स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
३६६ स्पन्दकारिका
परामृत—तत्त्वद्वय तो—(१) 'शिव' एवं (२) 'शक्ति' है 'तत्त्वद्वयं शिवशक्त्या-
ख्यम् ॥' यद्यपि ये अभिन्न है तथापि स्वरूप प्रतिपादन के लिए उनका अन्यथा अनुपपत्ति
द्वारा विभाजन करके उन्हें प्रकाशित किया गया है।
इसलिए गुरुदेव ने 'तत्त्वगर्भस्तोत्र' में सतताविलुप्त एवं उपलब्ध उसी का
प्रतिपादन करने के उद्देश्य से शिव तत्त्व की स्तुति की है—
'यस्या निरुपधिज्योतीरूपायाः शिवसंज्ञया ।
व्यपदेशः परां तां त्वामम्बां नित्यमुपास्महे ॥'
'शक्तितत्त्व' तो परमार्थ तत्त्वविदों के द्वारा स्वरूप प्रत्यवमर्श, सामान्य स्पन्द
आदि नामों के द्वारा व्यवहृत की गई है। उसका पर्यायभूत 'उन्मेष' आदि पद भी उसका
संसूचक है—
'किंचिदुच्छूनतापत्तेरुन्मेषादिपदाभिधाः ।
प्रवर्तन्ते त्वयि शिवे शक्तिता ते यदाम्बिके ॥'
यहाँ पर प्रयुक्त 'यदा' शब्द के प्रयोग से यह मतिभ्रम नहीं होना चाहिए कि—
कभी यह शक्त्यवस्था होती है और कभी नहीं होती है। क्योंकि स्वभावसंवेदनात्सक,
नित्य, सामान्यस्पन्द रूप ही धर्म है 'किंचिदुच्छूनता' (थोड़ा सा फूल जाना यथा पानी में
डाला चना फूल जाता है) ।¹
(३) 'सदाशिव', 'ईश्वर' एवं 'विद्या' (तत्त्वत्रय) भी परामृत शब्द वाच्य है।
ऐसा क्यों?—इसका कारण यह है कि—
भेदोद्भावन का सामर्थ्य ही माया शक्ति है—कोई वस्त्वन्तर नहीं है—'स्वभा-वस्य
विश्वरूपतया अवभासनमानस्य इदन्तोल्लेखने भेदोद्भावनसामर्थ्यं मायाख्याशक्ति-
राख्याता—न तु वस्त्वन्तरं किंचित् ॥'
इदम्—(यह जगत्)—इत्याकारक रूप में परामृश्यमान पदार्थ-जगत् (या
विषयात्मक विश्व) प्रकाशमानता का अतिक्रम करके अन्य बनने हेतु (जिसके द्वारा)
समर्थ नहीं हो पाता है उसके कारण यह भेदात्मक रूप वाली होकर भी यह माया
प्रकाशात्मक पारमेश्वर धर्म होने के कारण अतिक्रान्त न हो सकने के कारण भगवान् की
यह शक्ति ही अत्यन्त अद्भुतस्वरूपा है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥'
इसका अर्थ यह है कि मेरी यह दैवी माया, 'इत्थंक्रीडनैकरस' देव की (ईश्वर की)
यह माया शक्तित्व से सम्बद्ध है। इसका स्वरूप यह है कि यह 'गुणमयी' (सुखाद्यात्मा
सत्त्वाद्यभिधाना प्रकृति से युक्त) है, यह भेदावभासस्वस्वभावा है, शब्दादिविषयात्मिका
है, (विषय रूप सुखादिसंवेदनपर्यवसातात्मा है)—अतः मेरी यह सुखादि रूप ग्राह्याकार
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३६७
निर्भासिनी माया 'गुणमयी' कहलाती है। यह 'दुरत्यया' है—क्योंकि इसका अतिक्रमण
करना अत्यन्त दुःखपूर्ण या कष्टकारक है—बहुत कष्टपूर्ण साधनाओं के बाद ही इसको
अतिक्रान्त या पराभूत किया जा पाना संभव हो पाता है—अत्यन्त उत्साही प्रबुद्धों के
द्वारा भी शीघ्र ही भेदव्यवहार के परे जा पाना कठिन है तथा शीघ्र ही समस्त संसारव्यवस्था
का उच्छेद कर पाना संभव नहीं है। किन्तु जो लोग मेरी उपासना करते हैं—द्वैतभाव के
छिन्न-भिन्न होने एवं संवित् तत्त्व में अधिष्ठित होने के कारण जो सुप्रबुद्ध हैं मात्र मुझ
एक ही तत्त्व को अपने से अभिन्न रूप में देखते हुए मुझे पहचानते हुए मद्भावापन्न
होकर इस माया को पार कर जाते हैं। उस दशा में ही दिनकर की भाँति द्योतित
होकर यामिनी रूपा माया को निर्मूलरूप से नष्ट करके उसके पार हो जाते हैं। स्तोत्र में
कहा भी गया है—
'समाधि वज्रेणाप्यन्यैरभेद्यो भेदभूधरः ।
परामृष्टश्च नष्टश्च त्वद्भक्तिबलशालिभिः ॥'
इस प्रकार की प्रत्ययोद्भवमात्रस्वरूपा माया तथा उसका मूलरूप क्षेत्रज्ञतत्त्व 'पशु'
के पर्याय तथा 'अस्वतन्त्र' शब्द द्वारा यहाँ प्रतिपादित किया गया है।
अस्वतन्त्र = बन्धनग्रस्त (पशु) जीव ॥
इस प्रत्योद्भवस्वरूपा माया के द्वारा स्वस्वभाव से प्रच्यवित जीवात्मा अपने तात्त्विक
स्वस्वरूपात्मक धर्म के विपरीत कालादिरूप पाशपंचक के द्वारा ग्रथित होने के कारण
'पशुत्व' प्राप्त करती है और यही पशुत्व 'पारतन्त्र्य' है—'पाशपंचकेन ग्रथितस्य
पारतन्त्र्यं पशुत्वमुद्भाव्यते ।।' यह पशु रूप जीवात्मा इस पारतन्त्र्य के कारण व्यामोहित
होकर अपने अनवच्छिन्न स्वधर्म का परामर्श न करता हुआ प्रत्युत् उसके विपरीत
अवच्छेदक पंच पाशों के द्वारा—
(१) भूत-भविष्यादिक विकल्पों में विभक्त—'काल' के द्वारा,
(२) सर्वात्मकत्व, रूप धर्म को विस्मृत कर देने के फलस्वरूप सर्वत्र
नियतकार्यकारण नामक भाव से युक्त 'नियति' के द्वारा,
(३) सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्वलक्षण लक्षण वाले धर्म से उदासीन होने के कारण-
किंचित्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञत्व रूप वाले—'कला' एवं 'विद्या' के द्वारा।
(४) प्रेप्सित अर्थों को न पाने के कारण नित्यनिरभिलाषत्व रूप लक्षणरूप स्वधर्म
के अपरामर्श के कारण—विषयाभिलाषिता रूप 'राग' रूप पाश के द्वारा—बध्यमान,
पराधीन वृत्ति वाला (तत्त्वतः पतिरूप) जीव 'पशु' कहलाने लगता है।१
क्योंकि पारमार्थिक रूप में परमेश्वर के एक होने पर भी उसके अपने अत्यद्भुत
ऐश्वर्यवीर्य द्वारा और विशुद्धचिन्मात्ररूप होने के कारण तथा विश्वात्मक होने के कारण
उसके आन्तर एवं बाह्य दो रूप हैं—अतः उसमें द्वैविध्य आभासित तो होता ही है। यहाँ
उसका जो विश्वात्मक स्वरूप है—
१. रामकण्ठाचार्यः— 'स्पन्दविवृति'
३६८ स्पन्दकारिका
बाह्यरूप है—उसके 'ज्ञेय' एवं 'कार्य' रूप भाव द्वारा उसके लब्ध होने से एक
तत्त्व के अद्वैत शक्ति होने पर भी उसकी शक्ति 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो रूपों में उपचरित
होती है। वह 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' जहाँ बाह्यगृहीत 'उन्मेष' के रूप में त्रिगुणात्मक
अव्यक्तावस्था में स्थित होते हैं वे परमेश्वर भोगात्मक ज्ञान-क्रिया रूप में वर्तमान होने पर
भी अन्तर्मुखी होने के कारण निमेषात्मिका सदाशिवदशा कहलाते हैं।
'शक्ति' के क्रिया-प्राधान्य पूर्ण होने पर बहिर्गृहीत उन्मेष की पराहं विश्रान्ति दशा
'ईश्वरदशा' कहलाती है। जिसमें ज्ञानशक्ति के उद्रेक होने के कारण इसका बहिर्मुखत्व
बाह्याभ्यन्तर रूप सामानाधिकरण्यपर्यवसायी होने के कारण स्वरूपविश्रान्तिनिष्ठत्व ही वह
'विद्यादशा' है।
