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रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

आयुर्वेद का महत्व

आयुर्वेद का महत्व

हमारे देश में पहले आयुर्वेद का बड़ा महत्व था। टीके नहीं थे। चेचक बगैरह से बचाने के लिए माताएँ बच्चों को घुट्टी पिलाती थीं। आज हम अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हो गये हैं, इसलिए उम्र कम होती जा रही है, बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही हैं।

मेडिकल साईंस ने बड़ी तरक्की की, वैज्ञानिक उन्नति पर हैं, पर वे कुछ बीमारियों की दवा नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं। उदाहरण के लिए एड्स। यह जानलेवा है। रोगी मरेगा-ही-मरेगा। आखिर क्या चीज़ है एड्स। शरीर के अंदर रोग-निरोधक शक्ति का ह्रास ही एड्स है। वो कीटाणु इतने ठीठ हैं कि आसानी से मरते भी नहीं हैं। यदि तेज दवा दी जाएगी तो पहले इंसान ही मर जायेगा। इसी तरह जितनी भी दवाएँ डॉ० देता है, वो रोग के कीटाणुओं की तो खबर लेती ही है, साथ में आपकी भी खबर लेती है। जैसे मच्छरों को भगाने के लिए जो आप गुड नाइट बगैरह का इस्तेमाल करते हैं, वो मच्छरों की खबर तो लेगा ही, साथ ही आपकी भी खबर ले लेगा। मैंने एक बार अखबार में पढ़ा कि यदि छोटे बच्चे को किसी बंद कमरे में सुलाकर गुड नाइट लगा दी जाए तो वो सुबह तक मर भी सकता है। इस तरह दवा भी आपको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाकर ही जाती है।

तो एड्स के कीटाणु जल्दी पनपते हैं। उनका हमला रक्त पर है। भाई, रक्त के ग्राहकी बहुत हैं। हम जो भी खा रहे हैं, उसी से तो रक्त बन रहा है। आदमी उत्तम खाता है। जो शेर एक बार नरभक्षी हो जाए, वो फिर किसी दूसरे जानवर का माँस खाना ही नहीं चाहता है। मनुष्य उत्तम पदार्थ खाता है। काजू, बादाम आदि कोई जानवर तो खाता नहीं है। इसलिए जो शेर आदमी का माँस खा लिया, वो बाकी जानवर की तरफ जाता ही नहीं है।

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हरेक कीटाणु को हमला ही रक्त पर है। वो कीटाणु तो दवा से भी नहीं मरते हैं और बहुत तेज दवा इंसान को दी नहीं जा सकती, क्योंकि पहले इंसान ही मर जायेगा। हर दवा का तो साइड इफेक्ट है। ऐलोपैथी यहाँ फेल है। डॉ० लोगों के पास तो तीन चीजें रह गयी हैं— 1. एन्टिसेप्टिक 2. पेनिकिलर 3. कुत्रिम विटामिन

इनके बाद शल्य चिकित्सा है। पर ये तीनों चीजें हमारे शरीर का नाश ही करती हैं। कुत्रिम विटामिन लेते हैं तो जो हमारे शरीर में विटामिन बनाने वाली नाडियाँ हैं, वो काम करना बंद कर देती हैं, कमजोर हो जाती हैं। क्योंकि जैसे बना-बनाया मिल गया तो बनाने का आलस नहीं आ जाता है! दूसरा जो भी एन्टिसेप्टिक ले रहे हैं, वो कीटाणुओं के साथ-2 आपकी भी खबर ले रही है। आयुर्वेद साइड इफेक्ट से हटकर है।

एक तो हमारे चार मूल वेद हैं, फिर चार उपवेद भी हैं। एक है- आयुर्वेद, जिनके रचयिता प्रजापति ब्रह्मा हैं वैसे, लेकिन अश्विनी कुमार और धनवंत्री कहा जाता है। देवताओं का डॉ० अश्विनी कुमार तो मेडिकल से बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। नाक पर अश्विनी कुमार का वास है। कोई भी चीज खाने लगे तो यह बताता है कि खानी चाहिए कि नहीं। यह सृष्ठकर बताता है। इस शरीर में बड़ा जोरदार सिस्टम है। तो 14 देवताओं में अश्विनी कुमार का वास नाक पर है। यह अपनी ड्यूटी कर रहा है। आयुर्वेद पर 42 कामसूत्र के शास्त्र भी लिखे गये हैं। गुरुकुलों में ऋषि-मुनि इन चीजों की भी शिक्षा देते थे।

तो दूसरा है- धनुर्वेद। इसके रचयिता हैं- विश्वामित्र। सभी शस्त्रों का प्रयोग, शस्त्र चलाने की कला, राजनीति, प्रजा के साथ व्यवहार आदि का इसमें उल्लेख है। तलवार कैसे चलानी है, भाला कैसे चलाना है आदि इसमें बताया गया है।

