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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

२६५- श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य

१९४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
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प्राप्त होता है। फिर मासके अन्तमें वैष्णवोंको भोजन करानेसे सबका फल अनन्त हो जाता है। आषाढ़मासमें देवदेवेश्वर लक्ष्मीपतिकी प्रतिदिन श्रीपुष्पोंसे पूजा करे और उन्हें खीरका भोग लगावे। फिर मासकी समाप्ति होनेपर उत्तम भगवद्भक्त ब्राह्मणोंको भोजन करावे। ऐसा करनेसे वैष्णव पुरुष साठ हजार वर्षोंकी पूजाका फल पाता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। श्रावणमासमें नागकेसर और केवड़ेसे भक्तिपूर्वक श्रीविष्णुकी पूजा करनेसे मनुष्यका फिर इस लोकमें जन्म नहीं होता। उस समय भक्तिके साथ घी और शक्कर मिले हुए पूएका नैवेद्य निवेदन करे और श्रेष्ठ भगवद्भक्त ब्राह्मणोंको भोजन करावे। भादोंमें कुन्द और कटसरैयाके फूलोंसे पूजा करके खीर भोग लगावे। आश्विनमें नीलकमलसे मधुसूदनकी पूजा करे और भक्तिके साथ उन्हें खीर-पूआ निवेदन करे। इसी प्रकार कार्तिकमें कोमल तुलसीदलोंके द्वारा भक्तिपूर्वक अच्युतका पूजन करनेसे उनका सायुज्य प्राप्त होता है। दूध, घी और शक्करकी बनी हुई मिठाई, खीर और मालपूआ—इन्हें भक्तिपूर्वक एक-एक करके भगवान्‌को निवेदन करे।

अमावास्या तिथि, शनिवार, वैष्णवनक्षत्र (श्रवण), सूर्यसंक्रान्ति, व्यतीपात, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर अपनी शक्तिके अनुसार भगवान् विष्णुका विशेषरूपसे पूजन करे। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि गुरुके उत्क्रमणके दिन तथा श्रीहरिके अवतारोंके जन्म-नक्षत्रोंमें अपनी शक्तिके अनुसार वैष्णव-याग करे। उसमें वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके प्रत्येक ऋचाके साथ भगवान्‌को पुष्पाञ्जलि समर्पण करे। यथाशक्ति वैष्णव ब्राह्मणोंको भोजन करावे और दक्षिणा दे। ऐसा करनेसे वह अपनी करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार करके वैष्णवपद (वैकुण्ठधाम)को प्राप्त होता है। श्रेष्ठ वैष्णव यदि सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा भगवान्‌का यजन करनेमें असमर्थ हो तो केवल वैष्णव अनुवाकोंद्वारा लगातार सात राततक प्रतिदिन एक सहस्र पुष्पाञ्जलि समर्पण करे और हविष्यसे हवन करके भगवान्‌का यजन करे। विद्वान् पुरुष विशेषतः श्रेष्ठ भगवद्भक्तोंका पूजन करे। यज्ञान्तमें अपने वैभवके अनुसार अवभृथस्नानका उत्सव करे। अवभृथस्नान भी उसे वैष्णव अनुवाकोंद्वारा ही करना चाहिये। विधिपूर्वक स्नान करके एक सुन्दर पात्रमें आचार्यके चरणोंको भक्तिपूर्वक पखारे। फिर गन्ध, पुष्प, वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा पूजा करे। यथाशक्ति ताम्बूल और फूलोंसे सत्कार करे और अन्न-पान आदिसे भोजन कराकर बारम्बार प्रणाम करे। जाते समय गाँवकी सीमातक पहुँचाने जाय और वहाँ प्रणाम करके उन्हें विदा करे।

इस प्रकार जीवनभर आलस्य छोड़कर भगवान् और उनके भक्तोंका विशेषरूपसे पूजन करना चाहिये। समस्त आराधनाओंमें श्रीविष्णुकी आराधना सबसे श्रेष्ठ है। उससे भी उनके भक्तोंकी पूजा करनी अधिक श्रेष्ठ है। जो भगवान् गोविन्दकी पूजा करके उनके भक्तोंका पूजन नहीं करता, उसे भगवद्भक्त नहीं जानना चाहिये। वह केवल दम्भी है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके श्रीविष्णुभक्तोंका पूजन करना चाहिये। उनके पूजनसे मनुष्य समस्त दुःखराशिके पार हो जाता है। पार्वती! इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीविष्णुकी श्रेष्ठ आराधना, नित्य-नैमित्तिक कृत्य तथा भगवद्भक्तोंकी पूजाका वर्णन किया है।


श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य

पार्वतीजीने कहा— नाथ! आपने उत्तम वैष्णवधर्मका भलीभाँति वर्णन किया। वास्तवमें परमात्मा श्रीविष्णुका स्वरूप गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय है। सर्वदेववन्दित महेश्वर! मैं आपके प्रसादसे धन्य और कृतकृत्य हो गयी। अब मैं भी सनातन देव श्रीहरिका पूजन करूँगी।

महादेवजी बोले— देवि! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा! तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान्