(४) ये तीनों ही परामृत है। इन तीनों ही दशाओं में भेदप्रतिप्रतिमूलता होने के
कारण माया शक्ति के लब्ध्यात्मिका होने पर भी संवित् तत्त्व के परिपूर्णा हंकार लक्षण
वाले स्वभाव में ही विश्रान्त होने से प्रत्यस्तमिता होकर परमानन्दनिर्भर शिवरूप को
तिरोहित करने में समर्थ नहीं है अतः ये तीनों पद परामृत ही है—'इति पदत्रयमेतत्परा-
मृतमेव' तत्त्वगर्भ में कहा भी गया है—
'ज्ञानक्रियास्वरूपेण प्रवृत्तायास्तु ते शिवे।
सदाशिवत्वं जगदुर्भोंगाहं तत्त्ववेदिनः ॥
गुणीभूतज्ञशक्तित्वं व्यक्तीभूतक्रियात्मिका ।
यदा तदैश्वरं तत्त्वं व्यक्ततामेति वृत्तिमत् ॥
प्रवृत्तावुन्मुखीभूता भवेस्त्वं परमे यदा।
ज्ञान शक्तिस्तदोदारा विद्या त्वं परिगीयसे ॥'
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि—
एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा।
मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥
किन्त्वान्तरदशाद्रेकात्सादाख्यां तत्त्वमादितः।
बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥
ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः।
सामानाधिकरण्यं च सद्भिद्याहमिदं धियोः ॥
इदंभावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम्।
भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्त्ववलोकनात् ॥'
उससे परे तो परस्पर-परिहारावस्थित-अहं प्रतीति लक्षण से भिन्न विषयापेक्षी,
अनेक भेदों के अभिमान से युक्त होने के कारण, अपने तात्विक ऐश्वर्य से अनभिज्ञ
क्षेत्रज्ञतत्त्व में मायाशक्ति ही मात्र परमात्मा के विश्वरूपैश्वर्य का प्रथमास्पदभूत होकर
विजृंभण करती है—
'यदा त्वेवंविधादत्र निजा भोगाज्ञता पशोः।
तदा मायास्वरूपेति गीयते वैभवाश्रयः ॥'
तृतीयः निष्यन्दः ३६९
प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में भी कहा गया है—
'भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षते ।
शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृंभते ॥'
यहाँ यह 'प्रत्ययोद्भव' शब्द से प्रतिपादित की गई है । 'मैं'—इत्याकारक
शिवात्मक स्वभाव का परामर्शात्मक ज्ञान सम्यक् ज्ञान है । विश्व के रूप में अवभासमान
उसके ही स्वस्वभाव का इदन्तोल्लेखन ('यह' के रूप में उल्लेख करना) है ।
मायाशक्ति के पाँच भेद—काल, कला, नियति, राग, विद्या—या माया शक्ति
के ये पाँच प्रसव (उत्पन्नभूत पदार्थ या तत्त्व या माया शक्तियाँ)—समस्त पशु प्रबन्ध
(जीवों का अविच्छिन्न क्रम, बन्धन, योजना) को अविशेष रूप से उसके स्वस्वरूप को
आच्छादित करके स्थित है—'माया शक्तेः प्रसवः समस्तस्य पशुप्रबन्धस्य अविशेषेण
स्वरूपभावृत्य व्यवस्थितः ॥' यह माया शक्ति प्रत्येक प्राणी को उसकी भिन्न-भिन्न विचित्र
बुद्धि आदि के रूप में परिणत होकर उसको आच्छादित—आवृत्त करती है उस 'प्रधान'
(प्रकृति) नामक प्रसव का प्रपंच को प्रत्योद्भवविषय के प्रतिपादन के द्वारा यह कहा
कि—'स च तन्मात्र गोचरः' ।
स च तन्मात्रगोचरः = 'स च पशुत्व कारणं'—वह पशुत्व का कारण प्रत्ययो-
त्पन्न है । 'तन्मात्रगोचर' = तन्मात्रा (शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रायें) गोचर हैं
(विषय हैं) जिनके वह ॥ 'प्रत्यय' विषय का आलम्बन लेकर (विषयसापेक्ष) स्थित है—
प्रत्येय हैं । विषय एवं विषयीभाव ग्रहीतृ-ग्रहण-ग्राह्य-इस त्रितय रूप में होने के कारण
युक्ति-सिद्ध है तथापि सामान्य प्रवृत्ति के कारण बिना त्रितय की सत्ता नहीं हो सकती ।
इस वाक्य के द्वारा ये चारों आक्षिप्त हैं ।
(१) इसमें 'ग्रहीता' कौन है? प्रत्ययवान् पशु
(२) इसमें 'ग्राह्य' कौन है? शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध—
अर्थात् आकाशादिक स्थूल पंचभूतों के आश्रयभूत विशेषात्मक गुण (क्योंकि
उनके द्वारा ही समस्त विषयों की प्राप्ति होती है) ।
सामान्य के उपपन्न (प्राप्त) होने पर समस्त विशेषों का उनमें अंतर्भाव समझ लेना
चाहिए ॥ अतः सामान्य वाची 'तन्मात्र' शब्द के प्रयोग के द्वारा विशेषों को भी गृहीत
किया जाना चाहिए । उनके द्वारा—शब्दादि के आश्रयभूत स्थूल तत्त्व—आकाशादिक भी
आक्षिप्त हैं क्योंकि—उनकी सत्ता निराश्रय होने की स्थिति में तो है ही नहीं । इस प्रकार
दशविध कार्य हैं ।
१. 'तथा च अयम् अनया व्यामोहितः अनवच्छिन्नत्वादिरूपं स्वधर्मम् अपरामृशन्,
तद्विपरीतेन अनवच्छेदकेन कलनात्मना भूतभविष्यदादिविकल्पविभक्तेन कालाख्येन,
तथा सर्वात्मकत्वधर्मविस्मृतेः सर्वत्र नियतकार्यकारणभावाख्यात्मकेन नियतिनाम्ना,
तथा सर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वलक्षणधर्मद्वयौदासीन्यात् किंचित्कर्तृत्वकिंचिज्ज्ञत्व रूपाभ्यां
कलाविद्याभिधानाभ्यां तथा प्रेप्सितार्थविरहात् नित्यनिरभिलाषितारूपेण रागाख्येन, च
पाशेन वध्यमानः पराधीनवृत्तिः पशुः संबध्यते ॥' 'स्पन्दवृत्ति'
स्पं० २४
३७० स्पन्दकारिका
वह प्रत्ययवान्, पर वशीभूत पशु विषयी होने के कारण इष्टानिष्ट विषय में हानादि
क्रियाओं में करण की अपेक्षा रखता है । जिसके द्वारा यह विषय का निश्चय करता है
वह प्रकाशप्रधान ‘बुद्धि’ नामक करण है । जिसके द्वारा अनात्मभूत देहादिक अर्थ को
अपनी आत्मा के रूप में मानता है वह तद्विपर्ययात्मक नियमप्रधान तत्त्व ‘अहंकार’ है ।
जिसके द्वारा प्रवृत्तिप्राधान्यवश विषयों को विकल्पित करता है वह संशयात्मक तत्त्व
‘मन’ है ।
इस प्रकार—अंतःकरण त्रिविध है—बुद्धि, अहंकार, मन ॥ ‘त्रिविधं अन्तः-
करणम्’ ॥ ये कार्य हैं।
जिसके द्वारा शब्दादिक विषय ग्रहण किये जाते हैं—वे पाँच हैं—और वे श्रोत्रा-
दिक पाँच बुद्धीन्द्रिय पंचक कहलाते हैं जिसके द्वारा वचनादि क्रिया संपन्न की जाती है—
वे वागादिक पंचकर्मेन्द्रियाँ हैं । अतः ये १० बहिष्करण हैं ।१
ये अहंकार के कार्य हैं । इस प्रकार (१) बाह्य एवं (२) आभ्यन्तर दो प्रकार के
करण हैं—इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार २३ प्रकार के कार्य करण वर्ग विषयी होने के कारण
अन्यथानुपपत्ति द्वारा आक्षिप्त हैं ।
प्रवर्तक हेतु के बिना विषय-प्रवृत्ति का अभाव हो जाने के कारण विषयत्व भी
उपपादित नहीं किया गया । अतः यहाँ सुखाद्यात्मा भी आक्षिप्त हैं । ‘सुख’ क्या है?
