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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

About this granth

This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.

Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.

Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.

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८६ स्पन्दकारिका
कारिकाकार इसके उत्तर में कहते हैं कि—
(१) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि विभिन्न अवस्थाओं में भी भेद-विमुक्त सत्ता
समान रूप से वेदक (प्रमाता) के रूप में अवस्थित रहता है।
(२) इन विभिन्न अवस्थाओं के प्रसरण के समय भी वह सत्ता अपने अनुभूत्या-
त्मक (अनुभविता) स्वभाव से च्युत नहीं होता।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—
‘जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्मात् उपलब्धृरूपत्वं
त्रिष्वपि पदेषु साधारणाम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च पञ्चसु
स्कन्धेषु ॥’
सारांश = १. जाग्रत आदि भेदों के अस्तित्व का भान होने एवं उनका विस्तार
(प्रसार) होने पर भी अनुभविता के स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं आती। अवस्थायें
भिन्न-भिन्न हो सकती हैं किन्तु उन भिन्नताओं के अनुभव होते रहने पर भी अनु-
भविता भिन्न-भिन्न नहीं हो जाता प्रत्युत् एक ही रहता है। उसका स्वरूप आवृत्त नहीं हो
जाता।
२. अनुभविता के स्वरूप में उसी प्रकार कोई भेद या भिन्नता नहीं आ पाती जैसे
कि विष के बीज में उत्पन्न मूल, शाखा, पत्र, फूल एवं फल आदि में व्याप्त विष एवं
विष के बीज में व्याप्त विष में कोई भेद नहीं होता।
३. प्रमाता की विभिन्न अवस्थायें निम्नांकित हैं—
‘जाग्रत स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम्।
इति पञ्च पदान्याहुः ... ... ... ... ... ॥’ (तं० १०.२२८)
‘तदभिन्ने प्रसर्पति’—। जाग्रत आदि भेदसमन्वित अवस्थायें भेदशून्य ‘तत्त्व’
से अभिन्न है किन्तु वह ‘तत्त्व’ भेद कल्पना द्वारा (लीला रूप में) भेदों को प्रस्तुत
करता है।
‘तदभिन्ने’ = जाग्रदादि अवस्थाओं में पारस्परिक भेद तो है किन्तु उनमें भेद-
विमुक्त परासत्ता वेदक के रूप में व्याप्त रहती है।
जाग्रदादि = जाग्रत् आदि अवस्थायें—
अवस्थायें (चेतना की अवस्थायें)—
──────────────────────────┬──────────────────────────
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय तुरीयातीत गौण अवस्थायें
(सां०) (सां०) (सां०) │
┌─────────┬─────────┬─────────┬─────────┴─────────┐
भ्रान्ति मद मूर्च्छा उन्माद अर्ध सुरादिक
मूर्च्छा पानजन्य

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प्रथमः निष्यन्दः ८७
'तुरीय' = अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका।
तुरीयातीत = पूर्ण शिवभाव की अवस्था ॥
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति = (स्पन्द दार्शनिक एवं स्पन्दाचार्यों का अभिष्ट)
निर्विकल्पचिद्घनता की भूमिकायें। भेदकल्पना से शून्य अवस्था चिद्घन अवस्था ॥
शाश्वत जागरण की अवस्था।
१. 'सर्वसाधारणार्थ विषयं बाह्येन्द्रियजं ज्ञानं लोकस्य जाग्रत 'जागरावस्था' ।—
शि०सू०वि०।
२. ये तु मनोमात्र जन्या असाधारणार्थविषया विकल्पाः स एव स्वप्नः स्वप्ना-
वस्था' ।—शि०सू०वि०।
३. अविवेको विवेचना भावोऽख्यातिः एतदेव सौषुप्तम् ॥—शि०सू०वि०—
क्षेमराज ॥ अवस्थाएँ
┌─────────────┬─────────────┐
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
(योगियों (योगियों (योगियों
की धारणा- की ध्याना- की समाधि
वस्था) वस्था) की अवस्था)
(यौगिक) (यौगिक) (यौगिक)
१. जाग्रतस्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगः संभवः ॥ —शि०सू० ।
२. 'ज्ञानं जाग्रत' (शिवसूत्र) । (१.८)
१. 'ज्ञानं जाग्रत' १।८ ॥
२. स्वप्नो विकल्पाः ।१।९।
३. अविवेको माया सौषुप्तम् ।१।१०
इन अवस्थाओं की सविस्तार व्याख्या—
१. जाग्रत—ज्ञानं बाह्याक्षजं जाग्रत् सर्वसाधारणार्थकम् ॥ १।४६ ॥
२. स्वप्न—स्वप्नः स्वात्मैव संप्रोक्तो विकल्पाः स्वात्मसंभवाः ॥
३. सुषुप्ति—अविवेको निजाख्यातिर्मायामोहस्तदात्मकः ।
सौषुप्तं योगिनामेतत्त्रितयं धारणादिकम् ।
ईश्वरप्रत्यभिज्ञायां जागराद्यपि लक्षितम् ॥ ४८ ॥
शून्ये बुद्ध्याद्यभाव आत्मन्यहन्ताकर्तृतापदे ।
अस्फुटारूपसंस्कारमायिणि ज्ञेयशून्यता ॥ ४९ ॥
साक्षाणान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता ।
जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ ५० ॥
तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् ।
सवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ ५१ ॥

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८८ स्पन्दकारिका
मनोमात्रपथेऽप्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् ।
स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ ५२ ॥
सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतरा स्थिरा ।
सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातॄणां स जागरः ॥ ५३ ॥
इति विस्तरतः प्रोक्ते लोकयोग्यनुसारतः ।
जगरादित्रयेऽमुष्मिन्नवधानेन जाग्रतः ॥ ५४ ॥
४. तुर्या— शक्तिचक्रानुसंधानाद्विश्वसंहारकारणात् ।
तुर्याभोगमयां भेदरख्यातिरख्यातिहारिणी ॥ ५५ ॥
५. तुर्यातीत—स्फुरत्यविरतं यस्य स तद्वाराधिरोहतः ।
तुर्यातीतमयं योगी प्रोक्त चैतन्यमामृशन् ॥
वरदराज—'शिवसूत्रवार्तिकम्'
सुषुप्ति—ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा ।
चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः ॥
सैव मायावृति जालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता ।
अर्थस्मृतीस्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥—शि०सू०वा०
यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः,
एतदेव मायारूपं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी)
अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥ (शि०सू०वा०)
ग्राह्यग्राहकभेदासंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्,
इत्यप्यनया वचो युक्त्या दर्शितम् ॥ (शि०सू०वा०)
दृष्टि स्वभावस्य विभोरन्तर्नव तयोदयः ।
विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तदबाह्यार्थनिरासतः ॥ (शि०सू०वा०)
जाग्रत अवस्था—जिस अवस्था में पशुप्रमाता की इन्द्रियाँ सामान्य लोगों के
विषयों को ग्रहण करने हेतु स्पन्दायमान हो उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं । इस अवस्था
के प्रमेय प्रमाता की कल्पना या स्वप्नाश्रित संस्कारों से न उत्पन्न होकर जागतिक स्तर पर
एक व्यावहारिक सत्य के रूप में स्थित रहते हैं और एक ही साथ अनेक प्रमाता उनको
इन्द्रियगोचर कर सकते हैं । अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से उत्पन्न सुख,
दुःख, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, ईर्ष्या, प्रेम, राग, विराग के ज्ञान की इसी
व्यावहारिक सत्य की अवस्था को जाग्रत् अवस्था कहते हैं ।
स्वप्नावस्था—जाग्रतावस्था के बाधित होने पर एवं बाह्य जगत् से ऐन्द्रिय
सम्बन्धों के टूट जाने पर जो अन्तर्मुखी काल्पनिक अवस्था उत्पन्न होती है और जिसमें
प्रमाता, प्रमेय, प्रमा, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन केवल मन की वृत्तियाँ होती हैं और जो जागने पर
बाधित हो जाती है वही संकपविकल्पात्मिकावस्था स्वप्नावस्था है ।
यह अन्य प्रमाताओं को अज्ञात एवं अननुभूत रहती है, रजोगुण प्रधान है,
स्वल्पस्थायी है और जाग्रतावस्था में अस्पन्दित है ।

