पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९२-गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दानधर्मका वर्णन
स्वर्गखण्ड ] * गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दान-धर्मका वर्णन * ३९३
मृत्युका समाचार स्वयं दूसरोंको न सुनाये। माल बेचते समय बेमोलका भाव अथवा झूठा मूल्य न बताये। विद्वान्को उचित है कि वह मुखके निःश्वाससे और अपवित्रावस्थामें अग्निको प्रज्वलित न करे। पहलेकी की हुई प्रतिज्ञा भङ्ग न करे। पशुओं, पक्षियों तथा व्याघ्रोंको परस्पर न लड़ाये। जल, वायु, और धूप आदिके द्वारा दूसरेको कष्ट न पहुँचाये। पहले अच्छे कर्म करवाकर बादमें गुरुजनोंको धोखा न दे। सबेरे और सायंकालको रक्षाके लिये घरके दरवाजोंको बंद कर दे। विद्वान् ब्राह्मणको भोजन करते समय खड़ा होना और बातचीत करते समय हँसना उचित नहीं है। अपनेद्वारा स्थापित अग्निको हाथसे न छूए तथा देरतक जलके भीतर न रहे। अग्निको पंखेसे, सूपसे, हाथसे अथवा मुँहसे न फूँके। विद्वान् पुरुष परायी स्त्रीसे वार्तालाप न करे। जो यज्ञ कराने योग्य नहीं है, उसका यज्ञ न कराये। ब्राह्मण कभी अकेला न चले और समुदायसे भी दूर रहे। कभी देवालयको बायें रखकर न जाय, वस्त्रोंको कूटे नहीं और देवमन्दिरमें सोये नहीं। अधार्मिक मनुष्योंके साथ भी न चले। रोगी, शूद्र तथा पतित मनुष्योंके साथ भी यात्रा करना मना है। द्विज बिना जूतेके न चले। जल आदिका प्रबन्ध किये बिना यात्रा न करे। मार्गमें चिताको बायें करके न जाय। योगी, सिद्ध, व्रतधारी, संन्यासी, देवालय, देवता तथा याज्ञिक पुरुषोंकी कभी निन्दा न करे। जान-बूझकर गौ तथा ब्राह्मणकी छायापर पैर न रखे। झाडूकी धूलसे बचकर रहे। स्नान किया हुआ वस्त्र तथा घड़ेसे छलकता हुआ जल—इन दोनोंके स्पर्शसे बचना चाहिये। द्विजको उचित है कि वह अभक्ष्य वस्तुका भक्षण और नहीं पीने योग्य वस्तुका पान न करे।
गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दान-धर्मका वर्णन
व्यासजी कहते हैं— द्विजवरो ! ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये; जो ब्राह्मण आपत्कालके बिना ही मोहवश या स्वेच्छासे शूद्रान्न भक्षण करता है, वह मरकर शूद्र-योनिमें जन्म लेता है। जो द्विज छः मासतक शूद्रके कुत्सित अन्नका भोजन करता है, वह जीते-जी ही शूद्रके समान हो जाता है और मरनेपर कुत्ता होता है। मुनीश्वरो ! मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र— जिसके अन्नको पेटमें रखकर प्राण-त्याग करता है, उसीकी योनिमें जन्म लेता है। नट, नाचनेवाला, चाण्डाल, चमार, समुदाय तथा वेश्या—इन छःके अन्नका परित्याग करना चाहिये। तेली, धोबी, चोर, शराब बेचनेवाले, नाचने-गानेवाले, लुहार तथा मरणाशौचसे युक्त मनुष्यका अन्न भी त्याग देना चाहिये।* कुम्हार, चित्रकार, सूदखोर, पतित, द्वितीय पति स्वीकार करनेवाली स्त्रीके पुत्र, अभिशापग्रस्त, सुनार, रङ्गमञ्चपर खेल दिखाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले, व्याध, वन्ध्या, रोगी, चिकित्सक (वैद्य या डाक्टर), व्यभिचारिणी स्त्री, हाकिम, नास्तिक, देवनिन्दक, सोमरसका विक्रय करनेवाले, स्त्रीके वशीभूत रहनेवाले, स्त्रीके उपपतिको घरमें रखनेवाले, पुरुष-परित्यक्त, कृपण, जूठा, खानेवाले, महापापी, शस्त्रोंसे जीविका चलानेवाले, भयभीत तथा रोनेवाले मनुष्यका अन्न भी त्याज्य है। ब्रह्मद्वेषी और पापमें रुचि रखनेवालेका अन्न, मृतकके श्राद्धका अन्न, बलिवैश्वदेवरहित रसोईका अन्न तथा रोगीका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। संतानहीन स्त्री, कृतघ्न, कारीगर और नाजिर तथा परिवेत्ता (बड़े भाईको अविवाहित छोड़कर अपना विवाह करनेवाले) का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। पुनर्विवाहिता स्त्री तथा दिधिषू-पत्तिका † अन्न भी त्याज्य है। अवहेलना,
