तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
12 भूमिका
कहा जाता है कि जब तिरुक्कुरळ् अन्य ग्रन्थों के साथ उस "संगप्पलहै" पर
रखा गया तो अन्य सभी ग्रन्थ जल में निमज्जित हो गये, और केवल तिरुक्कुरळ्
ही जल के ऊपर तैरता रहा। इस कथा में सत्य का अंश चाहे कितना ही क्यों
न हो, पर यह अवश्य माननीय है कि इसकी तुलना में तात्कालिक अन्य कोई
कृति नहीं ठहरती। यह अपने ढंग की एक ही कृति है। कविवर परणर ने
तिरुक्कुरळ् की तुलना वामनावतार से की है। भगवान ने वामनावतार लेकर दो
ही पग में सम्पूर्ण विश्व को नाप डाला था। इसी प्रकार 'पौने दो चरणों' का
प्रत्येक कुरळ् एक भाव-लोक को अपने में अन्तर्लीन किये हुए है। दूसरे एक
सत्कवि ने तिरुक्कुरळ् में विभिन्न विषयों की विशदता को अलौकिक काव्यगत
सौन्दर्य से पूर्ण¹ व्यक्त किया हुआ पाकर कहा है :—
सभी अर्थ इस में समाप्त,
जो इस में है न, नहीं अन्यत्र ॥²
यहाँ "अर्थ" से वही भाव है जो "वागर्थाविव सम्पृक्तौ, वागर्थ
प्रतिपत्तये" के "अर्थ" से है।
तिरुक्कुरळ् पर "क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति । तदेव रूपं रमणीयतायाः ॥"
वाला सिद्धान्त पूर्णतः घटित होता है। जितना ही इसमें पैठकर अर्थ गाम्भीर्य का
अन्वेषण करते हैं उतना ही नवीन अर्थ का प्रकाश निस्सृत होता हुआ प्रकट होता
है। यह प्रकाश पाठक में उसके ज्ञान, अनुभव एवं व्यक्तिगत विचार-धारा की
- "Musaco Contingens Cuncta lopre" i. e., "touching all
things with poetic Grace"—G. U. Pope. - " எல்லாப் பொருளும் இதன்பாலுள ; இதன்பால்
இல்லாத எப்பொருளும் இல்லையால்."
(மதுரைத் தமிழ்நாயனார்.)
भूमिका 13
गम्भीरता के अनुपात में होता है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसके भाव
गम्भीर व नितनूतन होते हुए भी अत्यन्त सरल एवं स्पष्ट हैं।
तिरुक्कुरळ् एक मुक्तक काव्य है। इसका प्रत्येक पद पृथक् - पृथक्
मोती के सदृश विशिष्ट व्यक्तित्व से युक्त है। प्रत्येक पद स्वतन्त्र रूप से पूर्ण
अर्थ का द्योतक है। ऐसा होते हुए भी इसकी रचना में आद्योपान्त एक सम्बन्ध
सूत्र व धारावाहिकता भी है, जो यह सिद्ध करती है कि यह एक संग्रह ग्रन्थ
नहीं, अपितु एक पूर्ण क्रमबद्ध रचना है। इसका प्रत्येक अध्याय पूर्वोक्त अध्याय
से, एवं प्रत्येक पद पूर्वोक्त पद से विकसित ज्ञात होता है। दूसरे शब्दों में इस
प्रकार हम कह सकते हैं कि यह मोक्ष प्राप्ति के लिए एक प्रशस्त सोपान है
जिसके तीन खण्ड हैं—धर्म, अर्थ एवं काम। इसका एक-एक पद उस प्रशस्त