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प्रथमः निष्पन्दः ८९
सुषुप्ति की अवस्था—यह तमोगुण प्रधान अवस्था है । तमोगुण का आधिक्य
इतना प्रवर्द्धित हो जाता है कि प्रमाता शरीर, मन, बुद्धि सभी को विस्मृत करके गंभीर
मोह में संलीन हो जाता है । इस अवस्था में एतत्कालिक सुख-दुख का स्मरण तो नहीं
रहता किन्तु—'मैं सुखपूर्वक सोया'—इत्याकारक स्मृति-रेखायें अवश्य (स्मृति पटल
पर) खिंच जाती है ।
१. जाग्रत में जाग्रत २. जाग्रत में स्वप्न ३. जाग्रत में सुषुप्ति
२. स्वप्न में जाग्रत २. स्वप्न में स्वप्न ३. स्वप्न में सुषुप्ति
३. सुषुप्ति में जाग्रत २. सुषुप्ति में स्वप्न ३. सुषुप्ति में सुषुप्ति
ये समस्त अवस्थायें एक ही प्रमाता की अंगभूत अवस्थायें हैं—एक ही अवस्थाता
न होता तो इन भिन्न अवस्थाओं का एक ही अवस्थाता प्रमाता अनुभव नहीं कर सकता
था 'एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः ॥' (तं०वि०)
ये पाँचों अवस्थायें एक ही वेदक में होती है—
'इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति ॥' (तं०)
'एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्य-
वस्थानामवस्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् ।' (तं०वि०) ।
इन समस्त अवस्थाओं में अनुभविता, ज्ञाता, वेदक या उपलब्धक प्रमाता तो एक
ही रहता है । अवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं किन्तु अवस्थातीत आत्मा परिवर्तित नहीं
होती—समरूप रहती है यदि एक ही अनुभवी या अवस्थाता न रहे तो इन अवस्थाओं
का ज्ञान एवं उसकी स्मृति किसे होगी? ये पाँचों अवस्थायें स्वयं प्रमाता की स्वेच्छागृहीत
अवस्थायें हैं । अवस्थाओं में बदलाव आता है किन्तु इन अवस्थाओं का अनुभावक कभी
नहीं बदलता । चैतन्यसत्ता एक है और विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव भी वही एक सत्ता
करती है—अवस्थाओं की भिन्नता के साथ चैतन्यों (वेदकों प्रमाताओं) में भिन्नता नहीं आ
जाती ॥
'माण्डूक्योपनिषद्' में आत्मा को चतुष्पाद बताते हुए एवं उनका विभिन्न अव-
स्थाओं में अवस्थान इस प्रकार समझाया गया है और विभिन्न अवस्थाओं में भी एक
अभिन्न प्रमाता की स्थिति का प्रतिपादन किया गया है—
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥
१) आत्मा का प्रथमपाद—१. 'वैश्वानर', २. स्वरूप—बहिःप्रज्ञ, ३. अंग—७,
४. मुख—१९, ५. भोक्ता—स्थूल, ६. इस आत्मा की अवस्था—जाग्रत् अवस्था ।
२) आत्मा का द्वितीय पाद—तैजस । अन्तप्रज्ञ । ७ अंग । १९ मुख ।
भोक्ता—सूक्ष्म विषयों का । अवस्था—'स्वप्नावस्था' ।
३) आत्मा का तृतीय पाद—'प्राज्ञ' । भोक्ता = आनन्द का । मुख—चेतना
स्वरूप = ज्ञान । अवस्था—सुषुप्ति । सुषुप्ति अवस्था = 'यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं
कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् ॥' स्थिति—'एकीभूत' ।

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९० स्पन्दकारिका
एक ही आत्मा के तीन भेद है किन्तु उनमें चैतन्य एक ही है ।
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ (माण्डूक्योप०)
१. 'विभुविश्व' = बहिष्प्रज्ञ २. 'तैजस' = अन्तःप्रज्ञ ३. 'प्राज्ञ' = घनप्रज्ञ । विश्व
का स्थान = दक्षिणनेत्र । तैजस = मन के भीतर । प्राज्ञ = हृदयाकाश में । (एक ही
आत्मा शरीर में ३ प्रकार से स्थित है) 'विश्व' = स्थूलभुक् । तैजस—सूक्ष्मभुक् । प्राज्ञ =
आनन्दभुक् । इनको जानने वाला ज्ञाता भोगों को भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता ।
आत्मा का तुरीय स्वरूप— 'तुरीय' का स्वरूप क्या है?— 'नान्तः प्रज्ञं न
बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य-
मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स
विज्ञेयः ॥' ('माण्डूक्योपनिषद') ।
विश्व और तैजस— स्वप्न एवं निद्रा से आच्छादित । 'प्राज्ञ' = स्वप्नशून्य किन्तु
सनिद्र । तुरीय— न निद्रा न स्वप्न । स्वप्नावस्था—अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो ॥ (अन्यथा
ग्रहण) । निद्रावस्था—निद्रातत्त्वमजानतः ॥ (तत्त्व का अज्ञान)
स्वप्न + निद्रा दोनों का अन्त = तुरीय पद ॥
जो आत्मा विभिन्न अवस्थाओं में अवस्थित रहने के कारण भिन्नात्मक दृष्टिगोचर
होती है उसे तात्विक दृष्टि से अभिन्न एवं अद्वैतभाव से देखने वाले ही परमार्थदर्शी हैं—
एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशंकितः ॥ (मा० का०)
तुर्यपद तो अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है । स्थायी अवस्थान प्राप्त करने पर यही
तुर्यातीत पूर्णशिवभाव है । स्पन्द दार्शनिक इसी तुर्यपद शाक्तभूमिका प्राप्त करने पर बल
देकर शिवभाव तक ले जाने का प्रयास करते हैं । तुर्य + तुरीयातीत = निर्विकल्प
चिद्घन अवस्थायें । इसमें भेदकल्पना की संभावना नहीं । चिद्घनावस्था सततोदीयमान
रहने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है ।
साधना-स्तर पर सांसारिकों की जागरण, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थायें—
ध्यान, धारणा एवं समाधि की अवस्थायें हैं ।
शङ्कराचार्य कहते हैं— 'निद्रा समाधि-स्थितिः' ।
आराधना— यद् यद् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्' ।
प्रदक्षिणा— संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः ।
अपनी वार्ता— 'स्तोत्राणि सर्वागिरो'
अपनी आत्मा—शिव । अपनी बुद्धि = पार्वती ।
शिवसूत्रकार ने भी— 'कथा जपः, 'उद्यमो भैरवः, 'ज्ञानं जाग्रत' 'स्वप्नो
विकल्पः ।' अविवेको माया सौषुप्तम् । इच्छा शक्तिः उमा कुमारी, 'दृश्यं शरीरं, 'वितर्क
आत्मज्ञानम्, 'चितं मन्त्रः', 'प्रयत्नः साधकः । 'विद्या शरीरसत्ता मन्त्र रहस्यम्, 'शरीरं

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प्रथमः निष्यन्दः ९१
हविः' 'ज्ञानं अन्नम्' आत्मा चित्तम्' ज्ञानं बन्धः । 'नर्तक आत्मा' 'रङ्गोऽन्तरात्मा' आदि
रहस्यात्मक सूत्रों के द्वारा साधना-प्रयुक्त शब्दों में गुह्य प्रतीकार्थों को ग्रहण किया है ।
'विज्ञानाकल' 'प्रलयाकल' एवं 'सकल' ये सभी आत्माओं के ही भेद तो हैं किन्तु
चिदात्मा सभी में एक ही है भिन्न भिन्न नहीं ।
१. जाग्रत में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न, जाग्रत् में सुषुप्ति ।
२. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न, स्वप्न, में सुषुप्ति ।
३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न, सुषुप्ति में सुषुप्ति ।
अवस्थायें भी होती हैं । ज्ञान की सप्त अवस्थाओं में भी इन सूक्ष्म अवस्थाओं का
अन्तर्भाव है ।
समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व की अनुस्यूतता
अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः ।
सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥ ४ ॥
यह तथ्य तो सम्यक् रूप से स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' मैं अनुरक्त
हूँ'—आदि जो संवेदन (विकल्पात्मक ज्ञान) हैं ये किसी अन्य वेदक सत्ता के साथ
संबंधित हैं । वह (वेदक सत्ता) इन सभी से पृथक् होने पर भी इन सभी सुखादिक
अवस्थाओं में अनुस्यूत है ॥ ४ ॥

