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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 511 में से

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पृष्ठ 8

( ४ )
सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्ते प्रथम कारणम् ॥
अर्थात्—"मैं समस्त तंत्र ग्रन्थों के साररूप इस "शारदा तिलक"
को कथन करता हूँ। यह चारों पुरुषार्थों—धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की
प्राप्ति का प्रथम (प्रमुख) साधन है।"
आगे चलकर उन्होंने यह भी कह दिया है कि "भगवान् शिव ही
निर्गुण और सगुण स्वरूप हैं। प्रकृति से भिन्न तत्त्व निर्गुण होता है
और कलायुक्त को सगुण कहा जाता है। सत्, चित्, आनन्द से युक्त
कला सहित परमेश्वर से शक्ति हुई, उससे नाद प्रकट हुआ और फिर
बिन्दु का उद्भव हुआ। परा-शक्ति से परिपूर्ण यह साक्षात् तत्त्व इस
प्रकार बिन्दु, नाद और बीज—इन तीन भेदों में बंट गया । बिन्दु
शिव के स्वरूप वाला है, वीज, नाद और शक्ति उसी की होती है । इसी
को आगम शास्त्र के ज्ञाताओं ने 'समवाय' कहा है। संज्ञान, इच्छा और
क्रिया के स्वरूप वाले अग्नि, चन्द्र और सूर्य के स्वरूप से युक्त विद्यमान
"पर-बिन्दु" से एक अव्यक्त स्वरूप वाला रव ( ध्वनि ) उत्पन्न हुआ।
उसी को सब आगम-विशारदों ने "शब्द ब्रह्म" कहा है।"
इसमें सन्देह नहीं कि तांत्रिक क्रियाएँ और उनमें साधारण जनता
का विश्वास बहुत प्राचीन प्रवृत्ति है। यदि यह कहा जाय कि वह
उत्कृष्ट श्रेणी के श्रुतिमूलक ज्ञान तथा धार्मिक सिद्धान्तों से भी पूर्वकाल
की चीज है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं । उच्चकोटि के आध्यात्मिक
और ज्ञान तदनुकूल व्यवहार का विकास तो क्रमशः ही होता है।
पर टोना-टोटका और जादू-मन्त्र आदि का प्रचार घोर अशिक्षित और
ज्ञान शून्य जनता में भी हो सकता है। यह हम आज भी अपनी ग्रामीण
और निम्न जातियों की जनता में देख रहे हैं, जो सब प्रकार के रोगों
और कष्टों का कारण किसी दुष्ट अथवा असन्तुष्ट प्रेतात्मा को मानकर
ओझा अथवा स्थानों द्वारा उसे हटाये जा सकने में पक्का विश्वास रखते
हैं। ये सब क्रिया कलाप तन्त्र-शास्त्र के ही बिगड़े हुए या बदले हुए
रूप हैं इसमें सन्देह नहीं। यह बात प्रमुख तन्त्र ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से