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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

२२
परित्यक्ता देवा विविधविध सेवा कुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥
अर्थ:—विविध प्रकार से सेवा करते-करते व्याकुल होकर
अब ८५ वर्ष से भी अधिक वय हो जाने पर मैंने सब देवों
कोछोड दिया है, यदि अब हे मां ! तेरी भी कृपा नहीं होगी,
नो हे गणेश जननि ! मैं निरालम्ब किसकी शरण में जाऊं ?
यहां ८५ वर्ष की आयु से अधिक समय अन्य देवताओं
की सेवा में व्यतीत हो जाने के उल्लेख से यह शंका होती है
कि यह स्तोत्र आदि शंकर भगवत्पाद का विरचित नहीं है ।
संभव है कि चारों मठों की आचार्य परंपरा में किसी अन्य
आचार्य का यह विरचित हो सकता है, क्योंकि सब मठों के
आचार्य शंकराचार्य ही कहलाते हैं । अन्यथा ८५ वर्ष से भी
अधिक वय कहने से सामान्य लोगों का दीर्घायु तक अन्य देव-
ताओं की सकाम उपासना में ही लगे रहने की ओर संकेत है ।
श्वपाकोजल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विरहति चिरं कोटि कनकौः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