शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
About this granth
The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.
This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.
कुर्व॑न्तीत्येतदेक॒मयनम् ॥ ७॥ अथे॒दं द्वि॒तीय॑म् । अर॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्योपस-
माय॑न्ति यत्र॑ प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॒ यक्ष्य॑माणा भव॑न्ति मथि॒त्वोप॑समाधा॒योद्धृत्या॑हव-
नीयं॒ यज॑न्तऽए॒तेन॑ प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॑ ॥८॥ तस्य॒ शिरो॑ नि॒दध॑ति । तेषां॒ यदि॑
तदह॒र्दीक्षा॒ न समैत्य॑र॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्य यथायथं॒ विप॒रेत्य॑ जुह्वति ॥९॥ अथ
यद॒हरे॑षां दीक्षा॒ समै॑ति । अर॒णिष्वे॒वाग्नीत्स॒मारो॒ह्योपसमाय॑न्ति यत्र॑ दीक्षिष्यमा-
णा भव॑न्ति गृ॒हप॑तिरेव॒ प्रथमो॑ मन्थते॒ऽथेत॑रे पर्युप॒विश्य॑ मन्थन्ति॒ ते जातं॑-जातमे-
वानुप्रह्र॑न्ति गृ॒हप॑तेर्गाह॑पत्ये गृ॒हप॑तेरेव गार्हप॒त्यादुद्धृत्या॑हवनीये॒ दीक्ष॑न्ते ते-
षाꣳ समा॒न आह॑वनी॒यो भ॑वति समा॒नो गार्ह॑पत्यो दीक्षोप॒सत्सु॑ ॥ १०॥ अथ
यद॒हरे॑षां क्रयो भव॑ति । तद॒हर्गार्ह॑पत्यां चि॒तिमु॑पदधात्य॒थेत॑रेभ्य उपवस॒थे धि-
ष्ण्यान्वैस॑र्जिनानां काले प्राच्यः॒ पत्न्य॒ उपसमाय॑न्ति प्रजन॒त्येतमप॑रम॒ग्निꣳ स्रुतऽए॒व
वैस॒र्जिने॑ ॥११॥ राजानं॑ प्रणय॑ति । उद्यत ए॒वैष आ॑ग्नीध्रीयोऽग्नि॒र्भव॑त्यथैतऽएकै-
कमे॒वोल्मुकमा॒दाय॑ यथाधि॒ष्ण्यं॒ विपरा॑यन्ति सम॒द्धमु हैव॒ ते कु॑र्वन्ति॒ सम॑द्धेनान्वि-
न्दत्यु॑र्तुका ह भवन्त्यपि ह॒ तमर्थं॑ सम॒द्धिन्द॑न्ति॒ यस्मि॒न्नर्थे॒ यज॑न्ते॒ ये तथा॒ कुर्वन्त्ये-
तद्द्द्विती॒यम॑यनम् ॥ १२॥ अथे॒दं तृती॑यम् । गृ॒हप॑ते॒रेवार॒ण्योः संवद॑न्ते॒ य इ॒तो
ऽग्नि॒र्जनिष्य॑ते॒ स नः॑ सह॒ यद॒नेन॑ य॒ज्ञेन॒ जेष्यामो॒ऽनेन॑ पशुब॒न्धेन॒ तन्नः॑ स॒ह॒ सह॑
नः सा॒धुकृ॑त्या॒ य ए॒व पा॒पं कर॑वत्त॒स्यैव॒ तदि॒त्ये॒वमु॒क्त्वा गृ॒हप॑तिरेव॒ प्रथमः॒ समा-
रो॑हयते॒ऽथेत॑रेभ्यः समा॒रोह॑यति स्व॒यं वैव समा॑रोहयते त॒ऽश्राय॑न्ति॒ यत्र॑ प्राजा-
प॒त्येन॑ पशुना॒ यक्ष्य॑माणा भव॑न्ति मथि॒त्वोप॑समाधा॒योद्धृत्या॑हवनीयं॒ यज॑न्तऽए॒तेन॑
प्राजाप॒त्येन॑ पशुना॑ ॥ १३॥ तस्य॒ शिरो॑ नि॒दध॑ति । तेषां॒ यदि॑ तदह॒र्
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ८, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६७३
ये इन्हीं लकड़ियों से वध करते हैं। यह रीति है ॥७॥
दूसरी यह है—अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ जाते हैं जहाँ प्रजापति-सम्बन्धी
पशु-यज्ञ करना है। आग मथकर उस पर समिधा रखके उसमें से आहवनीय को लेकर प्रजापति-
सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥८॥
उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों पर
अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और वहाँ (दैनिक) आहुतियाँ देते हैं ॥६॥
यदि दीक्षा उसी दिन लेनी हो तो अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ चले आते हैं
जहाँ दीक्षा लेनी है। पहले गृहपति ही मथता है, फिर और उसके पास बैठकर मथते हैं। और
जो-जो अपनी आग मथता है वह उसको गृहपति के ही गार्हपत्य में डाल देता है। गृहपति के ही
गार्हपत्य से आहवनीय लेकर दीक्षा लेते हैं, उनकी आहवनीय एक ही होतो है और एक ही
