शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मोतियों की मूल्य-कल्पना | २१३ | काष्ठ आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश | २१९ |
| मोती के भेद और लक्षण | २१४ | भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश | २२० |
| सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश | ” | किसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश | ” |
| सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव | ” | क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश | ” |
| स्वर्णादि धातुओं के गुण | २१५ | व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वाँ भाग लेने का निर्देश | ” |
| धातुओं के मूल्य का प्रमाण | ” | दूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश | २२१ |
| अधिक मूल्य गौ के लक्षण | ” | राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश | ” |
| बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण | २१६ | राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश | ” |
| गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश | २२२ |
| हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | नरक के लक्षण का निर्देश | ” |
| उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश | ” | राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश | ” |
| देश-कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश | २१७ | सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश | ” |
| शुल्क के लक्षण | ” | मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश | २२३ |
| वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश | ” | जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश | ” |
| किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण | २१८ | द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश | ” |
| उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण | ” | क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश | २२४ |
| तडागादिकों से संपन्न भूमि से प्राप्त राजभाग का तारतम्य निर्देश | ” | शूद्रादि के कर्मों का निर्देश | ” |
| रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग-नियम | २१९ | ||
| तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २०वाँ भाग कर लेने का निर्देश | ” | ||
| बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश | ” |
( १७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश | २२४ | तर्क लक्षण | २२८ |
| ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश | ,, | सांख्य लक्षण | २२९ |
| द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश | ,, | वेदान्त लक्षण | ,, |
| गुरु का लक्षण | २२५ | योग लक्षण | ,, |
| मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश | ,, | इतिहास लक्षण | ,, |
| विद्या और कला के लक्षण | ,, | पुराण लक्षण | ,, |
| विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश | ,, | स्मृति लक्षण | ,, |
| वेदों के ६ अंगों का निर्देश | ,, | नास्तिक मत लक्षण | २३० |
| मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश | ,, | अर्थशास्त्र लक्षण | ,, |
| वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश | २२६ | कामशास्त्र लक्षण | ,, |
| मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण | ,, | शिल्पशास्त्र लक्षण | ,, |
| ऋग्वेद के लक्षण | ,, | अलङ्कार शास्त्र लक्षण | ,, |
| यजुर्वेद के लक्षण | ,, | काव्य लक्षण | २३१ |
| सामवेद के लक्षण | ,, | देशभाषा लक्षण | ,, |
| अथर्ववेद के लक्षण | ,, | अवसरोक्ति लक्षण | ,, |
| आयुर्वेद के लक्षण | २२७ | यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण | ,, |
| धनुर्वेद के लक्षण | ,, | देशादि धर्म लक्षण | ,, |
| गान्धर्ववेद के लक्षण | ,, | गान्धर्व वेदोक्त ७ कलायें | २३२ |
| तन्त्र या आगम के लक्षण | ,, | आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण | ,, |
| शिक्षा के लक्षण | ,, | धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण | २३३ |
| कल्प के लक्षण व भेद | ,, | पृथक् ४ कलाओं के लक्षण | २३४ |
| व्याकरण के लक्षण | २२८ | तडागकूपादि कलाओं के लक्षण | ,, |
| निरुक्त के लक्षण | ,, | ४ आश्रमों का नाम निर्देश | २३७ |
| ज्योतिष लक्षण | ,, | ४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश | ,, |
| छन्द लक्षण | ,, | स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश | २३८ |
| मीमांसा लक्षण | ,, | स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध | ,, |
| स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश | ,, | ||
| साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश | २४० | ||
| यथोक्त पतिसेवा से पतिलोक जाने का निर्देश | ,, |
२ शु० सूची
( १८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश | २४० | जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गृह के गृह बनाने के स्थान का निर्देश | २४७ |
| रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश | २४१ | ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश | ,, |
| पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश | ,, | मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश | ,, |
| पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध | २४२ | मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश | २४८ |
| शूद्र धर्म का निर्देश | ” | ध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश | ,, |
| संकर जाति के नियम का निर्देश | ” | बालु से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश | ,, |
| राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश | २४३ | शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल | ,, |
| मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश | २४४ | देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश | ,, |
| दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश | ,, | सात्त्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश | २४९ |
| वृक्षारोपण और पोषण के नियम | ,, | सात्त्विकी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश | ,, | राजसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश | २४५ | तामसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश | ,, | अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश | २५० |
| वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय | ,, | वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण | ,, |
| वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय | ,, | स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| आरण्य-वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश | ,, | नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश | २४६ | ||
| देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश | ,, |
( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊँचाई के प्रमाण | २५० | अनेक भुजाओं की व्यवस्था | २५८ |
| असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, | ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था | २५९ |
| बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | २५१ | हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार | ,, |
| सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद | ,, | अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश | ,, | सौख्य दायक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| रम्य प्रतिमा के लक्षण | २५३ | सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन | २६० |
| रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर | ,, | लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | ,, |
| मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर | ,, | प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | २६१ |
| अवयवों की आकृति का वर्णन | ,, | युगभेद से वर्णभेद का कथन | ,, |
| अवयवों के अन्तर का प्रमाण | २५४ | वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश | ,, |
| अवयवों की परिधि का प्रमाण | २५५ | युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश | ,, |
| प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण | २५६ | अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध | ,, |
| प्रतिमा के आसन का प्रमाण | २५७ | भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश | २६२ |
| योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण | ,, | वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश | ,, |
| देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण | ,, | गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण | २६३ |
| मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश | ,, | स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण | २६५ |
| प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश | ,, | सर्वों के मुख का प्रमाण | ,, |
| मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश | ,, | बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार | २५८ | शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण | २६६ |
| प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार | ,, | सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश | ,, | आसुरी आदि मूर्त्तियों के लक्षण | २६७ |
( २७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शिल्पी को कभी मूर्तियों की वृद्ध-सदृश कल्पना न करने का निर्देश | २६८ | यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण | २७३ |
| राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश | ” | सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश | ” |
| मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध | ” | सभा में जाने का नियम | ” |
| प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालन करने का निर्देश | ” | सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश | ” |
| राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश | २६९ | निर्णयकों का तारतम्य | ” |
| शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण | ” | निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण | २७४ |
| शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण | ” | धर्म का लक्षण | ” |
| व्यवहार-लक्षण | ” | अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश | ” |
| राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश | ” | दश साधनों का निर्देश | ” |
| पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश | २७० | यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश | २७५ |
| राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश | ” | दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश | ” |
| स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश | ” | गणक तथा लेखक के लक्षण | ” |
| ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश | २७१ | धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश | ” |
| सभासद के लक्षण | ” | राजसभा में प्रवेश करने का प्रकार | २७६ |
| राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण | ” | सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश | ” |
| राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश | २७२ | राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश | ” |
| देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश | ” | ||
| देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश | ” | ||
| कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश | २७७ | ||
| न्यायादिकों के समय का निर्देश | ” | ||
| मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश | ” |
( २१ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश | २७८ | पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश | २८३ |
| अर्थी के लिए राजा के कार्यों का निर्देश | ,, | जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश | २८४ |
| लेखक के कृत्यों का वर्णन | ,, | ४ प्रकार के आसेधों का वर्णन | ,, |
| राजा को अन्यथा लेख लिखने वाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश | ,, |
| राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश | २७९ | अपराधियों को बुलाने के लिये असमर्थादि भृत्यों को न बुलाने का निर्देश | २८५ |
| प्राड्विवाक शब्द के अर्थ का निर्देश | ,, | हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश | ,, |
| व्यवहार पद का कथन | ,, | निर्वैष्टुकाम (विवाहोद्यत) आदि को आसेध (बुलाने) का निषेध | ,, |
| राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध | ,, | आने में असमर्थ लोगों को सवारी से बुलवाने का निर्देश | २८६ |
| राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश | २८० | अर्थी-प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश | ,, |
| स्तोभक के लक्षण | ,, | अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक-ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश | ,, |
| सूचक के लक्षण | ,, | जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश | २८७ |
| पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन | २८१ | नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति (फीस) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करने वाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, |
| दश अपराधों का वर्णन | २८२ | ||
| राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन | ,, | ||
| दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश | ,, | ||
| आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश | २८३ | ||
| पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश | ,, |
( २२ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश | २८७ | असंदिग्ध उत्तर के लक्षण | २९१ |
| संदिग्ध उत्तर के लक्षण | " | ||
| दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण | " | ||
| ४ प्रकार के उत्तर | २९२ | ||
| सत्योत्तर के लक्षण | " | ||
| मिथ्योत्तर के लक्षण | " | ||
| कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश | २८८ | मिथ्योत्तर के ४ प्रकार | " |
| प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण | " | ||
| विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश | " | प्राङ्न्याय के लक्षण | २९३ |
| प्राङ्न्याय के ३ प्रकार | " | ||
| अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश | " | व्यवहार के ४ पाद | " |
| प्रथम निर्णय के योग्य न्याय वा विवाद का निर्देश | " | ||
