स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextतृतीयः निष्यन्दः ३८१
शब्दों की जननी हैं ('शब्दानां राशिः शब्दराशिः वर्णसमूहो मातृका अकारादिक्षकारान्ता
शब्दजननी')—क्योंकि समस्त शक्तियाँ वर्णात्मिका हैं। जगत् कादिवर्गात्मक शब्द समूह
से उत्पन्न है। उन्हीं से अर्थात् चाहे ककारादि अक्षर के रूप से या चाहे ब्राह्मी आदि शक्ति
रूप चक्र की कलाओं से—अर्थात् ककारादि अक्षरों से श्रवण एवं उच्चारण द्वारा—'पुरुष'
अपने वैभव को खो देता है। अपनी महाव्याप्ति को विस्मृत कर देता है और अपने
सर्वव्यापक एवं तात्त्विक स्वभाव से च्युत हो जाता है। परिणामतः वह जिन शक्तियों का
स्वामी होता है उन्हीं का भोग्य बनकर पुरुष के स्थान पर 'पशु' बन जाता है। 'ईश्वर-
प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि—सभी भाव अपनी गोद में अपनी अंगचेष्टा के समान
हैं। उनका स्वामी प्रमाता, संवित् या 'शिव' के नाम से अभिहित किया जाता है।
किन्तु जब वह उन्हीं भावों का दास बनकर फँस जाता है तब कर्म के पंक से लथपथ होकर
'पशु' कहा जाने लगता है। ठीक भी है—'वस्तुतः भेदग्रंथि स्वतः छिन्न-भिन्न है। उसके
छिन्न-भिन्न होने का ज्ञान होने पर द्वैत है ही नहीं। इस बात को जो नहीं जानता वही 'पशु'
है और जो उसे जान लेता है वही 'पशुपति' है। १ 'क्रियात्मिका शक्तिः'—शिव की अनन्त
शक्तियाँ हैं उन्हीं से एक क्रियाशक्ति भी है। उनकी मुख्य शक्तियाँ पाँच हैं—(१) प्रकाश-
रूप 'चित् शक्ति' (२) स्वातन्त्र्यरूप 'आनन्दशक्ति' (३) उपभोगात्मक चमत्कार रूप
'इच्छाशक्ति' (४) आमर्शात्मक अर्थात् वेद्य के प्रति उन्मुखता स्वरूप 'ज्ञान शक्ति' (५)
सर्वाकारयोगित्व रूप 'क्रियाशक्ति'। इस शक्ति के दो कार्य हैं—(१) बन्धन (२) मोक्ष।
(१) प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः २ (२) स्वातन्त्र्यं आनन्दशक्तिः ३ (३) तच्चमत्कारः
इच्छाशक्तिः ४ (४) आमर्शात्मकता ज्ञान शक्तिः ५ (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ६
('जन्ममरणविचार' : वामदेव भट्टाचार्य) ॥
चिदानन्दघन परमशिव विश्वरूपात्मिका क्रीड़ा के आरंभ में—'इच्छा' 'ज्ञान' एवं
'क्रिया' नामक अपनी शक्तियों द्वारा शिव तत्त्व से लेकर पृथ्वीपर्यन्त निखिल सृष्टि-चक्र
का प्रवर्तन करते हैं। शिव उस सार्वभौम नृपति की भाँति लीला करते हैं जो अपनी
पैदल, वायु, सामुद्र आदि चतुरंगिणी सेना के कार्यों के साथ एकीभूत होकर युद्ध क्रीड़ा
किया करता है—
यथा नृपः सार्वभौमः प्रभावामोदभावितः ॥ ३७ ॥
क्रीडन् करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः ।
तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ॥ ३८ ॥
इत्थं शिवो बोधमयः स एव परनिर्वृतिः ।
सैव चोन्मुखतां याति सेच्छाज्ञानक्रियात्मताम् ॥ ३९ ॥७
वे शिव अपने शिवत्व को विस्मृत किये हुए से 'पशु' आदि प्रमाताओं एवं नील
सुखादि प्रमेयों का भेद अंगीकार करते हैं। व्यवहारदशा में स्वरूपविस्मृत, सुखदुःखादि
अनेक संवेदनों से समाकुल, समल एवं संकुचित चित्त 'पशु' (जीव) को स्वरूपाभिज्ञान
१. स्पन्दप्रदीपिका । २-६. तन्त्रसार (आ० १)।
७. शिवदृष्टि (प्र० आ०)।