  • सरोजिनी *
    स्पन्दात्मक स्वभाव समस्त अवस्थाओं में अनुस्यूत है । 'जो मैं पहले सुखी था
    वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति' के रूप
    में एक ही संवेत्ता की अनुस्यूतता पाई जाती है । (भट्ट कल्लट) स्पन्दप्रदीपिकाकार इस
    कारिका का प्रतिपाद्य विषय बताते हुए कहते हैं—
    'अवस्था एव विश्रान्तर्नावस्थातेति ये जगुः ।
    प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥'
    अवस्थाओं का परिवर्तन मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का होता है चैतन्य का नहीं ।
    एक ही चैतन्यात्मा की भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं । तीनों अवस्थाओं में उस स्पन्दतत्त्व के
    स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता अन्यथा सोकर उठने पर तीनों अनुभूतियों को कैसे
    समानरूप से व्यक्त कर पाता ? समस्त अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता अवस्थित है ।
    सुख, दुःख, प्रसाद, विषाद आदि सभी मनोदशाओं में 'अहंप्रतीति' के रूप में एक ही
    वेदक अनुस्यूत है । 'स्वभाव' सारी अवस्थाओं से भिन्न है ।
    विवृत्तिकार + रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि जाग्रदादि अवस्था विशेष में उपलब्धा
    संवित् तत्त्व 'स्वभाव' से निवर्तित नहीं होता क्योंकि 'स्व' की अर्थात् अपने (उपलब्धा
    स्वरूप के) ज्ञान की, 'भाव' (अर्थात् स्वानुभवरूप) की एकरूप अवस्थिति की अखण्ड
    अविच्छिन्नता (या निरन्तरता) इसे प्रमाणित करती है । किन्तु प्रश्न यह उठता है कि
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९२ स्पन्दकारिका
'अनुभविता' 'उपलब्धा' अविच्छिन्न संवित् तत्त्व तो अनेक धरातलों पर भिन्न-भिन्न
दिखाई पड़ता है फिर उसकी अभिन्नता सिद्ध कैसे की जा सकती है? विवृत्तिकार पूर्वपक्ष
प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि अनुभविता इन अवस्थाओं में तो इन निम्न प्रकार के
प्रत्ययों से घिरा रहता है—
१. 'मैं मनुष्य हूँ' मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्त हूँ, मैं युवक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मैं कृश हूँ,
मैं स्थूल हूँ—इत्यादि। ये सभी प्रत्यय देहालम्बन हैं।
२. 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि। ये प्रत्यय बुद्ध्यालम्बन हैं।१
३. 'मैं बुभुक्षित हूँ, मैं पिपासु हूँ',—इत्यादि। ये प्रत्यय प्राणालम्बन हैं।२
४. 'मैं कुछ भी नहीं जानता'—इस प्रकार के शून्यता प्रमाता के प्रत्यय हैं। ये
प्रत्यवमर्शप्रत्येय सुषुप्तादि अवस्थाओं से प्रतिबुद्ध प्रमाता के प्रत्यय शून्यालम्बन हैं।३
और देह, बुद्धि, प्राण आदि तो अनित्य हैं और इनसे सम्बद्ध आलम्बन भी अनित्य हैं।
फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उपलब्धता, अनुभविता, एकात्मप्रत्ययसार, अद्वैत
एवं अभेद कहा जाने वाला आत्मतत्त्व स्वभाव से निर्वर्तित नहीं होता?—
इसी प्रश्न के उत्तर में कारिकाकार ने चौथी कारिका—'अहं सुखी च दुःखी च
रक्तश्चेत्यादिसंविदः' कही है।४
उत्पलदेवाचार्य कहते हैं कि—किसी-किसी का यह कथन है कि अवस्थायें तो
विश्वान्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता तो विश्वान्तर्गत नहीं है अतः अवस्थाओं को भी स्वभाव
से अभिन्न कैसे कहा जा सकता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि युक्तियों से इसका समाधान करने
हेतु कारिकाकार यह चौथी कारिका प्रस्तुत करते हैं—
'अवस्था एव विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः ।
प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥'५
'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं रागी हूँ'—आदि प्रत्यय एवं अनुभव, संवेदन मात्र
अवस्थायें हैं। वे भिन्न-भिन्न संवेदनों से पृथक् संवेत्ता या अवस्थाता (सुख दुःखादि के
उपलब्धा) में उपराग रूप से सुस्पष्ट रूप में अवस्थित है। किन्तु ध्यातव्य यह है कि
संवेत्ता के बिना भिन्न-भिन्न संवेदनों की सिद्धि कभी हो ही नहीं सकती—'संवेत्तारं विना
संवेदनस्याभावात्' ।६
(क) क्षणिकज्ञानवादियों का खण्डन—क्षणिकज्ञान वादियों के मत में अनेक
नदियाँ समुद्र में मिलकर तादात्म्य के कारण एक जान पड़ती हैं किन्तु यह संवेत्ता केवल
अवस्थाओं का तादात्म्य नहीं है—
नद्योऽब्धाविव तादात्म्यं प्रतप्रतिष्ठाः प्रयान्ति वा।
क्षणिकज्ञानिनां ह्येव न तु ता एव केवलाः ॥
१-३. स्पन्दकारिकाविवृति । ४. स्पन्दकारिकाविवृति ।
५-६. स्पन्दप्रदीपिका ।

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प्रथमः निष्यन्दः ९३

क्योंकि—कार्यकारणभाव (या बाध्यबाधकभाव तब तक सिद्ध ही नहीं हो सकता
जब तक कि पूर्वदशा एवं उत्तरदशा का एक ही प्रमाता न हो—)
कार्यकारणभावो हि बाध्यबाधकताऽपि च ।
पूर्वापरैकमातारमन्तरेण प्रसिद्धयतः ॥१
जब प्रत्येक क्षण विलक्षण (पृथक्-पृथक्, पूर्वापरा सम्बद्ध) होंगे, प्रत्येक संविद्
पृथक्-पृथक् होगी तो पूर्ववर्ती प्रमाण से उत्तरवर्ती प्रमेय को बोध कैसे होगा ?
सम्बन्ध का ग्रहण किए बिना प्रमाण की गति क्या होगी? संवेत्ता के बिना
मिथ्याज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध कैसे होगा? एक क्षण के अनन्तर यदि शुक्तिका रजत हो
जाय तो उसे रोक कौन सकेगा?२
वस्तुतः संवेत्ता के एक हुए बिना प्रमाण-अप्रमाण का भेद ही नहीं रहेगा । ऐसी
स्थिति में तो घट की सिद्धि होगी किन्तु पट का अनुभव होगा । ३
'यह वही व्यक्ति है; यह वही वस्तु है; यह वही दृश्य है'—इत्यादि प्रत्यय भी
क्षणिकवादियों के मतानुसार संभव नहीं हैं । अतः पूर्वविज्ञान की स्मृति जिसे 'प्रत्यभिज्ञा'
कहते हैं—यह 'सर्वथा प्रामाणिक है क्योंकि लोकसिद्ध है और दैनन्दिन अनुभवगत है ।
इसलिए नित्यस्वभाव आत्मा ही संवेत्ता है । वास्तविक बात तो यह है कि एक प्रमाता
आत्मा की सिद्धि के बिना प्रमाण भी अप्रमाण हो जाएगा क्योंकि सब कुछ क्षणिक और
अनिश्चित रहेगा । क्षणिक ज्ञान में कार्य कारण की सिद्धि कैसे होगी? स्मृति-बीज कैसे
होगा? कारण का नाश कैसे हो गया ? यदि नाश नहीं हुआ तो विनाशी कार्य का कारण
कैसे हुआ ? अभाव से भाव-परम्परा कैसे चल सकती है? यदि कार्य का नाश नहीं
होता तो वह क्षणिक कैसे हुआ? जो दूसरे क्षण रह सकता है वह सौ क्षण तक भी रह
सकता है । अभिप्राय यह कि भाव स्थिर हैं । स्वरूपतः भाव का अभाव नहीं होता-
'नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सतः ।' आत्मज्ञान में कुछ भी क्षणिक दृष्टिगत
नहीं होता । निश्चय के बिना बाध्य-बाधक भाव भी सिद्ध नहीं होता । स्थिरता के बिना
शुक्ति में रजत-भ्रान्ति मिटाने का क्या अर्थ होगा? अतः ज्ञान एक है, नित्य है और वह
क्षणिक एवं अनेक नहीं हो सकता ।
'प्रामाण्ये क्षणिकत्वेन प्रत्यक्षेणोपपद्यते ।
प्रागभावादुत्तरज्ञानदार्ढ्यात् प्रामाण्यसिद्धितः ॥
प्रतिक्षणमथान्यत्वात् सामान्यस्याग्रहे सति ।
विलक्षणाः क्षणाः सर्वे प्रामाण्ये किं निबन्धनम् ॥
सम्बन्धस्याग्रहश्चापि तेन मानस्य का गतिः ।
मिथ्याज्ञानस्य मिथ्यात्वं ब्रूहि वा किं निबन्धनम् ॥
क्षणान्तरे शुक्तिकायां रजतं केन वार्यते ।
भिन्नज्ञानस्य कर्तृत्वे सर्वं प्रामाण्यमाप्नुयात् ॥