* नटान्नं नर्तकान्नं च चाण्डालचर्मकारिणाम्। गणान्नं गणिकान्नं च षडन्नं च विवर्जयेत् ॥
चक्रोsheetविरजकतस्करध्वजिनां तथा। गान्धर्वलोहकारान्नं मृतकान्नं विवर्जयेत् ॥ (५६।४-५)
† जो कामवश भाईकी विधवा पत्नीके साथ सम्भोग करता है, उसे 'दिधिषू-पति' कहते हैं। बड़ी बहिनके अविवाहित होनेपर भी यदि छोटी बहिन विवाह कर ले तो बड़ी बहिन 'दिधिषू' कहलाती है, उसका पति 'दिधिषू-पति' है।
| ३९४ | * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * | [ संक्षिप्त पद्मपुराण |
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अनादर तथा रोषपूर्वक मिला हुआ अन्न भी नहीं खाना चाहिये। गुरुका अन्न भी यदि संस्काररहित हो तो वह भोजन करनेयोग्य नहीं है। क्योंकि मनुष्यका सारा पाप अन्नमें स्थित होता है। जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भोजन करता है।
आर्थिक (किसान), कुलमित्र (कुर्मी), गोपाल (ग्वाला), दास, नाई तथा आत्मसमर्पण करनेवाला पुरुष—इनका अन्न भोजन करनेके योग्य है। कुशीलव—चारण और क्षेत्रकर्मक— (खेतमें काम करनेवाले) इनका भी अन्न खानेयोग्य है। विद्वान् पुरुष इन्हें थोड़ी कीमत देकर इनका अन्न ग्रहण कर सकते हैं। तेलमें पकायी हुई वस्तु, गोरस, सत्तू, तिलकी खली और तेल—ये वस्तुएँ द्विजातियोंद्वारा शूद्रसे ग्रहण करने योग्य हैं। भाँटा, कमलनाल, कुसुम्भ, प्याज, लहसुन, शुक्त और गोंदका त्याग करना चाहिये। छत्राक तथा यन्त्रसे निकाले हुए आसव आदिका भी परित्याग करना उचित है। गाजर, मूली, कुम्हड़ा, गूलर और लौकी खानेसे द्विज गिर जाता है। रातमें तेल और दहीका यत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मट्ठा और नमकीन अन्न नहीं मिलाना चाहिये।
जिस अन्नके प्रति दूषित भावना हो गयी हो, जो दुष्ट पुरुषोंके सम्पर्कमें आ गया हो, जिसे कुत्तेने सूंघ लिया हो, जिसपर चाण्डाल, रजस्वला स्त्री अथवा पतितोंकी दृष्टि पड़ गयी हो, जिसे गायने सूँघ लिया हो, जिसे कौए अथवा मुर्गेने छू लिया हो, जिसमें कीड़े पड़ गये हों, जो मनुष्योंद्वारा सूँघा अथवा कोढ़ीसे छू गया हो, जिसे रजस्वला, व्यभिचारिणी अथवा रोगिणी स्त्रीने दिया हो, ऐसे अन्नको त्याग देना चाहिये। दूसरेका वस्त्र भी त्याज्य है। बिना बछड़ेकी गायका, ऊँटनीका, एक खुरवाले पशु—घोड़ी आदिका, भेड़ का तथा हथिनीका दूध पीने योग्य नहीं है—यह मनुका कथन है। मांस-भक्षण न करे। द्विजातियोंके लिये मदिरा किसीको देना, स्वयं उसे पीना, उसका स्पर्श करना तथा उसकी ओर देखना भी मना है—पाप है; उससे सदा दूर ही रहना चाहिये—यही सनातन मर्यादा है। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सर्वदा मद्यका त्याग करे। जो द्विज मद्य-पान करता है, वह द्विजोचित कर्मोंसे भ्रष्ट हो जाता है; उससे बात भी नहीं करनी चाहिये।* अतः ब्राह्मणको सदा यत्नपूर्वक अभक्ष्य एवं अपेय वस्तुओंका परित्याग करना उचित है। यदि त्याग न करके उक्त निषिद्ध वस्तुओंका सेवन करता है तो वह रौरव नरकमें जाता है।†