गार्हपत्य दीक्षा में भी और उपसदों में भी ॥१०॥
जिस दिन उनको सोम का क्रय करना हो (मोल लेना हो) उस दिन गार्हपत्य को चिनते
हैं, और उपवास के दिन दूसरों के लिए धिष्ण्या। विसर्जन के समय पत्नियां आगे आती हैं
और यजमान इस दूसरी अग्नि को छोड़ जाता है। और जब विसर्जन की आहुति दी जाती
है—॥११॥
तभी सोम राजा को लाता है। आग्नीध्र अग्नि उस समय लाई हुई होती है। उसमें से
एक-एक लकड़ी को लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में लाते हैं। जो इस प्रकार करते हैं वे झगड़ा
करते हैं। झगड़ा उनके बीच में आ जाता है। वे झगड़ा कर बैठते हैं जो इस प्रकार यज्ञ करते हैं।
यह दूसरी रीति है ॥१२॥
यह तीसरी रीति है—गृहपति की ही अरणियों में साझी हो जाते हैं। 'जो अग्नि इनसे
उत्पन्न होगी इसमें हमारा भाग है। इस यज्ञ के करने से जो फल होगा, या पशु-बन्ध से, इसमें
हमारा भाग है। जो पुण्य कर्म है उसमें हम सब शामिल हैं। जो पाप करे वह उसका अपना है।'
ऐसा कहकर गृहपति पहले अपने लिए आग लेता है, फिर दूसरों के लिए, या वे स्वयं अपने
लिए लेते हैं। वे उस स्थान पर आते हैं जहाँ प्रजापति का पशुयाग होना होता है। आग मथकर,
समिधा रखकर आहवनीय को लेते हैं और प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥१३॥
उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन उनकी दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों
पर अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और आहुतियां दे लेते हैं ॥१४॥
यदि इस दिन दीक्षा होनी होती है तो गृहपति की ही अरणियों में साझा कर लेते हैं कि
'जो अग्नि उत्पन्न होगी उसमें हमारा भाग है और जो इस होनेवाले यज्ञ तथा सत्र से फल होना
है उसमें हमारा साझा है। जो-जो पुण्य करना है उसमें हमारा साझा है। जो पाप हो जाय वह
अध्याय-६, ब्राह्मण-९
त॒दित्ये॑वमु॒क्त्वा गृ॒हप॑तिरे॒व प्र॑थमः समारो॑हयते॒ऽथे॑तरेभ्यः समारो॑हयति स्व॒यं वैव
समा॒रोह॑यन्ते त॒ऽआया॑न्ति यत्र दीक्षिष्य॒माणा भव॑न्ति म॒थित्वोप॑समाधायो॒द्धृत्या॑ह-
वनी॒ये दी॑क्षन्ते तेषाꣳ समा॒न आह॑वनी॒यो भ॑वति समा॒नो गार्ह॑पत्यो दीक्षोप॒स-
त्सु ॥ १५॥ अथ॒ यद॒हरे॑षां क्रयो भव॑ति । तदह॑र्गाह्पत्यां॒ चिति॒मुप॑दधात्यथे॑तरे-
भ्य उपव॑सथे धिष्ण्यान्वैस॒र्जिना॑नां काले प्राच्यः पत्न्य उपसमा॒यन्ति प्रकृत्येतमप-
रम॒ग्निꣳ हुत॒ऽएव वै॑स॒र्जिने ॥ १६॥ राजानं॒ प्रण॑यति । उ॒द्यत एवै॒ष आ॑ग्नीध्री॒यो
ऽग्निर्भवत्यथैतऽएकै॑कमेवो॒ल्मुक॑मादाय॒ यथा॑धिष्ण्यं॒ विपरयन्ति तत्तत्कृतं नाकॄतं
यन्ना॒नाधि॑ष्ण्या भव॑न्ति वरीय॑नाकाशोऽसत्परिचर॒णायेत्य॑थ यन्ना॒नापु॑रोडाशा भूयो
ह॒विरु॑च्छिष्टमसत्समा॒प्त्याऽइति ॥ १७॥ अथ येन स॒त्रेण दे॒वाः । क्षिप्रꣳश्व पाप्मा-
नमपा॑घ्नतेमां जितिम॒जय॒न्येषामियं॑ जितिस्तदुत उ॒द्यतऽए॒कगृहपतिका वै देवा ए॒-
कपुरोडाशा एक॑धिष्ण्याः क्षिप्रꣳश्व पाप्मानमपाघ्नत क्षिप्रे प्राजा॑यन्त तयो॒ऽहै॒वैत
ऽएक॑गृहपतिका एक॑पुरोडाशा एक॑धिष्ण्याः क्षिप्रꣳश्व पाप्मानमपघ्नते क्षिप्रे प्र-
जायन्ते ॥ १८॥ अथादः पूर्व॒स्मिन्नु॑दीची॒नवꣳशा शाला भव॑ति । तन्मानु॒षꣳ समा॒न
आह॑वनी॒यो भ॑वति नाना गार्हपत्यास्तद्विकृ॑ष्टं गृ॒हप॑तेरेव गार्ह॑पत्ये जा॒घन्य॑ा
पत्नीः संया॒जयन्त्या॒थ्येने॑तरे प्रति॒यत॒न्तऽआस॑ते तद्विकृ॑ष्टम् ॥ १९॥ अथात्र प्राची॒न-