| प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश | " | एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश | २९४ |
| विवाद के साधनों की जांच कर लेने का निर्देश | २८९ | साधन के भेद | " |
| पक्ष के लक्षण | " | तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण | २९५ |
| भाषा (अर्जीदावा) के दोषों का निर्देश | " | विवादी को अपने-अपने साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश | " |
| पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश | २९० | जो दोष गुप्त हों उनको सभासद प्रकट करें, इसका निर्देश | " |
| अप्रसिद्ध के लक्षण | " | कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश | २९६ |
| निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | लिखित के दो प्रकारों का निर्देश | " |
| असाध्य या विरुद्ध के लक्षण | " | लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश | " |
| निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | राजशासन के ३ प्रकार | " |
| दण्डनीय वादी के लक्षण | २९१ | साधनक्षम लेख्य के लक्षण | २९७ |
| उत्तर लेखन का निर्देश | " | साधनायोग्य लेख्य के लक्षण | २९८ |
| अच्छे लेख से फल का निर्देश | " |
( २३ )
| साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश | २९८ | ६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश | ३०४ |
| साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय | २९९ | आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश | ३०५ |
| बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश | ,, | उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश | ,, |
| साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश | ३०० | अब दिव्य कहने का निर्देश | ,, |
| प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश | ,, | त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश | ,, |
| दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण | ,, | युक्ति के लक्षण | ,, |
| एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश | ,, | कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण | ,, |
| साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश | ३०१ | धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण | ३०६ |
| लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश | ३०२ | जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश | ,, |
| कुशलों और कुटिलों द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश | ३०३ | दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश | ,, |
| केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश | ,, | दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश | ,, |
| केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश | ,, | दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश | ३०७ |
| अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश | ,, | शर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| प्रामाणिक भोग के लक्षण | ,, | जल दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश | ३०४ | धर्माधर्म मूर्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश | ३०८ |
| केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश | ,, | शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश | ,, | ||
| दिव्य के निषेध का निर्देश | ३०९ |
( २४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश | ३०९ | धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदोंके अधीन होने का निर्देश | ३१३ |
| तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश | ,, | दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश | ,, |
| वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश | ३१० | पौनर्भव विधि के लक्षण | ३१४ |
| भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश | ,, | मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश | ,, |
| लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश | ,, | जयी के लक्षणों का निर्देश | ,, |
| साक्षी के भेदनको प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश | ३११ | जयी को जयपत्र देने का निर्देश | ,, |
| विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश | ,, | प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश | ३१५ |
| द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोगको ही प्रमाण मानने का निर्देश | ,, | जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, |
| मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश | ,, | पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश | ,, |
| ६ प्रकार के निर्णय का निर्देश | ३१२ | पिता की सभी पत्नियोंमें मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश | ,, |
| सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश | ,, | स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय | ,, |
| धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश | ,, | स्वामित्व का निर्णय | ३१६ |
| विवाद होने के कारणों का निर्देश | ,, | विभाग-विचार | ३१७ |
| अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश | ३१३ | अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश | ,, |
| सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश | ,, | ||
| सौदायिक धन के लक्षण | ३१८ | ||
| अविभाज्य धन के लक्षण | ,, |
( २५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवां भाग प्राप्त करने का निर्देश | ३१८ | स्वर्णकार की भृति का विचार | ३२२ |
| शिल्पी के लक्षण | ,, | धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश | ३२३ |
| नर्त्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश | ३१९ | दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण | ३२४ |
| चोरों का धनविभागविषयक निर्देश | ,, | पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण | ,, |
| व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश | ,, | वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण | ,, |
| आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश | ,, | जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण | ,, |
| उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश | ३२० | सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण | ,, |
| अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश | ,, | ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश | ,, |
| त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण | ,, | सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश | ३२५ |
| राजा को १२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश | ,, | आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश | ,, |
| व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश | ,, | अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण | ,, |
| मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश | ३२१ | युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश | ३२६ |
| लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश | ,, | सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण | ३२७ |
| खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | सेना के भेदों का वर्णन | ,, |