प्रत्येक प्राणी की स्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्ति से होने वाली अनित्य तृप्ति रूप आनन्द
ही सुख है ।
‘सुखं प्रतिप्राणिस्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्तेस्तृप्तिरनित्य आनन्दः ।'—उसके द्वारा
प्रयुक्त होकर इष्टविषयों के आदान हेतु ही प्रवृत्ति होती है । उसके विपरीत ही दुःख होता
है जो कि अनिवृत्तिरूपात्मक है और अनिष्टविषयात्मक है । दोनों का न्यग्भाव मोह है ।
वृत्तिकार ने जो ‘रूपाद्यभिलाषात्मकः’ कहा है वह ‘तन्मात्रगोचरः’ का पर्याय है ।
रूपादिक में जो अभिलाषा (राग) है उसके निमित्तक होने के कारण तदात्मक
प्रत्ययोद्भव होता है । उसके कारण—अभिलाष-प्रपंच ही सुखाद्यात्मक प्रधान कारण है
अतः यह प्राधानिकी २४ तत्त्व ‘तन्मात्रगोचरः’ शब्द द्वारा आक्षिप्त है ।
पूर्व में १२ तत्त्वों को विनिर्णीत किया गया—शिवादिविद्यान्त ५, माया, काला-
दिक ५, पशुतत्त्व—इस प्रकार ३६ तत्त्वों द्वारा पारमेश्वरी शक्ति विजृंभण करती है—
‘द्वादशतत्त्वानि निर्णीतानि—दूतद्यथा-शिवादिविद्यान्तानि पंच, माया, कालादिपंचकं,
पशुतत्त्वं च इति षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपतया पारमेश्वरी एकैव शक्तिर्वृजृंभते ।।'
इस प्रकार प्रत्ययोद्भव ही पशुत्व का कारण है इस तथ्य के प्रतिपादित किये जाने
के कारण भोग्य होने के कारण जीव पशु कहा जाता है—'प्रत्ययोद्भवस्य पशुत्व-
कारणभावे प्रतिपादिते शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥’२
१-२. रामकण्ठाचार्यः— ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७१
शाक्त प्रसार के ३ प्रकार हैं—'प्रत्ययोद्भव' । 'स्वरूपा वरण' पशुवर्तिनी स्थूल के
रूपको ग्रहण कर लेना, अर्थात्—'आणवमल' 'मायीयमल' 'कार्ममल' ।। —'स्वतन्त्र'
का अस्वतन्त्र बन जाना ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व'—
परामृतरसापायः = परामृतरस = स्वस्वरूप । अपायः = विच्छेद, विच्युति ।
प्रत्ययोद्भवः = 'विषयदर्शने स्मरणोदयः' तेनास्वतन्त्रता मेति = तेन + स्वतन्त्रताम् +
एति । स्वतन्त्रता प्राप्त करता है । स च तन्मात्रगोचरः = 'रूपाद्यभिलाषात्मकः ।।'
बन्धन एवं विकल्पों की भूमिका—अपने निर्विकल्प स्वरूप में विकल्पों के
ज्ञान का प्रकटीकरण होना ही परामृतरस (शिवशक्ति-सामरस्य) से च्युत हो जाना
है । इसी के कारण जीव (अपनी सहज 'स्वातन्त्र्य शक्ति' खोकर) अस्वतन्त्र (पराधीन)
हो जाता है । इस विकल्प ज्ञान के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं ।
(क) 'विकल्पों' का प्रकटीकरण—जीव का परामृतरस से च्युत होना ।
(ख) 'विकल्पों' का उदय—स्वातन्त्र्य शक्ति से च्युत होकर अस्वतन्त्र हो जाना ।
(जीवों का स्वातन्त्र्यशक्ति से हीन होना) ।।
(ग) 'विकल्पों' के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि पंच तन्मात्राओं के
प्रति पशुप्रमाता की अभिलाषा का उत्पन्न होना ही विकल्प ज्ञान का विषय है ।
'विमर्शात्मिका स्पन्दशक्ति' की बाह्योन्मुख प्रसार-क्रीड़ा (सृष्टि विस्तार = शाक्त
प्रसार) के रूप—
(१) प्रत्ययोद्भव (२) स्वरूपावरण (३) स्थूलात्मिका क्रियाओं का ग्रहण (अर्थात्
'आणव मल' 'मायीयमल' 'कार्मकल') ।।
'शक्ति' सृष्टि-प्रसार की अपनी क्रीड़ा 'शिवभाव' (अनुत्तर कोटि) से जड़भावा-
त्मक (निम्नतम स्तरीय) पृथवीतत्त्व तक व्याप्त रखती है ।
शिव से पृथ्वी तक ३६ तत्त्व हैं । समस्त विश्व इसी में अन्तर्भूत या संलीन है ।
'शक्ति' का सृष्टि-प्रसार एवं 'प्रत्ययोद्भव'—'शक्ति जब सिसृक्षु होकर अपनी
बाह्योन्मुखी अभिव्यक्ति करती है तब वह 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में परिणत होती है ।
समस्त विकल्प-साम्राज्य प्रत्ययोद्भूत ही तो हैं । शिव के स्वातन्त्र्य शक्ति का
'मायाशक्ति' के रूप में स्वरूप-ग्रहण-शिव में अपनी पूर्णता, स्वतन्त्रता, पूर्ण ज्ञातृत्व,
पूर्ण कर्तृत्व, पूर्ण तृप्ति, पूर्ण विभुत्व के संदर्भ में संदेहाविर्भाव—प्रथम प्रत्ययोद्भव
(अपने निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य में विश्वास न होना)—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृत्व की हानि (२)
स्वतन्त्र कर्तृत्व पर अविश्वास ।। अर्थात् अनात्म पदार्थों में आत्मबोध एवं आत्म बोध
की हानि ।। सबसे बड़ा प्रत्ययोद्भव यही है जो कि स्वातन्त्र्यहानिमूलक है । यही
'आणवमल' भी कहलाता है ।
३७२ स्पन्दकारिका
प्रत्ययोद्भव—स्वस्वातन्त्र्य में अविश्वास—आत्मा का अवरोहण—चेतन ही
जड़त्व प्राप्त कर लेता है तथा 'परावाक्' वैखरी वाक् तक अवरोहण कर लेती है ।
परिणाम—
(१) सर्वज्ञातृत्व—किंचिद् ज्ञातृत्व (२) सर्वकर्तृत्व—किंचित् कर्तृत्व = सर्वात्मक
ज्ञान—संकुचित ज्ञान सर्वात्मक क्रिया—अल्पक्रिया ।। परिणाम = ३६ तत्त्वों का
बाह्यावभासन । यही 'परामृतरसापाय' है ।
परामृत = प्रकाशस्वरूप शिव । संवित् शक्ति ।
रस = अहं विमर्शमयी स्पन्दशक्ति ।
परामृत = सदाशिव, ईश्वर एवं शुद्ध विद्या इन तीनों तत्त्वों को भी सूचित करता है ।
एक ही तत्त्व प्रकाश के प्राधान्य से 'शिव' एवं विमर्श के प्राधान्य से शक्ति है
और दोनों मूलतः अभिन्न है ।
प्रत्ययोद्भव = ६ तत्त्व, जिन्हें 'षट् कंचुक' कहा जाता है ये भेद बुद्धि की
सर्जना करने वाले माया के प्रसार हैं । इनका रूप निम्नांकित है—
प्रत्ययोद्भव = (१) माया तत्त्व (२) कला तत्त्व (३) विद्या तत्त्व (४) राग तत्त्व
(५) नियति तत्त्व (६) काल तत्त्व ।।
स्वतन्त्र = शिव । शक्ति ।
अस्वतन्त्र = प्रत्ययावृत पुरुष तत्त्व ।। षट् कंचुक आबद्ध पशु ।। पशुप्रमाता ।।
तन्मात्रगोचरः = प्रकृति, बुद्धि, मनस् । अहंकार । श्रोत्र । त्वक् । नेत्र । जिह्वा ।
घ्राण । वाक् । हस्त । पाद । पायु । उपस्थ । शब्द । स्पर्श । रूप । रस । गंध ।
आकाश । वायु । तेजस् । जल । एवं पृथ्वी तत्त्व ।।
'प्रत्ययोद्भव' क्या है? अपनी आत्मभूता स्वरूप शक्ति के विरुद्ध विकल्पहीन
स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों का उदय होना ही 'प्रत्ययोद्भव'
है। 'तन्मात्र' शब्द मात्र ५ तन्मात्राओं का ही नहीं प्रत्युत् समस्त प्रकृत्योद्भूत सृष्टि का
वाचक है । ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ जीवों के स्वरूप पर सदैव आवरण डालकर उसे
आच्छादित करने का प्रयास करती रहती है ।
शब्दों की अनुस्यूतता न हो तो कोई भी प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकता : 'यतः
शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' (का० ४७)
'अस्वतन्त्रता' का कारण क्या है?