१-३. स्पन्दप्रदीपिका ।

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९४ स्पन्दकारिका
अन्यस्वरूपसंसिद्धावन्यसिद्धिर्भवेद्यदि ।
घटस्वरूपसंसिद्धौ पटस्यावगमो भवेत् ॥
योऽयं स एवाऽयमिति प्रत्ययः स्थिरकालजः ।
कर्तुं शक्यो न तद्वादि प्रामाण्यात् क्षणिकैस्ततः ॥
प्राग्विज्ञानस्मृति प्रत्यभिज्ञा नित्यं प्रतिष्ठिताः ।
अतो नित्य स्वभावस्यैवात्मनः कर्तृतोदिता ॥
एक प्रमात्रभावात् स्यात् क्षणिकत्वाद् निश्चयात् ।
प्रमाणमप्यप्रमाणं स्याद् बौद्धान्यं हि निराश्रयम् ॥
बौद्धायन संहिता में भी कहा गया है कि—
कार्यकारणभावस्तु नास्ति ज्ञाने क्षणक्षयः ।
क्षणं द्वितीयं नास्ते चेद् स्मृति बीजं कथं भवेत् ?
जनकं तत् कथं नष्टमनष्टं वाप्यनष्टकम् ।
नष्टस्य जनकत्वं चेदभावादभावसन्ततिः ॥
जनकत्वेत्वनष्टस्य क्षणभंगः प्रहीयते ।
द्वितीयं यत्क्षणं तिष्ठेत्तदास्ते शतमप्यथ ॥
जनकत्वेऽर्थनिष्ठस्य अर्थे नाभावमेति तत् ।
तस्माद्भावाः स्थिरा सर्वे न च्यवन्ते स्वरूपतः ॥
आत्मावबोधविषये स्वस्थिराः क्षणिका न ते ।
बाध्यबाधकभावोऽपि न स्यान्निश्चायकं बिना ॥
शुक्तौ हि रजतज्ञानभ्रान्तिभंगोऽस्ति नान्यथा ।
तस्माज्ज्ञानं नित्यमेकं क्षणिकानि बहूनि नो ॥
‘सत्कार्य सिद्धि’ में कहा गया है—‘यदि प्रत्येक विज्ञान स्वतन्त्र हो तो एक दूसरे
का संवेदन नहीं हो सकता । अतः पूर्वावस्था एवं उत्तरावस्था दोनों का ज्ञाता एक प्रमाता
होता है और वह विचित्र वृत्तियों के द्वारा व्यवहार का आश्रय बनता है । अनेक वृत्ति—
ज्ञानों का अनुसन्धान एक अजन्मा ज्ञान को होता है ।’ गीता का यह वचन सर्वथा सत्य
है कि एक ही चेतन स्मृति ज्ञान और अपोहन का कारण है ।’
विरोधियों के कुतर्क पाषाणों को चबाने में कोई लाभ नहीं है । ‘सत्कार्य सिद्धि’
में ठीक ही कहा गया है— ‘न हि स्वनिष्ठे विज्ञाने इतरेतरवेदनम् ।
तस्मात् पूर्वापरावस्था प्रमाणं परिपिण्डितः ।
एकः प्रमाता चित्राभिर्वृत्तिभिर्व्यवहारभाक् ॥
प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है—
एवमन्योन्यभिन्नानाम परस्पर वेदिनाम् ।
ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः ।
न चेदन्तः कृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः ।
स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥

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प्रथमः निष्यन्दः ९५
गीता में भी कहा गया है—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च'
'इत्यलं कुतर्काश्मनां चर्वणेन' (कुतर्कों के पत्थर चबाना बन्द करो।)।१
संवेत्ता का स्वरूप क्या है? 'किंभूते संवेत्तरि'? किस प्रकार के संवेत्ता में? यह
वह संवेत्ता है जिसमें सुख-दुःख, मोह—प्रबोध आदि समस्त अवस्थायें स्थित हैं । ये
अवस्थायें उसमें सूत में मणियों की भाँति अनुस्यूत हैं ।
'मैं पहले सुखी था, आज मैं दुःखी हूँ',-इस अनुभव में सुख एवं दुःख में
भेद तो है किन्तु 'मैं-मैं' में भेद नहीं है । इस स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञा का उसीको अनु-
सन्धान हुआ करता है । इन अवस्थाओं में भी वह नहीं है क्योंकि ये अवस्थायें विकल्पमात्र
हैं एवं अनित्य हैं । संवेत्ता इनसे अतिरिक्त है । अविद्यावरण तो केवल उपरागमात्र है यथा
चन्द्रमा सूर्य पर ग्रहण । अंधकार से आच्छन्न होने पर रस्सी साँप नहीं बन जाती और न तो
नष्ट होती है । इसी प्रकार आत्मा का कुछ बिगाड़ नहीं सकती—भर्तृहरि कहते हैं—२
नाच्छादितस्य तमसा रज्जुखण्डस्य विक्रिया ।
नाशो वा क्रियते यद्वत्तद्वन्नाविद्ययाऽऽत्मनः ॥
'संवित्प्रकाश' में भी कहा गया है कि स्फटिक का स्वभाव अत्यन्त निर्मल है
किन्तु जपाकुसुम आदि का उपराग होने पर स्फटिक लाल दिखाई पड़ने लगता है ।
भगवान् संवेत्ता का अत्यन्त निर्मल शरीर भावसमासक्त होकर विविध प्रकार का उपलब्ध
होता है । यथा स्फटिक रंगीन नहीं होता वैसे ही भाव युक्त होने पर संवित् वैसी ही नहीं
हो जाता । यह आत्म संवित् भी उपरक्त होने पर भी अपने निजरूप का परित्याग
नहीं किया करता । रूपान्तरित न होने पर भी रूपान्तरित के तुल्य दृष्टिगोचर अवश्य
होता है । जो कुछ भी दिखाई पड़ता है सब कुछ उसीका तो विलास है—३
अत्यन्ताच्छस्वभावत्वात् स्फटिकस्य यथा स्वकम् ।
रूपं परोपरक्तस्य नित्यमेवोपलभ्यते ॥
तथा भावसमासक्तं भगवंस्तावकं वपुः ।
अत्यन्तनिर्मलतया पृथक् तैनोपलभ्यते ।
नैतावताऽसौ स्फटिकः पृथङ्नास्त्येव रञ्जकात् ।
भावरूपपरित्यक्ता तव वा निर्मला तनुः ॥४
उपराग की स्थिति में भी शुद्धत्व नष्ट नहीं होता—
उपरागेऽपि शुद्धत्वं न त्यक्तमनया प्रभो ।
परित्यज्य निजं रूपं संविदाख्या कुतश्च यत् ।
अथाऽप्राप्त्यैव तद्रूपं भवेद्रूपान्तरानुगा ।
तद्रूपापि हि दृश्येत कारणेऽस्यापि संभवात् ॥५
शुद्धानुभव विविध आकारों द्वारा अपने आकार का परित्याग नहीं कर देता बल्कि
१-३. उत्पलदेवाचार्य । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका ।