वꣳशा शाला भव॑ति । तद्दे॒वत्रा समा॒न आह॑वनी॒यो भ॑वति समा॒नो गार्ह॑पत्यः
समा॒न आ॑ग्नीध्री॒यस्तदेतत्सत्रꣳ समॄद्धं यथैका॒हः समॄद्ध एवं तस्य न कूलास्ति
तस्यै॒वैव समा॒न्यावृ॒त्यन्य॑द्धि॒ष्ण्येभ्य॑ः ॥ २०॥ ब्राह्मणम् ॥ १० [६. ८.] ॥ ॥
दे॒वा ह॒ वै स॒त्रमा॑सत । श्रियं॑ गछेम यशः स्यामान्नादाः स्यामेति तेभ्य ए॒त-
दन्नाद्यमभित्रितमपाचिक्रमिवत्पशवो वाऽऽश्रं तं पशवो ह्रैवैस्तदपाचिक्रमियिष्य-
न्तै न इमे श्रात्ता न हिꣳस्युः कथमिव स्विन्नः सद्यस्तऽइति ॥ १॥ तऽए॒ते गार्ह॑-
पत्ये द्वेऽआहुती॒ऽअजुहुवुः । गृहा वै गार्ह॑पत्यो गृहा वै प्रतिष्ठा त॒देनान्गृ॒हेष्वे॒व
का० ४, अ० ६, ब्रा० ८-६, कं० १५-२० व १-२ शतपथब्राह्मण / ६७५
हर एक का अपना-अपना है।' ऐसा कहकर पहले गृहपति अरणियों पर अपने लिए मथता है,
फिर दूसरों के लिए, या वे स्वयं अपने लिए मथ लेते हैं। अब वे वहाँ आते हैं जहाँ दीक्षा होनी
होती है। मथकर, समिधा रखकर आहवनीय को लाते हैं और उसमें दीक्षा लेते हैं। दीक्षा और
उपसद में इनकी एक ही आहवनीय होती है और एक ही गार्हपत्य ॥१५॥
अब जिस दिन सोम-क्रय करना हो उस दिन गार्हपत्य को चिनते हैं, और उपवास के
दिन दूसरों के लिए धिष्ण्य । विसर्जन के समय पत्नियां आगे आती हैं। यजमान उस दूसरी
अग्नि को छोड़ जाता है। विसर्जन की आहुति होने पर—॥१६॥
सोम राजा को लाता है। आग्नीध्र अग्नि लाई हुई होती है। उसमें से एक-एक लकड़ी
लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में लाते हैं। इस प्रकार यह हो जाता है; अधूरा (अहृत) नहीं रहता।
अलग-अलग धिष्ण्या इसलिए होती है कि बीच में आने-जाने के लिए अवकाश रहे। पुरोडाश
अलग-अलग इसलिए होता है कि यज्ञ की समाप्ति के लिए अधिक हव्य बच रहे ॥१७॥
जिस सत्र से देवों ने शीघ्र ही पाप को मार डाला और वह विजय पा ली जो इस समय
उनको प्राप्त है, उसकी व्याख्या हो चुकी। एक गृहपति, एक पुरोडाश, एक धिष्ण्या से उन्होंने
पाप को शीघ्र ही भगा दिया और शीघ्र ही उत्पन्न हो गये। इसी प्रकार यह भी एक गृहपति,
एक पुरोडाश और एक धिष्ण्या से पाप को शीघ्र ही भगा देते हैं और फिर उत्पन्न हो जाते
हैं ॥१८॥
पहली दशा में एक शाला होती है जिसमें बाँस दक्षिण से उत्तर की ओर होते हैं। यह
मानुषी विधि है। एक ही आहवनीय होती है और भिन्न-भिन्न गार्हपत्य । यह विकृष्टि अर्थात्
भिन्नता है। गृहपति के ही गार्हपत्य में पशु के पिछले भाग से पत्नी संयाज आहुतियां देते हैं,
और दूसरे बैठकर घी की आहुति देते हैं। यह विकृष्टि अर्थात् भिन्नता है ॥१९॥
परन्तु यहाँ ऐसी शाला होती है जिसमें पश्चिम से पूर्व की ओर बाँस होते हैं। यहाँ एक
ही आहवनीय होती है और एक ही गार्हपत्य, एक आग्नीध्रीय । इस प्रकार यह सत्र सफल
होता है जैसे एकाह (एक दिन का यज्ञ) सफल हुआ। इसमें कोई वैफल्य नहीं। धिष्ण्या को
छोड़कर यहाँ हर बात में समानता है ॥२०॥
सत्रधर्माः
अध्याय ६—ब्राह्मण ६
देव एक सत्र में बैठे इस इच्छा से कि श्री और यश मिले; अन्न को खानेवाले हो जायें ।
उनसे वह अन्न जो उन्होंने जीता था भाग गया। पशु अन्न हैं। पशु ही उनसे भाग गये, यह
सोचकर कि ये देव थक गये हैं, कहीं हमको हानि न पहुँचावें, और न जाने हमारे साथ कैसा
बर्ताव करें ॥१॥
उन्होंने गार्हपत्य में इन दो आहुतियों को दिया। गार्हपत्य गृह हैं। गृह प्रतिष्ठा हैं। इस
६७६ शतपथ ब्राह्मण