'... ... ... ... प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥' (का० ४६)
विकल्प ज्ञान—(१) 'परामृतरसापाय ।' (२) 'स्वातन्त्र्य हानि'
ग्राह्य विषयों की प्राप्ति होने पर तद्विषयक अनुस्मृति का उदय होना ही
प्रत्ययोद्भव का रूप है । प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७३
'स्वतन्त्रता' की हानि का कारण अज्ञान या मल है जो कि निम्न हैं—(१)
'आणव मल' (२) 'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'मल'—'आणवमल'—'मायीय मल'—'कार्ममल'। 'मल' क्या है? संकुचित
ज्ञान ही 'मल' है । परमेश्वर पूर्णज्ञान एवं पूर्ण क्रिया के स्वस्वरूप को स्वेच्छा से
आच्छादित कर लेता है और अपनी संकुचितात्मता प्रकट करता है । यह आच्छादित
(प्रच्छन्न) ज्ञानात्मरूपता ही 'मल' है । यह पूर्णत्व की अख्याति है—आत्म सङ्कोच या
अज्ञान है—यही 'मल' भी है और संसार रूपी वृक्ष का अंकुर भी है—'मलमज्ञान-
मिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।।' इस 'मल' की अनेक संज्ञायें हैं—
'मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा ।
भवदोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढता ।।
अहंममात्मतातङ्को मायाशक्तिरथावृतिः ।
दोषबीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ।।'
१. आणवमल—अपने को अपूर्णमानना ('अपूर्णमन्यता' या पूर्णज्ञानात्मक
स्वरूप का अज्ञान या ज्ञान का सङ्कोच) । यह अणुता या सङ्कोच ही 'आणव मल' है ।
आणव मल के प्रकार—
(१) चिन्मात्र बोध के स्वातन्त्र्य का सङ्कोच (ज्ञातृत्व का अज्ञान)
(२) स्वातन्त्र्य या कर्तृत्व का अज्ञान—
स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता—द्विधाणवं मलमिदं स्वरूपापहानितः
।। ('ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ३।२)
२. मायीय मल—'भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं'
स्वरूप के अज्ञान के अनन्तर सांसारिक पदार्थों को अपने से भिन्न समझना (भेद
प्रथा) ही 'मायीय मल' है ।
३. कार्ममल—जन्म तथा भोग प्रदान करने वाले शुभाशुभ कर्मों की पराधीनता
ही 'कार्ममल' है ।
इन तीनों मलों का सर्जक मायाशक्ति है । मायाशक्ति—(१) 'आणव मल' (२)
'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'............ जन्म भोगदम् । कर्तर्यबोध कार्यम् तु माया शक्त्यैव तत्रयम् ॥'
(१) आणवमल—गोपितस्वमहिम्नोऽस्य सम्मोहाद्विस्मृतात्मनः ।
यः सङ्कोचः स एवास्य आणवो मल उच्यते ॥
(२) मायीयमल—ततः षट्कञ्चुकव्याप्ति विलोपितनिजस्थितेः ।
भूतदेहे स्थितिय्र्याऽसौ मायीयो मल उच्यते ॥
(३) कार्ममल—यदन्तःकरणाधीनबुद्धिकर्मेन्द्रियादिभिः ।
बहिर्व्याप्रियते कार्ममलमेतस्य तन्मतम् ॥
३७४ स्पन्दकारिका
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य—ये शाब्दी शक्तियाँ भी जीवों में मलोद्भव का
कारण बनती हैं। इनका स्वरूप इस प्रकार है—
| क्रं० | अधिष्ठात्री देवी | वर्ग | प्रभाव |
|---|---|---|---|
| १ | ब्राह्मी | कवर्ग | ये ही |
| २ | माहेश्वरी | चवर्ग | आठों शक्तियाँ |
| ३ | कौमारी | टवर्ग | चैतन्य |
| ४ | वैष्णवी | तवर्ग | (संवित् तत्त्व) |
| ५ | वाराही | पवर्ग | के ऊपर |
| ६ | ऐन्द्री | यवर्ग | आवरण डालने में |
| ७ | चामुण्डा | शवर्ग | 'सततोत्थिता' हैं। |
| ८ | महालक्ष्मी | अवर्ग | स्वरूपावरणं चास्य शक्तयः सततोत्थिताः |
| शैवदर्शन के अनुसार निजशक्तियों से जनित व्यामोहितता ही 'संसारित्व' है 'एवं | |||
| च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम्' (प्र० हृदयम्) ॥ | |||
| स्वरूपाच्छादन और उसके कारण— | |||
| स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोद्यता । | |||
| यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥ ४७ ॥ | |||
| और इसके (पुरुष के) स्वरूप पर आवरण डालने के लिए (ब्राह्मी आदि) शक्तियाँ | |||
| निरन्तर प्रयास-रत रहती हैं। कारण यह कि शब्दों की अनुस्यूतता के बिना प्रत्ययोद्भव | |||
| संभव ही नहीं है ॥ ४७ ॥ | |||
| * सरोजिनी * | |||
| अस्य = इसका । पशु का । स्वस्य = अपना । शिवात्म स्वरूप अपना । | |||
| आवरणे = आवरण में । भित्तिभूतत्व द्वारा प्रथमान । सम्यग्परामर्श द्वारा उसके कारण | |||
| शक्तियाँ अनवरत रूप से प्रादुर्भूत होती रहती है। ('परामृतरसात्मकस्वस्वरूपप्रत्यभिज्ञानं | |||
| न वृत्तं तावत् एताः स्वस्वरूपावरणाय उच्छन्ति एव') प्रत्ययोद्भव = विकल्पा-विकल्प- | |||
| ज्ञानप्रसर ॥ शब्दानुवेधेन = 'अहमिदं जानामि'—आदि सूक्ष्म अन्तःशब्दानुरञ्जन के द्वारा | |||
| तथा स्थूल अभिलाप संसर्ग के द्वारा । च = यहाँ 'च' शब्द शङ्का द्योतित करता है । | |||
| शङ्का के परिहारार्थ ही उसका प्रयोग हुआ है ।$^१$ भट्टकल्लट इस कारिका की व्याख्या इस | |||
| प्रकार करते हैं—'स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य शक्तयो ब्राह्म्याद्याः पूर्वमुक्ता | |||
| याः, ताः सततम् उद्युक्ताः । यतः शब्दरहितस्य प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव | |||
| कस्यचिदुद्भवः ॥' | |||
| ग्रन्थकार द्वारा शङ्का उठायी गयी है कि—यदि प्रत्ययोद्भव (ज्ञानाविर्भाव) |
१. स्पन्दनिर्णय ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७५
बन्धनग्रस्त प्राणी में परामृतानन्द के लुप्त होने का प्रतिनिधित्व करता है तो यह कैसे
कहा गया है कि वह शक्ति समुदाय का दास बन जाता है—अर्थात् शक्ति वर्ग का भोग्य
बन जाता है?—इसी के उत्तर में ग्रन्थकार ने प्रस्तुत श्लोक लिखा है । १
जिन शक्तियों का विवेचन किया गया है वे बद्धात्मा प्राणियों से, उनके शिव से
अभिन्न यथार्थ स्वरूप को (उनसे) छिपाने हेतु सर्वदा प्रस्तुत रहती है । या वे उस उपाय
के रूप में कार्य करती हैं जिसके द्वारा बद्धात्मा किसी भी प्रकार, अंतिम आधार के रूप
में स्थित यथार्थ आत्म स्वरूप का ध्यान कर सकें । जब तक कि बद्धात्मा परामृतानन्द से
अभिन्न अपने प्रत्यक् चैतन्य—अपने यथार्थ स्वरूप—की प्रत्यभिज्ञा नहीं कर लेता तब
तक ये शक्तियाँ सदा ही व्यक्ति के यथार्थस्वरूप को छिपाने का प्रयास करती रहती हैं
क्योंकि प्रत्ययों का आविर्भाव या निश्चितानिश्चित ज्ञान प्रवाह, बन्धनग्रस्त प्राणियों में
तब तक नहीं आ सकता जब तक कि वह शब्दों के सूक्ष्म या स्थूल रूपों के संयोग से
संयुक्त न हो जाय । सूक्ष्मरूप में शब्दों का संयोग इस प्रकार हो सकता है यथा 'मैं इसे
जानता हूँ' । २
निम्नस्तरीय पशु भी विचार करने की क्षमता रखते हैं और सिर हिलाने एवं ध्वनि
पैदा करने के द्वारा अपने विचार व्यक्त करते हैं अन्यथा बालक प्रथम बार ही पारम्परिक
चरित्र या परम्परागत गुण प्राप्त नहीं कर पाता क्योंकि वह परिणामों पर विचार करने की
क्षमता नहीं रखता । विचारशक्ति (Ideation) स्वात्मानुभव से ज्ञात होती है और यह
शब्दानुवेधजन्य है ।
अस्य = इस प्रकार के प्रत्ययापादित पशुत्व रूप आत्मा के ।। स्वरूपावरणे =
शिवात्मक स्वभाव रूप स्वरूप के आवरण में प्रत्यवमर्शाभावमात्र हेतु के कारण उत्पन्न
आवरण में ।।
इस व्यवधान के स्थगित होने पर ‘शक्तयः सततोत्थिताः’ । सतत् = पशु व्यवहार
के कभी भी उपरत न रहने के कारण सदैव (सततम्) नित्य ही । उत्थित = उदित ।
यतः = जिससे ।
अस्वन्त्रतापादनात्मक अमृतरसापाय से प्रतिपादित ‘यः प्रत्ययोद्भवः’ वह
