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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

६०-छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जैन-धर्मका वर्णन, उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापमें प्रवृत्ति और सप्तर्षियोंद्वारा उसकी भुजाओंका मन्थन

२५२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जैन-धर्मका वर्णन, उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापमें प्रवृत्ति और सप्तर्षियोंद्वारा उसकी भुजाओंका मन्थन

ऋषियोंने पूछा— सूतजी! जब इस प्रकार राजा वेनकी उत्पत्ति ही महात्मा पुरुषसे हुई थी, तब उन्होंने धर्ममय आचरणका परित्याग करके पापमें कैसे मन लगाया ?

सूतजी बोले— वेनकी जिस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्ति हुई, वह सब बात मैं बता रहा हूँ। धर्मके ज्ञाता प्रजापालक राजा वेन जब शासन कर रहे थे, उस समय कोई पुरुष छद्मवेष धारण किये उनके दरबारमें आया। उसका नंग-धड़ंग रूप, विशाल शरीर और सफेद सिर था। वह बड़ा कान्तिमान् जान पड़ता था। काँखमें मोरपंखकी बनी हुई मार्जनी (ओघा) दबाये और एक हाथमें नारियलका जलपात्र (कमण्डलु) धारण किये वह वेद-शास्त्रोंको दूषित करनेवाले शास्त्रका पाठ कर रहा था। जहाँ महाराज वेन बैठे थे, उसी स्थानपर वह बड़ी उतावलीके साथ पहुँचा। उसे आया देख वेनने पूछा—'आप कौन हैं, जो ऐसा अद्भुत रूप धारण किये यहाँ आये हैं? मेरे सामने सब बातें सच-सच बताइये।'

वेनका वचन सुनकर उस पुरुषने उत्तर दिया—'तुम इस प्रकार धर्मके पचड़ेमें पड़कर जो राज्य चला रहे हो, वह सब व्यर्थ है। तुम बड़े मूढ़ जान पड़ते हो। [मेरा परिचय जानना चाहते हो तो सुनो] मैं देवताओंका परम पूज्य हूँ। मैं ही ज्ञान, मैं ही सत्य और मैं ही सनातन ब्रह्म हूँ। मोक्ष भी मैं ही हूँ। मैं ब्रह्माजीके देहसे उत्पन्न सत्यप्रतिज्ञ पुरुष हूँ। मुझे जिनस्वरूप जानो। सत्य और धर्म ही मेरा कलेवर है। ज्ञानपरायण योगी मेरे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं।

वेनने पूछा— आपका धर्म कैसा है? आपका शास्त्र क्या है? तथा आप किस आचारका पालन करते हैं? ये सब बातें बताइये।

जिन बोला— जहाँ 'अर्हन्' देवता, निर्ग्रन्थ गुरु और दयाको ही परम धर्म बताया गया है, वहीं मोक्ष देखा जाता है। यही जैन-दर्शन है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अब मैं अपने आचार बतला रहा हूँ। मेरे मतमें यजन-याजन और वेदाध्ययन नहीं है । सन्ध्योपासन भी नहीं है। तपस्या, दान, स्वधा (श्राद्ध) और स्वाहा (अग्निहोत्र) का भी परित्याग किया गया है। हव्य-कव्य आदिकी भी आवश्यकता नहीं है। यज्ञ-यागादि क्रियाओंका भी अभाव है। पितरोंका तर्पण, अतिथियोंका सत्कार तथा बलिवैश्वदेव आदि कर्मोंका भी विधान नहीं किया गया है। केवल 'अर्हन्' का ध्यान ही उत्तम माना गया है। जैन-मार्गमें प्रायः ऐसे धर्मका आचरण ही दृष्टिगोचर होता है।

प्राणियोंका यह शरीर पाँचों तत्त्वोंसे ही बनता और परिपुष्ट होता है। आत्मा वायुरूप है; अतः श्राद्ध और यज्ञ आदि क्रियाओंकी कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे पानीमें जल-जन्तुओंका समागम होता है तथा जिस प्रकार बुलबुले पैदा होते और विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार संसारमें समस्त प्राणियोंका आवागमन होता

भूमिखण्ड ] * छद्मवेषधारी पुरुषद्वारा जैन-धर्म-वर्णन और वेनकी पापमें प्रवृत्ति * २५३