न्य॑यंस्त॒त्यैभ्य ए॒तद॒न्नाद्य॑म॒भिजितं नापा॑क्रामत् ॥ २॥ तथो॒ऽएवैमे सत्र॑मासते ।
ये स॒त्रमास॑ते श्रि॒यं ग॑छेम॒ यशः॑ स्यामा॒न्नादाः॑ स्या॒मेति॒ तेभ्य ए॒तद॒न्नाद्य॑म॒भिजित॒म-
पचि॑क्रमिषति पश॒वो वा॒ऽअन्नं॑ पश॒वो ह्यैवेभ्य॒स्तद॒पचि॑क्रमिषन्ति॒ यद्वै न इ॒मे श्रा-
ता नु॒ हिंस्युः कथमिव स्विन्नः सद्येत्त॒ऽइति॑ ॥ ३॥ तऽए॒ते गार्हपत्ये द्वेऽआहु॒-
ती जु॑ह्वति । गृ॒हा वै गार्ह॑पत्यो गृ॒हा वै प्रतिष्ठा॒ तदे॑नान्गृ॒हेष्वेव निय॑च्छति त-
थेभ्य ए॒तद॒न्नाद्य॑म॒भिजितं॒ नाप॑क्रामति ॥ ४॥ तथो॒ऽएवैतस्मात् । ए॒तद॒न्नाद्य॒मुपा॑-
हृत॒मपचि॑क्रमिषति॒ यद्वै मा॒यं न हिं᳭स्या॒त्कथ॑मिव स्विन्मा सद्यत॒ऽइति॑ ॥ ४॥
तस्य पुर॒स्ताद्दि॒वाग्रे॒ऽल्पश॑ऽइव प्राश्ना॑ति । तदे॑नड॒पनि॑मदति तद्वे॒द न वै तया॑भू-
त्वायाम॑सि॒ न वै माहि॑सिष्टेति॒ तदे॑नमु॒पाव॑ह्वयते॒ स ह॒ प्रिय॒ एवा॒न्नस्यान्ना॒दो
भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानेतस्य व्रत॒ꣳ शक्नोति॑ चरि॒तुम् ॥ ५॥ तद्वा॒ऽएतत् । दश॒मे
ऽह॒न्स॑त्त्रोत्थानं क्रियते तेषामेकैक एव वाचं॑यम॒ आस्ते वाच॑माया॒यंस्तया॑पीन-
यायातयाम्न्योत्त॑रम॒हस्तून्वते॒ऽथेत॑रे विसृ॒ज्यन्ते समिदाहा॑रा वा स्वाध्या॒यं वा तत्रा॒-
प्यश्न॑न्ति ॥ ६॥ ते॒ऽपराह्ण॒ऽउपस॑मेत्य । अ॒प उप॑स्पृश्य पत्नीशाल॒ꣳ सम्प्र॑पद्यन्ते तेषु
समन्वा॒रब्धेष्वेते॒ऽआहु॑ती जुहोती॒ह रतिरि॒ह रम॑ध्वमि॒ह धृतिरि॒ह स्वधृ॑तिः स्वा॒-
हेति॑ पशू॒नेवैतदा॒ह पशू॒नेवैतदा॒त्मन्निय॑ङ्क्ते ॥ ८॥ अथ द्वितीयां॑ जुहोति । उप॑सृ-
॒ज्यरु॑णं मात्र॒ऽइत्य॒ग्निमे॒वैतत्पृथिव्या॒ऽउप॑सृजन्नाह धरु॑णो मा॒तरं॑ धय॒न्नित्य॒ग्निमे॒-
वैतत्पृथिवीं॑ धय॑न्तमाह रायस्पोष॒मस्मासु॑ दीधर॒त्स्वाहेति॑ पश॒वो वै रायस्पोषः॑
पशू॒नेवैतदा॒त्मन्निय॑ङ्क्ते ॥ १॥ ते प्राञ्च॒ उपनि॑ष्क्रामन्ति । ते पश्चात्प्राञ्चो हविर्धाने॑
सम्प्र॑पद्यन्ते पुरस्ता॒द्धि प्रत्य॑ञ्चस्त॒ऽअस्यमाना अ॑थैवै॒तꣳ स॑त्रोत्थाने ॥ १०॥ त॒ऽउत्तर॑स्य
ह॒विर्धान॑स्य । ज॒घन्या॑यां कूबर्या॒ꣳ सामा॑भिगायन्ति स॒त्त्रस्य॒ऽऋद्धिरिति॑ ऋ॒द्धिमे॒वैत-
दभ्युत्ति॑ष्ठन्त्युत्तर॒वेदे॑रुत्तराया॒ꣳ श्रोणा॒वितरं॑ तु कृत॒तरम् ॥ ११॥ यदुत्तरस्य हवि-
र्धान॑स्य । ज॒घन्या॑यां कूबर्या॑मगन्म॒ ज्योति॑रमृ॒ता अभू॒मेति॒ ज्योति॒र्वाऽए॒ते भवन्त्य-
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६, कं० २-१२ शतपथब्राह्मण / ६७७
प्रकार उन्होंने इनको गृहों में ही थाम लिया, इस प्रकार इनसे जीता हुआ अन्न न भागा ॥२॥
इसी प्रकार ये लोग भी जो सत्र में बैठते हैं इस आशा से बैठते हैं कि श्री और यश
मिले, अन्न को खानेवाले हो जायें। जो अन्न उन्होंने जीता है वह उनसे भागना चाहता है। पशु
अन्न हैं, अर्थात् पशु भागना चाहते हैं यह सोचकर कि ये थके हुए हैं, कहीं हमको हानि न
पहुँचावें, (न जाने) हमसे कैसा बर्ताव करें ॥३॥
वे गार्हपत्य में दो आहुतियां देते हैं। गृह गार्हपत्य हैं। गृह प्रतिष्ठा हैं। इस प्रकार उनको
गृहों में ही थाम लेते हैं। इस प्रकार यही जीता हुआ अन्न उनसे भाग नहीं सकता ॥४॥
इसी प्रकार जीता हुआ अन्न उनसे भागना चाहता है कि कहीं ये मुझे हानि न पहुँचावें।
न जाने कैसे बर्ताव करें ॥५॥
इसमें से पीछे की ओर से थोड़ा-सा खाता है। इस प्रकार वह उसका साहस बढ़ाता है।
तब वह जानता है कि वैसा नहीं हुआ जैसा मैंने समझा था। इन्होंने मुझे हानि नहीं पहुँचाई।