‘शब्दानुवेधेन’ अर्थात् शब्द संभेद के ‘बिना’ अर्थात् ‘संभव नहीं है’ यह शेष है ।
भाव यह है कि—(१) शाब्द शक्तियाँ एवं अन्य शक्तियाँ स्वरूप को आच्छादित
करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहती हैं । ३
(२) ऐसा कोई प्रत्यय (विचार) उत्पन्न हो ही नहीं सकता जो शब्दानुविद्ध न हो ।
‘शब्द’ निश्चय ही प्रत्यवमर्शात्मक एवं अवभासात्मक हैं । शब्द के ही अवभास अर्थ है ।
‘शब्द’ जो कि मूलतः प्रत्यवर्शात्मक हैं अपने क्रोड में पदार्थों को रखते हैं : ‘शब्द’ की
गोद में ‘पदार्थ किलकारी मारा करते हैं । ‘शब्द’ चेतन हैं और अवभास जड़ हैं अतः
दोनों में भेद भी है स्पष्ट है कि ‘शब्द’ जनक हैं और पदार्थ ‘जन्य’ है । एक कर्ता है
१-२. स्पन्दनिर्णय । ३. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दविवृति’ ।
३७६ स्पन्दकारिका
दूसरा कार्य, एक स्रष्टा है दूसरा सृष्टि एवं कारण है तो दूसरा कार्य है। शब्द की गोद में
उसके अर्थ—खंग, उदक, आदर्श (दर्पण) आदि पदार्थ—स्थित हैं—ये पदार्थ 'शब्द'
के अवभास मात्र हैं—
'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥' (प्रत्यभिज्ञा)
अन्यत्र भी कहा गया है—
'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगं विना ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥'
और वह सर्वाच्छेद-विरहित-विशुद्ध-चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठ होकर प्रत्यव-
मर्श कहलाता है—'स च सर्वाच्छेदविरहितविशुद्ध चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठः सन्
प्रत्यवमर्श इत्युच्यते ॥'
'विकल्प' क्या है? जाति गुण क्रिया आदि अभिधानादिक विविध विशेषावच्छिन्न
भिन्नरूपात्मक विश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ ही विविध कल्पनात्मक होने के कारण
'विकल्प' कहलाते हैं—
'जाति गुण क्रियाभिधानादिविविध विशेषावच्छिन्नभिन्नरूपविश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ-
स्तु, विविधकल्पनात्मकत्वात् विकल्प इत्युच्यते ॥' वही शब्द का मुख्य रूप है—'तदेव
शब्दस्य मुख्यं रूपं ।' उसके संकेतत्व द्वारा व्यवस्थित, श्रोत्रग्राह्य ध्वनिविशेषात्मक अर्थ
ही प्रायः 'शब्द' के नाम से व्यवहियत किया जाता है—
'तत्संकेतत्वेन व्यवस्थितः श्रोत्रग्राह्यो, ध्वनिविशेषात्मकोऽर्थ एव प्रायेण शब्द इति
व्यवहियत े ॥'
अतः शब्दरूपतापन्न, एवं प्रत्ययोद्भवप्राणभूत शक्तियाँ ही इस स्वरूपावरण करने
के कार्य में सदोद्युक्त रहा करती हैं—'तस्माच्छब्दरूपतामापन्नाः प्रत्ययोद्भवप्राणभूताः
शक्तय एवास्य स्वरूपावरणे सदोद्युक्ता' ।
पशु = 'शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥'
कहा भी गया है—स्वरूपस्य स्वस्वभावस्याच्छादने ॥'१
स्वरूपावरण : बन्धन—(१) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्री शक्तियाँ जीवों के
स्वरूप पर आवरण डालने हेतु सदैव उद्यत रहती है 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः
सततोत्थिताः' ।
(२) 'शब्दानुवेध' (प्रत्ययों में शब्दानुस्यूतता) के बिना प्रत्ययों का आविर्भाव
संभव ही नहीं है—'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥'
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व' में वृत्तिकार कहते हैं कि—'स्वरूप'
अर्थात् स्वभाव के आच्छादन में पुरुष की ब्राह्मी आदि शक्तियाँ सदैव उद्यत रहती हैं।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७७
शब्द-शून्य प्रत्यय (ज्ञान) का आविर्भाव हो ही नही सकता। सारांश यह कि प्रत्ययों का
मूल शब्द है अतः शब्द शून्य ज्ञान संभव नहीं है।
स्वरूप = स्वभाव। आवरण = आच्छादन। चास्य = च + अस्य = और इस
पुरुष की। शक्तयः = पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि अष्ट वर्गाधिष्ठात्री शक्तियाँ। उत्थिता = उद्यत
रहती हैं। यतः = क्योंकि 'शब्दानुवेधेन न विना' = शब्दों की अनुस्यूतता के बिना।
प्रत्ययोद्भवः = किसी भी प्रत्यय या ज्ञान का आविर्भाव नहीं हो सकता।
आत्मा का स्वरूपावरण—ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ पुरुष (जीव) के
'स्वभाव' पर आवरण डालने के लिए निरन्तर उद्यत रहती हैं।
प्रत्ययोद्भव = स्व शक्ति के विरोध के कारण विकल्प शून्य स्वरूप में ज्ञेय
विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों के उदित होने को 'प्रत्ययोद्भव' कहा गया है।
शब्द की सहायता (सहकारिता) के अभाव में किसी भी प्रत्यय (विकल्पात्मक ज्ञान) का
आविर्भूत होना कथमपि संभव नहीं है।
स्वरूपावरण—इस कारिका में पुरुष के स्वरूप पर जो आवरण पड़ जाता है
उसकी विवेचना की गई है।
आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में इसका सुन्दर विवेचन किया है। वे
कहते हैं—
'जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी (स्वातन्त्र्य शक्ति से) स्वतन्त्रतापूर्वक अभेद-व्याप्ति
को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं तब उनकी इच्छादिक
शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं। तभी यह मलों से आवृत
होकर संसारी हो जाता है।'
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं विमृज्य भेद व्याप्तिं अव-
लम्बते तदा 'तदीया इच्छादिशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च
अयं मलावृतः संसारी भवति॥' चाहे 'पतिभूमिका' हो चाहे 'पशुभूमिका' हो सभी
भूमिकायें चिदात्मा भगवान् की स्वातन्त्र्य शक्ति द्वारा अवभासित हैं—सभी भूमिकाओं में
एक ही आत्मा व्याप्त है—
'एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिता सर्वा इमा।
भूमिका ..... अतएव एक एव एतावद्व्याप्तिक आत्मा॥'
(क) स्वरूपावरण की एक शक्ति तो ब्राह्मी आदि शाब्दी अष्ट शक्तियाँ हैं। ये
शब्दानुविद्ध ज्ञान द्वारा स्वरूपावरण करती है। इनके स्वरूपावरण का साधन है :
शब्दानुविद्ध प्रत्यय॥ इसी लिए तो कहा गया है—'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र)॥
(ख) स्वरूपावरण का दूसरा साधन है—'मलत्रय' अर्थात् 'आणवमल'
'मायीय मल' 'कार्ममल'॥ 'ज्ञानंबन्धः' का ज्ञान 'विकल्पज्ञान' है न कि आत्मज्ञान॥
यह विकल्प ज्ञान भी स्वरूपावरण का कारण है।
शक्तियोँ का यह स्वभाव है कि वे प्रतिक्षण जीवों की आत्मा पर मायिक
३७८ स्पन्दकारिका
आवरण डालकर उन्हें दिग्भ्रान्त करती रहें किन्तु ये ही शक्तियाँ शिव भूमिका (पति-
भूमिका) पर जहाँ कि शक्ति का अर्हविमर्शात्मिका स्पन्दना स्थित है और पूर्ण स्वातन्त्र्य
उल्लसित है वहाँ वे स्वरूप गोपन की क्रिया करके स्वरूपावरण नहीं करतीं क्योंकि शक्ति
जब तक माया की भूमिका पर आरूढ़ होकर बहिर्मुखी नहीं होती तब तक स्वरूपावरण
नहीं करती किन्तु मायाशक्ति का रूप धारण करते ही वह स्वरूपगोपनात्मिका क्रीड़ा प्रारंभ
कर देती है इसीसे इसे 'स्वरूपगोपन व्यग्रा' कहा जाता है—
स्वरूप गोपन क्रीडा— 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (सूत्र १२) में आचार्य क्षेमराज कहते
हैं—(१) 'भगवती चिति शक्ति ही विश्व का वमन या बहिः प्रकाशन करने के कारण या
संसार रूप वाम (विपरीत) आचरण करने के कारण 'वामेश्वरी' का रूप ग्रहण करती
हुई, 'खेचरी' 'गोचरी' 'दिक्चरी' तथा 'भूचरी' रूप प्रमाता । अन्तःकरण, बाह्य
करण एवं वस्तु स्वभाव रूप में स्फुरित होती है ।'¹
(२) 'पशु भूमिका में शून्य पद ग्रहण करके पारमार्थिकी 'चिद्गगनचरी' का स्वरूप