तीसरा है-गन्धर्ववेद। इसमें गायन, शृंगार आदि का वर्णन है। गले का कैसे सजाना है, जूड़ा कैसे बाँधना है आदि। लोग कहते हैं कि

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ब्यूटी-पार्लर का कोर्स करके आई है। यह सब तो हमारे धर्म-शास्त्रों से चुराकर वो ले गये हैं। यहाँ तो पहले ही था।

तो चौथा उपवेद है—अर्थवेद। वो मूल वेद तो अथर्ववेद है, पर यह अर्थवेद है। इसमें धन-उपार्जन के फार्मूले बताए गये हैं। किस मौसम में क्या खरीद करनी चाहिए, यह भी बताया गया है। लोग कहते हैं बिजनेस एण्ड मैनेजमेंट। भाइयों, यह सब तो यहाँ से लिया गया है। यह सब यहाँ का मूल है। हमारा देश आगे था, आगे है। तो उसमें यह भी लिखा है कि आपका आवास कैसा हो। आज जो इंजीनियर बता रहे हैं, वो सब उसमें है। जैसे उत्तर दिशा में शोचाल्य नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वायुकोण की तरफ रखा तो दिन-भर हवा द्वारा वही गंद बदबू आती रहेगी।

...तो एड्स पर चिकित्सा विज्ञान फेल हो गया। वनस्पति जगत की पूरी-पूरी खबर उसे नहीं हुई। वनस्पति जगत में कई लाख किस्म के पौधे हैं। हरेक का बड़ा महत्व है। लोग नहीं जानते हैं, इसलिए आश्चर्यचकित हैं एड्स के मरीजों को पीड़ित देखकर।

मैंने एड्स पर शोध किया। मैंने उन जड़ी-बूटियों को देखा, जिन्हें कीड़ा नहीं लगता है। 27 लाख कीटों में से कोई भी कीड़ा उन पौधों में नहीं लग रहा था। उन बूटियों पर शोध किया। जैसे नीम, कनियारी आदि बूटियों पर कीड़ा नहीं लग रहा है। पपीते पर भी कीड़ा नहीं लग रहा है। ऐसे अन्य बूटियाँ भी हैं। मैंने प्रयोग किया। एक फौज के सूबेदार को मेरा शिष्य अरुणाचल प्रदेश से लाया। वो अंतिम स्टेज पर था। डॉ० तो ऐसा कर देगा, ऐसी दवा दे देगा कि यदि 3 साल में मरना होगा तो 5 पाँच साल में मरेगा। पर मरेगा। क्योंकि कीटाणु बढ़ते ही जायेंगे। उनका विकास रुकेगा नहीं।

एड्स के मरीज को यदि बुखार हुआ तो उतरेगा नहीं, यदि जुकाम हुआ तो चलता ही रहेगा, क्योंकि रोग-प्रतिरोधक शक्ति ही नहीं रहती है। फिर सभी कीटाणु हमला बोल देते हैं। कीटाणु बढ़ते जाते हैं, उसने तो मरना ही है।

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तो जिन दवाओं को कीड़ा नहीं लगता, जब वो खून में पहुँचेंगी, उसी से तो माँस भी बनेगा। फिर उस माँस के पास कीड़ा आयेगा ही नहीं। इस तरह नयी पीढ़ी पनपेगी ही नहीं, विकास भी रुक जायेगा। मैंने पहले अपने पर शोध किया, सोचा कि यदि शरीर पर कुछ असर हुआ तो निपट लूँगा।

तो बड़ी औषधियाँ हैं, जिन्हें कोई भी कीड़ा नहीं लगता है। जोजड़े देखे, उनके चारों तरफ काँटे हैं। कनियारी में भी काँटे हैं। कीड़ा पहुँचता नहीं है। ये बड़ी संजीवनी-सी बूटियाँ हैं।

...तो मैंने तीन दिन उसे आश्रम में रखा, वो चीज़ दी। वो कहने लगा कि मुझे अब रोग नहीं है। ऐसे ही कुछ और लोगों को भी वो दवा दी। पाँच साल से भी ज्यादा हो गये, वे स्वस्थ हैं।

जब भी वो दवा रक्त में पहुँचेंगी तो उन कीटाणुओं का विकास रुक जायेगा, आगे भी नहीं होगी। तो कहने का भाव है कि बनस्पति जगत में बहुत कुछ है।

मेरे पास वैद्य भी आते हैं। पर मेरा लक्ष्य इससे हटकर है। यह इसलिए कि लोगों को शरीर का भी लाभ मिले। शरीर स्वस्थ होगा तो भक्ति-ध्यान भी ठीक हो पायेगा।

पहला स्वर्ग नीरोगी काया।

इसलिए सोचा कि यदि लोगों को लाभ मिल जाए तो अच्छा ही तो है। आप सोचें कि पहले ऋषि-मुनियों की आयु भी लंबी थी, उन्हें इन चीजों का ज्ञान था।