| शिल्पियों की भृति का विचार | ३२२ | स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण | ,, |
| सैन्य के प्रभाव का निर्देश | ,, | ||
| ६ प्रकार के बलों का निर्देश | ३२८ | ||
| २ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश | ,, | ||
| मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण | ,, | ||
| सार-असार तथा शिक्षित-अशिक्षित सेनाओं के लक्षण | ३२९ | ||
| गुल्मीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण | ,, |
( २६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण | ३२९ | घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल | ३३८ |
| शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण | ” | अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश | ” |
| सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय | ” | भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद | ” |
| शौर्यबल बढ़ाने के उपाय | ३३० | शुभ भौंरी के लक्षण | ” |
| सेनाबल, आत्मिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय | ” | भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता | ३३९ |
| आयुर्बल के लक्षण | ” | भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमता | ” |
| सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम | ” | 'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण | ३३१ | 'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| राजा के रथ का वर्णन | ” | अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण | ” |
| अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण | ३३२ | अन्य भौंरियों से युक्त अश्वों के लक्षण | ” |
| हाथी के ४ प्रकार | ” | यशोवर्द्धक तथा 'सव्यं' संज्ञक अश्व के लक्षण | ३४० |
| भद्रगज के लक्षण | ” | शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण | ” |
| मन्द्रगज के लक्षण | ” | इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| मृगगज के लक्षण | ” | विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| मिश्रगज के लक्षण | ३३३ | पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण | ” | भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| भद्रगज के शरीर का मान | ” | चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ३४१ |
| मन्द्र तथा मृग गज का मान | ” | ||
| उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण | ” | ||
| उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण | ” | ||
| नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना | ३३४ | ||
| अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण | ” | ||
| उत्तम अश्व के अन्य लक्षण | ३३८ | ||
| अश्व के भौंरी के दो भेद | ” |
( २७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ३४१ | अश्वों के कुठारवादि दोष उत्पन्न होने के कारण | ३४५ |
| अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण | ,, | घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश | ,, |
| धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ,, | घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण | ,, |
| कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ,, | अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश | ३४६ |
| घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल | ,, | अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट | ,, |
| भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश | ३४२ | उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण | ,, |
| आवर्त्त भौरियोंके शुभप्रद स्थानों का निर्देश | ,, | उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश | ३४७ |
| सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश | ,, | ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश | ,, |
| शुभाशुभ फलप्रद भौंरो के स्थानों का निर्देश | ,, | वर्षर्तु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध | ,, |
| एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ३४३ | उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश | ,, |
| कीलोत्पाटी व मध्यम आवर्त्तों के लक्षण व फल | ,, | थके हुए अश्व को धीरे-धीरे चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश | ,, |
| पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल | ,, | मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश | ३४८ |
| श्यामकणं अश्व के लक्षण | ,, | मार्ग से चलकर आये हुए घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश | ,, |
| जयमङ्गल अश्व के लक्षण | ३४४ | पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश | ,, |
| निन्दित अश्व के लक्षण | ,, | घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश | ,, |
| अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण | ,, | घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल | ,, |
| निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण | ,, | ||
| स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश | ३४५ | ||
| आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण | ,, |
( २८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष | ३४८ | मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश | ३५३ |
| घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश | ३४९ | बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल | ,, |
| घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश | ,, | राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश | ३५४ |
| धारा गति के लक्षण | ,, | बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य | ,, |
| आस्कन्दित गति के लक्षण | ,, | राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध | ,, |
| रेचित गति के लक्षण | ,, | युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश | ,, |
| प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण | ,, | संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश | ,, |
| वल्गित गति के लक्षण | ,, | सन्नद्ध सेना का माहात्म्य | ३५५ |
| बैल के मुखादि का प्रमाण | ३५० | मौल सेना की प्रशंसा | ,, |
| पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण | ,, | सेना में अवश्य भेद होने के कारण | ,, |
| श्रेष्ठ बैल के लक्षण | ,, | सेना का भेद होने से अनिष्ट फल | ,, |
| श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण | ,, | राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश | ,, |
| मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण | ,, | शत्रुओं को साधने का प्रकार | ३५६ |
| घोड़ा, बैल तथा ऊंट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण | ३५१ | शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश | ,, |
| दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश | ,, | शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश | ,, |
| दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथमादि वर्ष का ज्ञान | ,, | मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश | ,, |
| निन्दित घोड़ों के लक्षण | ३५२ | अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद | ,, |
| दांतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा | ,, | ||
| अंकुश के लक्षण | ३५३ | ||
| घोड़ों की लगाम का वर्णन | ,, | ||
