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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 474 of 519

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Page 474

तृतीयः निष्यन्दः ३७३
'स्वतन्त्रता' की हानि का कारण अज्ञान या मल है जो कि निम्न हैं—(१)
'आणव मल' (२) 'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'मल'—'आणवमल'—'मायीय मल'—'कार्ममल'। 'मल' क्या है? संकुचित
ज्ञान ही 'मल' है । परमेश्वर पूर्णज्ञान एवं पूर्ण क्रिया के स्वस्वरूप को स्वेच्छा से
आच्छादित कर लेता है और अपनी संकुचितात्मता प्रकट करता है । यह आच्छादित
(प्रच्छन्न) ज्ञानात्मरूपता ही 'मल' है । यह पूर्णत्व की अख्याति है—आत्म सङ्कोच या
अज्ञान है—यही 'मल' भी है और संसार रूपी वृक्ष का अंकुर भी है—'मलमज्ञान-
मिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।।' इस 'मल' की अनेक संज्ञायें हैं—
'मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा ।
भवदोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढता ।।
अहंममात्मतातङ्को मायाशक्तिरथावृतिः ।
दोषबीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ।।'
१. आणवमल—अपने को अपूर्णमानना ('अपूर्णमन्यता' या पूर्णज्ञानात्मक
स्वरूप का अज्ञान या ज्ञान का सङ्कोच) । यह अणुता या सङ्कोच ही 'आणव मल' है ।
आणव मल के प्रकार—
(१) चिन्मात्र बोध के स्वातन्त्र्य का सङ्कोच (ज्ञातृत्व का अज्ञान)
(२) स्वातन्त्र्य या कर्तृत्व का अज्ञान—
स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता—द्विधाणवं मलमिदं स्वरूपापहानितः
।। ('ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ३।२)
२. मायीय मल—'भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं'
स्वरूप के अज्ञान के अनन्तर सांसारिक पदार्थों को अपने से भिन्न समझना (भेद
प्रथा) ही 'मायीय मल' है ।
३. कार्ममल—जन्म तथा भोग प्रदान करने वाले शुभाशुभ कर्मों की पराधीनता
ही 'कार्ममल' है ।
इन तीनों मलों का सर्जक मायाशक्ति है । मायाशक्ति—(१) 'आणव मल' (२)
'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'............ जन्म भोगदम् । कर्तर्यबोध कार्यम् तु माया शक्त्यैव तत्रयम् ॥'
(१) आणवमल—गोपितस्वमहिम्नोऽस्य सम्मोहाद्विस्मृतात्मनः ।
यः सङ्कोचः स एवास्य आणवो मल उच्यते ॥
(२) मायीयमल—ततः षट्कञ्चुकव्याप्ति विलोपितनिजस्थितेः ।
भूतदेहे स्थितिय्र्याऽसौ मायीयो मल उच्यते ॥
(३) कार्ममल—यदन्तःकरणाधीनबुद्धिकर्मेन्द्रियादिभिः ।
बहिर्व्याप्रियते कार्ममलमेतस्य तन्मतम् ॥