सोपान का एक - एक पद है। जिस प्रकार सोपान का प्रत्येक पद अपने में पूर्ण
होता हुआ भी निम्न पद के पश्चात् एवं आगामी पद के पूर्व होता है और इस
प्रकार एक क्रम-बद्धता रहती है, उसी प्रकार तिरुक्कुरळ् के पदों में भी एक
'क्रम-बद्धता, एक नियम व भावों का क्रमिक विकास हम देख सकते हैं।
तिरुक्कुरळ् एक 'सामान्य नीति-ग्रन्थ'¹ है। यह किसी मत - विशेष,
काल-विशेष अथवा स्थान-विशेष का ग्रन्थ नहीं है। यह ग्रन्थ हिन्दू, जैन, बौद्ध,
ईसाई, इस्लाम आदि सभी, से समाहृत हुआ है। जिस प्रकार यह ईसा की
प्रारम्भिक शताब्दियों में समाहृत हुआ था, उसी प्रकार आज भी हो रहा है,
और सदा होता रहेगा। सभी मनुष्य समान रूप से इसका अध्ययन व सम्मान
करते हैं। भारत में ही नहीं प्रत्युत पाश्चात्य एवं प्राच्य देशों में भी इसका नाम
सादर लिया जाता है। इसी हेतु यह रचना 'सम-धर्म-ग्रन्थ'² की संज्ञा से, और
- பொது நீதி நூல்—Common Ethical Code
- 'समयப் பொது நூல்'
14 भूमिका
इसके रचयिता 'दैविक कवि', 'भगवान', व 'पिता'¹ आदि नामों से स्मरण
किये जाते हैं। इसमें जो तत्त्व व्यक्त किये गये हैं वे सभी मनुष्यों, देशों व
कालों के लिए सत्य ठहरते हैं। अतः इसे "सत्य वचन"² की संज्ञा से भी
सम्मानित किया जाता है।
यद्यपि तमिऴ भाषा में आचरण एवं नीति के ग्रन्थ अनेकानेक हैं, तथापि
उनमें तिरुक्कुरळ् का स्थान कुछ विलक्षण ही है। निकटतः दो सहस्राब्दियों के
पूर्व रचित ऐसा अपूर्व काव्य-ग्रन्थ कदाचित् अन्य किसी भाषा-साहित्य में
अप्राप्य है। इन सबका यही कारण है कि यह ऐसा विशिष्ट नीति-ग्रन्थ है जो
भाव, भाषा एवं साहित्यिक सौंदर्य से पूर्ण है, और जिसके साधु-लेखक ने मनुष्य
के सामान्य आचरण एवं व्यवहार भूमि पर अवस्थित होकर अपनी सर्वतोमुखी
प्रतिभा एवं सुविशाल विचार-धारा से प्रेरित सर्वग्राह्य मानव-धर्म के तत्वों को सुन्दर
समास शैली में स्पष्टतः व्यक्त किया है। अनेकानेक गम्भीर भाव-चित्रों को अपने
मानस-पटल पर अंकित करके उन्हें उसी रूप में न्यूनातिन्यून शब्दों में चित्रित
करने में तिरुवळ्ळुवर विश्व साहित्य में अद्वितीय हैं³। कोई भी सहृदय पाठक
तिरुक्कुरळ् को आद्योपान्त पढ़कर उनके तत्त्वों को हृदयंगम करने के पश्चात् उक्त
कथन की सत्यता को माप सकता है। कवि इडैक्काडर ने ठीक ही कहा है :—
'सरसों को छिद, सत सागर भर,
काटे मध्य कुरळ्।'⁴
- 'தெய்வப் புலவா', 'நாயனா'
- 'பொய்யா மொழி.' "செய்யா மொழிக்கும் திருவள்ளுவர் மொழிந்த
பொய்யா மொழிக்கும் பொருள் ஒன்றே." (வெள்ளி வீதியார்) - "It is truly an apple of gold in a net-work of silver."
