इस ग्रन्थ के बारे में
पद्मपुराण अठारह महापुराणों में सबसे विशाल पुराणों में से एक है, जिसकी रचना परम्परा महर्षि वेदव्यास को देती है। इसका नाम उस कमल से जुड़ा है जिससे ब्रह्मा प्रकट हुए। यह वैष्णव पुराण है, पर इसमें शिव, शक्ति, तीर्थ, व्रत और धर्म के विषय भी विस्तार से आते हैं।
यह गीताप्रेस, गोरखपुर का 'संक्षिप्त पद्मपुराण' है, जो सचित्र और केवल हिन्दी में है। इसके सम्पादक तथा संशोधक श्री जयदयाल गोयन्दका हैं। मुद्रण-विवरण के अनुसार संवत् 2043 से 2056 तक इसकी 75,000 प्रतियाँ छपीं और संवत् 2058 में बारहवाँ संस्करण निकला।
ग्रन्थ पाँच खण्डों में है: सृष्टिखण्ड, भूमिखण्ड, स्वर्गखण्ड, पातालखण्ड और उत्तरखण्ड। सृष्टिखण्ड में भीष्म और पुलस्त्य के संवाद के रूप में सृष्टि-क्रम, समुद्र-मन्थन और लक्ष्मी का प्राकट्य, सती का देह-त्याग और दक्ष-यज्ञ का विध्वंस, पृथु का चरित्र, श्राद्ध-विधि, पुष्कर में ब्रह्मा का यज्ञ और सरस्वती का प्राकट्य, भीमद्वादशी व्रत, श्रीराम द्वारा शम्बूक-वध और राजा श्वेत की कथा तथा दण्डकारण्य की उत्पत्ति जैसे प्रसंग आते हैं। उत्तरखण्ड में गीता-माहात्म्य और कार्तिक-माहात्म्य जैसे प्रसिद्ध अंश हैं। लगभग 1018 पृष्ठों का यह संस्करण पुराण-कथाओं को सरल हिन्दी में पढ़ने वालों के लिए है।
उत्तरखण्ड ] * त्रिदेवोंमें श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्थका उपसंहार * १००१
लिये ही मैंने आपकी छातीपर पैर रखा है। गोविन्द! कृपानिधे! मेरे इस अपराधको क्षमा करें।'
ऐसा कहकर महर्षि भृगुने बारम्बार भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया। भगवान्के धाममें रहनेवाले दिव्य महर्षियोंने भृगुजीका भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। वहाँसे प्रसन्नचित्त होकर वे यज्ञमें महर्षियोंके पास लौट आये। उन्हें आया देख महर्षियोंने उठकर नमस्कार किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की। तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ भृगुने उन महर्षियोंसे सब बातें बतायीं। उन्होंने कहा— 'ब्रह्माजीमें रजोगुणका आधिक्य है और रुद्रमें तमोगुणका। केवल भगवान् विष्णु शुद्ध सत्त्वमय हैं। वे कल्याणमय गुणोंके सागर, नारायण, परब्रह्म तथा सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके देवता हैं। वे ही विप्रोंके लिये पूजनीय हैं। उनके स्मरणमात्रसे पापियोंकी भी मुक्ति हो जाती है। उनका चरणोदक तथा भोग लगाया हुआ प्रसाद समस्त मनुष्यों और विशेषतः ब्राह्मणोंके सेवन करनेयोग्य, परमपावन तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् विष्णुको निवेदन किये हुए हविष्यका ही देवताओंके लिये हवन करे और वही पितरोंको भी दे। वह सब अक्षय होता है। अतः द्विजवरो ! तुम आलस्य छोड़कर जीवनभर भगवान् विष्णुका पूजन करो। वे ही परम धाम हैं और वे ही सत्य ज्योति। अष्टाक्षरमन्त्रके द्वारा विधिपूर्वक पुरुषोत्तमका पूजन और उनके प्रसादका सेवन करना चाहिये। श्रीविष्णु ही सब यज्ञोंके भोक्ता परमेश्वर हैं—ऐसा जानकर उन्हींके उद्देश्यसे सदा हवन, दान और जप करे।
वसिष्ठजी कहते हैं— भृगुजीके ऐसा कहनेपर समस्त निष्पाप महर्षियोंने उन्हें नमस्कार किया और उन्हींसे मन्त्रकी दीक्षा ले भगवान् विष्णुका पूजन किया। राजन् ! ये सब बातें मैंने प्रसङ्गवश तुम्हें बतलाई हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब देवताओंमें पावन एवं पुरुषोत्तम हैं। अतः यदि तुम परम पदको प्राप्त करना चाहते हो तो उन श्रीरघुनाथजीकी ही शरणमें जाओ। राजन् ! यह समस्त पुराण वेदके तुल्य है। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें साक्षात् ब्रह्माजीने इसका उपदेश किया था। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, उसकी भगवान् लक्ष्मीपतिमें अनन्य भक्ति होती है। वह विद्यार्थी हो तो विद्या, धर्मार्थी हो तो धर्म, मोक्षार्थी हो तो मोक्ष और कामार्थी हो तो सुख पाता है। द्वादशी तिथिको, श्रवण नक्षत्रमें, सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणके अवसरपर, अमावास्या तथा पूर्णिमाको इसका भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये। जो एकाग्रचित्त हो प्रतिदिन इसके आधे या चौथाई श्लोकका भी पाठ करता है वह निश्चय ही एक हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। इस प्रकार यह परम गुह्य पद्मपुराण कहा गया। यदि परम पदकी प्राप्ति चाहते हो तो सदा भगवान् हृषीकेशकी आराधना करो।
सूतजी कहते हैं— अपने गुरु वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर नृपश्रेष्ठ राजा दिलीपने उनको प्रणाम किया और यथायोग्य पूजा करके उनसे विधिपूर्वक विष्णुमन्त्रकी दीक्षा ली। फिर आलस्यरहित हो उन्होंने जीवनभर श्रीहृषीकेशकी आराधना करके समयानुसार योगियोंको प्राप्त होनेयोग्य सनातन विष्णुधामको प्राप्त कर लिया।
—★—
उत्तरखण्ड सम्पूर्ण
—★—
श्रीपद्मपुराण समाप्त
| प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तथा संकर्षणाय च। | नमो ब्रह्मण्यदेवाय सर्वदेवस्वरूपिणे ॥ |
| वाराहवपुषे नित्यं त्रयीनाथाय ते नमः। | नमो ब्रह्मण्यदेवाय नागपर्यङ्कशायिने ॥ |
| राजीवदलनेत्राय राघवाय नमो नमः। | मायया मोहिताः सर्वे देवाश्च ऋषयस्तव ॥ |
| न जानन्ति महात्मानं सर्वलोकेश्वरं प्रभो। | त्वां न जानन्ति भगवन्सर्ववेदविदोऽपि हि ॥ |
(२८२।७०—८२)