इस प्रकार वे उसके आश्रय हो जाते हैं। वह अन्न का प्रिय हो जाता है, अन्न का खानेवाला
हो जाता है यदि वह इस रहस्य को समझकर व्रत कर सकता है ॥६॥
यह कृत्य दसवें दिन सत्रोत्थान के समय होता है। हर एक चुप बैठता है इस प्रकार
वाणी को शक्ति देते हुए। उस शक्तिशाली और पूर्ण वाणी से वे अन्तिम दिवस का कृत्य करते
हैं। अब दूसरों का विसर्जन हो जाता है या तो समिधा लेने के लिए या स्वाध्याय के लिए। अब
खाना खाते हैं ॥७॥
तीसरे पहर को साथ आकर और जल का स्पर्श करके पत्नीशाला में जाते हैं। जब वे
उसके पास होते हैं वह आहुति दे देता है इस मन्त्र से—"इह रतिरिह रमध्वमिह धृतिरिह
स्वधृतिः स्वाहा” (यजु० ८।५१)—"यहाँ प्रसन्नता है, यहाँ आनन्द मनाइये। यहाँ धृति है।
यहाँ आपकी अपनी धृति है—स्वाहा।" वह पशुओं से ऐसा कहता है। इस प्रकार वे अपने लिए
पशुओं को प्राप्त कर लेते हैं ॥८॥
अब दूसरी आहुति देता है— "उपसृजन् धरुणं मात्रे" (यजु० ८।५१)—"बछड़े को
माता के लिए छोड़ते हुए।" इसका तात्पर्य है कि अग्नि को पृथिवी के पास छोड़ते हुए। "धरुणो
मातरं धयन्" (यजु० ८।५१)—"बछड़ा माता का दूध पीता हुआ अर्थात् अग्नि पृथिवी से दूध
पीती हुई। "रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा" (यजु० ८।५१)—"वह हममें धन को जारी
रक्खे।" इस प्रकार वह पशुओं को अपने में स्थित रखता है ॥६॥
वे पूर्व की ओर निकलते हैं और पीछे से पूर्व की ओर हविर्धान में प्रवेश करते हैं। आगे
से पीछे को उस समय गये थे जब यज्ञ करना था। सत्रोत्थान में इस प्रकार - ॥१०॥
उत्तरी हविर्धान के पिछले भाग में सामगान करते हैं जिसको 'सत्र की ऋद्धि' (यजु०
८।५२) कहते हैं। यहीं वे ऋद्धि को प्राप्त होते हैं, या उत्तर वेदी के उत्तर भाग में। परन्तु
दूसरी विधि अधिक प्रचलित है—॥११॥
अर्थात् उत्तरी हविर्धान के पिछले भाग में। "अगन्म ज्योतिरमृता ऽ अभूम" (यजु०
८।५२)—"हमको ज्योति मिल गई। हम अमर हो गये।" जो सत्र में बैठते हैं उनको ज्योति
६७८ शतपथ ब्राह्मण
मृ॒ता भव॑न्ति॒ ये स॒त्रमास॑ते॒ दिवं॑ पृथि॒व्या अध्या॒रुहा॒मेति॑ दि॒वं वा॒ऽए॒ते पृ॑थि॒व्या
अध्या॒रोह॑न्ति॒ ये स॒त्रमास॑ते॒ऽविदाम दे॒वानिति॑ विन्द॒न्ति हि दे॒वाᳵस्वर्य्ये॑ती॒रिति॑
त्रि॒र्निध॑नमु॒पाव॑यन्ति॒ स्व॒र्क्य॑ते॒ ज्योति॒र्क्य॑ते॒ भव॑न्ति॒ तद्य॒दैवैतस्य॒ साम्नो॑ रू॒पं तदै-
वैते॒ भव॑न्ति॒ ये स॒त्रमास॑ते ॥१२॥ ते द॑क्षिणस्य ह॒विर्द्धान॑स्य । अ॒धोऽधो॑ऽक्षꣳ
सर्प॑न्ति॒ स य॒थाहि॒स्त्वचो॒ निर्मुच्ये॑तै॒वꣳ सर्व॑स्मात्पा॒प्मनो॒ निर्मुच्य॑न्ते॒ऽति॒छन्द॑सा स-
र्प॒न्त्ये॒षा वै सर्वा॑णि॒ छन्दा॑ꣳसि॒ यद॑ति॒छन्दा॒स्तद्ये॑ना॒न्यान्नान्वत्ये॑ति॒ तस्मा॑दति॒छ-
न्द॑सा सर्प॑न्ति ॥१३॥ ते॒ सर्प॑न्ति । यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा॒ यो न॑ः पृत॒न्यादप॒
तं-त॑मिद्धतं॒ वज्रे॑ण॒ तं-त॑मिद्धतम् । दू॒रे च॒त्ताय॑ कृ॒त्सदृ॒ह्ने यदि॑न्नक्ष॒त् । अ॒स्माक॑ꣳ
शत्रू॒न्परि॑ शूर वि॒श्वतो॑ द॒र्म्मा द॑र्षिष्ट वि॒श्वत॒ इति॑ ॥१४॥ ते प्राञ्च॒ उप॑निष्क्रा॒मन्ति
। ते पु॒रस्ता॑त्प्रत्य॒ञ्चः सद॑ः स॒म्प्रप॑द्यन्ते प॒श्चाद्धि प्राञ्च॒स्तꣳस्य॑माना॒ अथैवैꣳ सत्रोत्या-
ने ॥१५॥ ते य॒थाधि॒ष्ण्यमे॒वो॑प॒विश॑न्ति । दे॒वेभ्यो ह॒ वै वाचो॒ रसो॑ऽभि॒जितो॑ऽप-
चिक्र॑मिषां चकार॒ स इ॒मामे॑व॒ परा॒ऽत्यति॑सृप्तस्त॒दिदं॑ वै वा॒क्तस्या॑ ए॒ष र॒सो यदोष॑-