(P. vi—Introduction to 'The Sacred Kural' by G. U. Pope) - "கடுகைத துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக
குறுகத தரித்த குறள்." (இடைக்காடா)
भूमिका 15
इस समालोचना-सूक्ति को शिथिल मानकर सरस्वती का साक्षात् अवतार
मानी जानेवाली तमिऴ कवयित्री अव्वयार ने कुरळ् की अपार शक्ति का अवलोकन
करके कहा—
' अणु को ही छिद, सत सागर भर,
काटै मध्य कुरळ् ।'¹
हिन्दी साहित्य के प्रेमी कविवर बिहारीलाल के दोहों में उपस्थित
“ गागर में सागर ” के गुण से परिचित ही हैं। बिहारी के दोहों के सम्बन्ध में
कहा गया है—
“ सतसैया के दोहरे, अरु नावक के तीर ।
देखत के छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर ॥ ”
यही गुण हम तिरुवळ्ळुवर में अत्यधिक मात्रा में पाते हैं ।
विचार स्वातन्त्र्य की भावना इस नीति-ग्रन्थ की अपनी एक अनुपम
विशिष्टता है । ध्यान देने का विषय है कि यह कोई परम्परागत अथवा एक-
पक्षीय धर्म-ग्रन्थ तो है ही नहीं । सम्पूर्ण ग्रन्थ में रचयिता ने अपने विभिन्न
विचारों को स्पष्टतः व्यक्त करके अन्तिम निर्णय का अधिकार पाठक को ही दे
दिया है । कवि ने स्वयं ही कहा है—
जो भी सुनें किसी भी जन से,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान ।²
- “ அணுவைத் துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக்
குறுகத் தரித்த குறள். ” (ஔவையார்)
2, “ எப்பொருள் யார்யார்வாய்க் கேட்பினு மப்பொருள்
மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு. ”
(2-43-3)
16 भूमिका
तिरुवळ्ळुवर कहते हैं कि कोई व्यक्ति कितना ही महान् क्यों न हो,
मानव को चाहिए कि उसके विचारों को ध्यान से सुनकर उन पर स्वयं चिन्तन एवं
मनन करे, और सत्य मात्र को स्वीकार करे । तात्पर्य यह है कि कथित विषय का
विवेचन स्वयं भी अपनी बुद्धि से करके वास्तविकता की छान-बीन करे, और
युक्तियुक्त हो तो उस पर विश्वास लावे, अन्यथा नहीं । यही ज्ञान कहलाता है ।
अन्धानुकरण अज्ञान का चिह्न है । कबीर ने भी कहा है—
“ लेना होय सो लेय ले,
कही-सुनी मत मान । ”
एक दूसरे स्थान में तिरुवळ्ळुवर ने यहाँ तक कह दिया है—
किसी वस्तु का गुण कुछ भी हो,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान । ¹
सारांश यह है कि तिरुवळ्ळुवर ने व्यक्तिगत विचारों को मानव के सम्मुख
उपस्थित करके, अपनी बुद्धि के आधार पर उन पर मनसा-वाचा-कर्मणा आचरण
करने की सम्मति दी है । सम्पूर्ण ग्रन्थ में कहीं भी धार्मिक अथवा अन्य
किसी प्रकार के प्रमाण की छाप² नहीं लगायी है । यह वर्तमान काल के
प्रजातन्त्र-वाद के दृष्टिकोण से भी युक्तियुक्त सिद्ध होता है ।
तिरुक्कुरळ् एक नीति-ग्रन्थ है जिसमें पुरुषार्थों का विशद विवेचन एवं
स्पष्टीकरण हुआ है । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों में से कवि ने
केवल प्रथम तीन का ही प्रत्यक्ष रूप से वर्णन किया है । चौथे पुरुषार्थ—
मोक्ष—का शब्दों में विशद वर्णन दो कारणों से नहीं किया है । प्रथम यह कि यदि
- “ எப்பொரு ளெத்தன்மைத தாயினு மப்பொருண்
மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு ”. (2-36-5.)
2 “ Stamp of Religion or any other type of Sanction. ”
भूमिका 17
कोई व्यक्ति धर्म, अर्थ एवं काम का अपने जीवन में तिरुक्कुरळ् में कहे अनुसार
व्यवहार करेगा तो चौथा पुरुषार्थ उसे आप से आप प्राप्त हो जाएगा । तत्पश्चात्
वह स्वयं उसका अनुभव भी कर लेगा, और साथ-साथ यह भी कि वह अव्यक्त
अवस्था अवर्णनीय है ।¹ दूसरा कारण यह है कि जिसे यह पुरुषार्थ प्राप्त हो
जाय, वह इसका अपने मुख से वर्णन नहीं करेगा; और जो इसका वर्णन करे,
उसे वास्तव में इसका अनुभव नहीं हुआ समझना चाहिए ।² कबीर ने कहा
ही है—
“जो देखे सो कहे नहीं, कहे सो देखे नाहिं ।
सुने सो समझावे नहीं, नैन - जीभ - कन काहिं ॥”
