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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

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DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

'सौन्दर्यलहरी' देवी त्रिपुरसुन्दरी की स्तुति में सौ श्लोकों का प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है, जो परम्परा से आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। यह शाक्त परम्परा, विशेषकर श्रीविद्या उपासना का एक प्रमुख ग्रन्थ है। पहले इकतालीस श्लोक 'आनन्दलहरी' कहलाते हैं, जिनमें शिव और शक्ति की एकता, श्रीचक्र, मन्त्र और मूलाधार से सहस्रार तक कुण्डलिनी के आरोहण का वर्णन है। शेष श्लोकों में देवी के मुकुट से चरण-कमल तक के सौन्दर्य का काव्यमय चित्रण है। पहला श्लोक 'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्' बहुत उद्धृत होता है।

इस स्कैन के आरम्भिक पृष्ठों के अनुसार यह संस्करण स्वामी विष्णुतीर्थ महाराज का है, जिसमें मूल स्तोत्र के साथ हिन्दी अनुवाद और 'श्रीविद्या-तत्त्व कुण्डलिनी-रहस्य' नामक विवेचन है। मुखपृष्ठ पर वर्ष १९४९ अंकित है। स्वामी विष्णुतीर्थ शक्तिपात परम्परा के संन्यासी थे और कुण्डलिनी-योग पर उनके लेखन के कारण यह व्याख्या साधकों में विशेष रूप से पढ़ी जाती है।

आरम्भ में ललिता त्रिपुरसुन्दरी, लक्ष्मी, सरस्वती और श्रीयन्त्र का एक चित्र है। सूची-विवरण में प्रकाशक के रूप में श्रीवेंकटेश्वर प्रेस का नाम है। ४१५ पृष्ठों में हर श्लोक के साथ उसका अर्थ और साधना-परक व्याख्या दी गई है।

१३
इच्छा, श्री, ज्ञान, वैराग्य, कीर्ति, ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष
ये ८ भग कहलाते हैं, इनकी शक्तियों से युक्त भगवान
कहलाता है ।
परिस्स्रुता हविषा भावितेन प्रसंकोचे गलिते वैमनस्कः ।
शर्वः सर्वस्य जगतो विधाताधर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥१५॥
अर्थः—मदिरा की हविद्वारा अर्थात् आनन्दावेशरूपी हवि-
द्वारा भावना करने से प्रसंकोच के गलित होने पर अर्थात्
जीवभाव का त्याग करके वैमनस्क उनमनी भाव को प्राप्त होता
है । और कल्याण स्वरूप सारे जगत का विधाता धर्ता और
हर्ता उसको विश्वरूप में दिखने लगता है ।
इयं महोपनिषत् त्रैपुर्या यामक्षयं परमोर्गीर्भिरीट्टे ।
एषर्ग्यजुःपरमेतच्च सामायमथर्वेयमन्या च विद्या ॥१६॥
अर्थः—यह त्रिपुरा का महोपनिषत् है, जो अक्षय और
परम है, जिसको, यहां वाणी द्वारा कहा गया है । यह ऋक्
यजुर् है और वह परंसाम है, यह ही अथर्व और अन्य विद्या
स्वरूप है ।
ॐ ह्रीमोँ ह्रीमित्युपनिषत् । वाङ्मे मनसीति शांतिः ॥ हरिःॐ तत्सत्
इति ऋग्वेदीया श्रीत्रिपुरोपनिषत् समाप्ता ॥

