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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 201 of 519

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Page 201

१०० स्पन्दकारिका
इस प्रकार—सुखी दुःखी होने की अनुभूति के उपर्युक्त दो अर्थ हैं 'द्वौ अर्थौ
स्फुरतः।'
३. 'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु' ।१
'स्पन्दशास्त्र' की मान्यता है कि—'जाग्रत,' 'स्वप्न', 'सुषुप्ति' आदि अवस्थाओं
में एक ही अवस्थाता अवस्थित रहता है। अवस्थायें भिन्न हैं किन्तु अवस्थाता अभिन्नतया
एक है। भट्टकल्लट कहते हैं—'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—'जो मैं पहले सुखी था
वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति के रूप में
एक ही वेदक अवस्थित रहता है जो सभी अवस्थाओं में अभिन्न एवं एक है।
'अन्यत्र'—जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति से अतिरिक्त।
'स चानुस्यूत एवं सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी,
रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन, अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः .... स
स्वभावः परः स्मृतः।'
स्पन्दात्म 'स्वभाव' समस्त अवस्थाओं में अवस्थित रहता है। मैं जो पहले सुखी
था वही अब दुःखी या अनुरक्त हूँ—इत्याकारक अनुभवों में 'अहं प्रतीति' के रूप में एक
ही अनुभविता का अवस्थान रहता है। कहा भी गया है—
'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एवं उत्कृष्ट कहा गया है।'
'क्षणवाद'—
बौद्धदार्शनिकों का विज्ञानवाद—ज्ञान क्षणिक है। एक ज्ञान केवल तीन क्षण
तक स्थायी रहते हैं। इसके उपरान्त उनका समय, विषय एवं आकार-प्रकार परिवर्तित
हो जाता है। इन ज्ञानों में समानता या एकरूपत्व प्रतीत होता है। उसका कारण यह है
कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तरवर्ती ज्ञान क्षणों का आविर्भाव करते हैं। संस्कारों
का स्वभाव ही स्थितिसंस्थापकता है। इसी का परिणाम है कि प्राथमिक ज्ञानक्षणों के
संस्कार परवर्ती ज्ञान क्षणों को पूर्ववर्ती ज्ञानक्षणों के गुण, धर्म, आकार-प्रकार प्रदान
करके उन्हें तद्रूप बना देते हैं। ज्ञान क्षणिक है। उनमें एकरूपता का कारण संस्कार
प्रवाहों की अविरल श्रृंखला है। 'ज्ञान' स्वयं प्रकाश है उन्हें अपने प्रकाशन के लिए
अन्यापेक्षा नहीं है। 'ज्ञान' एक प्रकारक ही नहीं प्रमाता (ज्ञानक्षणस्वरूप प्रमाता) भिन्न है
अतः ज्ञान एवं ज्ञान प्रवाह (विज्ञान) भी भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक ज्ञानक्षण स्वयंप्रकाश है
अतः स्वभावभूत विश्वात्मा (स्पन्द = चैतन्य) आवश्यक नहीं है।
ज्ञान के दो प्रकार हैं—
१. प्राथमिक ज्ञान = 'निर्विकल्प ज्ञान'—इसके संस्कार—२. सविकल्पात्मक
(द्वितीय) ज्ञान—(पूर्वानुभूत) नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्धस्थापन । 'विकल्प'
नामरूपात्मक हैं।
१. स्पन्दकारिकाविवृति ।