छिपाकर, किंचित्कर्तृत्वादिरूप कला आदि शक्त्यात्मक खेचरी चक्र रूप में प्रकाशित
होती हैं ॥'
(३) 'अभेद निश्चयादिरूप पारमार्थिक स्वरूप छिपाकर, भेद निश्चय भेदाभिमान
एवं भेदकल्पना प्रधान अंतःकरणों की देवी रूप 'गोचरी चक्र' के रूप में प्रकाशित
होती है ।'²
(४) 'अभेद प्रथात्मक पारमार्थिक जिसमें आवृत्त है तथा भेद का आलोचन आदि
जिसमें प्रधान हैं—ऐसी बाह्य करणों की देवी स्वरूप दिक्चरी चक्र के रूप में भी वही
चिति उदित होती है तथा सर्वात्मरूप को छिपाकर भेदाभास स्वभाव, प्रमेय रूप
'भूचरीचक्र' के रूप में पशु हृदयों को मूढ़ बनाती हुई शोभित होती है ।'³
स्वरूप गोपन-क्रीड़ा और उसके साधन
'मल' (अज्ञान) विकल्पज्ञान
आणवमल मायीयमल कार्ममल अष्ट शक्तियाँ
ब्राह्मी माहेश्वरी कौमारी वैष्णवी वाराही ऐन्द्री चामुण्डा महालक्ष्मी
(क वर्ग) (च वर्ग) (ट वर्ग) (त वर्ग) (प वर्ग) (य वर्ग) (श वर्ग) (अ वर्ग)
'पतिभूमिका में तो सर्वकर्तृत्वदि शक्तिरूप—'चिद्गगनचरी' अभेदनिश्चयादिरूप
गोचरी । भेदालोचनाद्यात्मक दिक्चरी और निजांगस्वरूप अद्वैतप्रथासारभूत
प्रमेयात्मक 'भूचरी' रूप से पति-हृदय को विकसित करती हुई स्फुरित होती है ।'⁴
१. राजाचनक क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । २. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।
३. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७१
जो शाब्दी शक्तियाँ पशुप्रमाताओं को बन्धन में डालती हैं वे सदैव बन्धन का
कारण ही नहीं बनती प्रत्युत्—
'पूर्णप्रमाता, परिमितप्रमाता तथा उसके अन्तःकरण, बाह्यकरण एवं प्रमेयगत
वामेश्वरी आदि शक्तियाँ ज्ञात होने पर मुक्ति देने वाली और अज्ञात होने पर बन्धन प्रद
बन जाती है— 'पूर्णावच्छिन्नमात्रन्तर्बहिष्करणभावगाः ।
वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥'१
निखिलजगदात्मा एवं संविदात्मा महेश्वर अपनी स्वरूप गोपन क्रीड़ा द्वारा 'अणु'
बन जाता है—
'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुच्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र-
शक्ति महिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयत अणुः इति ॥'२
'मायीयमल'–स्वरूपावरण को ही शब्दान्तर में 'मायीय मल' भी कहते हैं—
'जब ज्ञान शक्ति क्रमश संकुचित होकर भेद दशा में, सर्वज्ञता से अल्पज्ञत्व प्राप्त करती
है और अन्तःकरण तथा ज्ञानेन्द्रियता की प्राप्ति के साथ अत्यन्त संकोच ग्रहण करती है
तब उसको देहादिक भिन्न-भिन्न का वेद्यों का विकास रूप 'मायीय मल' कहते हैं'—
(१) 'ज्ञानशक्तिः क्रमेण संकोचात् भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्वाप्तेः अन्तःकरण-
बुद्धीन्द्रियतापत्ति पूर्वं अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथाप्रथारूपं मायीयं मलम् ॥'३
(२) उत्पलदेवाचार्य 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहते हैं—
'भिन्नवेद्य प्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम्' ।४
'भिन्नवेद्यजुषां मायामलं विद्येश्वरायश्च ते ॥'५
'कर्तृत्वयोगेऽपि बोधानां कार्मोत्तीर्णानां विद्येश्वराख्यानां भिन्नवेद्यभाक्त्वेन माया
मलम् ॥'६
'मायीयमल' एवं 'आणवमल' में भेद है कि—'जब चिदात्मा परमेश्वर अपने
स्वातन्त्र्य से अभेद व्याप्ति को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते
हैं तब उनकी इच्छादिक शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं तभी
यह मलों से आवृत होकर संसारी हो जाता है और अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति
संकुचित होकर अपूर्णामन्यतात्मक आणवमल कही जाती है ।'—
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिम्
अवलम्बते, तदा 'तदीया इच्छाशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव
च अयं मलावृतः संसारी भवति तथा च अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूपा इच्छाशक्ति संकुचिता
सती अपूर्णाम्मन्यतारूपम् आणवं मलम् ॥'७
१. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (भट्टदामोदर का उद्धरण) । २. 'जन्ममरणविचार'—वामदेव।
३. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' ।
५. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' । ६. 'प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति' ।
७. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्'
३८० स्पन्दकारिका
मायीय आवरणों के द्वारा आच्छादित होने के कारण शिव अपने ही अंगभूत वेद्य
पदार्थों को अपने स्वरूप से भिन्न समझने के सङ्कोच की परवशता में पड़ जाता है।
'शब्दानुवेध' शब्द ध्यातव्य है। वृत्तिकार ने ठीक ही कहा है कि 'शब्दरहितस्य
प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचिदुद्भवः ॥' विश्व के प्रत्येक पदार्थ के साथ उसके
वाचक शब्द का शाश्वत सम्बन्ध जुड़ा है। इसे ही कहा गया है कि—'प्रत्येक अर्थ (ज्ञेय
पदार्थ) प्रकाशरूप है।' शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में (उसको) सत्ता प्रदान
करता है क्योंकि विश्व में ऐसा कोई अर्थ या उसका ज्ञान नहीं है जिसके साथ
शब्दानुवेध न हो। 'शब्द' एवं अर्थ का साहचर्य शिव शक्ति का यामल है—
'वागार्थाविवसंपृक्तौ पार्वतीपरमेश्वरौ' (कालिदास)
शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य—
सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ।
बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्धयुपपादिका ॥ ४८ ॥
शिव की यह क्रियात्मिका शक्ति स्वयं शिव को पशुत्व प्रदान करती है और उसके
लिए बन्धयित्री बन जाती है। ज्ञात होने पर स्वात्म की ओर गतिशील यह शक्तिमुक्ति
रूपी सिद्धि प्रदान करती है ॥ ४८ ॥
- सरोजिनी *
क्रियात्मिका शक्ति—'क्रियाशक्तिस्तु, रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा।' (यो०ह०)
सेयं = (सा इयं) = वह यह ! शिवस्य = स्वस्वभाव परमेश्वर शिव की। क्रियात्मिका
= तत्स्वरूपप्रत्यवमर्शलक्षणव्यापारशरीरा। शक्तिः = सामर्थ्यरूप अव्यभिचारीधर्म। इयं
= प्रतिपादित प्रसररूपा शक्ति अद्वयचिन्मात्रस्वभावप्रत्यवमर्शिनी पारमेश्वरी शक्ति। पशु
= जीव। 'पशु'—
(१) 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'१
(२) 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'२
(३) 'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते ॥
सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥'३
(४) 'बाह्यादिशक्ति चक्रस्य कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो हतमहाव्याप्तिः
स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते अज्ञत्वात् ॥'४
पशु—वर्णसमुदाय ही 'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही
१. स्पन्दकारिका (श्लोक ४५)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा।
३. ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वावस्थायां तु रागादि-
क्लेशकर्मविकाशायैः परीतः पशुः (प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति : उत्पलदेव)।
४. स्पन्दप्रदीपिका (उत्पलदेव)।
तृतीयः निष्यन्दः ३८१
शब्दों की जननी हैं ('शब्दानां राशिः शब्दराशिः वर्णसमूहो मातृका अकारादिक्षकारान्ता
शब्दजननी')—क्योंकि समस्त शक्तियाँ वर्णात्मिका हैं। जगत् कादिवर्गात्मक शब्द समूह