१४
परिशिष्ट (३)
अथ अथर्ववेदीया भावनोपनिषत् का हिन्दी अनुवाद !
स्त्राविद्यापदतत्कार्यं श्रीचक्रोपरि भासुरम् ।
बिन्दुरूपंशिवकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥
ॐ भद्रंकणेभिः शृणुयामदेवा भद्र पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिररङ्गै स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्तिन
इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्तिनः पूषाविश्ववेदाः, स्वस्ति नस्ताक्षर्यो
अरिष्टनेमिः, स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः ३॥
हरिः ॐ ॥ आत्माका चारों ओर सकल ब्रह्माण्डमण्डल
को घेरेहुए, अखण्ड मण्डलाकार स्वयं प्रकाशमान ध्यान करना
चाहिये । ॐ श्रीगुरु सबकी कारणभूता शक्ति है । उससे ९ रंध्र
(छिद्र) वाला देह बनता है, वह ही ९ शक्ति स्वरूप श्रीचक्र
है । (जैसे देह में २ नेत्र, २ कान, २ नाक के छिद्र, १ मुख,
१ पायु और १ उपस्थ ये ९ छिद्र हैं वैसे ही श्रीचक्र में ४
श्रीकंठ और ५ शिव युवतियों वाले ९ प्रकृति स्वरूप त्रिकोण
हैं), (सौ. ल. श्लोक ११) । वाराही शक्ति पितृ रूपा है ।
(सौ. ल. श्लोक ३) और कुण्डलिनी शक्ति मातृ रूपा
है (सौ. ल. श्लोक ९), पुरुषार्थ सागर हैं, देह नवरत्नद्वीप
(सौ. ल. श्लोक ८), आधर नवक मुद्रा शक्तियां हैं (त्रैलोक्य

मोहन चक्र के तीसरे चतुष्कोण की प्रकट योगिनियां, अर्थात्
सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्व वशंकरी,
सर्वोन्मादिनी, सर्व महाङ्कुशा, सर्व खेचरी, सर्व बीजा और सर्व
योनि मुद्रा शक्तयः) । त्वगादि सप्त धातुओं से अनेक प्रकार
संयुक्त संकल्प कल्पतरु हैं, तेजकल्पकोद्यान हैं। (श्लोक ८)
जिह्वा के मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय और क्षार (लवण)
भेद से छः रस छः ऋतु हैं। क्रियाशक्ति पीठ है, ज्ञानशक्ति
कुण्डलिनी घर है, और इच्छाशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी हैं। ज्ञाता
होता, ज्ञान अग्नि और ज्ञेय हवि हैं; तीनों की अभेद भावना
श्रीचक्र पूजन है। नियति सहित श्रृंगार, विभत्स, रौद्र, अद्भुत,
भयानक, वीर, हास्य, करुण और शान्त ये ९ रस, त्रैलोक्य
मोहन चक्र के प्रथम बहिर चतुष्कोण पर स्थित् अणिमा, लघिमा,
महिमा, ईशत्व, वशित्व, प्राकाम्य, भुक्ति इच्छा, प्राप्ति और मुक्ति
१० सिद्धियां हैं (श्लोक ५१) । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,
मात्सर्य, पुण्य और पाप मध्य चतुष्कोणास्था ब्राह्मी, माहेश्वरी,
कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा और महालक्ष्मी
८ मातृ देवता हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश; श्रोत्र,
त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण; वाक्, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ, और
मनोविकार सर्वाशा परिपूरक दूसरे आवरण के १६ दलों पर
स्थित कामाकर्षिणी, बुद्धया कर्षिणी, अहंकाराकर्षिणी, शब्दस्पर्शा
रूपरसगंधाकर्षिणि, चित्ताकर्षिणी धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी,