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९६ स्पन्दकारिका
अविच्छिन्न रूप में सदा निर्मल रहा करता है। श्वेत वस्त्र पर कोई रंग चढ़ा, उतर गया
दूसरा चढ़ा और पुनः उतर गया । श्वेत वस्त्र ज्यों का त्यों रह जाता है। इसी प्रकार
शुद्ध चेतन तत्तत् आकारों के राग से तत्तदाकार दिखाई तो पड़ता है किन्तु वस्तुतः रहता
शुद्ध ही है । नील, पीत, सुख दुःख—सभी में चित् स्वरूप अखण्डित ही रहता है ।
चित्र-विचित्र उपाधि सम्पदा से विकल्प उसे विशिष्ट-विशिष्ट दिखाई देता है—१
सदैव शुद्धोऽनुभवो यं प्रत्याकारकर्बुरः ।
आकारान्तरसंचारकाले तस्यापि निर्मलः ॥
यथा जात्या सितं वस्त्रं रक्तं रागेण केनचित् ।
तत्पदप्राप्त शुक्लत्वं पुन रागान्तरं श्रयेत् ॥
एवं शुद्धा चितिर्जात्या यदाकारोपरागिणी ।
तत्त्यागापरसंचारमध्ये शुद्धैव तिष्ठति ॥२
नीले पीते सुखे दुःखे चित्स्वरूपमखण्डितम् ।
विशिनष्टि विकल्पस्तच्चित्रयोपाधिसम्पदा ॥३
आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं 'अहं सुखी इत्यादयो याः
संविदः ता अन्यत्र वर्तन्ते' ततः असौ स्वभावात् एकस्मात् न निवर्तते ॥४
अर्थात् 'मैं सुखी हूँ'—आदि जो ज्ञान है वह अन्यत्र रहा करता है अतः आत्मतत्त्व
अपने एकात्मक स्वभाव से कभी निर्वर्तित नहीं हुआ करता ।
'मैं सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ'—आदि संवेदन अन्तरंग है और वे बुद्धि पर
अवलम्बित हैं । अन्य संवेदन देहादिक पर अवलम्बित हैं । उनका अपना सीधा सम्बन्ध
उन्हीं से है—आत्मतत्त्व से नहीं ।
'अन्यत्र'—अन्य जगह, अर्थात् शरीर, इन्द्रियमान, बुद्धि आदि जगहों में ।
'वर्तन्ते' स्थित हैं ।
'स्फुटम्'—यह बात सुस्पष्ट हैं या 'स्पष्टतया'। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा
हूँ, मैं प्यासा हूँ'—इत्यादि संविद—आत्मा में नहीं प्रत्युत् अन्यत्र बुद्धि, शरीर एवं प्राण
आदि में रहते हैं तथापि सुखादिक से पृथक् उपलब्धि में भी अभेदात्मना रहते हैं—जैसे
कि नदियाँ समुद्र में—'सरितः सागरे इव तत्र विगलितान्योन्यभेदा ऐक्येन अवतिष्ठन्ते,
तादात्म्यं आपद्यन्ते ।'५
'स्फुटम्' = स्वानुभवसंवेद्य होने के कारण सुप्रकट ही हैं ।६
'संविदः' शब्द का (बहुवचनान्त) प्रयोग क्यों किया गया ? कारण यह है
कि—एक ही उपलब्धिरूप संवित् 'अहमोऽस्मि' के रूप में पारमार्थिकी स्फुरण से भी
संवलित होता है और वही माया शक्तिजनित एवं तथाविध स्वभाव-परामर्श के अभाव के
कारण अनित्य सुखदुःखादि का वेदक होने के कारण—'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ—
१-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४. स्पन्दकारिकाविवृति ।
५-६. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।

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प्रथमः निष्यन्दः ९७
इत्यादि संवेदन द्वारा बुद्धि आदि अवस्थाओं के साथ सामानाधिकरण्य स्थापित कर लेने
के कारण अनेक संवेदनों के मध्य विचरण करता है अतः कारिकाकार ने 'संविदः'
(बहुवचनान्त) शब्द का प्रयोग किया है।
आचार्य रामकण्ठ ठीक ही कहते हैं कि यदि सुखादिक वेद्य वस्तु के संबन्ध के
कारण संवित् भी सुखादिवत् विभिन्नरूपों वाला बन जाता तो स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञानुसंधान
न हो पाता। ऐसा न होने पर समस्त व्यवहारोच्छेद हो जाता किन्तु यह स्थिति तो
अभीष्ट है नहीं।
कारिकाकार 'अन्यत्र' शब्द के पूर्व 'एताः संविदः' विशेषण का प्रयोग करते हैं।
ये संवेदन (ज्ञान) किस स्वरूप वाले 'अन्यत्र' में रहते हैं? ये 'सुखाद्यवस्था' में अनुस्यूत
रूप वाले अन्यत्र' में रहते हैं। अर्थात् समस्त सुख-दुःख-मोहरूप विशिष्ट अवस्थाओं में
उत्पादविनाशधर्मक होने के कारण अनित्य दशाओं में, वेद्यत्व के सामान्य होने के कारण
शब्दादिविषय समानवृत्तियों में एवं 'अहमोऽस्मि' अनुभूति के ज्ञान से संवलित उपलब्धा
के भीतर विद्यमान रहते हैं। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इन प्रत्ययों में दो अर्थ स्फुरित
होते हैं—
१. सुखाद्यात्मा वेद्यरूप एवं
२. अहमिति अपर वेदक रूप
'वेद्यत्वरूप'—घटादिक अनित्य पदार्थों के नानात्व को द्योतित करने वाला।
'वेदकरूप' = पूर्वापरावस्था में व्यापक होने के कारण समस्त प्रमातृ प्रसिद्ध,
समस्त व्यवहारों के कारणों के अनुसंधानक, नित्य स्थित एवं उपलब्ध रूप एकात्मक
संवित् तत्त्व।
अवस्थायें जाग्रदादि भेदों के कारण अनेक हैं किन्तु संवित् तत्त्व उसमें संचरण
करने पर भी अभिन्नलक्षण एवं एक रूप वाला ही रहता है। 'मैं सुखी हूँ' एवं 'मैं दुःखी
हूँ' ये दोनों अवस्थायें भिन्न-भिन्न हैं। एक ही संवेत्ता दोनों अवस्थाओं का संवेदन करता
है किन्तु उसके स्वरूप में एकानुसंधातृनिबद्धावस्था होने के कारण एक से अधिक न होने
की अभिन्नता (एकता) बनी रहती है। वह नित्य निरावरणा रूप होने के कारण सर्वत्र
अनिरुद्ध, स्वयंसिद्ध एवं तात्त्विक स्वभाव में मात्र शङ्कर है और वही समस्त अवस्थाओं
में अनुस्यूत है—'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु।' उनको 'पर स्वभाव' कहा गया
है—'स स्वभावः परः स्मृतः ॥'
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि चौथी कारिका सौगतों के सिद्धान्त का खण्डन
करने के उद्देश्य से कही गई है। सौगत तर्क की शक्ति पर, ज्ञान के सातत्य में विश्वास
रखते हैं।१
'ये सभी सुख-दुःख एक ही चेतना के विविध रूप हैं तथापि ये विभिन्न रूपों एवं
विभिन्न आकारों में स्थित हैं' मीमांसक कहते हैं—'यह सभी कुछ आत्मा ही है जो कि
१. स्पन्दनिर्णय।
स्पं० ७

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९८ स्पन्दकारिका
सुखादि के द्वारा सदैव छायी रहती है तथा जो कि अपनी चेतना के द्वारा ही सत्ता में बनी
रहती है।' 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं आसक्त हूँ'—ये एवं इसीप्रकार के अन्य ज्ञान
केवल एक सत्ता में रहते हैं जिसमें कि आनन्दादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं।१
वहीं मैं, जो कि 'सुखी हूँ, दुःखी हूँ,' का अनुभव करता है, वही 'सुखानुशय
(सुख के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध) के कारण रागी एवं दुःखानुशय के कारण द्वेषवश द्वेषी
हो जाता है। उसके ये सभी प्रत्यय (ज्ञान) एक ही नित्य आत्मतत्त्व में पाये जाते हैं।
एवं ये प्रत्यय एक नित्य एवं साक्षी रूप में स्थित आत्मतत्त्व में विश्राम ग्रहण करते हैं।
अन्यथा अवबोधों के अन्तर्सम्बन्धों एवं उनके प्रभावों पर आधृत अन्य विचार अपने आप
नष्ट हो जायेंगे तथा विचार गतिशील नहीं हो सकते।२
'च'—और इस श्लोक में 'च' शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। वह सम्बन्ध को
विकसित करता है क्योंकि यह एक वस्तु के साथ दूसरे का संबन्ध द्योतित करता है।
'एक में' शब्द, 'उसमें' शब्द द्वारा, विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थ यह
है कि—जिसमें सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत हैं। ये ऐसे अन्तर्विद्ध हैं यथा माला में
मणियों के दाने।३
'ताः' = वे। वे क्षणवादी दार्शनिक जो कि ज्ञान की क्षणभंगुरता में विश्वास रखते
हैं सब कुछ क्षणिक मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि क्षण-क्षण परिवर्तित होने
वाली घटनाओं की परिवर्तन परम्परा या क्षणभंगुरता की दृश्यावलियों को तो केवल वही
देख सकता है जो कि इन सभी परिवर्तनों एवं क्षणक्षण की घटनाओं से अप्रभावित
रहकर स्थायी सत्ता रखकर इनकी क्षण-क्षण में होने वाली विनाश लीलाओं को देख
सके। यदि ऐसी कोई स्थायी एवं अक्षणात्मक सत्ता मान ली जाती है तो 'क्षणिकवाद
सिद्धान्त' अपने आप खण्डित हो जाता है।४
'ज्ञान' स्मृति से उत्पन्न होते हैं। 'स्मृति' भूतकालिक घटना का पुनर्जागरण है।
यदि प्रत्येक वस्तु क्षण-क्षण में परिवर्तित हो जाती है तो 'स्मृति' संभव ही नहीं हो
सकती क्योंकि तब तक स्मरण करने वाला संवेत्ता परिवर्तित हो जायेगा। अतः क्षण
भर के पूर्व का संवेत्ता एक क्षण के बाद तो रह नहीं जायेगा (प्रत्युत एक क्षण के बाद
एक नया संवेत्ता उत्पन्न हो जाएगा) अतः उसे भूतकाल की ये स्मृतियाँ कैसे हो सकती हैं?
आचार्य क्षेमराज एक प्रश्न यह भी उठाते हैं कि मूलभूत यथार्थतत्त्व वह तो हो
नहीं सकता जिसमें कि सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं अतः वह सुखादि से
अनुस्यूत चेतना आत्मा भी नहीं हो सकती क्योंकि आत्मा का स्वरूप लक्षण चैतन्य
है—'चैतन्यमात्मा' ।५ जब यह आत्मा अपनी निजी अशुद्धियों के द्वारा उपहित हो जाता
है उस स्थिति में अपने यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर लेता है और ऐसी स्थिति में ही
सुखदुखादि अवस्थाओं का अनुभव करता है। सुखदुखादि का अनुभविता 'पुर्यष्टक' है न
१. स्पन्दनिर्णय। २-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय।
५. शिवसूत्र।