अतः तिरुवळ्ळुवर ने मोक्ष पर किसी अध्याय की रचना नहीं की है।
पर हाँ, प्रस्तावना के चार अध्यायों, में इस चतुर्थ पुरुषार्थ के सम्बन्ध में अप्रत्यक्ष
रूप से सूचना मात्र दे दी है³ और तद्हेतु जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर
एक सामान्य मानव-धर्म-पथ का उल्लेख कर दिया है ।
- “अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूंगेहि मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै ॥
परम स्वाद सब ही जु निरन्तर अमित तोष उपजावै ।
मन बानी को अगम अगोचर सो जानै जो पावै ।”
—सूरदास - “He who has seen will not say,
He who says, has not seen.” - “வீடொன்று பாயிர நான்கு” (சிறு மேதாவியார்)
अर्थात् ‘मोक्ष इक प्रस्तावना चार ।’ तात्पर्य यह कि प्रथम चार
अध्यायों को एक पृथक खण्ड ‘मोक्ष’ पर मानने से तिरुक्कुरळ् मे चार
खण्ड—क्रमशः मोक्ष, धर्म, अर्थ एवं काम पर चारों पुरुषार्थों के हो जाते
हैं । इस प्रकार तिरुक्कुरळ् ‘चतुर्पुरुषार्थ-निरूपण ग्रन्थ’ है ।
3
18 भूमिका
तिरुक्कुरळ् में धर्म के जिज्ञासुओं के लिए, अर्थ (राजनीति) विभाग के
छोटे-बड़े सभी कार्य-कर्त्ताओं के लिए व ज्ञान के अन्वेषकों के लिए ही नहीं,
अपितु काव्य व काम-रस के इच्छुकों के लिए भी मनोवांछित सामग्री यथेष्ट
मात्रा में प्राप्त हो सकती है। यह उत्तम जीवन का उत्तम पथ-प्रदर्शक है। अतः
हम कह सकते हैं कि तिरुक्कुरळ्—
धर्म के जिज्ञासुओं को धर्म-ग्रन्थ महान है,
राजनीति विदग्ध को यह राज्य-ग्रन्थ महान है।
ज्ञान का जो भान चाहें, ज्ञान-ग्रन्थ महान है,
काव्य-रस के रसिक जन को काव्य-ग्रन्थ महान है॥
प्रेम-रस के पाठकों को प्रेम-ग्रन्थ महान है,
ब्रह्म-सुख-खोजी को ब्रह्मानन्द-ग्रन्थ महान है॥
जीवनोत्तम पथ-प्रदर्शन हेतु ग्रन्थ महान है,
दिव्य-विद्या-ज्ञानार्जन हेतु ग्रन्थ महान है॥
दो०—तिरुक्कुरळ् पथ के पथिक, होंगे यहाँ सानन्द।
उन्हें प्राप्त होगा वहाँ, निज पद ब्रह्मानन्द॥
तिरुक्कुरळ् एवं उसके लेखक तिरुवळ्ळुवर के अनेक नाम हैं जिनमें नौ
प्रधान हैं। वे हैं—
ग्रन्थ के नाम लेखक के नाम
(१) तिरुक्कुरळ् तिरुवळ्ळुवर
(२) मुप्पानूल् नायनार
(३) उत्तरवेदम देवर
(४) देय्वनूल् मुदर्पावलर
(५) तिरुवळ्ळुवर देय्वप्पुलवर
भूमिका 19
(६) पोय्यामोष़ि नान्मुखनार
(७) वायुरै वाष़्त्तु मातनुवंगी
(८) तमिष़ मरै चेन्नाप्पोदार
(९) पोदु मरै पेरुनावलर
वस्तुतः तिरुक्कुरळ् का कोई अनुवाद उसके सम्पूर्ण काव्य-सौष्ठव को
व्यक्त नहीं कर सकता ।¹ वैसे इस ग्रन्थ का अनुवाद अनेक भाषाओं में
हो चुका है । भारतीय व अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य अनेक पाश्चात्य भाषा
साहित्यागार इस ग्रन्थ-रत्न के भाषान्तर से समृद्ध किये जा चुके हैं। केवल
अंग्रेज़ी में इसके बारह अनुवाद हो चुके हैं जिनमें पादरी श्री जी. यू. पोप,
वा० वे० सु० अय्यर, वी. आर. रामचन्द्र दीक्षितर आदि के प्रमुख हैं।
श्री एम. एरियल ने फ्रेंच में इसका अति सुन्दर अनुवाद किया है। डॉ०
ग्रॉल ने जर्मन तथा लैटिन भाषाओं में सन् १८५६ में अनुवाद करके क्रमशः
लैप्सिग तथा लन्दन से प्रकाशित किया है। इटालियन फ़ादर बेस्की जिन्होंने
अपना नाम 'वीरमामुनिवर', 'धैर्यनाथ स्वामी' व 'इसाती सन्यासी' रखकर
भारतीय वेश-भूषा में तिरुच्चिराप्पळ्ळी के निकटवर्ती एक नगर में चालीस वर्ष
रह कर तमिष़ भाषा के विशद अध्ययन के पश्चात् तिरुक्कुरळ् का लैटिन भाषा में
अनुवाद तथा तमिष़ भाषा तथा साहित्य पर अन्य अनेक ग्रन्थों की भी रचना की,
विशेष प्रशंसा के पात्र हैं। इन अनुवादकों ने तमिष़ को ही नहीं, अपितु
अपनी भाषा को भी प्रशोभित किया, और उसी के साथ-साथ तिरुक्कुरळ् के
दिव्य सन्देश को संसार के विभिन्न देशों तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की।
- "No Translation can express its charming effect." — P. vi.