१६
नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृता कर्षिणी और
शरीराकर्षिणी १६ नित्या कला गुप्त योगिनियां हैं। बोलना, चलना,
पकडना, मलमूत्र का विसर्जन करना मैथुन, हानि, लाभ और
उपेक्षा बुद्धि, सर्व संक्षोभण संज्ञक तीसरे आवरणके ८ दलों पर
स्थिता अनङ्ग कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, वेगिनी,
अङ्कुशा और मालिनी ८ गुप्ततर योगिनियां हैं । अलंबुसा, कुहू
विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा यशस्वती अथवा पयस्विनी, अश्विनी,
गांधारी, पूषा, शंखिनी, सरस्वती, ईडा, पिङ्गला, और सुषुम्ना ये
१४ नाडियां सर्व सौभाग्य दायक चतुर्थ चतुर्दशार आवरण के
१४ त्रिकोणों पर स्थिता सर्व संक्षोभिणी, सर्व विद्राविणी, सर्वा-
कर्षिणी सर्वाल्हादिनी, सर्वसंमोहनी सर्वस्तंभिनी, सर्वजृंभिणी,
सर्ववशंकरी, सर्वरंजनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसंपत्ति
पूरिणी, सर्वमंत्रमयी, और सर्वद्वंद्वक्षयंकरी १४ संप्रदाय योगिनियां
हैं । प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म, कृकर,
देवदत्त और धनजय १० वायु सर्वार्थ साधक संज्ञक बहिर्दशार
गत पांचवें आवरणके १० त्रिकोणों पर स्थिता सर्वसिद्धिप्रदा,
सर्वसंपत्प्रदा, सर्वप्रियकरी, सर्वमंगलकरी, सर्वकामदा, सर्वदुखःविमो-
चिनी, सर्वमृत्यु प्रशमनी, सर्वविघ्न निवारिणी, सर्वाङ्ग सुन्दरी, और
सर्वसौभाग्य दायिनी १० कुलोत्तीर्ण योगिनियां हैं । उक्त दस वायु
के संसर्ग की उपाधि भेद से जो रेचक पूरक, शोषक, दाहक,
प्लावक पंचप्राणादि की अमृत रूपी पालन करने वाली क्रियाएं

१७

हैं, और क्षारक, दारक, क्षोभक, मोहक, जृंभक ५, क्रियाएं जो
पालन नहीं करतीं नागादि की क्रियाएं है, जिन ने मनुष्यों का
मोहक दाहक खाया पीया भक्ष्य, लेह्य, चोष्य, और पेय चतुर्विध
अन्न पचता है सर्वरक्षाकर संज्ञक छठे अन्तर्दशार चक्र की सर्वज्ञा
सर्वशक्तिप्रदा, सर्वैश्वर्यप्रदा, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधि विनाशिनी,
सर्वाधारस्वरूपा, सर्वपापहरा, सर्वानन्दमयी सर्वरक्षा स्वरूपिणी,
और सर्वेप्सित फलप्रदा १० वह्निकला निगर्भ योगिनियां हैं ।
शीत, ऊषण, सुख, दुःख, इच्छा, सत्व, रजोगुण और तमोगुण
सर्वरोगहर संज्ञक अष्टार सप्तम आवरण के ८ त्रिकोणों में स्थिता
वशिनी कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयनी, सर्वेश्वरी
और कौलिनी वाग्देवता ८ रहस्य योनियां हैं । शब्द स्पर्श रूप-
रसगंध ५ तन्मात्रा ५ पुष्पबाण है, मन इक्षुधनु, वश्यबाण, राग
पाश और द्वेष अङ्कुश है । अव्यक्त, महत्, अहंकार तीनों
कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, और भगमालिनी देवियां हैं जिनका स्थान
सर्वसिद्धिप्रद अष्टम आवरण के मध्य त्रिकोण के अग्र भागों पर है ।
काल के परिणाम को दिखाने वाली १५ तिथियां १५ नित्या हैं,
श्रद्धानुरूपा बुद्धि देवता है, उन में कामेश्वरी सदा आनंदघना
परिपूर्ण स्वात्मैका रूपा है । इसका स्थान सर्वानन्दमय संज्ञक
नवम आवरण में अर्थात् विन्दुस्थान है, जिसको ललिता महात्रिपुर
सुन्दरी परापरातिरहस्य योगिनी कहते हैं ।
उपासना क्रमः—तर्पणादि के लिये जल सत्व है, कर्तव्या
कर्तव्य विचार उपचार है, कर्तव्यता है या नहीं यह अनूपचार