धयो॒ यद्वन॒स्पत॑यस्तमे॒तेन॒ साम्ना॑प्नुव॒न्त्स ए॒नान्नाप्तो॑ऽभ्याव॑र्तत॒ तस्मा॑दस्यामूर्द्धा ओ-
षधयो जा॒यन्त॒ऽऊर्द्धा वन॒स्पत॑यस्त॒थो॒ऽए॒वैतेभ्य ए॒तद्वाचो॒ रसो॑ऽभि॒जितो॑ऽपचिक्र-
मिषति॒ स इ॒मामे॑व॒ परा॒ऽतिसृ॑प्त॒स्तदिदं॑ वै वा॒क्तस्या॑ ए॒ष र॒सो यदोष॑धयो॒ यद्वन॑-
स्पत॑यस्तमे॒तेन॒ साम्ना॑प्नुव॑न्ति॒ स ए॒नाना॑प्तो॒ऽभ्याव॑र्तते॒ तस्मा॑द॒स्यामूर्द्धा ओष॑धयो
जा॒यन्त॒ऽऊर्द्धा वन॒स्पत॑यः ॥१६॥ सर्प॑रा॒ज्ञा ऋचू स्तु॑वते । इ॒यं वै पृ॑थि॒वी सर्प॑रा-
ज्ञी तद॒नयै॒वैतत्सर्व॑माप्नुवन्ति स्व॒यम॑प्रस्तुत॒मनु॑पगीतं॒ यथा॒ नान्य॒ उप॑शृणु॒यादि॑ति रू॒
रेच॑येद्य॒दन्यः॑ प्रस्तु॒याद॑तिरे॒चये॒द्यद॒न्य उ॑पगा॒येद॑तिरे॒चये॒द्यद॒न्य उप॑शृणुया॒त्तस्मा॑त्स्व-
यम॑प्रस्तुत॒मनु॑पगीतम् ॥१७॥ चतु॒र्हौतृ॑न्द्होता व्याच॑ष्टे । ए॒तद्वैवैत॒त्स्तुत॒मनु॑शꣳस-
ति॒ यदि॒ होता॒ न वि॒द्याद्गृहप॑तिर्व्याच॒क्षीत॒ होतुरे॒व व्याख्यानम् ॥१८॥ अथा-
र्ध्वयोः॑ प्रति॒गरः॑ । अ॒रात्सुरि॒मे यज॑माना॒ भद्र॑मेभ्यो॒ऽभूदि॑ति कल्या॒णमे॒वैतन्मानु॒ष्यै॑
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ६, कं० १२-२६ शतपथब्राह्मण / ६७६
मिल जाती है। ये अमर हो जाते हैं। “दिवं॑ पृथि॒व्या ऽअध्यारु॑हाम” (यजु० ८।५२)—“हम
पृथिवी से द्यौलोक में पहुँच गये।” जो सत्र में बैठते हैं वे पृथिवी से द्यौलोक में पहुँच जाते हैं।
“विदाम॑ दे॒वान्” (यजु० ८।५२)—“हमने देवों को प्राप्त किया।” क्योंकि वे वस्तुतः देवों को
पा जाते हैं। “स्व॒र्ज्योति॑:” (यजु० ८।५२)—“स्वर्ग को और ज्योति को।” इसको तीन बार
कहते हैं। यही स्वर्ग और ज्योति के भागी हो जाते हैं। इस प्रकार जो सत्र में बैठते हैं उनका वही
रूप हो जाता है जो साम का रूप है ॥१२॥
वे दक्षिणी हविर्धान के धुरे के नीचे रेंगते हैं। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुल छोड़ देता
है उसी प्रकार ये अपने पापों से मुक्त हो जाते हैं। अतिछन्दस् से रेंगते हैं। ये जो अतिछन्दस्
हैं वे ही सब छन्द हैं। इस प्रकार पाप उनको नहीं लगता। इसलिए वे अतिछन्दस् से रेंगते
हैं ॥१३॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर रेंगते हैं— “यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा यो नः॒ पृत॒न्यादप॒ तं-
तम॑िद्धतं॒ वज्रे॑ण॒ तन्त॑मिद्धतम्। दू॒रे च॒त्ताय॑ छन्तस॒द् गहनं॒ यदिनक्ष॑त्। अ॒स्माकँ॑ श॒त्रून् परि॑ शूर
वि॒श्वतो॑ द॒र्मा द॑र्षीष्ट वि॒श्वतः॑’ (यजु० ८।५३)—“हे इन्द्र और पर्वत ! तुम दोनों उसको जो
हमसे युद्ध में लड़ता है मारो। वज्र से उसको मारो। उसको भी जो दूर देश में जाकर छिप गया
हो। हे शूर ! हमारे शत्रुओं को फाड़ डालनेवाला चारों ओर से फाड़ डाले—चारों ओर
से” ॥१४॥
वे पूर्व की ओर निकलते हैं और सदस् में आगे से पीछे की ओर प्रवेश करते हैं। पीछे
से आगे की ओर उस समय आये थे जब यज्ञ करना था। सत्रोत्थान के अवसर पर इस
प्रकार—॥१५॥
वे अपनी-अपनी धिष्ण्या के पास बैठ जाते हैं। एक बार वाणी के रस ने देवों से, जिन्होंने
इसको जीत लिया था, अलग होना चाहा। उसने पृथिवी पर रेंग-रेंगकर भागने का यत्न किया।
पृथिवी ही वाणी है। ये जो ओषधियाँ या वनस्पतियाँ हैं यही इसका रस हैं। उसको इसी साम
के द्वारा पकड़ा। इस प्रकार पकड़ने पर वह लौट आया। इसीलिए भूमि पर ओषधियाँ और
वनस्पतियाँ ऊपर को उगीं। इसी प्रकार वाणी का रस इन यजमानों को भी जिन्होंने इसको जीत
