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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 485 of 519

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Page 485

३८४ स्पन्दकारिका

परमात्मा की अघटनघटनापटीयसी सर्वकर्तृत्व शक्ति, 'कर्तुं-अकर्तुं—अन्यथा
कर्तुं। करने की स्वतन्त्र शक्ति ही क्रिया शक्ति है । यह सिसृक्षारूपा है ।
इस श्लोक का मूल उद्देश्य बन्धन एवं मोक्ष के स्वरूप का विश्लेषण करना है
इसीलिए रामकण्ठाचार्य ने कहा है—'तत्स्वरूपाप्रत्यभिज्ञामात्र निबन्धनौ बन्धमोक्षौ
प्रतिपादयितुमाह' अर्थात् (१) आत्मप्रत्यभिज्ञा रूप 'मोक्ष' एवं (२) आत्मप्रत्यभिज्ञाभाव
रूप 'बन्धन' का प्रतिपादन करने हेतु ही यह श्लोक 'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः' लिखा
गया है ।
जीवों (पशुओं) की कलाओं की द्विविध सन्तानें हैं—(१) ज्ञानरूपा कला (२)
क्रियारूपा कला । ज्ञानरूप कलासंतान—अन्तःकरण = ३ अंग ॥ क्रियारूपा कला-
संतान = बहिष्करणात्मक । स्वभावस्थ प्राणशक्ति सहित एकादशविध ॥ (१) ज्ञान रूपा
संतान = ३ (२) क्रियारूपा संतान = ११, ३ + ११ = १४ ॥ जीवकला संतान चतु-
र्दशविध है । संतानद्वयवर्तिनी जो—जीवकलायें हैं—वे वस्तुतः हैं ही नहीं—केवल अव-
भासित होती हैं—'इत्थं प्रसृत्य अवभासते, तत्त्वतो नास्ति अस्याः ततो भेद इत्यर्थः ।'—
'संतानद्वयवर्तिनी जीवस्यात्मनः कला सा न काचित् संभवति इति शेषः ॥'—
'न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी ।
व्याप्नी शिवकला यस्मादधिष्ठात्री न विद्यते ॥'
देश काल आदि से अनवच्छिन्न वैभवों की अधिष्ठात्री 'शिव कला' वेद्यत्व आदि
से सभी को अधिष्ठित करके एवं सभी को आत्म परतन्त्र बनाकर स्थित है । वस्तुतः यह
परमात्मा की कला या पराशक्ति जिस प्रकार अवभासित होती है वैसी है नहीं प्रत्युत् सत्य
तो यह है कि इस रूप में उसकी सत्ता ही नहीं है प्रत्युत् वह ऐसा अवभासित होती है—
'पराशक्तिः उक्तरूपा न विद्यते सत्तां व्यभिचरति । सैव इत्थमवभासते' ।१ जहाँ तक इसके
विश्वरूप में परिणत होकर दिखाई पड़ने की बात है तो यह भी एक अवभास है क्योंकि
शक्ति के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ की सत्ता ही नहीं है—'वैश्वरूप्येऽपि अवभास-
लक्षणस्य सामान्यरूपस्य शिवधर्मस्य' । अपरा शक्ति—स्थूलक्रियारूपा है । इस प्रकार
शक्ति के 'पर' एवं 'अपर' जो दो रूप हैं उन दोनों में पारमार्थिक दृष्टि से अभेद है ।
'ज्ञानगर्भ' में भी इसी की पुष्टि की गई है—
बहिष्करणबुद्ध्यहंकृतिमनाः सुषुम्नाश्रया, च्चतुर्दशसु चण्डिके पथिषु येन येन व्रजेत् ।
कला शिवनिकेतनं जननि तत्र तत्र स्म ते, दशोंदयति दुर्लभा जगति या सुरैरप्यहो ॥'
अर्थात् (१) श्रोत्रादिपंचक (२) वागादिपंचक १० प्रकार का 'बहिष्करण' है । (३)
बुद्धि अहंकार, एवं मन के भेद से अन्तःकरण त्रिविध है । (४) मन एक है = कुल
योग १४ । इस प्रकार 'कला' अर्थात् चिदात्मिका शक्ति के चौदह भेद हैं । उनके अपने
इतने प्रसरणमार्ग भी है । उनके मध्य में से एकतमण पथ से यह कला शिवनिकेतन में
प्रविष्ट होनी चाहिए ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।