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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 198

प्रथमः निष्यन्दः ९७
इत्यादि संवेदन द्वारा बुद्धि आदि अवस्थाओं के साथ सामानाधिकरण्य स्थापित कर लेने
के कारण अनेक संवेदनों के मध्य विचरण करता है अतः कारिकाकार ने 'संविदः'
(बहुवचनान्त) शब्द का प्रयोग किया है।
आचार्य रामकण्ठ ठीक ही कहते हैं कि यदि सुखादिक वेद्य वस्तु के संबन्ध के
कारण संवित् भी सुखादिवत् विभिन्नरूपों वाला बन जाता तो स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञानुसंधान
न हो पाता। ऐसा न होने पर समस्त व्यवहारोच्छेद हो जाता किन्तु यह स्थिति तो
अभीष्ट है नहीं।
कारिकाकार 'अन्यत्र' शब्द के पूर्व 'एताः संविदः' विशेषण का प्रयोग करते हैं।
ये संवेदन (ज्ञान) किस स्वरूप वाले 'अन्यत्र' में रहते हैं? ये 'सुखाद्यवस्था' में अनुस्यूत
रूप वाले अन्यत्र' में रहते हैं। अर्थात् समस्त सुख-दुःख-मोहरूप विशिष्ट अवस्थाओं में
उत्पादविनाशधर्मक होने के कारण अनित्य दशाओं में, वेद्यत्व के सामान्य होने के कारण
शब्दादिविषय समानवृत्तियों में एवं 'अहमोऽस्मि' अनुभूति के ज्ञान से संवलित उपलब्धा
के भीतर विद्यमान रहते हैं। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इन प्रत्ययों में दो अर्थ स्फुरित
होते हैं—
१. सुखाद्यात्मा वेद्यरूप एवं
२. अहमिति अपर वेदक रूप
'वेद्यत्वरूप'—घटादिक अनित्य पदार्थों के नानात्व को द्योतित करने वाला।
'वेदकरूप' = पूर्वापरावस्था में व्यापक होने के कारण समस्त प्रमातृ प्रसिद्ध,
समस्त व्यवहारों के कारणों के अनुसंधानक, नित्य स्थित एवं उपलब्ध रूप एकात्मक
संवित् तत्त्व।
अवस्थायें जाग्रदादि भेदों के कारण अनेक हैं किन्तु संवित् तत्त्व उसमें संचरण
करने पर भी अभिन्नलक्षण एवं एक रूप वाला ही रहता है। 'मैं सुखी हूँ' एवं 'मैं दुःखी
हूँ' ये दोनों अवस्थायें भिन्न-भिन्न हैं। एक ही संवेत्ता दोनों अवस्थाओं का संवेदन करता
है किन्तु उसके स्वरूप में एकानुसंधातृनिबद्धावस्था होने के कारण एक से अधिक न होने
की अभिन्नता (एकता) बनी रहती है। वह नित्य निरावरणा रूप होने के कारण सर्वत्र
अनिरुद्ध, स्वयंसिद्ध एवं तात्त्विक स्वभाव में मात्र शङ्कर है और वही समस्त अवस्थाओं
में अनुस्यूत है—'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु।' उनको 'पर स्वभाव' कहा गया
है—'स स्वभावः परः स्मृतः ॥'
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि चौथी कारिका सौगतों के सिद्धान्त का खण्डन
करने के उद्देश्य से कही गई है। सौगत तर्क की शक्ति पर, ज्ञान के सातत्य में विश्वास
रखते हैं।१
'ये सभी सुख-दुःख एक ही चेतना के विविध रूप हैं तथापि ये विभिन्न रूपों एवं
विभिन्न आकारों में स्थित हैं' मीमांसक कहते हैं—'यह सभी कुछ आत्मा ही है जो कि
१. स्पन्दनिर्णय।
स्पं० ७