स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके बिना वह अपनी पूर्ववर्ती स्वातन्त्र्य या
आनन्दशक्ति से रहित होकर संतप्त रहता है और इसी संताप को दूर करने एवं निज
वैभव प्राप्त कर पाने हेतु ही प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का उपदेश दिया गया है—
तैस्तैरप्युपयाचितैरुपन्नतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके,
कान्तो लोक समान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा।
लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्माऽपि विश्वेश्वरो,
नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १
क्रियाशक्ति—परमात्मा अपने स्वप्रकाश रूप स्वरूप में जिस शक्ति के द्वारा
विश्वात्मक भाव से विभिन्न पदार्थों का भेदावभासन करता है उसी 'भासना' को 'क्रिया-
शक्ति' कहा जाता है—'भासना च क्रियाशक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते।
यया विचित्रतत्त्वादिकलना प्रविभज्यते ॥ २
सर्वाकार योगित्व ही क्रिया शक्ति है (सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ।) ३
विश्वस्फार ही क्रियाशक्ति का स्वरूप है। ४
पाँचशक्तियों से समवेत होने पर भी शक्तिमान शिव विश्वाभास में निम्न तीन
शक्तियों का ही उपयोग करते हैं—(१) इच्छा शक्ति (२) ज्ञान शक्ति (३) क्रिया
शक्ति—'एवं मुख्याभिः शक्तिभिः युक्तोऽपि वस्तुतः इच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तियुक्तः
अनवच्छिन्नः प्रकाशो निजानन्दविश्रान्तः शिवरूपः ॥' ५
'चितशक्ति' (प्रकाश = स्वरूप परामर्श) एवं 'आनन्दशक्ति' (विमर्श =
स्वातन्त्र्य शक्ति) शक्ति के पूर्ण स्वरूप की अवस्थायें हैं। स्वातन्त्र्य रूप 'विमर्श' का
स्वरूपपरामर्श रूप 'प्रकाश' ही उसकी चिकीर्षा रूप 'इच्छाशक्ति' है और यह इच्छाशक्ति
ही अपनी उच्छूनावस्था में ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति बन जाता है 'इच्छाशक्तिश्च
उत्तरोत्तर उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्ती भवति ॥' ६ आचार्य क्षेमराज ने इसकी
व्याख्या करते हुए कहा है कि—एक ही स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति जगदाभास क्रम में
तरतमभाव से ज्ञान और क्रिया शक्ति के नाम से जाने जाते हैं ७— चिद्रूपु, स्वतन्त्र
परमशिव की कर्तृतारूपा कारणता या चिकीर्षा ही 'क्रियाशक्ति' है—'चिद्रूपुषः स्वतन्त्रस्य
विश्वात्मना कर्तुमिच्छैव जगत्प्रति कारणता कर्तृतारूपा सैव क्रियाशक्तिः ॥ एवं चिद्रूपस्य
एकस्य कर्तुरिव चिकीर्षाख्या क्रिया मुख्या ॥' ८ 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहा गया है—
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका । २. मालिनीविजयवार्तिक (१।९०) ।
३. तन्त्रसार ।
४. क्रिया शक्तेरेव अयं सर्वो विस्फारः (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी भाग-२ पृ० ४२) ।
५. तन्त्रसार ।
६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-१ पृ० १७) ।
७. एकस्या अपि इच्छायाः सूक्ष्मरूप ज्ञानक्रियाशक्तिसंभेदेन त्रित्वात् (स्वच्छन्दतन्त्र
टीकाः भाग ६।१०७) ।
८. उत्पलदेवाचार्य—प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति (२।५३) ।