Introduction to the Sacred Kural — by G. U. Pope
20 भूमिका
इस ग्रन्थ के भाष्य तमिऴ में ही बारह से अधिक लिखे जा चुके हैं।
प्रत्येक में एक विशिष्ट विचार-धारा को प्रतिबिम्बित होते हुए हम स्पष्टतः देख
सकते हैं। इसके अनुवाद अन्य तीनों द्राविडीय भाषाओं में हो चुके हैं।
तेल्लुगु में श्री वेंकटराम विद्यानन्द ने ‘ त्रिवर्ग दीपिका ’ के नाम से आकस्मिक
स्वर्गवास के कारण केवल प्रथम दो खण्डों का पद्यानुवाद प्रस्तुत किया है।
कन्नड में श्री नरसिंहाचार्य ‘ नीति मंजरी ’ के नाम से सम्पूर्ण ग्रन्थ का सुन्दर
भाषान्तर तीन शताब्दियों के पूर्व ही कर गये हैं, और अभी श्री एल. गुण्डप्पा
का भी संपूर्ण भाषानुवाद प्रकाशित हो चुका है। मलयाळम् में श्री परमेश्वरन्
पिळ्ळै ने ‘ रत्न उद्धारकम् ’ के नाम से प्रथम दो खण्डों का भाषानुवाद किया है।
इतर भारतीय भाषाओं में से बंगाली में डा० नलिनी मोहन सानियाल
ने स्वर्गीय श्री वा० वे० सु० अय्यर के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर
प्रसिद्ध भाषा-शास्त्रज्ञ डा० सुनीति कुमार चटर्जी के प्राकथन के साथ सुन्दर
अनुवाद प्रस्तुत किया है। हिन्दी में श्री क्षेमानन्द राहत द्वारा चुने हुए
८९ अध्यायों का तथा प्रो० बी. डी. जैन द्वारा तीनों खण्डों का अंग्रेज़ी से
भाषानुवाद हो चुका है।
प्रस्तुत अनुवाद में मैंने तिरुक्कुरळ् के तमिऴ भाष्यों पर, विशेष रूप से
परिमेलऴग़र के भाष्य पर तथा अन्य टीकाओं व भाषानुवादों पर ध्यान रखते
हुए तिरुक्कुरळ के विशेषज्ञों से स्थान-स्थान पर परामर्श प्राप्त करके मूल
तिरुक्कुरळ का अनुसरण करने का प्रयत्न किया है।
अपने आदरणीय वाइस चान्सलर सर ए० लक्ष्मणस्वामी मुदलियार जी
को इस ग्रंथ का प्राक्कथन प्रदान करने के लिये मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता
सादर समर्पित करता हूँ।
मद्रास विश्वविद्यालय,
मद्रास ❭ सु. शंकर राजू नायडू
१ - ६ - १९५८ /
திருக்குறள்
तिरुक्कुरळ्
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- அறம்
१. धर्म
திருக்குறள்
I. அறத்துப்பால்
- பாயிரவியல்
- கடவுள் வாழ்த்து
- அகர முதல எழுத்தெல்லாம் ஆதி
பகவன் முதற்றே உலகு. - கற்றதனால் ஆய பயனென்கொல் வாலறிவன்
நற்றாள் தொழாஅர் எனின். - மலர்மிசை ஏகினான் மாணடி சேர்ந்தா
நிலமிசை நீடுவாழ் வார். ` - வேண்டுதல் வேண்டாமை இலான் அடிசேர்ந்தார்க்கு
யாண்டும் இடும்பை இல. - இருள்சேர் இருவினையும் சேரா இறைவன்
பொருள்சேர் புகழ்புரிந்தார் மாட்டு. - பொறிவாயில் ஐந்தவித்தான் பொய்தீர் ஒழுக்க
நெறிநின்றார் நீடுவாழ் வார்.