अब मैं परम उत्तम दानधर्मका वर्णन करूँगा। इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने ब्रह्मवादी ऋषियोंको उपदेश किया था। योग्य पात्रको श्रद्धापूर्वक धन अर्पण करना दान कहलाता है। ओंकारके उच्चारणपूर्वक किया हुआ दान भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला होता है। दान तीन प्रकारका बतलाया जाता है—नित्य, नैमित्तिक और काम्य। एक चौथा प्रकार भी है, जिसे 'विमल' नाम दिया गया है। विमल दान सब प्रकारके दानोंमें परमोत्तम है। जिसका अपने ऊपर कोई उपकार न हो, ऐसे ब्राह्मणको फलकी इच्छा न रखकर प्रतिदिन जो कुछ दिया जाता है, वह नित्यदान है। जो पापोंकी शान्तिके लिये विद्वानोंके हाथमें अर्पण किया जाता है, उसे श्रेष्ठ पुरुषोंने नैमित्तिक दान बताया है; वह भी उत्तम दान है। जो सन्तान, विजय, ऐश्वर्य और सुखकी प्राप्तिके उद्देश्यसे दिया जाता है, उसे धर्मका विचार करनेवाले ऋषियोंने 'काम्य' दान कहा है तथा जो भगवान्की प्रसन्नताके लिये धर्मयुक्त चित्तसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंको कुछ अर्पण किया जाता है, वह कल्याणमय दान 'विमल' (सात्त्विक) माना गया है।‡
* अदेयं वाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव वा। द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन मद्यं नित्यं विवर्जयेत्। पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसंभाष्यो भवेद् द्विजः॥ (५६।४३-४४)
† तस्मात् परिहरेन्नित्यमभक्ष्याणि प्रयत्नतः। अपेयानि च विप्रो वै तथा चेद् याति रौरवम्॥ (५६।४६)
‡ नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं दानमुच्यते। चतुर्थं विमलं प्रोक्तं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥
अहन्यहनि यत्किंचिद् दीयतेऽनुपकारिणे। अनुद्दिश्य फलं तस्माद् ब्राह्मणाय तु नित्यकम्॥
स्वर्गखण्ड ] \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ * गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दान-धर्मका वर्णन * \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ ३९५
सुयोग्य पात्रके मिलनेपर अपनी शक्तिके अनुसार दान अवश्य करना चाहिये। कुटुम्बको भोजन और वस्त्र देनेके बाद जो बच रहे, उसीका दान करना चाहिये; अन्यथा कुटुम्बका भरण-पोषण किये बिना जो कुछ दिया जाता है, वह दान दानका फल देनेवाला नहीं होता। वेदपाठी, कुलीन, विनीत, तपस्वी, व्रतपरायण एवं दरिद्रको भक्तिपूर्वक दान देना चाहिये।* जो अग्निहोत्री ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक पृथ्वीका दान करता है; वह उस परमधामको प्राप्त होता है जहाँ जाकर जीव कभी शोक नहीं करता। जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मणको गन्नोंसे भरी हुई तथा जौ और गेहूँकी खेतीसे लहलहाती हुई भूमि दान करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो दरिद्र ब्राह्मणको गौके चमड़े बराबर भूमि भी प्रदान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भूमिदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है। केवल अन्नदान उसकी समानता करता है और विद्यादान उससे अधिक है। जो शान्त, पवित्र और धर्मात्मा ब्राह्मणको विधिपूर्वक विद्यादान करता है, वह ब्रह्म-लोकमें प्रतिष्ठित होता है। गृहस्थ ब्राह्मणको अन्नदान करके मनुष्य उत्तम फलको प्राप्त होता है। गृहस्थको अन्न ही देना चाहिये, उसे देकर मानव परमगतिको प्राप्त होता है। वैशाखकी पूर्णिमाको विधिपूर्वक उपवास करके शान्त, पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर काले तिलों और विशेषतः मधुसे सात या पाँच ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा इससे धर्मराज प्रसन्न हों—ऐसी भावना करे। जब मनमें यह भाव स्थिर हो जाता है, उसी क्षण मनुष्यके जीवनभरके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। काले मृगचर्मपर तिल, सोना, मधु और घी रखकर जो ब्राह्मणको