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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

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DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

८६ स्पन्दकारिका
कारिकाकार इसके उत्तर में कहते हैं कि—
(१) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि विभिन्न अवस्थाओं में भी भेद-विमुक्त सत्ता
समान रूप से वेदक (प्रमाता) के रूप में अवस्थित रहता है।
(२) इन विभिन्न अवस्थाओं के प्रसरण के समय भी वह सत्ता अपने अनुभूत्या-
त्मक (अनुभविता) स्वभाव से च्युत नहीं होता।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—
‘जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्मात् उपलब्धृरूपत्वं
त्रिष्वपि पदेषु साधारणाम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च पञ्चसु
स्कन्धेषु ॥’
सारांश = १. जाग्रत आदि भेदों के अस्तित्व का भान होने एवं उनका विस्तार
(प्रसार) होने पर भी अनुभविता के स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं आती। अवस्थायें
भिन्न-भिन्न हो सकती हैं किन्तु उन भिन्नताओं के अनुभव होते रहने पर भी अनु-
भविता भिन्न-भिन्न नहीं हो जाता प्रत्युत् एक ही रहता है। उसका स्वरूप आवृत्त नहीं हो
जाता।
२. अनुभविता के स्वरूप में उसी प्रकार कोई भेद या भिन्नता नहीं आ पाती जैसे
कि विष के बीज में उत्पन्न मूल, शाखा, पत्र, फूल एवं फल आदि में व्याप्त विष एवं
विष के बीज में व्याप्त विष में कोई भेद नहीं होता।
३. प्रमाता की विभिन्न अवस्थायें निम्नांकित हैं—
‘जाग्रत स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम्।
इति पञ्च पदान्याहुः ... ... ... ... ... ॥’ (तं० १०.२२८)
‘तदभिन्ने प्रसर्पति’—। जाग्रत आदि भेदसमन्वित अवस्थायें भेदशून्य ‘तत्त्व’
से अभिन्न है किन्तु वह ‘तत्त्व’ भेद कल्पना द्वारा (लीला रूप में) भेदों को प्रस्तुत
करता है।
‘तदभिन्ने’ = जाग्रदादि अवस्थाओं में पारस्परिक भेद तो है किन्तु उनमें भेद-
विमुक्त परासत्ता वेदक के रूप में व्याप्त रहती है।
जाग्रदादि = जाग्रत् आदि अवस्थायें—
अवस्थायें (चेतना की अवस्थायें)—
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जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय तुरीयातीत गौण अवस्थायें
(सां०) (सां०) (सां०) │
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भ्रान्ति मद मूर्च्छा उन्माद अर्ध सुरादिक
मूर्च्छा पानजन्य