शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
प्रकाशक :
प्रकाशक :
डॉ० चमन लाल गौतम
संस्कृति संस्थान
ख्वाजा कुतुब (वेद नगर)
बरेली २४३००३ (उ० प्र०)
फोन : ४२४२
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सम्पादक :
डॉ० चमनलाल गौतम
सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
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तृतीय संस्करण
सन् १६८१
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मुद्रक :
शैलेन्द्र वी० माहेश्वरी
नवज्योति प्रेस,
सेठ भीकचन्द मार्ग, मथुरा
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मूल्य :
बारह रुपये मात्र ।
विषय प्रवेश
भारतवर्ष का प्राचीन धार्मिक साहित्य निगम और आगम दो
श्रेणियों में विभाजित है। इनमें से “निगम” वेदमूलक साहित्य को
कहते हैं, जिसमें उपनिषद्, स्मृतियाँ, दर्शन आदि की गणना की जाती
है। इसके दो मुख्य लक्षण “विद्यास्थान” और “धर्मस्थान” कहे गये हैं-
पुराण न्याय मीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रत।
वेदाः स्थानानि 'विद्यानां धर्मस्य' च चतुर्दश ॥
(याज्ञवल्क्य)
यह वैदिक साहित्य भावना की दृष्टि से परा और अपरा—ऐसे
दो नामों से भी प्रसिद्ध हैं। “अपरा” भाग में धर्म का वर्णन लौकिक
व्यवहार की दृष्टि से किया गया हैं और “परा” का उद्देश्य ब्रह्म का
ज्ञान और उसकी प्राप्ति का मार्ग माना गया है। यद्यपि वेदमूलक अपरा
विद्या में लौकिक अभ्युदय का ध्यान रखा गया है, पर उसका स्वरूप
धर्मशास्त्रानुकूल और शिष्ट-समाज द्वारा मान्य होना आवश्यक है। इस
श्रेणी के वैदिक साहित्य का मूल भारतीय मनीषियों के मतानुसार
अनादि और नित्य माना गया है।
आगम-शास्त्र को स्रोत शिवजी को बतलाया जाता है। इस मार्ग
की अधिकांश रचनायें शिव-पार्वती के संवाद रूप में मिलती हैं। जिस
प्रकार प्रत्येक पुराण, चाहे वह विषय के विवेचन तथा भाषा-शैली की
दृष्टि से कितना ही बढ़िया अथवा घटिया हो, व्यासजी द्वारा रचित
बतलाया गया है, उसी प्रकार आगम ग्रन्थों का कर्तृत्व शिवजी के नाम
पर मान लिया गया है । इसका आशय यह समझा जा सकता है, कि
चाहे विभिन्न आगम ग्रन्थ अलग-अलग काल में अनेक विद्वानों द्वारा
लिखे गये हैं, पर उनका मूल आधार वही सिद्धान्त है, जिसे भगवान
शिव ने सर्वप्रथम लोक हितार्थ प्रकट किया था।
यद्यपि इस “शारदातिलक” को भी शिवजी के ज्ञान का ही प्रसाद
माना गया है, तो भी इसके लेखक श्री लक्ष्मण देशिकेन्द्र ने रचना का
उत्तरादायित्व अपना रखा है, जैसा कि ग्रन्थ के आरम्भ में ही कह दिया
गया है—
( ४ )
सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्ते प्रथम कारणम् ॥
अर्थात्—"मैं समस्त तंत्र ग्रन्थों के साररूप इस "शारदा तिलक"
को कथन करता हूँ। यह चारों पुरुषार्थों—धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की
प्राप्ति का प्रथम (प्रमुख) साधन है।"
आगे चलकर उन्होंने यह भी कह दिया है कि "भगवान् शिव ही
निर्गुण और सगुण स्वरूप हैं। प्रकृति से भिन्न तत्त्व निर्गुण होता है
और कलायुक्त को सगुण कहा जाता है। सत्, चित्, आनन्द से युक्त
कला सहित परमेश्वर से शक्ति हुई, उससे नाद प्रकट हुआ और फिर
बिन्दु का उद्भव हुआ। परा-शक्ति से परिपूर्ण यह साक्षात् तत्त्व इस
प्रकार बिन्दु, नाद और बीज—इन तीन भेदों में बंट गया । बिन्दु
शिव के स्वरूप वाला है, वीज, नाद और शक्ति उसी की होती है । इसी
