शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ६, ब्रा० ६, कं० २-१२ शतपथब्राह्मण / ६७७
प्रकार उन्होंने इनको गृहों में ही थाम लिया, इस प्रकार इनसे जीता हुआ अन्न न भागा ॥२॥
इसी प्रकार ये लोग भी जो सत्र में बैठते हैं इस आशा से बैठते हैं कि श्री और यश
मिले, अन्न को खानेवाले हो जायें। जो अन्न उन्होंने जीता है वह उनसे भागना चाहता है। पशु
अन्न हैं, अर्थात् पशु भागना चाहते हैं यह सोचकर कि ये थके हुए हैं, कहीं हमको हानि न
पहुँचावें, (न जाने) हमसे कैसा बर्ताव करें ॥३॥
वे गार्हपत्य में दो आहुतियां देते हैं। गृह गार्हपत्य हैं। गृह प्रतिष्ठा हैं। इस प्रकार उनको
गृहों में ही थाम लेते हैं। इस प्रकार यही जीता हुआ अन्न उनसे भाग नहीं सकता ॥४॥
इसी प्रकार जीता हुआ अन्न उनसे भागना चाहता है कि कहीं ये मुझे हानि न पहुँचावें।
न जाने कैसे बर्ताव करें ॥५॥
इसमें से पीछे की ओर से थोड़ा-सा खाता है। इस प्रकार वह उसका साहस बढ़ाता है।
तब वह जानता है कि वैसा नहीं हुआ जैसा मैंने समझा था। इन्होंने मुझे हानि नहीं पहुँचाई।
इस प्रकार वे उसके आश्रय हो जाते हैं। वह अन्न का प्रिय हो जाता है, अन्न का खानेवाला
हो जाता है यदि वह इस रहस्य को समझकर व्रत कर सकता है ॥६॥
यह कृत्य दसवें दिन सत्रोत्थान के समय होता है। हर एक चुप बैठता है इस प्रकार
वाणी को शक्ति देते हुए। उस शक्तिशाली और पूर्ण वाणी से वे अन्तिम दिवस का कृत्य करते
हैं। अब दूसरों का विसर्जन हो जाता है या तो समिधा लेने के लिए या स्वाध्याय के लिए। अब
खाना खाते हैं ॥७॥
तीसरे पहर को साथ आकर और जल का स्पर्श करके पत्नीशाला में जाते हैं। जब वे
उसके पास होते हैं वह आहुति दे देता है इस मन्त्र से—"इह रतिरिह रमध्वमिह धृतिरिह
स्वधृतिः स्वाहा” (यजु० ८।५१)—"यहाँ प्रसन्नता है, यहाँ आनन्द मनाइये। यहाँ धृति है।
यहाँ आपकी अपनी धृति है—स्वाहा।" वह पशुओं से ऐसा कहता है। इस प्रकार वे अपने लिए
पशुओं को प्राप्त कर लेते हैं ॥८॥
अब दूसरी आहुति देता है— "उपसृजन् धरुणं मात्रे" (यजु० ८।५१)—"बछड़े को
माता के लिए छोड़ते हुए।" इसका तात्पर्य है कि अग्नि को पृथिवी के पास छोड़ते हुए। "धरुणो
मातरं धयन्" (यजु० ८।५१)—"बछड़ा माता का दूध पीता हुआ अर्थात् अग्नि पृथिवी से दूध
पीती हुई। "रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा" (यजु० ८।५१)—"वह हममें धन को जारी
रक्खे।" इस प्रकार वह पशुओं को अपने में स्थित रखता है ॥६॥
वे पूर्व की ओर निकलते हैं और पीछे से पूर्व की ओर हविर्धान में प्रवेश करते हैं। आगे
से पीछे को उस समय गये थे जब यज्ञ करना था। सत्रोत्थान में इस प्रकार - ॥१०॥
उत्तरी हविर्धान के पिछले भाग में सामगान करते हैं जिसको 'सत्र की ऋद्धि' (यजु०
८।५२) कहते हैं। यहीं वे ऋद्धि को प्राप्त होते हैं, या उत्तर वेदी के उत्तर भाग में। परन्तु
दूसरी विधि अधिक प्रचलित है—॥११॥
अर्थात् उत्तरी हविर्धान के पिछले भाग में। "अगन्म ज्योतिरमृता ऽ अभूम" (यजु०
८।५२)—"हमको ज्योति मिल गई। हम अमर हो गये।" जो सत्र में बैठते हैं उनको ज्योति