१८
अर्थात गौण उपचार है। वाह्य और अभ्यन्तर इन्द्रियों की रूप
ग्रहण करने की योग्यता बनी रहें यह इच्छा आवाहन है। उन
वाह्याभ्यन्तर कर्मों की एक विषय पर स्थिरता आसन है। रक्त
और शुक्ल पदों का एकीकरण पाद्य है। (ईडा और पिंगला
शक्ति के दोनों चरणों में शक्त्यात्मक पद रक्त है और शिवात्मक
पद शुक्ल है। आमोद और आनंद का प्रकाश आसनदान और
अर्घ्यदान। स्वतः सिद्ध स्वच्छता आचमन। चन्द्रमयी चिति से
सर्वांग स्रवण स्नान है। चिदग्नि स्वरूप परमानन्द शक्ति का
स्फुरण वस्त्र है। सत्ताइस भेदों से युक्त क्रिया, इच्छा और ज्ञान
रूपी ब्रह्म ग्रंथिवाली छः तन्तु की ब्रह्म नाडी ब्रह्म सूत्र है।
प्रत्येक क्रिया शक्ति, इच्छा और ज्ञान शक्ति के २७ भेद कहे
गये हैं। अधिभौतिक, अधिदैविक, और अध्यात्म भेद से तीनों
शक्तियां तीन तीन प्रकार की होती है। फिर प्रत्येक के मृदु
मध्य और तीव्र भेद से तीनों के नवधा भेद समझना चाहिये।
फिर प्रत्येक के सुख दुःख और मोहात्मक अथवा सात्विक राजसिक
और तामसिक भेद से सत्ताईस भेद होते हैं। मृदु मध्य और
तीव्र के स्थान पर मनसा वाचा कर्मणा भेद से भी तीनों को
त्रिधा माना जा सकता है। ब्रह्म सूत्र में तीन ग्रंथियां इच्छा ज्ञान
और क्रिया रूपा है और उसमें छः तन्तु है। तीनों की शक्तियां
शिव शक्ति अथवा ईडा पिंगला भेद से ६ प्रकार की होती हैं।
इस प्रकार २७ तारों का यज्ञोपवीत बट कर उसकी छ डोरियों

३९
ने सुषुम्ना रूपी ब्रह्म सूत्र बना है। अपने को वस्तु संग रहित पृथक
स्मरण करना विभूषण है। सच्चिदानन्द की परिपूर्णता का स्मरण
करना गंध है। सब विषयों का एकाग्रस्थिर मन से अनुसंधान
करना पुष्प हैं। उन को ही सर्वदा स्वीकार करना धूप है।
सच्चित् स्वरूप उल्काकाश देह वाला जो पवन के झोकों से न
हिलने वाला उर्द्ध शिखा युक्त प्रज्वलित दीप है। सर्वथा याता-
यात वर्जित एकान्तवास नैवेद्य है। तीनों अवस्थाओं का एकीकरण
तांबूल है। मूलाधार से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त और ब्रह्मरंध्र से मूलाधार
तक आना जाना प्रदक्षिणा है। तुर्यावस्था नमस्कार है। देह के
शून्य होने पर प्रमातृत्व का लय होना बलि हरण है। सत्य हैं
कर्तव्य और अकर्तव्य परन्तु उदासीनता के भाव में नित्य आत्मा
को मग्न रखना होम है। स्वयं उसकी पादुकाओं में निमग्नता
परिपूर्ण ध्यान है। इस प्रकार तीन मुहूर्त्त भावना करने वाला जीवन्मुक्त
हो जाता है। उसे सायुज्य देवात्मैक्य सिद्धि होती है। उसके
चिन्तित कार्य बिना यत्न के सिद्ध होते हैं। वह ही शिवयोगी
कहलाता है। यह कादि हादि मत के अनुसार भावना प्रतिपादित
की गई है। जो ऐसा जानता है वह जीवन मुक्त हो जाता है।
वह जीवन मुक्त हो जाता है।
इति उपनिषत् । ॐ भद्रं कर्णे भिरिति शान्तिः।
हरीः ॐ तत्सत् ।
इत्यथर्वण वेदे भावनोपनिषद् हिन्दी अनुवाद।