रहता है। अन्तकाल आनेपर वायुरूप आत्मा शरीर छोड़कर चला जाता है और पञ्चतत्त्व पाँचों भूतोंमें मिल जाते हैं। फिर मोहसे मुग्ध मनुष्य परस्पर मिलकर मरे हुए जीवके लिये श्राद्ध आदि पारलौकिक कृत्य करते हैं। मोहवश क्षयाह तिथिको पितरोंका तर्पण करते हैं। भला, मरा हुआ मनुष्य कहाँ रहता है ? किस रूपमें आकर श्राद्ध आदिका उपभोग करता है ? मिष्टान्न खाकर तो ब्राह्मणलोग तृप्त होते हैं। [मृतात्माको क्या मिलता है ?] इसी प्रकार दानकी भी आवश्यकता नहीं जान पड़ती। दान क्यों दिया जाता है ? दान देना उत्कृष्ट कर्म नहीं समझना चाहिये। यदि अन्नका भोजन किया जाय तो इसीमें उसकी सार्थकता है। यदि दान ही देना हो तो दयाका दान देना चाहिये, दयापरायण होकर प्रतिदिन जीवोंकी रक्षा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष चाण्डाल हो या शूद्र, उसे ब्राह्मण ही कहा गया है। दानका भी कोई फल नहीं है, इसलिये दान नहीं देना चाहिये। जैसा श्राद्ध, वैसा दान; दोनोंका एक ही उद्देश्य है। केवल भगवान् जिनका बताया हुआ धर्म ही भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मैं तुम्हारे सामने उसीका वर्णन करता हूँ। वह बहुत पुण्यदायक है। पहले शान्त-चित्तसे सबपर दया करनी चाहिये। फिर हृदयसे—मनके शुद्ध भावसे चराचरस्वरूप एकमात्र जिनकी आराधना करनी चाहिये। उन्हींको नमस्कार करना उचित है। नृपश्रेष्ठ वेन ! माता-पिताके चरणोंमें भी कभी मस्तक नहीं झुकाना चाहिये; फिर औरोंकी तो बात ही क्या है?

वेनने पूछा—ये ब्राह्मण तथा आचार्यगण गङ्गा आदि नदियोंको पुण्यतीर्थ बतलाते हैं; इनका कहना है, ये तीर्थ महान् पुण्य प्रदान करनेवाले हैं। इसमें कहाँतक सत्य है, यह बतानेकी कृपा कीजिये।

जिन बोला—महाराज ! आकाशसे बादल एक ही समय जो पानी बरसाते हैं, वह पृथ्वी और पर्वत—सभी स्थानोंमें गिरता है। वही बहकर नदियोंमें एकत्रित होता है और वहाँसे सर्वत्र जाता है। नदियाँ तो जल बहानेवाली हैं ही, उनमें तीर्थ कैसा। सरोवर और समुद्र—सभी जलके आश्रय हैं, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वत भी केवल पत्थरकी राशि हैं, इनमें तीर्थ नामकी कोई वस्तु नहीं है। यदि समुद्र आदिमें स्नान करनेसे सिद्धि मिलती है तो मछलियोंको सबसे पहले सिद्ध होना चाहिये; पर ऐसा नहीं देखा जाता। राजेन्द्र ! एकमात्र भगवान् जिन ही सर्वमय हैं, उनसे बढ़कर न कोई धर्म है न तीर्थ। संसारमें जिन ही सर्वश्रेष्ठ हैं; अतः उन्हींका ध्यान करो, इससे तुम्हें नित्य सुखकी प्राप्ति होगी।

इस प्रकार उस पुरुषने वेद, दान, पुण्य तथा यज्ञरूप समस्त धर्मोंकी निन्दा करके अङ्ग-कुमार राजा वेनको पापके भावोंद्वारा बहुत कुछ समझाया-बुझाया। उसके इस प्रकार समझानेपर वेनके हृदयमें पापभावका उदय हो गया। वेन उसकी बातोंसे मोहित हो गया। उसने उसके चरणोंमें प्रणाम करके वैदिक धर्म तथा सत्य-धर्म आदिकी क्रियाओंको त्याग दिया। पापात्मा वेनके शासनसे संसार पापमय हो गया—उसमें सब तरहके पाप होने लगे। वेनने वेद, यज्ञ और उत्तम धर्मशास्त्रोंका अध्ययन बंद करा दिया। उसके शासनमें ब्राह्मणलोग न दान करने पाते थे न स्वाध्याय। इस प्रकार धर्मका सर्वथा लोप हो गया और सब ओर महान् पाप छा गया। वेन अपने पिता अङ्गके मना करनेपर भी उनकी आज्ञाके विपरीत ही आचरण करता था। वह दुरात्मा न पिताके चरणोंमें प्रणाम करता था न माताके। वह पुण्य, तीर्थ-स्नान और दान आदि भी नहीं करता था। उसके महायशस्वी पिताने अपने भाव और स्वरूपपर बहुत कालतक विचार किया, किन्तु किसी तरह उनकी समझमें यह बात नहीं आयी कि वेन पापी कैसे हो गया।

तदनन्तर एक दिन सप्तर्षि अङ्ग-कुमार वेनके पास आये और उसे आश्वासन देते हुए बोले—'वेन ! दुःसाहस न करो, तुम यहाँ समस्त प्रजाके रक्षक बनाये गये हो; यह सारा जगत् तुमपर ही अवलम्बित है, धर्माधर्मरूप सम्पूर्ण विश्वका भार तुम्हारे ही ऊपर है। अतः पाप-कर्म छोड़कर धर्मका आचरण करो।'