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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 193

९२ स्पन्दकारिका
'अनुभविता' 'उपलब्धा' अविच्छिन्न संवित् तत्त्व तो अनेक धरातलों पर भिन्न-भिन्न
दिखाई पड़ता है फिर उसकी अभिन्नता सिद्ध कैसे की जा सकती है? विवृत्तिकार पूर्वपक्ष
प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि अनुभविता इन अवस्थाओं में तो इन निम्न प्रकार के
प्रत्ययों से घिरा रहता है—
१. 'मैं मनुष्य हूँ' मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्त हूँ, मैं युवक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मैं कृश हूँ,
मैं स्थूल हूँ—इत्यादि। ये सभी प्रत्यय देहालम्बन हैं।
२. 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि। ये प्रत्यय बुद्ध्यालम्बन हैं।१
३. 'मैं बुभुक्षित हूँ, मैं पिपासु हूँ',—इत्यादि। ये प्रत्यय प्राणालम्बन हैं।२
४. 'मैं कुछ भी नहीं जानता'—इस प्रकार के शून्यता प्रमाता के प्रत्यय हैं। ये
प्रत्यवमर्शप्रत्येय सुषुप्तादि अवस्थाओं से प्रतिबुद्ध प्रमाता के प्रत्यय शून्यालम्बन हैं।३
और देह, बुद्धि, प्राण आदि तो अनित्य हैं और इनसे सम्बद्ध आलम्बन भी अनित्य हैं।
फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उपलब्धता, अनुभविता, एकात्मप्रत्ययसार, अद्वैत
एवं अभेद कहा जाने वाला आत्मतत्त्व स्वभाव से निर्वर्तित नहीं होता?—
इसी प्रश्न के उत्तर में कारिकाकार ने चौथी कारिका—'अहं सुखी च दुःखी च
रक्तश्चेत्यादिसंविदः' कही है।४
उत्पलदेवाचार्य कहते हैं कि—किसी-किसी का यह कथन है कि अवस्थायें तो
विश्वान्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता तो विश्वान्तर्गत नहीं है अतः अवस्थाओं को भी स्वभाव
से अभिन्न कैसे कहा जा सकता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि युक्तियों से इसका समाधान करने
हेतु कारिकाकार यह चौथी कारिका प्रस्तुत करते हैं—
'अवस्था एव विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः ।
प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥'५
'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं रागी हूँ'—आदि प्रत्यय एवं अनुभव, संवेदन मात्र
अवस्थायें हैं। वे भिन्न-भिन्न संवेदनों से पृथक् संवेत्ता या अवस्थाता (सुख दुःखादि के
उपलब्धा) में उपराग रूप से सुस्पष्ट रूप में अवस्थित है। किन्तु ध्यातव्य यह है कि
संवेत्ता के बिना भिन्न-भिन्न संवेदनों की सिद्धि कभी हो ही नहीं सकती—'संवेत्तारं विना
संवेदनस्याभावात्' ।६
(क) क्षणिकज्ञानवादियों का खण्डन—क्षणिकज्ञान वादियों के मत में अनेक
नदियाँ समुद्र में मिलकर तादात्म्य के कारण एक जान पड़ती हैं किन्तु यह संवेत्ता केवल
अवस्थाओं का तादात्म्य नहीं है—
नद्योऽब्धाविव तादात्म्यं प्रतप्रतिष्ठाः प्रयान्ति वा।
क्षणिकज्ञानिनां ह्येव न तु ता एव केवलाः ॥
१-३. स्पन्दकारिकाविवृति । ४. स्पन्दकारिकाविवृति ।
५-६. स्पन्दप्रदीपिका ।