से उत्पन्न है। उन्हीं से अर्थात् चाहे ककारादि अक्षर के रूप से या चाहे ब्राह्मी आदि शक्ति
रूप चक्र की कलाओं से—अर्थात् ककारादि अक्षरों से श्रवण एवं उच्चारण द्वारा—'पुरुष'
अपने वैभव को खो देता है। अपनी महाव्याप्ति को विस्मृत कर देता है और अपने
सर्वव्यापक एवं तात्त्विक स्वभाव से च्युत हो जाता है। परिणामतः वह जिन शक्तियों का
स्वामी होता है उन्हीं का भोग्य बनकर पुरुष के स्थान पर 'पशु' बन जाता है। 'ईश्वर-
प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि—सभी भाव अपनी गोद में अपनी अंगचेष्टा के समान
हैं। उनका स्वामी प्रमाता, संवित् या 'शिव' के नाम से अभिहित किया जाता है।
किन्तु जब वह उन्हीं भावों का दास बनकर फँस जाता है तब कर्म के पंक से लथपथ होकर
'पशु' कहा जाने लगता है। ठीक भी है—'वस्तुतः भेदग्रंथि स्वतः छिन्न-भिन्न है। उसके
छिन्न-भिन्न होने का ज्ञान होने पर द्वैत है ही नहीं। इस बात को जो नहीं जानता वही 'पशु'
है और जो उसे जान लेता है वही 'पशुपति' है। १ 'क्रियात्मिका शक्तिः'—शिव की अनन्त
शक्तियाँ हैं उन्हीं से एक क्रियाशक्ति भी है। उनकी मुख्य शक्तियाँ पाँच हैं—(१) प्रकाश-
रूप 'चित् शक्ति' (२) स्वातन्त्र्यरूप 'आनन्दशक्ति' (३) उपभोगात्मक चमत्कार रूप
'इच्छाशक्ति' (४) आमर्शात्मक अर्थात् वेद्य के प्रति उन्मुखता स्वरूप 'ज्ञान शक्ति' (५)
सर्वाकारयोगित्व रूप 'क्रियाशक्ति'। इस शक्ति के दो कार्य हैं—(१) बन्धन (२) मोक्ष।
(१) प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः २ (२) स्वातन्त्र्यं आनन्दशक्तिः ३ (३) तच्चमत्कारः
इच्छाशक्तिः ४ (४) आमर्शात्मकता ज्ञान शक्तिः ५ (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ६
('जन्ममरणविचार' : वामदेव भट्टाचार्य) ॥
चिदानन्दघन परमशिव विश्वरूपात्मिका क्रीड़ा के आरंभ में—'इच्छा' 'ज्ञान' एवं
'क्रिया' नामक अपनी शक्तियों द्वारा शिव तत्त्व से लेकर पृथ्वीपर्यन्त निखिल सृष्टि-चक्र
का प्रवर्तन करते हैं। शिव उस सार्वभौम नृपति की भाँति लीला करते हैं जो अपनी
पैदल, वायु, सामुद्र आदि चतुरंगिणी सेना के कार्यों के साथ एकीभूत होकर युद्ध क्रीड़ा
किया करता है—
यथा नृपः सार्वभौमः प्रभावामोदभावितः ॥ ३७ ॥
क्रीडन् करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः ।
तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ॥ ३८ ॥
इत्थं शिवो बोधमयः स एव परनिर्वृतिः ।
सैव चोन्मुखतां याति सेच्छाज्ञानक्रियात्मताम् ॥ ३९ ॥७
वे शिव अपने शिवत्व को विस्मृत किये हुए से 'पशु' आदि प्रमाताओं एवं नील
सुखादि प्रमेयों का भेद अंगीकार करते हैं। व्यवहारदशा में स्वरूपविस्मृत, सुखदुःखादि
अनेक संवेदनों से समाकुल, समल एवं संकुचित चित्त 'पशु' (जीव) को स्वरूपाभिज्ञान
१. स्पन्दप्रदीपिका । २-६. तन्त्रसार (आ० १)।
७. शिवदृष्टि (प्र० आ०)।
३८२ स्पन्दकारिका
की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके बिना वह अपनी पूर्ववर्ती स्वातन्त्र्य या
आनन्दशक्ति से रहित होकर संतप्त रहता है और इसी संताप को दूर करने एवं निज
वैभव प्राप्त कर पाने हेतु ही प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का उपदेश दिया गया है—
तैस्तैरप्युपयाचितैरुपन्नतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके,
कान्तो लोक समान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा।
लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्माऽपि विश्वेश्वरो,
नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १
क्रियाशक्ति—परमात्मा अपने स्वप्रकाश रूप स्वरूप में जिस शक्ति के द्वारा
विश्वात्मक भाव से विभिन्न पदार्थों का भेदावभासन करता है उसी 'भासना' को 'क्रिया-
शक्ति' कहा जाता है—'भासना च क्रियाशक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते।
यया विचित्रतत्त्वादिकलना प्रविभज्यते ॥ २
सर्वाकार योगित्व ही क्रिया शक्ति है (सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ।) ३
विश्वस्फार ही क्रियाशक्ति का स्वरूप है। ४
पाँचशक्तियों से समवेत होने पर भी शक्तिमान शिव विश्वाभास में निम्न तीन
शक्तियों का ही उपयोग करते हैं—(१) इच्छा शक्ति (२) ज्ञान शक्ति (३) क्रिया
शक्ति—'एवं मुख्याभिः शक्तिभिः युक्तोऽपि वस्तुतः इच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तियुक्तः
अनवच्छिन्नः प्रकाशो निजानन्दविश्रान्तः शिवरूपः ॥' ५
'चितशक्ति' (प्रकाश = स्वरूप परामर्श) एवं 'आनन्दशक्ति' (विमर्श =
स्वातन्त्र्य शक्ति) शक्ति के पूर्ण स्वरूप की अवस्थायें हैं। स्वातन्त्र्य रूप 'विमर्श' का
स्वरूपपरामर्श रूप 'प्रकाश' ही उसकी चिकीर्षा रूप 'इच्छाशक्ति' है और यह इच्छाशक्ति
ही अपनी उच्छूनावस्था में ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति बन जाता है 'इच्छाशक्तिश्च
उत्तरोत्तर उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्ती भवति ॥' ६ आचार्य क्षेमराज ने इसकी
व्याख्या करते हुए कहा है कि—एक ही स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति जगदाभास क्रम में
तरतमभाव से ज्ञान और क्रिया शक्ति के नाम से जाने जाते हैं ७— चिद्रूपु, स्वतन्त्र
परमशिव की कर्तृतारूपा कारणता या चिकीर्षा ही 'क्रियाशक्ति' है—'चिद्रूपुषः स्वतन्त्रस्य
विश्वात्मना कर्तुमिच्छैव जगत्प्रति कारणता कर्तृतारूपा सैव क्रियाशक्तिः ॥ एवं चिद्रूपस्य
एकस्य कर्तुरिव चिकीर्षाख्या क्रिया मुख्या ॥' ८ 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहा गया है—
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका । २. मालिनीविजयवार्तिक (१।९०) ।
३. तन्त्रसार ।
४. क्रिया शक्तेरेव अयं सर्वो विस्फारः (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी भाग-२ पृ० ४२) ।
५. तन्त्रसार ।
६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-१ पृ० १७) ।
७. एकस्या अपि इच्छायाः सूक्ष्मरूप ज्ञानक्रियाशक्तिसंभेदेन त्रित्वात् (स्वच्छन्दतन्त्र
टीकाः भाग ६।१०७) ।
८. उत्पलदेवाचार्य—प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति (२।५३) ।
तृतीयः निष्यन्दः ३८३
'इत्थं तथा घटपटाद्याभास जगदात्मना ।
तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ।। ५३ ।।
स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्ति ही 'ज्ञान' 'क्रिया' और माया रूप होकर पशुदशा में
संकोच के प्रकर्ष से सत्व-रज एवं तम स्वभाव वाले चित्त के रूप में स्फुरित होता है ।१
'पशुवर्तिनी बन्धयित्री'— यह पारमेश्वरी क्रियात्मिका पराशक्ति भेदप्रत्यय के उद्भव से
उपपादित पारतन्त्र्य के पुरुष (जीव) में संक्रान्त होने पर जन्ममरण, सुखदुःखादि रूप
बन्धन प्रदान करती है । यह आत्मा को पशुत्व से बाँध देती है—'आ प्रबोधप्रत्युदयात्
पशुत्वेन बध्नाति'—इसीलिए कहा गया है—'पशुवर्तिनीबन्धयित्री' ।२
ज्ञाता = जान लिए जाने पर (‘शिवात्मकस्वभाव प्रत्यवमर्शक्रियारूपतया प्रत्यभि-
ज्ञाता सती’ ३)—(‘सिद्धियाँ प्रदान करती है ।) ॥
सिद्धयुपपादिका—'सिद्धि' क्या है ! सिद्धि है—आत्मैश्वर्याधिगमलक्षण रूपा
'परा' की एवं आनुषंगिक विविध विभूतियों के आविर्भाव रूप 'अपरा' सिद्धियों की
उपपादिका (संपादयित्री) । यह शक्ति 'पशुवर्तिनी' कब बनती है? 'प्रत्ययोद्भवरूप माया