को आगम शास्त्र के ज्ञाताओं ने 'समवाय' कहा है। संज्ञान, इच्छा और
क्रिया के स्वरूप वाले अग्नि, चन्द्र और सूर्य के स्वरूप से युक्त विद्यमान
"पर-बिन्दु" से एक अव्यक्त स्वरूप वाला रव ( ध्वनि ) उत्पन्न हुआ।
उसी को सब आगम-विशारदों ने "शब्द ब्रह्म" कहा है।"
इसमें सन्देह नहीं कि तांत्रिक क्रियाएँ और उनमें साधारण जनता
का विश्वास बहुत प्राचीन प्रवृत्ति है। यदि यह कहा जाय कि वह
उत्कृष्ट श्रेणी के श्रुतिमूलक ज्ञान तथा धार्मिक सिद्धान्तों से भी पूर्वकाल
की चीज है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं । उच्चकोटि के आध्यात्मिक
और ज्ञान तदनुकूल व्यवहार का विकास तो क्रमशः ही होता है।
पर टोना-टोटका और जादू-मन्त्र आदि का प्रचार घोर अशिक्षित और
ज्ञान शून्य जनता में भी हो सकता है। यह हम आज भी अपनी ग्रामीण
और निम्न जातियों की जनता में देख रहे हैं, जो सब प्रकार के रोगों
और कष्टों का कारण किसी दुष्ट अथवा असन्तुष्ट प्रेतात्मा को मानकर
ओझा अथवा स्थानों द्वारा उसे हटाये जा सकने में पक्का विश्वास रखते
हैं। ये सब क्रिया कलाप तन्त्र-शास्त्र के ही बिगड़े हुए या बदले हुए
रूप हैं इसमें सन्देह नहीं। यह बात प्रमुख तन्त्र ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से
( ५ )
कही गई है । "महानिर्वाण तंत्र" में शिवजी के मुख से कहलाया है—
कलौ तन्त्रोदिता मन्त्राः सिद्धास्तूर्ण फलप्रदाः ।
शस्ताः कर्मसु सर्वेषु जप यज्ञ क्रियादिषु ।।
निर्वीर्याः श्रौत जातीया विषहीनोरगाइव ।।
अर्थात्— 'कलियुग में तन्त्र-शास्त्र द्वारा प्रतिपादित मन्त्र ही सिद्ध
होकर शीघ्र फल दे सकते हैं । इसलिये सब प्रकार के धार्मिक कृत्यों में
जप, यज्ञ आदि में वे ही श्रेष्ठ और विहित हैं । इस युग में वैदिक कर्म-
काण्ड तो विषहीन सर्प की भाँति अशक्त हो जाते हैं ।"
तंत्र-ग्रन्थों में इस प्रकार के सैकड़ों वचनों के होते हुए भी विद्वान्
लोग इस सिद्धांत को सहज में स्वीकार नहीं कर सकते । जिस प्रकार
"महानिर्वाण" के रचयिता ने तंत्रोक्त क्रियाओं को फलवती बताया है,
उसी प्रकार भक्तिमार्ग के प्रधान आचार्य गोस्वामी तुलसीदास जी की
अमरवाणी भी हमको "रामायण" में सुनाई पड़ती है—'कलियुग केवल
नाम अधारा ।" इस अद्वितीय घोषणा पर विश्वास करके आज लाखों-
करोड़ों नर-नारी 'नाम संकीर्तन' में तल्लीन हैं और उसी को आत्मा की
सद्गति का सर्वोत्कृष्ट मार्ग मान रहे हैं ।
फिर भी तन्त्र-शास्त्र उपेक्षा का विषय नहीं है । किसी समय इस
शास्त्र की अभूतपूर्व उन्नति हुई थी और लाखों नर-नारी इससे लौकिक
और पारलौकिक सत्परिणाम प्राप्त करते थे । उस समय इतना अधिक
तन्त्र-साहित्य रचा गया है जिससे आज भी एक पूरा पुस्तकालय भर
सकता है । उन हजारों छोटे-बड़े ग्रन्थों में 'शारदा तिलक' एक महत्व
पूर्ण रचना है । तन्त्रोक्त धर्म और आचार-विचार, व्यावहार का प्रति-
पादन करने वाला यह एक प्रसिद्ध और मान्य ग्रन्थ है । इसमें तन्त्र-शास्त्र
के मतानुसार सृष्टि और विश्व-रचना का उचित विवेचन करते हुए
इसके व्यावहारिक पक्ष का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है । मनुष्य किस
प्रकार दीक्षा ग्रहण करके तांत्रिक-साधना का अधिकारी बन सकता है,
इसके प्रत्येक विधि-विधान का ऐसा स्पष्ट रूप से समझा कर वर्णन
किया गया है कि नया व्यक्ति भी उससे बहुत लाभ उठा सकता है । तन्त्र
मार्ग के रचयिताओं से अपने विधि विधानों और क्रियाओं को बहुत शक्ति