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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 415 में से

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पृष्ठ 407

२१
उद्धार करने वाली शिवे ! कुपुत्र तो हो सकता है परन्तु कहीं
भी कुमाता नहीं होती ।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संतिसरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तवसुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥
अर्थः—पृथ्वी पर तेरे, हे मां ! बहुत से सरल पुत्र हैं,
परन्तु उनमें मैं भी एक विरल चपल तेरा सुत हूं । हे शिवे !
जो तूने मुझे त्याग रखा है, यह तेरे लिये उचित नहीं है, क्योंकि
कुपुत्र तो होते हैं परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वादत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥
अर्थः—हे जगज्जननि ! हे मां ! मैंने तेरे चरणों की
सेवा कभी नहीं की, और हे देवि ! मैं तुझे बहुत धन भी न दे
सका, तौ भी तू जो मेरे ऊपर निरुपमं स्नेह करती हैं, ठीक है
क्योंकि कुपुत्र तो हो सकते है, परन्तु कहीं भी कुमाता नहीं
होती ।