7 தனக்குவமை இல்லாதான் தாள்சேர்ந்தார்க் கல்லால்
மனக்கவலை மாற்றல் அரிது. - அறவாழி அந்தணன் தாள்சேர்ந்தார்க் கல்லால்
பிறவாழி நீந்தல் அரிது - கோளில் பொறியிற் குணமிலவே எண்குணத்தான்
தாளை வணங்காத் தலை
10 பிறவிப் பெருங்கடல் நீந்துவர் நீந்தார்
இறைவன் அடிசேரா தார்.
तिरुक्कुरळ्
१. धर्म
१. प्रस्तावना
१. सर्वेश स्तुति
१. सभी अक्षर-मालाएँ 'अ' अक्षर को प्रथमतः धारण की हुई हैं।
सभी लोक 'आदि भगवान्' को ही प्रथमतः धारण किये हुए हैं।
२. विशुद्ध-ज्ञान रूप सर्वेश्वर के श्री चरणों की सेवा के बिना सारा
विद्यार्जन व्यर्थ ही है।
३. पुष्पों पर गमन करनेवाले (अथवा सभी के हृदय-कमल में
उपस्थित) उस सर्वेश के पदों के उपासक (आनन्द) भूमि पर सदा
दीर्घायुष्मान होंगे।
४. इच्छा व अनिच्छा से रिक्त सर्वेश की शरण जो ग्रहण करते हैं,
उन्हें किसी प्रकार का कष्ट बाधित नहीं कर सकता।
५. सर्वेश के सुयश का सदा सप्रेम गान करनेवाले अज्ञान से उत्पन्न,
उभय कर्मों से मुक्त रहेंगे।
६. पंचेन्द्रियों के उद्गारों को भस्मीभूत कर सर्वेश के सत्य-मार्ग के जो
निरन्तर अनुगामी होते हैं, उन्हें स्थायी सद्गति प्राप्त होती है।
७. उस अनुपम परम पुरुष के पदों में पहुँचे बिना मन की चिन्ता कभी
मिट नहीं सकती।
८. सदा शीतल व शान्त रहनेवाले उस धर्म-सिन्धु के चरणों की
वंदना नहीं की तो भव-सागर से बेड़ा पार होना नितान्त
असम्भव है।
९. अष्ट-गुणों से युक्त सर्वेश्वर के चरणों में जो शीश न झुके, उसे
बस, शक्तिहीन इन्द्रिय के समान ही समझो।
१०. वे ही संसार-सागर से तरेंगे जो ईश्वर के श्री चरणों में स्थिर
था तरना असम्भव ही है।
4
26 திருக்குறள் அதிகாரம் 2.
2. வான் சிறப்பு
11. வான்நின்று உலகம் வழங்கி வருதலால்
தான்அமிழ்தம் என்றுணரற் பாற்று.
12. துப்பார்க்குத் துப்பாய துப்பாக்கித் துப்பார்க்குத்
துப்பாய தூஉம் மழை.
13. விண்இன்று பொய்ப்பின் விரிநீர் வியனுலகத்து
உள்நின்று உடற்றும் பசி.
14. ஏரின் உழாஅர் உழவர் புயல்என்னும்
வாரி வளங்குன்றிக் கால்
15. கெடுப்பதூஉங் கெட்டார்க்குச் சார்வாய்மற் றாங்கே
எடுப்பதூஉம் எல்லாம் மழை.
16. விசும்பின் துளிவீழின் அல்லால்மற் றாங்கே
பசும்புல் தலைகாண்பு அரிது.
17. நெடுங்கடலும் தன்நீர்மை குன்றும் தடிந்தெழிலி
தானல்கா தாகி விடின்.
18. சிறப்பொடு பூசனை செல்லாது வானம்
வறக்குமேல் வானோர்க்கும் ஈண்டு.
