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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 197 of 519

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Page 197

९६ स्पन्दकारिका
अविच्छिन्न रूप में सदा निर्मल रहा करता है। श्वेत वस्त्र पर कोई रंग चढ़ा, उतर गया
दूसरा चढ़ा और पुनः उतर गया । श्वेत वस्त्र ज्यों का त्यों रह जाता है। इसी प्रकार
शुद्ध चेतन तत्तत् आकारों के राग से तत्तदाकार दिखाई तो पड़ता है किन्तु वस्तुतः रहता
शुद्ध ही है । नील, पीत, सुख दुःख—सभी में चित् स्वरूप अखण्डित ही रहता है ।
चित्र-विचित्र उपाधि सम्पदा से विकल्प उसे विशिष्ट-विशिष्ट दिखाई देता है—१
सदैव शुद्धोऽनुभवो यं प्रत्याकारकर्बुरः ।
आकारान्तरसंचारकाले तस्यापि निर्मलः ॥
यथा जात्या सितं वस्त्रं रक्तं रागेण केनचित् ।
तत्पदप्राप्त शुक्लत्वं पुन रागान्तरं श्रयेत् ॥
एवं शुद्धा चितिर्जात्या यदाकारोपरागिणी ।
तत्त्यागापरसंचारमध्ये शुद्धैव तिष्ठति ॥२
नीले पीते सुखे दुःखे चित्स्वरूपमखण्डितम् ।
विशिनष्टि विकल्पस्तच्चित्रयोपाधिसम्पदा ॥३
आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं 'अहं सुखी इत्यादयो याः
संविदः ता अन्यत्र वर्तन्ते' ततः असौ स्वभावात् एकस्मात् न निवर्तते ॥४
अर्थात् 'मैं सुखी हूँ'—आदि जो ज्ञान है वह अन्यत्र रहा करता है अतः आत्मतत्त्व
अपने एकात्मक स्वभाव से कभी निर्वर्तित नहीं हुआ करता ।
'मैं सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ'—आदि संवेदन अन्तरंग है और वे बुद्धि पर
अवलम्बित हैं । अन्य संवेदन देहादिक पर अवलम्बित हैं । उनका अपना सीधा सम्बन्ध
उन्हीं से है—आत्मतत्त्व से नहीं ।
'अन्यत्र'—अन्य जगह, अर्थात् शरीर, इन्द्रियमान, बुद्धि आदि जगहों में ।
'वर्तन्ते' स्थित हैं ।
'स्फुटम्'—यह बात सुस्पष्ट हैं या 'स्पष्टतया'। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा
हूँ, मैं प्यासा हूँ'—इत्यादि संविद—आत्मा में नहीं प्रत्युत् अन्यत्र बुद्धि, शरीर एवं प्राण
आदि में रहते हैं तथापि सुखादिक से पृथक् उपलब्धि में भी अभेदात्मना रहते हैं—जैसे
कि नदियाँ समुद्र में—'सरितः सागरे इव तत्र विगलितान्योन्यभेदा ऐक्येन अवतिष्ठन्ते,
तादात्म्यं आपद्यन्ते ।'५
'स्फुटम्' = स्वानुभवसंवेद्य होने के कारण सुप्रकट ही हैं ।६
'संविदः' शब्द का (बहुवचनान्त) प्रयोग क्यों किया गया ? कारण यह है
कि—एक ही उपलब्धिरूप संवित् 'अहमोऽस्मि' के रूप में पारमार्थिकी स्फुरण से भी
संवलित होता है और वही माया शक्तिजनित एवं तथाविध स्वभाव-परामर्श के अभाव के
कारण अनित्य सुखदुःखादि का वेदक होने के कारण—'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ—
१-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४. स्पन्दकारिकाविवृति ।
५-६. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।