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प्रथमः निष्यन्दः ९९
कि स्वस्वरूपावस्थित पूर्णचेतन संवित् तत्त्व । इस स्थिति में भी उसके लिए सुखदुखादि
का स्थायी या नित्यात्मक अवरोध नहीं है क्योंकि वह उनसे मुक्त भी हो सकता है ।
कारिकाकार ने 'मैं कृश हूँ' 'मैं पृथुल हूँ'—इत्यादि न कहकर 'मैं सुखी हूँ—मैं
दुःखी हूँ'—इत्यादि का प्रयोग क्यों किया? इसलिए किया क्योंकि ग्रन्थकार यह प्रस्तुत
करना चाहता है कि—'शिव के साथ मेरी निजी आत्मा स्वरूप से अभिन्न है'—यह
अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है । यह अनुभव पुर्यष्टक की स्थिति में भी होता है । किन्तु
ये अनुभव ज्ञानी एवं आनन्दमय शङ्कर के यथार्थ स्वरूप में कहीं भी स्थान नहीं पाते ।
शङ्कर ही यथार्थ सत्य है । यथार्थ तत्त्व सुखदुःखादि से उपहित नहीं है । साधक
पुर्यष्टकत्व से मुक्ति की साधना का लक्ष्य रखकर आगे बढ़ता है । 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी
हूँ'—आदि के प्रत्यय शरीर, इन्द्रिय, मन एवं जागतिक वासनाओं से ऊपर उठने पर
नष्ट हो जाते हैं अन्तर्पथ की यात्रा के समय भी ऐसा ही होता है । 'सम्यक् पुर्यष्टक
शमनाय एवं आस्थेय इति ॥'१
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि रहस्यगुरुप्रवर, अनुभवागमज्ञ, कारिकाकार ने
युक्तियों, तर्कों एवं उपपत्तियों द्वारा समस्त वादों की अनुपपन्नता का अनुवदन करते हुए
स्पन्दतत्त्व का ही प्रतिपादन किया है । 'स्पन्दतत्त्वमेवास्तीति प्रतिजानाति ।'२ इसीलिए वे
अगले श्लोक में कहते हैं कि जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय नहीं है एवं जहाँ
क्षणभंगुरता (अनित्यता) की भी अवस्था नहीं है वही पारमार्थिक तत्त्व है—
'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च ।
न चास्ति मूढ़भावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (का०५)
निष्कर्ष—रामकण्ठ कहते हैं कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ आदि जो संवेदानायें हैं वे
अन्यत्र स्थित हैं अतः यह स्पन्द तत्त्व अपने एकात्मक अविचल स्वस्वंभाव से कभी
प्रत्यावर्तित या निवर्तित नहीं होता ॥३ 'आदि' = देहादिक आलम्बन ॥ ये संवेदनायें
उपलब्धा स्पन्द से पृथक् तो हैं किन्तु इन भिन्न-भिन्न समस्त अवस्थाओं में एक ही संवित्
तत्त्व अनुस्यूत है ।
१. एक ही संवित् तत्त्व उपलब्ध (अनुभवकर्ता) के रूप में अहं प्रतीति के साथ
विद्यमान है ।४
२. वही माया शक्ति जनित तथाविध स्वभाव परामर्शाभाव के कारण सुखादिक
अनित्य वस्तुओं का वेदक बनकर 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों
से संक्रान्त होकर बुद्ध्याद्यवस्था सामानाधिकरण्य प्राप्त किए हुए स्थित है । ये समस्त
संवेदनायें सुख, दुःख मोह आदि अवस्थाओं में स्थित हैं । इस संवेत्ता के दो रूप हैं—
१. एकः सुखाद्यात्मा वेद्यरूपः । (घरादि की भाँति)
२. द्वितीय है—अहमाकार संवेदन द्वारा अपर वेदक के रूप में ।
१-२. स्पन्दनिर्णय । ३-४. स्पन्दकारिकाविवृति ।

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१०० स्पन्दकारिका
इस प्रकार—सुखी दुःखी होने की अनुभूति के उपर्युक्त दो अर्थ हैं 'द्वौ अर्थौ
स्फुरतः।'
३. 'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु' ।१
'स्पन्दशास्त्र' की मान्यता है कि—'जाग्रत,' 'स्वप्न', 'सुषुप्ति' आदि अवस्थाओं
में एक ही अवस्थाता अवस्थित रहता है। अवस्थायें भिन्न हैं किन्तु अवस्थाता अभिन्नतया
एक है। भट्टकल्लट कहते हैं—'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—'जो मैं पहले सुखी था
वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति के रूप में
एक ही वेदक अवस्थित रहता है जो सभी अवस्थाओं में अभिन्न एवं एक है।
'अन्यत्र'—जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति से अतिरिक्त।
'स चानुस्यूत एवं सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी,
रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन, अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः .... स
स्वभावः परः स्मृतः।'
स्पन्दात्म 'स्वभाव' समस्त अवस्थाओं में अवस्थित रहता है। मैं जो पहले सुखी
था वही अब दुःखी या अनुरक्त हूँ—इत्याकारक अनुभवों में 'अहं प्रतीति' के रूप में एक
ही अनुभविता का अवस्थान रहता है। कहा भी गया है—
'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एवं उत्कृष्ट कहा गया है।'
'क्षणवाद'—
बौद्धदार्शनिकों का विज्ञानवाद—ज्ञान क्षणिक है। एक ज्ञान केवल तीन क्षण
तक स्थायी रहते हैं। इसके उपरान्त उनका समय, विषय एवं आकार-प्रकार परिवर्तित
हो जाता है। इन ज्ञानों में समानता या एकरूपत्व प्रतीत होता है। उसका कारण यह है
कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तरवर्ती ज्ञान क्षणों का आविर्भाव करते हैं। संस्कारों
का स्वभाव ही स्थितिसंस्थापकता है। इसी का परिणाम है कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के
संस्कार परवर्ती ज्ञान क्षणों को पूर्ववर्ती ज्ञानक्षणों के गुण, धर्म, आकार-प्रकार प्रदान
करके उन्हें तद्रूप बना देते हैं। ज्ञान क्षणिक है। उनमें एकरूपता का कारण संस्कार
प्रवाहों की अविरल श्रृंखला है। 'ज्ञान' स्वयं प्रकाश है उन्हें अपने प्रकाशन के लिए
अन्यापेक्षा नहीं है। 'ज्ञान' एक प्रकारक ही नहीं प्रमाता (ज्ञानक्षणस्वरूप प्रमाता) भिन्न है
अतः ज्ञान एवं ज्ञान प्रवाह (विज्ञान) भी भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक ज्ञानक्षण स्वयंप्रकाश है
अतः स्वभावभूत विश्वात्मा (स्पन्द = चैतन्य) आवश्यक नहीं है।
ज्ञान के दो प्रकार हैं—
१. प्राथमिक ज्ञान = 'निर्विकल्प ज्ञान'—इसके संस्कार—२. सविकल्पात्मक
(द्वितीय) ज्ञान—(पूर्वानुभूत) नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्धस्थापन । 'विकल्प'
नामरूपात्मक हैं।
१. स्पन्दकारिकाविवृति ।