19 தானம் தவம்இரண்டும் தங்கா வியன்உலகம்
வானம் வழங்காது எனின்.
20. நீர்இன்று அமையாது உலகெனின் யார்யார்க்கும்
வான்இன்று அமையாது ஒழுக்கு.
अध्याय- २ तिरुक्कुरळ 27
२. वर्षा वैशिष्ट्य
११. संसार का अस्तित्व वर्षा पर आधारित होने के कारण वही संसार की
सुधा कहलाने योग्य है ।
१२. जीवमात्र के लिए उपयुक्त भोज्य पदार्थों की सृष्टि करके वर्षा स्वयं भी
उनके लिए भोजन (जल) बन जाती है ।
१३. ऋतुकालीन वर्षा न हो तो महासागरों के मध्य उपस्थित इस
पृथ्वी के सभी जीवों को क्षुधा सदा सतायेगी ।
१४. वर्षा रूपी आय में यदि कमी पड़ी तो कृषक कृषि-कर्म नहीं करेंगे ।
१५. (न बरस कर) किसी व्यक्ति का नाश ही नहीं, अपितु (खूब बरस कर)
गिरे हुए व्यक्ति का विकास करने की शक्ति भी वर्षा में है ।
१६. वर्षा का जल-बिन्दु पड़े बिना, किसी स्थान पर हरित-तृण की
नोक के भी दर्शन दुर्लभ होते हैं ।
१७. यदि जलद अपने आपको क्षीण करके बरसना बन्द कर दे तो
असीम समुद्र भी सूख जायगा ।
१८. यदि वर्षा न हो तो संसार में सम्मान के साथ होनेवाली देव-पूजा
बन्द हो जायगी ।
१९. विस्तृत व्योम वर्षा-वृष्टि न करे तो इस विशाल वसुधा पर से दान
व तपस्या दोनों का सदा के लिए लोप हो जायगा ।
२०. जल के बिना संसार में जीवन का अन्त हो जायगा तो वर्षा के
बिना सदाचरण को भी सब में समाप्त ही समझो ।
28 திருக்குறள் அதிகாரம் 3.
3. நீத்தார் பெருமை
21. ஒழுக்கத்து நீத்தார் பெருமை விழுப்பத்து
வேண்டும் பனுவல் துணிவு
22. துறந்தார் பெருமை துணைக்கூறின் வையத்து
இறந்தாரை எண்ணிக்கொண்டு அற்று.
23. இருமை வகைதெரிந்து ஈண்டுஅறம் பூண்டார்
பெருமை பிறங்கிற்று உலகு.
24 உரனென்னும் தோட்டியான் ஓரைந்தும் காப்பான்
வரனென்னும் வைப்பிற்கோர் வித்து
25. ஐந்தவித்தான் ஆற்றல் அகல்விசும்பு ளார்கோமான்
இந்திரனே சாலும் கரி.
26. செயற்கரிய செய்வார் பெரியர் சிறியர்
செயற்கரிய செய்கலா தார்
27. சுவைஒளி ஊறுஓசை நாற்றமென்று ஐந்தின்
வகைதெரிவான் கட்டே உலகு.
28. நிறைமொழி மாந்தர் பெருமை நிலத்து
மறைமொழி காட்டி விடும்.
29. குணமென்னும் குன்றேறி நின்றார் வெகுளி
கணமேயும் காத்தல் அரிது.
30. அந்தணர் என்போர் அறவோர்மற் றெவ்வுயிர்க்கும்
செந்தண்மை பூண்டொழுக லான்.
