तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय. ४ तिरुक्कुरळ 31
४. धर्म की सबलता
३१. धर्म यशप्रद है, और धनप्रद भी । अतः जीवन के लिए धर्म से
श्रेष्ठ और कौन-सा पदार्थ है ?
३२. न तो धर्म से श्रेष्ठ कोई वस्तु ही है, और न उसका विस्मरण जैसा
कोई पतन ।
३३. धर्म को छोड़े बिना यथाशक्ति अपने सभी कर्मों को सम्पन्न करो ।
३४. मन को निर्मल रखना ही वस्तुतः धर्म है । अन्य सभी कार्य
बाह्याडम्बर मात्र हैं ।
३५. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध एवं कठोर वचन—इन चारों से सदा बचते
रहना ही वस्तुतः धर्म है ।
३६. स्थगित किये बिना सदा धर्म का पालन करो । यह मृत्यु के
उपरान्त भी निरन्तर सहायक होता है ।
३७. धर्म-लाभ के निदर्शन की क्या आवश्यकता ? शिविका के कहार
एवं सवार के मध्य एक दृष्टि मात्र डालो ।
३८. एक दिन भी व्यर्थ गँवाये बिना किया गया सत्कर्म मनुष्य के
भव-पथ को बन्द करनेवाला प्रस्तर-खण्ड होता है ।
३९. सुख वही है जो सद्धर्म से प्राप्त हो । अन्य सभी वस्तुतः दुखप्रद
एवं यशहीन ही होते हैं ।
४०. मानव मात्र के लिए ग्रहण करने योग्य सत्कर्म ही है, और कुकर्म
त्यागने योग्य है ।