दान देता है, वह सब पापोंसे तर जाता है। जो विशेषतः वैशाखकी पूर्णिमाको धर्मराजके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको घी और अन्नसहित जलका घड़ा दान करता है, वह भयसे छुटकारा पा जाता है। जो सुवर्ण और तिलसहित जलके पात्रोंसे सात या पाँच ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, वह ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। माघ मासके कृष्णपक्षमें द्वादशी तिथिको उपवास करे और श्वेत वस्त्र धारण करके काले तिलोंसे अग्निमें हवन करे। तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणोंको तिलोंका ही दान करे। इससे द्विज जन्मभरके किये हुए सब पापोंको पार कर जाता है।
अमावास्या आनेपर देवदेवेश्वर भगवान् श्रीविष्णुके उद्देश्यसे जो कुछ भी बन पड़े, तपस्वी ब्राह्मणको दान दे और सबका शासन करनेवाले इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् श्रीविष्णु प्रसन्न हों, यह भाव रखे। ऐसा करनेसे सात जन्मोंका किया हुआ पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।
जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्नान करके ब्राह्मणके मुखमें अन्न डालकर इस प्रकार भगवान् शङ्करकी आराधना करता है, उसका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता। विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको स्नान करके चरण धोने आदिके द्वारा विधिपूर्वक पूजा करनेके पश्चात् धार्मिक ब्राह्मणको 'मुझपर महादेवजी प्रसन्न हों' इस उद्देश्यसे अपना द्रव्य दान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होता है। भक्त द्विजोंको उचित है कि वे कृष्ण-पक्षकी चतुर्दशी, अष्टमी तथा विशेषतः अमावास्याके दिन भगवान् महादेवजीकी पूजा करें। जो एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीको ब्राह्मणके मुखमें अन्न दे इस प्रकार पुरुषोत्तमकी अर्चना करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। यह शुक्लपक्षकी द्वादशी भगवान् विष्णुकी तिथि है। इस दिन भगवान् जनार्दनकी प्रयत्नपूर्वक आराधना करनी चाहिये। भगवान् शङ्कर अथवा श्रीविष्णुके उद्देश्यसे जो कुछ भी पवित्र ब्राह्मणको दान
यत्तु पापोपशान्त्यर्थं दीयते विदुषां करे। नैमित्तिकं तदुद्दिष्टं दानं सद्भिरनुत्तमम् ॥
अपत्यविजयैश्वर्यसुखार्थं यत्प्रदीयते। दानं तत्काम्यमाख्यातमृषिभिर्धर्मचिन्तकैः ॥
यदीश्वरस्य प्रीत्यर्थं ब्रह्मवित्सु प्रदीयते। चेतसा धर्मयुक्तेन दानं तद् विमलं शिवम् ॥ (५७।४—८)
* श्रोत्रियाय कुलीनाय विनीताय तपस्विने। व्रतस्थाय दरिद्राय प्रदेयं भक्तिपूर्वकम् ॥ (५७।११)
३९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
दिया जाता है, उसका अक्षय फल माना गया है। जो मनुष्य जिस देवताकी आराधना करना चाहे, उसके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंका ही यत्नपूर्वक पूजन करे, इससे वह उस देवताको संतुष्ट कर लेता है। देवता सदा ब्राह्मणोंके शरीरका आश्रय लेकर ही रहते हैं। ब्राह्मणोंके न मिलनेपर वे कहीं-कहीं प्रतिमा आदिमें भी पूजित होते हैं। प्रतिमा आदिमें बहुत यत्न करनेपर अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। अतः सदा विशेषतः द्विजोंमें ही देवताओंका पूजन करना उचित है।