वैभव से उद्भावित भेदों को जन्म देने पर यही शक्ति 'पशुवर्तिनी' कही जाती है ।४
किन्तु प्रत्युदित प्रबोध वाले साधक के अपने स्वात्मरूप में यथावस्थित होने से उसके
प्रत्यभिज्ञायमान होने के कारण यह शक्ति उसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करती है ।५
पशु = 'आहार निद्राभय मैथुनानि समानमेतद् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि
तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनः पशुभिः समानः ।।'
स्वमार्गस्था = अपने आत्मीय (निजी) शिवस्वभावरूप मार्ग में स्थित और
तद्व्यतिरिक्त विषयान्तर से निवृत्त होकर स्वात्मस्थित ॥
एषा = परमेश्वरस्वरूप प्रकाशप्रत्यवमर्शमात्ररूपा 'पराशक्ति' जो वाणी के रूप में
सर्वत्र फैली हुई है—या सर्वव्याप्त है वह यह शक्ति ।
यही शक्ति इच्छा-ज्ञान-क्रिया आदि का रूप धारण कर लेती है—
‘या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः संप्रपद्यते ॥
सैकापि सत्यनेकत्वं यथागच्छति तच्छृणु ।
एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥
(१) ज्ञान शक्ति = ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।
एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥
(२) क्रियाशक्ति = जाता तदैव तत्तद्रूपकुर्वत्यत्र क्रिया मता ।
एवं यथा द्विरूपैव पुनर्भेदैरनेकताम् ।। आदि ॥६
१. क्षेमराजः 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (सूत्र ५) । २. रामकण्ठः स्पन्दकारिकावृत्ति ।
३. रामकण्ठाचार्य । ४. रामकण्ठ ।
५. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । ६. मालिनीविजय ।
३८४ स्पन्दकारिका
परमात्मा की अघटनघटनापटीयसी सर्वकर्तृत्व शक्ति, 'कर्तुं-अकर्तुं—अन्यथा
कर्तुं। करने की स्वतन्त्र शक्ति ही क्रिया शक्ति है । यह सिसृक्षारूपा है ।
इस श्लोक का मूल उद्देश्य बन्धन एवं मोक्ष के स्वरूप का विश्लेषण करना है
इसीलिए रामकण्ठाचार्य ने कहा है—'तत्स्वरूपाप्रत्यभिज्ञामात्र निबन्धनौ बन्धमोक्षौ
प्रतिपादयितुमाह' अर्थात् (१) आत्मप्रत्यभिज्ञा रूप 'मोक्ष' एवं (२) आत्मप्रत्यभिज्ञाभाव
रूप 'बन्धन' का प्रतिपादन करने हेतु ही यह श्लोक 'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः' लिखा
गया है ।
जीवों (पशुओं) की कलाओं की द्विविध सन्तानें हैं—(१) ज्ञानरूपा कला (२)
क्रियारूपा कला । ज्ञानरूप कलासंतान—अन्तःकरण = ३ अंग ॥ क्रियारूपा कला-
संतान = बहिष्करणात्मक । स्वभावस्थ प्राणशक्ति सहित एकादशविध ॥ (१) ज्ञान रूपा
संतान = ३ (२) क्रियारूपा संतान = ११, ३ + ११ = १४ ॥ जीवकला संतान चतु-
र्दशविध है । संतानद्वयवर्तिनी जो—जीवकलायें हैं—वे वस्तुतः हैं ही नहीं—केवल अव-
भासित होती हैं—'इत्थं प्रसृत्य अवभासते, तत्त्वतो नास्ति अस्याः ततो भेद इत्यर्थः ।'—
'संतानद्वयवर्तिनी जीवस्यात्मनः कला सा न काचित् संभवति इति शेषः ॥'—
'न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी ।
व्याप्नी शिवकला यस्मादधिष्ठात्री न विद्यते ॥'
देश काल आदि से अनवच्छिन्न वैभवों की अधिष्ठात्री 'शिव कला' वेद्यत्व आदि
से सभी को अधिष्ठित करके एवं सभी को आत्म परतन्त्र बनाकर स्थित है । वस्तुतः यह
परमात्मा की कला या पराशक्ति जिस प्रकार अवभासित होती है वैसी है नहीं प्रत्युत् सत्य
तो यह है कि इस रूप में उसकी सत्ता ही नहीं है प्रत्युत् वह ऐसा अवभासित होती है—
'पराशक्तिः उक्तरूपा न विद्यते सत्तां व्यभिचरति । सैव इत्थमवभासते' ।१ जहाँ तक इसके
विश्वरूप में परिणत होकर दिखाई पड़ने की बात है तो यह भी एक अवभास है क्योंकि
शक्ति के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ की सत्ता ही नहीं है—'वैश्वरूप्येऽपि अवभास-
लक्षणस्य सामान्यरूपस्य शिवधर्मस्य' । अपरा शक्ति—स्थूलक्रियारूपा है । इस प्रकार
शक्ति के 'पर' एवं 'अपर' जो दो रूप हैं उन दोनों में पारमार्थिक दृष्टि से अभेद है ।
'ज्ञानगर्भ' में भी इसी की पुष्टि की गई है—
बहिष्करणबुद्ध्यहंकृतिमनाः सुषुम्नाश्रया, च्चतुर्दशसु चण्डिके पथिषु येन येन व्रजेत् ।
कला शिवनिकेतनं जननि तत्र तत्र स्म ते, दशोंदयति दुर्लभा जगति या सुरैरप्यहो ॥'
अर्थात् (१) श्रोत्रादिपंचक (२) वागादिपंचक १० प्रकार का 'बहिष्करण' है । (३)
बुद्धि अहंकार, एवं मन के भेद से अन्तःकरण त्रिविध है । (४) मन एक है = कुल
योग १४ । इस प्रकार 'कला' अर्थात् चिदात्मिका शक्ति के चौदह भेद हैं । उनके अपने
इतने प्रसरणमार्ग भी है । उनके मध्य में से एकतमण पथ से यह कला शिवनिकेतन में
प्रविष्ट होनी चाहिए ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३८५
शिवनिकेतन में इस पारमार्थिक कला की यात्रा या लय रूप व्यापार स्वयमेव एक
'सिद्धि' ('सिद्ध्युपपादिका') है ।
'न दुःखं न सुखं' के लक्षणों से समलंकृत अपने निजास्पद शिवधाम में यह
'शैवीकला' एक 'सिद्धि' है जोकि शिवधाम में ही उदित भी होती है । वहाँ पर कृतकृत्य
होकर अन्त में यह आन्तर प्रदेश में प्रविष्ट होकर (सागर में सरिता के मिलन की तरह)
समरसीभूत होती है और मध्य में भी प्रवेश करने पर (बुद्धि आदि आन्योन्य भिन्न
प्रसरणरूप में होकर) नाना रूप से अवभासित होने पर भी वह चिदात्मकत्व का त्याग
नहीं करती और अपने शिव स्वभाव को कभी नहीं छोड़ती किन्तु फिर भी माया शक्ति से
व्यामोहित होने के कारण यह वैसी पहचानी नहीं जा पाती उसकी इस रूप में प्रत्यभिज्ञा
नहीं हो पाती ।
पशुवर्तिनी बन्धयित्री = भेदप्रत्यय से उद्भूत होने के कारण परतन्त्र (बन्धन
ग्रस्त) जीव (पशु) में वर्तमान यह शिवकला बन्धनकारिणी (जन्मादि 'पशु' = सर्वतो
व्यवच्छिन्न आत्मा । यह शैवी कला व्यवच्छिन्न आत्मा की आबोधप्रत्ययोदय पशुत्व से
बाँध देती है ।)¹
स्वमार्गस्था—यह परा पारमेश्वरी शक्ति 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं
'वैखरी'—अपने सभी प्रसरणों में भी 'स्वमार्गस्थत्व' का त्याग नहीं करती । ठीक भी है
क्योंकि समस्त सृष्टि शब्द तत्त्व का ही विवर्त है—
'अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥'²
यह पराशक्ति ही 'स्वमार्गस्था' के रूप में ज्ञात होने पर समस्त सिद्धियाँ प्रदान
करती है । यह बैखरी रूप में अभिव्यक्त होकर 'स्थूलाक्रियाशक्ति' बन जाती है किन्तु
इसके पूर्व तो वह 'मध्यमा वाक्' के रूप में 'इच्छाशक्ति' को व्यक्त करती है और इसके
पूर्व वह अपने 'पश्यन्तीवाक्' के रूप में अपने 'ज्ञान-शक्ति' को ही प्रस्तुत करती है ।
'शिवस्य क्रियात्मिका शक्ति'—शक्ति को 'शिव की शक्ति' क्यों कहा? इसलिए
कहा क्योंकि शक्ति को विश्व की अपेक्षा रहती है ।³
अभिन्नमातृकात्मक शब्दराशि रूप क्रियाशक्ति-प्रधान ऐश्वर्य विग्रह ही इस शक्ति
का आश्रय है । इस शक्ति का जो वाक्यरूप विस्तार है वह भी द्विविधात्मक है—(१)
मन्त्रात्मक एवं (२) लौकिक व्यवहार विषयक लौकिक वाक्यात्मक । मन्त्रात्मक रूप
नित्य एवं लौकिकवाक्यात्मक रूप अनित्य है ।
इस प्रकार परमेश्वर की शक्ति के रूप में प्रत्यभिज्ञायमाना होने पर यह शिवकला
—यह वाङ्मयीविभूति परसिद्धिप्रदा है किन्तु पशु से संबंधित होने पर अवच्छिद्यमान
उसका यह स्वरूप बन्धन का कारण है—एवं परमेश्वरशक्तित्वेन प्रत्यभिज्ञायमाना एषा
वाङ्मयी विभूतिः परसिद्धिप्रदा, नानापशुसंबंधतया तु अवच्छिद्यमाना बन्धहेतुर्भवति ।⁴
१. रामकण्ठाचार्य । २-४. स्पन्दकारिकावृत्ति ।
स्पं० २५