२०
परिशिष्ट (४)
अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ।
न मंत्रं नो यंत्रंतदपि च नजाने स्तुति महो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च नजाने स्तुति कथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥
अर्थ:—हे मां ! मैं न यंत्र जानता हूं, न मंत्र, और फिर
अहो स्तुति भी तो नहीं जानता, आवाहन ध्यान और तेरी स्तुति
कथा कुछ नहीं जानता, तेरी मुद्रा नहीं जानता, और न रोना
ही जानता हूं, परन्तु हे मात ! इतना तो जानता हूं कि तेरा
अनुसरण करने से क्लेशों का नाश होता है ।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रोजायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥
अर्थ:—तेरी पूजा की विधि का ज्ञान न होने के कारण
धन के अभाव से और आलस्य से एवं विधिवत् पूजा करने में
अशक्य होने के कारण जो तेरे चरणों से अलग रहा हूं, वह
मेरा अपराध क्षमा किया जाने के योग्य है । हे जननि सब का

२१
उद्धार करने वाली शिवे ! कुपुत्र तो हो सकता है परन्तु कहीं
भी कुमाता नहीं होती ।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संतिसरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तवसुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥
अर्थः—पृथ्वी पर तेरे, हे मां ! बहुत से सरल पुत्र हैं,
परन्तु उनमें मैं भी एक विरल चपल तेरा सुत हूं । हे शिवे !
जो तूने मुझे त्याग रखा है, यह तेरे लिये उचित नहीं है, क्योंकि
कुपुत्र तो होते हैं परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वादत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥
अर्थः—हे जगज्जननि ! हे मां ! मैंने तेरे चरणों की
सेवा कभी नहीं की, और हे देवि ! मैं तुझे बहुत धन भी न दे
सका, तौ भी तू जो मेरे ऊपर निरुपमं स्नेह करती हैं, ठीक है
क्योंकि कुपुत्र तो हो सकते है, परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं
होती ।

२२
परित्यक्ता देवा विविधविध सेवा कुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥
अर्थ:—विविध प्रकार से सेवा करते-करते व्याकुल होकर
अब ८५ वर्ष से भी अधिक वय हो जाने पर मैंने सब देवों
कोछोड दिया है, यदि अब हे मां ! तेरी भी कृपा नहीं होगी,
नो हे गणेश जननि ! मैं निरालम्ब किसकी शरण में जाऊं ?
यहां ८५ वर्ष की आयु से अधिक समय अन्य देवताओं
की सेवा में व्यतीत हो जाने के उल्लेख से यह शंका होती है
कि यह स्तोत्र आदि शंकर भगवत्पाद का विरचित नहीं है ।
संभव है कि चारों मठों की आचार्य परंपरा में किसी अन्य
आचार्य का यह विरचित हो सकता है, क्योंकि सब मठों के
आचार्य शंकराचार्य ही कहलाते हैं । अन्यथा ८५ वर्ष से भी
अधिक वय कहने से सामान्य लोगों का दीर्घायु तक अन्य देव-
ताओं की सकाम उपासना में ही लगे रहने की ओर संकेत है ।
श्वपाकोजल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विरहति चिरं कोटि कनकौः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

२३
अर्थः — हे अपर्णे ! तुम्हारे मंत्र का एक वर्ण भी कान
में पड़जाने का जब यह फल है, कि बकवास करने वाला अबोध
भी मधुपाक जैसी मधुरवाणी का वक्ता हो जाता है और रंक
भी किरोडों सुवर्ण की मुद्राओं में दीर्घ काल तक निर्भय विहार
करता है । तो कौन मनुष्य जान सकता है कि हे जननि ,
जप की विधि के अनुसार जप करने का क्या फल होगा.
क्योंकि जप विधि को कौन जानता है ? अर्थात् कोई नहीं
जानता ।
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पट धरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
अर्थः—हे भवानि ! चिता की भस्म कालेप करने वाला,
हलाहल खाने वाला, दिगम्बर जटाधारी, कंठ में सर्पों का हार
पहिनने वाला, पशुओं का पति, कपाली ( हाथ में भिक्षा के
लिये खप्पर लिये ) भूतेश ईश्वर जगत की एक मात्र ईशन (शासन)
करने की पदवी धारण करता है. इसका कारण तेरा पाणिग्रहण
करने की परिपाटी का ही फल है ।
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
नविज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।