अध्याय ३ तिरुक्कुरळ २७
३. सन्यासी का माहात्म्य
२१. सभी धर्म-ग्रन्थों का निश्चित मत है कि सदाचरण पर स्थिर रूप से
चलकर सन्यास ग्रहण करनेवालों की महिमा ही सर्वश्रेष्ठ है।
२२. सन्यासी के माहात्म्य की गणना करना ठीक वैसा ही है जैसे यह
गिनना कि इस संसार में आज तक कितने मृत्यु को प्राप्त हुए।
२३. जन्म तथा मुक्ति-इन दोनों के सुख-दुख को पूर्णतः समझकर भविष्य में
जन्म से मुक्ति प्राप्त करने के हेतु जो सन्यास ग्रहण करे, उसका
मान संसार में बढ़ेगा।
२४. दृढ़ता रूपी अंकुश के द्वारा पंचेन्द्रिय रूपी हस्तियों को जो वशीभूत
कर ले, वह सर्वोत्तम लोक के एक बीज के समान है।
२५ पंचेन्द्रियों पर विजय-प्राप्त व्यक्ति की शक्ति को व्यक्त करने के
सुन्दर उदाहरण विशाल आकाश के अधिपति इन्द्र स्वयं हैं।
२६. श्रेष्ठ कार्यों को सिद्ध करनेवाले व्यक्ति ही श्रेष्ठ हैं, और जो श्रेष्ठ
कार्यों में सिद्ध नहीं होते, वे निम्न हैं।
२७. वस्तुतः संसार उन्हीं के हाथों में है जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध के गुण के ज्ञाता हैं।
२८. सारगर्भित शब्दों से युक्त सन्यासी की महिमा को इस संसार में
धार्मिक वचन सिद्ध कर देंगे।
२९ सद्गुण रूपी शृंग पर खड़े हुए व्यक्ति का क्रोध क्षणमात्र के लिए भी
सहन नहीं किया जा सकता।
३०. ब्राह्मण कहलाने योग्य वही है जो धर्म-निरत रहकर सभी जीवों पर
सस्नेह दयार्द्र हो।
30 திருக்குறள் அதிகாரம் 4.
4. அறன்வலியுறுத்தல்
31. சிறப்புஈனும் செல்வமும் ஈனும் அறத்தினூஉங்கு
ஆக்கம் எவனோ உயிர்க்கு.
32. அறத்தினூஉங்கு ஆக்கமும் இல்லை அதனை
மறத்தலின் ஊங்கில்லை கேடு.
33. ஒல்லும் வகையான அறவினை ஓவாதே
செல்லும்வா யெல்லாம் செயல்.
34. மனத்துக்கண் மாசிலன் ஆதல் அனைத்துஅறன்
ஆகுல நீர பிற
35. அழுக்காறு அவாவெகுளி இன்னாச்சொல் நான்கும்
இழுக்கா இயன்றது அறம்.
36. அன்றறிவாம் என்னாது அறஞ்செய்க மற்றது
பொன்றுங்கால் பொன்றாத் துணை.
37. அறத்தாறு இதுவென வேண்டா சிவிகை
பொறுத்தானோடு ஊர்ந்தான் இடை.
38. வீழ்நாள் படாஅமை நன்றாற்றின் அஃதொருவன்
வாழ்நாள் வழிஅடைக்கும் கல்.
39. அறத்தான் வருவதே இன்பம்மற் றெல்லாம்
புறத்த புகழும இல.
40. செயற்பால தோரும் அறனே ஒருவற்கு
உயற்பால தோரும் பழி.
अध्याय. ४ तिरुक्कुरळ 31
४. धर्म की सबलता
३१. धर्म यशप्रद है, और धनप्रद भी । अतः जीवन के लिए धर्म से
श्रेष्ठ और कौन-सा पदार्थ है ?
३२. न तो धर्म से श्रेष्ठ कोई वस्तु ही है, और न उसका विस्मरण जैसा
कोई पतन ।
३३. धर्म को छोड़े बिना यथाशक्ति अपने सभी कर्मों को सम्पन्न करो ।
३४. मन को निर्मल रखना ही वस्तुतः धर्म है । अन्य सभी कार्य
बाह्याडम्बर मात्र हैं ।
३५. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध एवं कठोर वचन—इन चारों से सदा बचते
रहना ही वस्तुतः धर्म है ।
३६. स्थगित किये बिना सदा धर्म का पालन करो । यह मृत्यु के
उपरान्त भी निरन्तर सहायक होता है ।
३७. धर्म-लाभ के निदर्शन की क्या आवश्यकता ? शिविका के कहार
एवं सवार के मध्य एक दृष्टि मात्र डालो ।
३८. एक दिन भी व्यर्थ गँवाये बिना किया गया सत्कर्म मनुष्य के
भव-पथ को बन्द करनेवाला प्रस्तर-खण्ड होता है ।
३९. सुख वही है जो सद्धर्म से प्राप्त हो । अन्य सभी वस्तुतः दुखप्रद
एवं यशहीन ही होते हैं ।
४०. मानव मात्र के लिए ग्रहण करने योग्य सत्कर्म ही है, और कुकर्म
त्यागने योग्य है ।