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प्रथमः निष्यन्दः १०१
‘नाम’ (बौद्ध दर्शन)
┌───────────┬───────────┬───────────┐
वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान
(सविकल्प ज्ञान) (निर्विकल्प ज्ञान)
‘नाम’ + ‘रूप’ ──>
‘रूप’ ── ‘वेदना’ ── ‘संज्ञा’ ── ‘संस्कार’ ── ‘विज्ञान’
इन पाँच स्कंधों का समुदाय ही सन्तान रूप में प्रवाहित ज्ञानधारा है ।
‘विज्ञान’ एवं ‘आलय विज्ञान’ — ‘ज्ञान सन्तान’ चेतन आत्मा का स्मरण आदि
कार्यों को पूर्ण करता है । ज्ञानक्षण के दो प्रकार हैं—१. निर्विकल्प ज्ञान २. सविकल्प
ज्ञान । निर्विकल्प ज्ञानक्षण = ‘स्वलक्षणाभास’¹ (किसी वस्तु का प्रथम दृष्ट्या साक्षात्कार
होने पर उस वस्तु से सम्बद्ध प्राथमिक ज्ञान) जिसमें वस्तु का नामरूपात्मक विकल्प से
शून्य ज्ञान निहित हो । इसमें व्यावहारिक व्यापार संभव नहीं है ।
‘ज्ञानसन्तान’ किसे कहते हैं— प्रमाता के हृदय में भिन्न-भिन्न कालखण्डों में,
भिन्नविषयक एवं भिन्नाकारों से सम्बद्ध ज्ञानक्षणों की अविरलधारा अजस्र रूप में प्रवाहित
होती रहती है और वही है— ‘ज्ञानसन्तान’ । बौद्धों की दृष्टि में यही ज्ञान सन्तान चेतन
आत्मा का स्वरूप है और यही स्मरण, संकल्प, इच्छा, पूर्वानुस्मरण आदि का आधार
है । इससे भिन्न किसी अन्य नित्य आत्मा की कल्पना व्यर्थ है । नामरूपात्मक विकल्प
अनन्त हैं अतः तत्सम्बद्ध सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त है । ‘मैं’ की अनुभूति ‘शरीर
सन्तान’ एवं विज्ञान सन्तान (ज्ञान सन्तान) से ही हो जाती है फिर आत्मा के कल्पना की
क्या आवश्यकता है—
१. ज्ञान स्वलक्षणाभासात्मक होते हैं—‘स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्’ ।
‘अहंप्रतीति’ इत्यादि ज्ञान के लिए किसी नित्य आत्मा की व्यर्थ कल्पना
अनावश्यक है क्योंकि यह कार्य तो स्वयं ज्ञान सन्तान ही कर देता है—। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा
(१.२.२) में कहा गया है—
‘नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्या त्रानवभासतः ।
अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥’²
२. लोकायत की दृष्टि— चार्वाक, बृहस्पति प्रभृति नास्तिक दार्शनिकों ने अपने
चिन्तन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है—
१. ‘शरीरात्मवाद’ २. ‘अपत्यात्मवाद’ ३. ‘इन्द्रियात्मकवाद’ ४. ‘प्राणात्मवाद’
५. ‘मनसात्मवाद’ ६. ‘बुद्ध्यात्मवाद’ । लोकायतिक दर्शन के मूलभूत सिद्धान्त निम्न
──────────────────────────────────────────────────────────
१. नीलप्रकाशः ‘स्वलक्षणाभासनम्’ । ‘स्वम्’ अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि
‘लक्षणं’ देशकालाकाररूपं यस्य तस्य ‘आभासः प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन्—
‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ ।
२. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।

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१०२ स्पन्दकारिका
हैं—(‘बृहस्पति’ सूत्र के अनुसार)—
१) तत्त्व = ‘पृथिव्यापस्तेजोवायुरिति तत्त्वानि’ ।
२) शरीर, इन्द्रिय, विषय = ‘तत्समुदाये शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञा ।’
३) चैतन्य = ‘तेभ्यश्चैतन्यम् ।’
४) चैतन्योत्पत्ति = किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् विज्ञानम् । पाँच भूत—(अन्न के
संघटन से मादक शक्ति शराब आदि उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार भूतों के संघटन से)
‘विज्ञान’ (चैतन्य) उत्पन्न हो जाता है ।
५) भूत ही चैतन्योत्पत्ति के कारण—‘भूतान्येव चेतयन्ते’
६) आत्मा—चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः ।
७) जीव = जलबुद्बुदवज्जीवाः ।
८) परलोकाभाव—परलोकिकोऽभावात् परलोकाभावः ।
९) मोक्ष—‘मरणोऽपवर्गः’ ।
१०) स्वर्गसुख = धूर्त-प्रलाप । धूर्त प्रलापस्त्रयी स्वर्गोत्पादकत्वेन विशेषाभावात्।
११) पुरुषार्थ—अर्थ कामौ पुरुषार्थों ।
१२) विद्या = दण्डनीतिरेवविद्या ।
१३) प्रमाण—प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् ॥
१४) अनुसर्तव्य मार्ग = ‘लौकिको मार्गोऽनुसर्तव्यः ॥’
विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं कि ‘चित्त’ ही एकमात्र तत्त्व है अन्य नहीं—(यही चित्त
‘विज्ञान’ भी कहा जाता है) ॥
‘चित्तं वर्ततेचित्तमेव विमुच्यते ।
चित्तं हि जायते नान्यच्चित्तमेवनिरुध्यते ।
चित्त ही मात्र एक परम सत्य है । चित्त ही जन्म लेता है, मुक्त होता है, और वही
निरुद्ध होता है ।
‘विज्ञान’ के निम्न पर्याय हैं—‘लंकावतार सूत्र’ ।
१. ‘चित्त’ २. ‘मन’ ३. ‘विज्ञप्ति’
‘विज्ञान’ एवं आलय विज्ञान—
‘चित्तं मनश्च विज्ञानं संज्ञा वैकल्पवर्जिताः ।
विकल्पधर्मतां प्राप्ताः श्रावका न जिनात्मजाः ॥’
(‘लंकावतार’ ३।४०)
चेतन क्रिया से सम्बद्धता, अतः—‘चित्त’ मनन क्रिय से सम्बद्धता, अतः—
‘मन’ एवं विषय—विग्रह की कारणता अतः यही—‘विज्ञप्ति’ कहलाता है—

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प्रथमः निष्यन्दः १०३
'चित्तमालयविज्ञानं मनो यन्मन्यनात्मकम् ।
गृह्णाति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते ॥
(लंकावतार गाथा १०२)
चित्त को छोड़कर कोई भी पदार्थ सत् नहीं है । 'तथता' 'शून्यता' 'निर्वाण'
'धर्मधातु' आदि सब उसी के पर्याय हैं । सभी उसी के नाम हैं । चित्त (आलय विज्ञान)
ही 'तथता' है—
'दृश्यते न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्रं हि दृश्यते ।
देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम् ॥'
चित्त के दो रूप हैं—१. ग्राह्य विषय २. ग्राहक (विषयी)—
चित्तमात्रं न दृश्योऽस्ति द्विधा चित्तं हि दृश्यते ।
ग्राह्यग्राहकभावेन शाश्वतोच्छेदवर्जितम् ।। (लंकावतार सूत्र ३।६५)
ग्राहक, ग्राह्य एवं ग्रहण तीन हैं किन्तु ये तीनों विज्ञान या चित्त के परिणमन होने
के कारण यथार्थ न होकर मात्र काल्पनिक हैं । वास्तविक एवं पारमार्थिक तत्त्व तो मात्र
बुद्धि है—'बुद्धिस्वरूपमेकं हि वस्त्वस्तिपरमार्थतः । प्रतिभानस्य नानात्वान्न चैकत्वं
विहन्यते ।' (सर्वस० सं०) विज्ञान एक है भिन्न-भिन्न नहीं ।
विज्ञान के भेद हैं—१. चक्षुर्विज्ञान, २. श्रोत्रविज्ञान, ३. घ्राण विज्ञान, ४.
जिह्वा विज्ञान, ५. काय विज्ञान, ६. मनोविज्ञान, ७. क्लिष्ट मनोविज्ञान, ८. आलय
विज्ञान ।
आलय विज्ञान ही आत्मा है और इसका प्रवाह सतत चलता रहता है । यह
समष्टि चैतन्य है और एकाकार, एकरस, परिवर्तनशील (किन्तु आत्मा तो परिवर्तनशील
नहीं हैं) एवं सर्व प्राणिगत है । इसका विजृंभण ही है विश्व ॥
१५) लोकायतिकों का जीवन-दर्शन—
'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?'
१६) पुनर्जन्म एवं कर्म फल का भोग—'पुनरागमनं कुतः?' ॥
मीमांसा का सोपाधि आत्मवाद—कुमारिलभट्ट—'आत्मा' ज्ञान का कर्ता एवं
ज्ञान का विषय दोनों है—ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का कर्म दोनों है । प्रत्येक वस्तुज्ञान
में आत्मा का ज्ञान नहीं होता । डेकार्टें (युरोपीय दार्शनिक) ने कहा था ---- ('मैं सोचता
हूँ अत, मैं हूँ') किन्तु कुमारिल मानते हैं समस्त मननात्मक ज्ञानों में आत्म-संवित्ति
नहीं है ।
न्याय-वैशेषिक—आत्मा में क्रिया नहीं है । (प्रभाकर का भी यही मत है ।)
भाट्ट मीमांसक—आत्मा में क्रिया है । कर्म के दो प्रकार हैं—१. स्पन्द २.
परिणाम । 'स्पन्द' (स्थान परिवर्तन) आत्मा में नहीं होता किन्तु परिणाम (रूप परिवर्तन)
होता है । परिणामी वस्तु भी नित्य है (कुमारिलभट्ट) ॥ आत्मा परिणामी है तथापि