ऐश्वर्य चाहनेवाला मनुष्य इन्द्रकी पूजा करे। ब्रह्मतेज और ज्ञान चाहनेवाला पुरुष ब्रह्माजीकी आराधना करे। आरोग्यकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष सूर्यकी, धनकी कामनावाला मनुष्य अग्निकी तथा कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाला पुरुष गणेशजीका पूजन करे। जो भग चाहता हो, वह चन्द्रमाकी, बल चाहनेवाला वायुकी तथा सम्पूर्ण संसार-बन्धनसे छूटनेकी अभिलाषा रखनेवाला मनुष्य यत्नपूर्वक श्रीहरिकी आराधना करे। जो योग, मोक्ष तथा ईश्वरीय ज्ञान—तीनोंकी इच्छा रखता हो, वह यत्न करके देवताओंके स्वामी महादेवजीकी अर्चना करे। जो महान् भोग तथा विविध प्रकारके ज्ञान चाहते हैं, वे भोगी पुरुष श्रीभूतनाथ महेश्वर तथा भगवान् श्रीविष्णुकी भी पूजा करते हैं। जल देनेवाले मनुष्यकी तृप्ति होती है; अतः जलदानका महत्त्व अधिक है। तेल दान करनेवालेको अनुकूल संतान और दीप देनेवालेको उत्तम नेत्रकी प्राप्ति होती है। भूमि-दान करनेवालोंको सब कुछ सुलभ होता है। सुवर्ण-दाताको दीर्घ आयु प्राप्त होती है। गृह-दान करनेवालेको श्रेष्ठ भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूप मिलता है। वस्त्र-दान करनेवाला चन्द्रमाके लोकमें जाता है। अश्व-दान करनेवालेको उत्तम सवारी मिलती है। अन्न-दाताको अभीष्ट सम्पत्ति और गोदान करनेवालेको सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। सवारी और शय्या-दान करनेवाले पुरुषको पत्नी मिलती है। अभय-दान करनेवालेको ऐश्वर्य प्राप्त होता है। धान्य-दाताको सनातन सुख और ब्रह्म (वेद) दान करनेवालेको शाश्वत ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है।
जो वेदविद्याविशिष्ट ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार अनाज देता है, वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका सुख भोगता है। गौओंको अन्न देनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है; ईंधन दान करनेसे मनुष्यकी जठराग्नि दीप्त होती है। जो ब्राह्मणोंको फल, मूल, पीनेयोग्य पदार्थ और तरह-तरहके शाक-दान करता है, वह सदा आनन्दित होता है। जो रोगीके रोगको शान्त करनेके लिये उसे औषध, तेल और आहार प्रदान करता है, वह रोगहीन, सुखी और दीर्घायु होता है। जो छत्र और जूते दान करता है, वह नरकोंके अन्तर्गत असिपत्रवन, छुरेकी धारसे युक्त मार्ग तथा तीखे तापसे बच जाता है। संसारमें जो-जो वस्तु अत्यन्त प्रिय मानी गयी है तथा जो मनुष्यके घरमें अपेक्षित है, उसीको यदि अक्षय बनानेकी इच्छा हो तो गुणवान् ब्राह्मणको उसका दान करना चाहिये। अयन-परिवर्तनके दिन, विषुव<sup>१</sup> नामक योग आनेपर, चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणमें तथा संक्रान्ति आदिके अवसरोंपर दिया हुआ दान अक्षय होता है।$^\dagger$ प्रयाग आदि तीर्थों, पुण्य-मन्दिरों, नदियों तथा वनोंमें भी दान करके मनुष्य अक्षय फलका भागी होता है। प्राणियोंके लिये इस संसारमें दानधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। इसलिये द्विजातियोंको चाहिये कि वे श्रोत्रिय ब्राह्मणको अवश्य दान दें। ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुष स्वर्गकी प्राप्तिके लिये तथा मुमुक्षु पुरुष पापोंकी शान्तिके लिये प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान देते रहें।
जो पापात्मा मानव गौ, ब्राह्मण, अग्नि और देवताके लिये दी जानेवाली वस्तुको मोहवश रोक देता है, उसे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जाना पड़ता है। जो द्रव्यका उपार्जन करके ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन नहीं
१. तुला और मेषकी संक्रान्तिको, जब कि दिन और रात बराबर होते हैं, 'विषुव' कहते हैं।
$\dagger$ अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः। संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम्॥ (५७। ५३)