२४
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८
अर्थ:—हे चन्द्रमुखि जननि ! न मुझे मोक्ष की इच्छा
है न संसारिक वैभव की इच्छा है, न विज्ञान की ही अपेक्षा
है और न सुख की इच्छा, इसलिये यह ही याचना करता हूं
कि मेरा जीवन 'मृडानी' रुद्राणी, शिव २ भवानी' इस प्रकार
जप करता हुआ बीते ।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिन्तनपरै र्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
अर्थ:— हे श्यामे ! अम्बे ! मेरेसे न तो विधिपूर्वक तेरी
विविध सामग्रियों से पूजा ही हुई है ! और मेरी रूखे चिन्तन
में लगी वाणी द्वारा क्या नहीं किया गया है ? तो भी यदि
तूही मुझ अनाथ पर जो कुछ कृपा रखती है, हे मां वह तेरे
लिये उचित है । (जो मुझ जैसे कुपात्र पर कृपा तो है ही )
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा :
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥

२७
अर्थः—हे दुर्गे, हे दया के सागर की ईश्वरि ! आपत्तियों
में डूबा हुआ मैं तेरा स्मरण करता हूं मेरी इसमें शठता है ऐसा
मत समझना, क्योंकि क्षुधा और तृषा से दुःखी बालक ही माँ
को याद करता है ।
जगदम्ब विचित्रमत्रकिं, परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराध परम्परावृतं, न हिमाता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥
अर्थः—हे जगदम्ब ! इसमें यहां आश्चर्य ही क्या है
कि मेरे ऊपर तेरी पूर्ण दया है; अपराधों पर अपराध करते
रहने पर भी, माता पुत्र की उपेक्षा नहीं करती ।
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
अर्थः—मेरे समान कोई पापी नहीं, और तेरे समान
पापों का नाश करने वाली दूसरी नहीं, ऐसा जानकर हे महा
देवि, जैसा योग्य समझो वैसा करो ।
इति श्री शङ्कराचार्य विरचितं देव्यपराधक्षमा प्रार्थना स्तोत्रम्
संपूर्णम् ॥

रिक्त पृष्ठ

शुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति अशुद्धि शुद्धि
६ १६ साधनौपाय साधनोपाय
०. १९ युद्ध शुद्ध
१६ १२ के में
” २० शान्ता शान्तो
१८ ४ संक्या संख्या
२३ ११ बहिद्रष्टि बहिर्दृष्टि
३० ८ उच्छ्श्वास उच्छ्वास
३० ११ दु. स. दु. श.
३९ १०, १३ हो जायगी लग जायगी
३९ अन्तिम ऐ स्वरात्मक ऐ उसका स्वरात्मक
४० १७ शांतातीता शांत्यातीता
४४ १७ सृस्ट्रत्व सृष्टृत्व
५९ ११ गायत्री का भी गायत्री का ही
६१ ३ शक्ति अनन्तता शक्ति की अनन्तता
” ४ शैरि शौरि
६६ ९ संमार संसार
७२ १८ शाक्षात् साक्षात्

[ २ ]
७४ १४ निम्नोद्धत निम्नोद्धृत
७५ २ वराभित्यभिनया वराभीत्यभिनया
८३ ६ शक्त शक्ति
,, १३ नाया माया
८९ ६, ७ तमोगु रजोगु तमोगुण रजोगुण
,, अन्तिम रजित रंजित
१०० ७, ८ रुद्रग्रंथि के स्थान पर ब्रह्मग्रंथि और ब्रह्मग्रंथि
के स्थान पर रुद्रग्रंथि पढ़ें
१०६ ६ जसे जैसे
११९ ७ शा. नि. शा. ति.
१३२ १५ हरमहिशि हरमहिषि
१३३ ५ हराधींगिनी हरार्धांगिनी
१३४ १३ सूर्या: सूर्य:

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