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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 415 में से

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पृष्ठ 406

२०
परिशिष्ट (४)
अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ।
न मंत्रं नो यंत्रंतदपि च नजाने स्तुति महो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च नजाने स्तुति कथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥
अर्थ:—हे मां ! मैं न यंत्र जानता हूं, न मंत्र, और फिर
अहो स्तुति भी तो नहीं जानता, आवाहन ध्यान और तेरी स्तुति
कथा कुछ नहीं जानता, तेरी मुद्रा नहीं जानता, और न रोना
ही जानता हूं, परन्तु हे मात ! इतना तो जानता हूं कि तेरा
अनुसरण करने से क्लेशों का नाश होता है ।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रोजायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥
अर्थ:—तेरी पूजा की विधि का ज्ञान न होने के कारण
धन के अभाव से और आलस्य से एवं विधिवत् पूजा करने में
अशक्य होने के कारण जो तेरे चरणों से अलग रहा हूं, वह
मेरा अपराध क्षमा किया जाने के योग्य है । हे जननि सब का