिग्धः) सन्देह-
युक्त ही रहा ॥
अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, इत्यादि प्रत्यक्ष में यह सन्देहः
तो ज्यों का त्यों ही रहा कि वक्ता को शरीर का जाना आना विवक्षित है
अथवा आत्मा का वा दोनों का ? ॥ १६ ॥
आगे उक्त शङ्का का परिहार करते हैं कि-
१५३-न तु, शरीरविशेषाद् यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोर्ज्ञानं
विषयः ॥ १७ ॥
(शरीरविशेषाद्) शरीर के विशेष से (यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोः) यज्ञदत्त
और विष्णुमित्र का पृथक् २ (ज्ञानम्) ज्ञान (विषयः) वक्ता का विषय है
(न तु) तब सन्देह नहीं रहता ॥
जब यज्ञदत्त को आता और विष्णुमित्र को जाता देखते हैं, तब यज्ञदत्त
से विष्णुमित्र का पृथक् जो ज्ञान होता है वह तो शरीरविशेष से ही होता
है, आत्मा तो दोनों का एक सा होगा, शरीर ही भिन्न २ प्रकार के देखकर एक
का दूसरे से विशेष ज्ञान होता है तब आत्मा जाता है वा आता है, यह तो
सन्देह नहीं हो सकता किन्तु शरीरविषयक ही अहङ्कार का विषय होजाता
है, फिर उपचार (बोलचाल) सन्देहयुक्त कहां रहा ? ॥ १७ ॥

१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जब कि शरीर का ही प्रत्यक्ष अभिमान और अहङ्कार है, आत्मा का
प्रत्यक्ष नहीं, तब सामान्यतोदृष्ट से विशेष सिद्ध न होने पर आत्मा केवल
शास्त्रसिद्ध है, और उस के अनुमान से सिद्ध करने का परिश्रम वृथा है ? तो
उत्तरः-
१५४-अहमिति मुख्ययोग्याभ्यां शब्दवद् व्यतिरेकाऽव्यभि-
चाराद्विशेषसिद्धेर्नागमिकः ॥ १८ ॥
( अहमिति ) 'मैं' ऐसे ( मुख्ययोग्याभ्याम् ) उपचाररहित और योग्य
प्रत्ययों से ( शब्दवत् ) शब्द के समान ( व्यतिरेकाऽव्यभिचारात् ) पृथक्ता
के अव्यभिचार से ( विशेषसिद्धेः ) विशेष सिद्ध होने से ( आगमिकः ) केवल
शास्त्रसिद्ध ( न ) नहीं है ॥
अर्थात् आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है किन्तु अनुमानसिद्ध भी है
क्योंकि 'मैं हूं' ऐसी प्रतीति न तो औपचारिक है किन्तु उपचाररहित है
और योग्य भी है क्योंकि केवल शरीर को कोई 'मैं' नहीं कहता, प्रत्युत
'मेरा शरीर' कहता है, तब आत्मा शरीर से नित्य भिन्न हुवा अर्थात् शरीर
कभी भी आत्मा नहीं हुवा, तब जैसे शब्द गुण, पृथिवी आदि आठ द्रव्यों
में से किसी द्रव्य का गुण न होने से किन्तु आठों से व्यतिरिक्त आकाश का
गुण होने से भिन्न है । ऐसे ही आत्मा भी पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से
व्यतिरिक्त विशेष सिद्ध होने से केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं, किन्तु अनुमान-
सिद्ध भी है । इस प्रकार आत्मा-शास्त्र और अनुमान दोनों से सिद्ध है ॥१८॥
आत्मा की परीक्षा हो चुकी । अब आत्मा के नाना अर्थात् अनेक होने
की परीक्षा करेंगे, इस लिये पहले पूर्व पक्ष करते हैं:-
१५५-सुखदुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेषादैकात्म्यम् ॥ १९ ॥
( सुखदुःख-ऽविशेषात् ) सुख दुःख और ज्ञान की सिद्धि में विशेष न होने
से ( ऐकात्म्यम् ) आत्मा एक ही जान पड़ता है ॥
जैसा सुख दुःख और ज्ञान एक शरीर में है, वैसा ही सब शरीरों में है,
कुछ विशेष नहीं । इस कारण देवदत्त, यज्ञदत्त, विष्णुमित्र, चैत्र, मैत्र इत्यादि
के अनेक शरीरों में एक ही आत्मा प्रतीत होता है क्योंकि जैसे शब्दलिङ्ग की
विशेषता न होने से आकाश एक है और जैसे शीघ्र विलम्ब एकसाथ इत्यादि
सामान्य से काल एक है और जैसे पूर्व, पश्चिम आदि प्रत्ययलिङ्ग के अविशेष