| बैल व ऊंट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन | ,, |
( २६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश | ३५७ | यान तथा आसन के लक्षण | ३६३ |
| नालिक के २ प्रकारों का निर्देश | ,, | आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण | ३६४ |
| लघुनालिका (बन्दूक) के लक्षण | ,, | सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश | ,, |
| बृहन्नालिक (तोप) के लक्षण | ३५८ | उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश | ,, |
| अग्निचूर्ण (बारूद) बनाने का प्रकार | ,, | शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद | ,, |
| गोला बनाने का प्रकार | ,, | पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश | ,, |
| नालिक की व्यवस्था का निर्देश | ३५९ | सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश | ३६५ |
| बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश | ,, | विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण | ,, |
| तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति | ,, | विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश | ३६६ |
| बाण का लक्षण | ,, | बलवान् शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध | ,, |
| गदा व पट्टिश के लक्षण | ३६० | निष्पाय दशा में विग्रह करने का निर्देश | ,, |
| खड्ग-प्रासि और कुन्त (भाला) के लक्षण | ,, | यान के पांच भेद | ,, |
| चक्र और पाश के लक्षण | ,, | विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण | ३६७ |
| कवच और टोप के लक्षण | ,, | सन्धाययान के लक्षण | ,, |
| करज के लक्षण | ,, | संभूययान के लक्षण | ,, |
| युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण | ३६१ | प्रसङ्गयान के लक्षण | ,, |
| युद्ध का सामान्य लक्षण | ,, | उपेक्षाययान के लक्षण | ,, |
| युद्ध के भेद और लक्षण | ,, | रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था | ३६८ |
| युद्ध के लिये काल-विचार | ,, | नदी-पर्वतादि में भय की संभावना होने पर व्यूह बाँध कर चलने का निर्देश | ,, |
| युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण | ३६२ | मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना-स्थल का निर्देश | ,, |
| मध्यम युद्ध-देश के लक्षण | ,, | ||
| अधम युद्ध-देश के लक्षण | ,, | ||
| युद्ध के लिये सेना का विचार | ३६३ | ||
| मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश | ,, | ||
| सन्धि के लक्षण | ,, | ||
| विग्रह के लक्षण | ,, |
( ३० )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शकट, वज्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्यालव्यूहों का नाम-निर्देश | ३६८ | उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश | ३७३ |
| बाजा बजाने के ढङ्ग से संकेतों के जानने का निर्देश | ,, | उद्योग की अवश्य-कर्तव्यता का निर्देश | ,, |
| सैनिकों को संकेतज्ञान कराने का निर्देश | ३६९ | भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, |
| संकेतों के अनुसार सैनिकों को कार्य करने का निर्देश | ,, | लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश | ३७४ |
| संकेतानुसार स्थिति रखने का निर्देश | ,, | स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि | ,, |
| संकेतानुसार बाणादि चलाने आदि का निर्देश | ,, | किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का निर्देश | ,, |
| संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश | ३७० | आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश | ३७५ |
| सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश | ,, | शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध | ,, |
| अस्त्र-प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश | ,, | रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध | ,, |
| क्रौञ्चव्यूह के लक्षण | ,, | युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर सकने मे क्षत्रियों की परम कर्तव्यता का निर्देश | ,, |
| श्येनव्यूह के लक्षण | ,, | ||
| मकरव्यूह के लक्षण | ,, | ||
| सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण | ३७१ | ||
| सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण | ,, | ||
| शकट व व्यालव्यूह के लक्षण | ,, | ||
| सैन्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश | ,, | युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा | ,, |
| लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश | ,, | ||
| आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य | ,, | स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि | ,, |
| सन्धाय आसन के लक्षण | ३७२ | स्वामी के निमित्त करने का फल | ३७६ |
| आश्रय के लक्षण | ,, | युद्ध में वीरगति पाए हुए के लिये शोक करने का निषेध | ,, |
| द्वैधीभाव के लक्षण | ,, |
( ३१ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल | ३७६ | शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश | ३७९ |
| युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश | ,, | दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश | ,, |
| शूरता की प्रशंसा व सर्वोत्तमता का निर्देश | ,, | उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण | ,, |
| प्राणियों के अन्न का विचार | ,, | सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण | ३८० |
| सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश | ३७७ | नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण | ,, |
| आततायी ब्राह्मण व गुरु को मारने का निर्देश | ,, | शस्त्रयुद्ध का लक्षण | ,, |
| शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश | ,, | बाहुयुद्ध का लक्षण | ,, |
| बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश | ,, | ||
| जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश | ३७८ | बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध | ३८१ |
| आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश | ,, | युद्ध के समय सेना की रचना | ,, |
| आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश | ,, | युद्ध होने का क्रम | ,, |
| युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश | ,, | सेना के उपद्रुत होने पर लड़ने का निर्देश | ३८२ |
| जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश | ३७९ | सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश | ,, |
| मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश | ,, | फूट जानेवाली सेना के दुःखदायिनी होने का निर्देश | ,, |
| मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश | ,, | सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश | ,, |
| शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश | ,, | ||
| युद्ध में नालास्त्र ( बन्दूक-तोप ) आदियों की योजना | ३८३ | ||
| युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण | ,, | ||
| वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध | ३८४ | ||
| बलवान शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता | ,, |
( ३२ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश | ३८४ | प्रातः सायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश | ३८९ |
| कार्य को नष्ट न करने का निर्देश | ,, | भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश | ,, |
| सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश | ३८५ | शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश | ,, |
| भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश | ,, | शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश | ,, |
| शत्रु को नष्ट करने का उपाय | ,, | मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण | ,, |
| शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार | ,, | अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण | ३९० |
| विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश | ,, | अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण | ,, |
| राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश | ३८६ | शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार | ,, |
| शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश | ,, | राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश | ,, |
| विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश | ,, | शत्रु-संचित धन की व्यवस्था का निर्देश | ३९१ |
| मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश | ३८७ | सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश | ,, |
| ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के टिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश | ,, | पहरेदारों की व्यवस्था | ,, |
| १००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश | ,, | राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश | ३९२ |
| सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म | ३८८ | चिरस्थायी राजा के लक्षण | ,, |
| सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म | ,, | शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण | ३९३ |
| आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश | ,, | नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश | , |
| सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश | ,, | तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश | ,, |
( ३३ )
| राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश | ३९४ | शत्रु का राज्य हरण करने का उपाय | ३९७ |
| हीन-राज्य राजा के आचरणों का निर्देश | " | राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का निर्देश | " |
| राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश | " | राज्य को वृक्ष की समता का निर्देश | ३९८ |
| धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश | " | राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश | " |
| धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश | " | पुत्र को राज्य देने के समय का निर्देश | ३९९ |
| मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ-संख्या का निर्देश | ३९५ | राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश | " |
| शुक्रनीति-सार-चिन्तन का फल | " | मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का निर्देश | " |
| शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश | " | नवीन राजा के साथ मन्त्रियों को भी अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का निषेध | " |
| नीति-शेष कहने का निर्देश | ३९६ | नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री आदि के मतानुसार न रहने का दुष्परिणाम | " |
| शत्रु के छिद्रों को ढूँढ़ते रहने का निर्देश | " | नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था | ४०० |
| शत्रु राजा को हीन-बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश | " | धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश | " |
| मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश | " | धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश | " |
| युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश | " | धूर्त्तों की धूर्त्तता वर्णन | " |
| दान-मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश | ३९७ | बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश | ४०१ |
| राजा के द्रव्य को मेघ-जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश | " | राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश | " |
३ शु० सूची
( ३४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश | ४०१ | प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन | ४०५ |
| बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश | ,, | योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण | ,, |
| अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश | ४०२ | एकचित्तता के भाव का वर्णन | ,, |
| धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश | ,, | श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन | ४०६ |
| अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश | ,, | हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश | ,, |
| शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुखदायी होने का निर्देश | ,, | अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश | ,, |
| अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश | ४०३ | कार्यसिद्ध्यर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश | ,, |
| अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश | ,, | छल का वर्णन | ४०७ |
| स्वकार्य-सिद्धयर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश | ,, | तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश | ,, |
| ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश | ,, | उत्तमादि भृत्यों के लक्षण | ४०८ |
| दर्प, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण | ४०४ | प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण | ,, |
| महान बैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश | ,, | उपदेश के विना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश | ,, |
| आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश | ,, | आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश | ,, |
| आपत्ति में बिना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का निर्देश | ,, | बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध | ,, |
| समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश | ४०९ | ||
| प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश | ,, |
( ३५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश | ४०९ | सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश | ४११ |
| निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश | " | युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध | " |
| दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश | " | व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश | " |
| श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध | ४१० | धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार | " |
| उत्तमादि गृह-भूमि के प्रमाणों का निर्देश | " | सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश | ४१२ |
| अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश | ४११ | मूल से चौगुना सूद ले चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश | " |
| सैनिकों ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश | " | टीकाकार-परिचय | " |
| श्लोकानुक्रमणिका | ४१३ |