लिया है छोड़ना चाहता है, और इस भूमि पर बहकर भागने की कोशिश करता है। क्योंकि यह
पृथिवी वाणी है और इसका रस ये ओषधियाँ और वनस्पतियाँ हैं। इसी साम के द्वारा वे इसको
पकड़ते हैं और पकड़ा जाने पर वह लौट आता है, इसलिए इस पृथिवी पर ओषधियाँ ऊपर को
उगती हैं और वनस्पतियाँ भी ऊपर को ही उगती हैं ॥१६॥
सर्पराज्ञी ऋचाओं से स्तुति करते हैं। यह पृथिवी सर्पराज्ञी है। इसके द्वारा ये सब चीजों
की प्राप्ति करते हैं। उद्गाता अकेले ही स्तुति करता है (बिना प्रस्तोता के) और उपगाता भी
साथ में नहीं होते, इसलिए कि कोई इसे सुन न ले। अति हो जाय यदि कोई दूसरा स्तुति करे।
अति हो जाय यदि दूसरा गावे। अति हो जाय यदि दूसरा सुन ले। इसलिए बिना उपगाता की
सहायता के उद्गाता स्वयं ही स्तुति करता है ॥१७॥
होता चतुर्होतृ का पाठ करता है और उस स्तुति के बाद शस्त्र पढ़ता है। यदि होता
उनको न जानता हो तो गृहपति पढ़े। परन्तु है तो यह होता के पढ़ने के लिए ही ॥१८॥
अब अध्वर्यु प्रत्युत्तर देता है—‘ये यजमान सफल हो गये। इनका कल्याण हो।’ इस
६८० शतपथ ब्राह्मण
वाचो॒ वद॑ति ॥ १९॥ अथ॑ वाकोवाक्यं॑ ब्रह्म॒ोद्यं॑ वदन्ति । स॒र्वं वै ते॑षामा॒प्तं भव॑-
ति॒ सर्वं॑ जि॒तं ये स॒त्त्रमास॑ते॒ऽचारि॒षुर्यजु॑र्भि॒स्तत्ता॒न्याप॑स्त॒द्वावृ॑त्सता॒शꣳ॑सिषु॒र्ऋच॑स्त-
त्ता आ॑प॑स्त॒द्वावृ॑त्सता॒स्तोष्य॒न् साम॑भि॒स्तत्ता॒न्याप॑स्त॒द्वावृ॑त्सद्यदि॒ षमित्ते॒देवा॒नाप्त॑-
म॒नवरु॑द्धं भवति॒ यद्वाकोवाक्यं॑ ब्राह्म॒णं तद्द्वैवे॑तेना॒प्नुव॑न्ति॒ तद्व॑रुन्धते ॥ २० ॥
औदुम्ब॑रीमुप॒संमृ॑ज्य॒ वाचं॑ यच्छन्ति । वि॒दुह्य॑न्ति वा॒ऽए॒ते य॒ज्ञं निर्द्धय॑न्ति ये वा॒चा
य॒ज्ञं त॑न्वते॒ वाग्वि य॒ज्ञस्तामे॑षां पुरैके॑क ए॒व वा॑चंय॒म आस्ते॒ वाच॑मा॒प्याय॑यंस्त-
यापीनयायातया॒म्न्योत्त॑रमह॒स्तन्व॑ते॒ऽथात्र सर्वै॑व वागा॒प्ता भव॑त्यपवृ॒क्ता ताꣳ सर्व॑
ऽए॒व वा॑चंयमा वा॒चमा॒प्याय॑यन्ति तयापीनयायातया॒म्न्याति॑रा॒त्रं त॑न्वते ॥ २१ ॥
औदुम्ब॑रीमन्वा॒रभ्या॑सते । अन्नं॒ वाऽऊर्गौदु॑म्बर ऊ॒र्जेवैतद्वाच॑मा॒प्याय॑यन्ति ॥ २२॥
ते॒ऽस्त॑मिते प्राञ्च उ॒न्निष्क्रा॑मन्ति । ते ज॒घने॑नाहव॒नीय॒मास॑ते॒ऽग्रेण ह॒विर्द्धाने ता-
न्वाचं॑यमा॒नेव॒ वाचं॑यमः प्रतिप्रस्थाता वसतीवरीभिरभि॒परि॒हर॑ति ते॒ यत्का॑मा
आ॒सीरं॒स्तेन॒ वाचं॑ वि॒सृजे॑र॒न्कमि॒र्ह स्म॒ वै पु॒रुर्षयः स॒त्त्रमास॑ते॒ऽसौ नः काम॒:
स न॒: समृ॑द्ध्यता॒मिति॒ यद्यु॒ऽअ॑नेककामाः स्युर्लोककामा वा प्रजाकामा वा पशुका-
मा वा ॥ २३॥ अ॒नेनै॑व वाचं॑ वि॒सृजे॑रन् । भूर्भुव॒: स्व॒रिति॒ तत्स॒त्येनै॒वैतद्वाचं॑
समर्द्धय॑न्ति तया॒ समृ॑द्ध्या॒शिष॒ आशा॑सते सुप्र॒जाः प्र॒जाभि॑ः स्यामेति तत्प्र॒जामाशा॑-
सते सुवी॒रा वी॒रैरिति॒ तद्वी॒रानाशा॑सते सुपोष॒: पोषै॒रिति॒ तत्पुष्टि॒माशा॑सते
॥ २४॥ अथ गृह॒पति॑: सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑यति । यं वा गृह॒पति॑र्ब्रूयात्पृथगु हैवैके
सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑यीत गृह॒पति॑स्त्वेव सुब्रह्म॒ण्यामाह्व॑येद्यं वा गृह॒पति॑र्ब्रूयात्तस्मिन्स-
मुप॒ह्वन॑मिष्ट्वा समिधो॒ऽभ्याद॑धाति ॥ २५॥ ब्राह्म॒णम् ॥ ११ [६. १.] ॥ पञ्चमः प्रपाठ-
कः ॥ कण्डिकासंख्या १२६ ॥ ॥ षष्ठोऽध्यायः [३०.] ॥ ॥ अस्मिन्काण्डे कण्डिकासं-
ख्या ६४८ ॥ ॥
इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे ग्रहनाम चतुर्थं काण्डं समाप्तम् ॥४॥
·कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६, कं० १६-२५. शतपथब्राह्मण / ६८१
प्रकार वह मानुषी वाणी के लिए कल्याण चाहता है ॥१६॥
अब वाकोवाक्य के रूप में ब्रह्मोद्य पड़ते हैं। उनको सभी कुछ प्राप्त हो जाता है, सब जीत
लिया जाता है जो सत्र में बैठते हैं। इन्होंने यजुओं से यज्ञ किया, इतना उनको मिल गया, इतना
प्राप्त हो गया। उन्होंने ऋचाएँ पढ़ीं, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। उन्होंने
साम से स्तुति की, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। परन्तु इतना नहीं मिला,
इतना नहीं प्राप्त हुआ अर्थात् वाकोवाक्य या ब्राह्मण, इसको वे इसके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥२०॥
औदुम्बरी के पास पहुँचकर वे वाणी को रोक लेते हैं। जो वाणी से यज्ञ करते हैं वे यज्ञ
को दुह लेते या चूस लेते हैं, क्योंकि वाणी यज्ञ है। इससे पहले हर एक वाणी को रोककर बैठता
है अर्थात् उसको प्रबल बनाता है। इस रुकी हुई और प्रबल हुई वाणी के द्वारा वे अन्त के दिन यज्ञ
करते हैं। परन्तु इस वाकोवाक्य में समस्त वाणी थक जाती है। वे सब इस वाणी को चुप होकर
शक्तिशाली करते हैं। इस प्रकार प्रबल और शक्ति-सम्पन्ना वाणी से वे अतिरात्र करते हैं ॥२१॥
औदुम्बरी को छूकर बैठते हैं। अन्न शक्ति है। उदुम्बर शक्ति है। उदुम्बर से ही वे
वाणी को शक्ति देते हैं ॥२२॥
सूर्यास्त पर वे सदस् से पूर्व की ओर बाहर आते हैं, और हविर्धान के सामने आहवनीय
के पीछे बैठते हैं। जब वे चुपचाप बैठे होते हैं तो प्रतिप्रस्थाता उनके चारों ओर वस्तीवरी जलों
को फिराता है। जिस कामना के लिए उन्होंने यह सत्र रचा उसी कामना से उनको इस वाणी को
छोड़ना चाहिए (अर्थात् मौन तोड़ते समय उसी समय बात को कहना चाहिए)। क्योंकि पहले
समय में ऋषियों ने भिन्न-भिन्न कामनाओं से सत्र किये थे अर्थात् यह हमारी इच्छा है, हमको
यह मिले इत्यादि। और यदि उनकी कामनाएँ अनेक हों अर्थात् लोक की कामना, सन्तान की
कामना या पशुओं की कामना, तो—॥२३॥
'भूः भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ना चाहिए। इस प्रकार सत्य के द्वारा वाणी को शक्ति-
शाली बनाते हैं, और इसी शक्तिशाली वाणी से आशीर्वाद देते हैं। "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम"
(यजु० ८।५३)—"हम सन्तानवाले हों।" इससे सन्तान की प्रार्थना करते हैं। "सुवीराः वीरैः"
(यजु० ८।५३)—"वीर पुरुषों से युक्त हों।" इससे वीर पुरुषों के लिए प्रार्थना करते हैं।
"सुपोषाः पोषैः" (यजु० ८।५३)—"सम्पत्तिशाली हों।" इससे सम्पत्ति के लिए प्रार्थना ॥२४॥
अब गृहपति सुब्रह्मण्या को पढ़ता है, या वह पुरुष जिसको गृहपति नियुक्त कर दें। कुछ
लोग सुब्रह्मण्या को पृथक्-पृथक् पढ़ते हैं, परन्तु गृहपति को ही सुब्रह्मण्या पढ़नी चाहिए या उसको
जिसे गृहपति आज्ञा दे। (अतिरात्र भोज में) निमंत्रण की इच्छा करके वे आग पर समिधाएँ
रख देते हैं ॥२५॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का ग्रहनाम चतुर्थ काण्ड समाप्त हुआ।
चतुर्थ काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [४. २. १] १३६
द्वितीय [४. ३. ३] १३६
तृतीय [४. ४. ४] १२२
चतुर्थ [४. ५. ८] १२५
पञ्चम [४. ६ ६] १२६
योग ६४८
पूर्व के काण्डों का योग २२४६
पूर्णयोग २८९४