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१०४ स्पन्दकारिका
नित्य है। आत्मा में दो अंश है—१. चिदंश २. अचिदंश। चिदंश—आत्मा द्वारा
प्रत्येक ज्ञान की अनुभूति क्षमता।
अचिदंश—परिणमन, परिणाम।
न्याय वैशेषिक—सुख, दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि आत्मा के विशेष गुण हैं—।
भाट्टमत—सुख दुःख आदि आत्मा के अचिदंश के परिणाम है। 'वेदान्त' 'स्पन्द',
'प्रत्यभिज्ञा' एवं 'क्रम' = आत्मा चैतन्यस्वरूप है॥
कुमारिलभट्ट = आत्मा चैतन्यस्वरूप नहीं प्रत्युत् चैतन्य विशिष्ट है।
आत्मा में चैतन्य आता कहाँ से है? शरीर-विषय-संयोग के द्वारा। आत्मा में
'चैतन्य समवादी धर्म के रूप में स्थित नहीं है—शरीर-विषय का संयोग होने पर आत्मा
में चैतन्य का उदय होता है। स्वप्नावस्था में शरीर-विषय-संयोग नहीं अतः आत्मा
में चैतन्य भी नहीं रहता। 'आत्मा' जड एवं बोधात्मक दोनों हैं।
प्रभाकर—आत्मा में क्रियाशक्ति-क्रियावत्ता नहीं है। कुमारिल = प्रत्येक वस्तु
ज्ञान में आत्मा का ज्ञान नहीं होता। आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं कर्म दोनों है।
'प्रभाकर'—एक ही वस्तु एक साथ कर्ता एवं कर्म दोनों एक साथ कैसे हो सकती है?
प्रत्येक वस्तु ज्ञान में उसी ज्ञान के द्वारा आत्मा का ज्ञान भी कर्ता के रूप में प्रकाशित
होता है। 'मैं लिख रहा हूँ' वाक्य में क्रिया के कर्ता के रूप में आत्मा ही प्रकट हो रही
है। कुमारिल—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का विषय दोनों है। प्रभाकर = आत्मा
को 'अहं' पद के ज्ञात (अहं प्रत्यय वेद्य) मानते हैं। प्रत्येक ज्ञान का कर्ता आत्मा है।
कुमारिल = प्रभाकर का मत ठीक नहीं। आत्मा ज्ञान का कर्ता, ज्ञान का विषय
दोनों है।
'आत्मानं विद्धि' में—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं विषय दोनों है अतः कुमारिल का
ही मत यथार्थ है न कि प्रभाकर का।
कुमारिल—आत्मा का ज्ञान कैसे प्राप्य? (क) प्रत्येक वस्तुज्ञान में तो आत्मा का
ज्ञान नहीं होता (ख) आत्मसंवित्ति में ही आत्मा का ज्ञान होता है।
'मैं अपने को जानता हूँ, वाक्य में क्रिया का कर्म क्या है? 'अपने को'।
'जानता हूँ' क्या है? क्रिया। 'आत्मा को' पद संकेतित करता है कि आत्मा का ज्ञान
प्राप्त हो रहा है अतः कर्ता एवं कर्म दोनों आत्मा में स्थित है।
मीमांसक मानते हैं कि कोई भी ज्ञान क्यों न हो उसके साथ कोई न कोई
विशेषता (उपाधि) संलग्न रहती है। 'रजत' के ज्ञान के साथ रजतत्त्व की उपाधि संलग्न
है। 'अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः' (स्पन्द का०४) में सुखत्व-दुःखत्व की
उपाधियों के द्वारा किसी आत्मा के अस्तित्व का अनुमान लगता है। मैं 'अहं सुखी च
दुःखी च' के परामर्शों में दो अनुभव स्थित है—१. 'अहं' २. 'सुखी च दुखी च' सुख,
दुःख की अनुभूति गुण रूप उपाधियाँ हैं। इनकी प्रतीति जिससे होती है वह है 'अहं'।
'अहं' = सुखदुःख उपाधि से विशिष्ट आत्मा।

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प्रथमः निष्यन्दः १०५
सारांश— १. प्रत्येक ज्ञान के साथ कोई न कोई वैशिष्ट्य रहता ही है । रजत का
ज्ञान होता है क्योंकि उसके साथ रजतत्व का वैशिष्ट्य है । किसी भी विशेषता या उपाधि
का सम्बन्ध हुए बिना कोई ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । ‘मैं सुखी हूँ’ वाक्य में
सुखत्व उपाधि (विशेषता) है जिससे कि सुख का ज्ञान संभव हो पाता है । सुख
‘सुखत्व’ गुण है । गुण के बिना गुणी, धर्म के बिना धर्मी, विशेषण के बिना विशेष्य का
अस्तित्व नहीं है । इस गुण, धर्म, विशेषण या वैशिष्ट्य का संवेदक ही ‘आत्मा’ है ।
‘सुखादिक गुणों का अनुभव बिना किसी अनुभविता के संभव नहीं है अतः ‘सुखादि
चेत्यमानं हि क्वतन्त्र नानुभूयते ।’ (ई०प्र०वि०)
आत्मा के चिदंश के द्वारा आत्मा ज्ञान का अनुभव करता है । आत्मा अचिदंश
के द्वारा सुखत्व आदि उपाधियों (विशेषताओं) को प्राप्त करता है । आत्मा सुख-दुख-
हर्ष-ग्लानि-भय-इच्छा-ईर्ष्या द्रोह-मोह-असूया से तद्रूप या तत्स्वरूप नहीं है प्रत्युत्
तद्विशिष्ट हैं । वह आत्मा सुख, दुःख, भय, प्रेम आदि के द्वारा परिणाम-भाव प्राप्त
करती है । **कुमारिलभट्ट—**आत्मा स्वयं चेतन नहीं प्रत्युत् शरीर और विषय के साथ
संयोग होने की अवस्था में ‘चैतन्यविशिष्ट’ बन जाती है । इसीलिए स्वप्नावस्था में
विषयादिक का सम्बन्ध च्युत हो जाने पर, आत्मा में चैतन्य नहीं रहता । अतः आत्मा
जड़ भी है और बोधात्मक भी है—
१. ‘इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥
२. ‘स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः ॥
३. चिदंशत्वेन दृष्टत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा ।
विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञान सुखादिरूपेण ॥
परिणामित्वम् ।। (अद्वैत ब्रह्मसिद्धिः) ॥
बौद्ध दृष्टि की पर्यालोचना—
‘मैं’ की अनुभूति से (संवेदन द्वारा) अनुमान के विषयीभूत और सुख-दुःख आदि
उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही ‘आत्मा’ है ।
१. बौद्धों का दर्शन प्रकृति के बुद्धितत्त्व (विज्ञान-चित्त) तक ही सीमित हो जाता
है—उसके परे आगे बढ़ ही नहीं पाता ।
२. यदि ज्ञान जड़ है तो किसी संवेदन को प्रकाश में कैसे ला सकता है?
३. यदि ज्ञान चेतन है तो किसी चेतन सत्ता को मानना पड़ेगा ।
४. अपने को एवं विषय को प्रकाशित करना तो केवल चेतन सत्ता के ही
अधिकार मात्र में है जड़तत्त्व के अधिकार में नहीं किंतु बौद्ध ऐसी चेतन सत्ता (आत्मा)
स्वीकार ही नहीं करते । ‘ज्ञान सन्तान एव सत्त्वम्’ इति सौगता बुद्धि वृत्तिषु एव पर्य-
वसिताः ।।' (प्र०ह० सूत्र ८ की व्याख्या—क्षेमराज)—ज्ञान-सन्तान तो बुद्धि में पर्य-
वसित है फिर बुद्ध्यातीत तत्त्व की प्राप्ति कैसे होगी? ज्ञान वेद्य तो बन सकते हैं किन्तु