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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 475 of 519

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Page 475

३७४ स्पन्दकारिका
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य—ये शाब्दी शक्तियाँ भी जीवों में मलोद्भव का
कारण बनती हैं। इनका स्वरूप इस प्रकार है—

क्रं०अधिष्ठात्री देवीवर्गप्रभाव
१ब्राह्मीकवर्गये ही
२माहेश्वरीचवर्गआठों शक्तियाँ
३कौमारीटवर्गचैतन्य
४वैष्णवीतवर्ग(संवित् तत्त्व)
५वाराहीपवर्गके ऊपर
६ऐन्द्रीयवर्गआवरण डालने में
७चामुण्डाशवर्ग'सततोत्थिता' हैं।
८महालक्ष्मीअवर्गस्वरूपावरणं चास्य शक्तयः सततोत्थिताः
शैवदर्शन के अनुसार निजशक्तियों से जनित व्यामोहितता ही 'संसारित्व' है 'एवं
च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम्' (प्र० हृदयम्) ॥
स्वरूपाच्छादन और उसके कारण—
स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोद्यता ।
यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥ ४७ ॥
और इसके (पुरुष के) स्वरूप पर आवरण डालने के लिए (ब्राह्मी आदि) शक्तियाँ
निरन्तर प्रयास-रत रहती हैं। कारण यह कि शब्दों की अनुस्यूतता के बिना प्रत्ययोद्भव
संभव ही नहीं है ॥ ४७ ॥
* सरोजिनी *
अस्य = इसका । पशु का । स्वस्य = अपना । शिवात्म स्वरूप अपना ।
आवरणे = आवरण में । भित्तिभूतत्व द्वारा प्रथमान । सम्यग्परामर्श द्वारा उसके कारण
शक्तियाँ अनवरत रूप से प्रादुर्भूत होती रहती है। ('परामृतरसात्मकस्वस्वरूपप्रत्यभिज्ञानं
न वृत्तं तावत् एताः स्वस्वरूपावरणाय उच्छन्ति एव') प्रत्ययोद्भव = विकल्पा-विकल्प-
ज्ञानप्रसर ॥ शब्दानुवेधेन = 'अहमिदं जानामि'—आदि सूक्ष्म अन्तःशब्दानुरञ्जन के द्वारा
तथा स्थूल अभिलाप संसर्ग के द्वारा । च = यहाँ 'च' शब्द शङ्का द्योतित करता है ।
शङ्का के परिहारार्थ ही उसका प्रयोग हुआ है ।$^१$ भट्टकल्लट इस कारिका की व्याख्या इस
प्रकार करते हैं—'स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य शक्तयो ब्राह्म्याद्याः पूर्वमुक्ता
याः, ताः सततम् उद्युक्ताः । यतः शब्दरहितस्य प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव
कस्यचिदुद्भवः ॥'
ग्रन्थकार द्वारा शङ्का उठायी गयी है कि—यदि प्रत्ययोद्भव (ज्ञानाविर्भाव)

१. स्पन्दनिर्णय ।