उत्तरखण्ड ] * श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य * १९५


लक्ष्मीपतिको पूजन अवश्य करो। भद्रे ! मैं तुम-जैसी वैष्णवी पत्नीको पाकर अपनेको कृतकृत्य मानता हूँ।

**वसिष्ठजी कहते हैं—**तदनन्तर वामदेवजीके उपदेशानुसार पार्वतीजी प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करनेके पश्चात् भोजन करने लगीं। एक दिन परम मनोहर कैलासशिखरपर भगवान् श्रीविष्णुकी आराधना करके भगवान् शङ्करने पार्वतीदेवीको अपने साथ भोजन करनेके लिये बुलाया। तब पार्वतीदेवीने कहा—'प्रभो ! मैं श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करनेके पश्चात् भोजन करूँगी, तबतक आप भोजन कर लें।' यह सुनकर महादेवजीने हँसते हुए कहा—'पार्वती ! तुम धन्य हो, पुण्यात्मा हो; क्योंकि भगवान् विष्णुमें तुम्हारी भक्ति है। देवि ! भाग्यके बिना श्रीविष्णु-भक्तिका प्राप्त होना बहुत कठिन है। सुमुखि ! मैं तो 'राम ! राम ! राम !' इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्रीराम-नाममें ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। राम-नाम सम्पूर्ण सहस्रनामके समान है। पार्वती ! रकारादि जितने नाम हैं, उन्हें सुनकर रामनामकी आशङ्कासे मेरा मन प्रसन्न हो जाता है।* अतः महादेवि ! तुम राम-नामका उच्चारण करके इस समय मेरे साथ भोजन करो।'

यह सुनकर पार्वतीजीने राम-नामका उच्चारण करके भगवान् शङ्करके साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर पूछा—'देवेश्वर ! आपने राम-नामको सम्पूर्ण सहस्रनामके तुल्य बतलाया है। यह सुनकर राम-नाममें मेरी बड़ी भक्ति हो गयी है; अतः भगवान् श्रीरामके यदि और भी नाम हों तो बताइये।'

**महादेवजी बोले—**पार्वती ! सुनो, मैं श्रीरामचन्द्रजीके नामोंका वर्णन करता हूँ। लौकिक और वैदिक जितने भी शब्द हैं, वे सब श्रीरामचन्द्रजीके ही नाम हैं। किन्तु सहस्रनाम उन सबमें अधिक है और उन सहस्रनामोंमें भी श्रीरामके एक सौ आठ नामोंकी प्रधानता अधिक है। श्रीविष्णुका एक-एक नाम ही सब वेदोंसे अधिक माना गया है। वैसे ही एक हजार नामोंके समान अकेला श्रीराम-नाम माना गया है। पार्वती ! जो सम्पूर्ण मन्त्रों और समस्त वेदोंका जप करता है, उसकी अपेक्षा कोटिगुणा पुण्य केवल राम-नामसे उपलब्ध होता है।† शुभे ! अब श्रीरामके उन मुख्य नामोंका वर्णन सुनो, जिनका महर्षियोंने गान किया है। १ ॐ श्रीरामः—जिनमें योगीजन रमण करते हैं, ऐसे सच्चिदानन्दघनस्वरूप श्रीराम अथवा सीता-सहित राम। २ रामचन्द्रः—चन्द्रमाके समान आनन्ददायी एवं मनोहर राम। ३ रामभद्रः—कल्याणमय राम। ४ शाश्वतः—सनातन भगवान्। ५ राजीवलोचनः—कमलके समान नेत्रोंवाले। ६ श्रीमान् राजेन्द्रः—श्रीसम्पन्न राजाओंके भी राजा, चक्रवर्ती सम्राट्। ७ रघुपुङ्गवः—रघुकुलमें सर्वश्रेष्ठ। ८ जानकीवल्लभः—जनककिशोरी सीताके प्रियतम। ९ जैत्रः—विजयशील। १० जितामित्रः—शत्रुओंको जीतनेवाले। ११ जनार्दनः—सम्पूर्ण मनुष्योंद्वारा याचना करने योग्य। १२ विश्वामित्रप्रियः—विश्वामित्रजीके प्रियतम। १३ दान्तः—जितेन्द्रिय। १४ शरण्यत्राणतत्परः— शरणागतोंकी रक्षामें संलग्न। १५ बालिप्रमथनः—बालि नामक वानरको मारनेवाले। १६ वाग्मी—अच्छे वक्ता। १७ सत्यवाक्— सत्यवादी। १८ सत्यविक्रमः—सत्य-पराक्रमी। १९ सत्यव्रतः—सत्यका दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाले। २० व्रतफलः— सम्पूर्ण व्रतोंके प्राप्त होने योग्य फलस्वरूप। २१ सदा हनुमदाश्रयः— निरन्तर हनुमान्जीके आश्रय अथवा हनुमान्जीके हृदयकमलमें सदा निवास करनेवाले।


* राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
रकारादीनि नामानि शृण्वतो मम पार्वति। मनः प्रसन्नतां याति रामनामाभिशङ्कया ॥ (२८१। २१-२२)
† विष्णोरेकैकनामैव सर्ववेदाधिकं मतम्। तादृङ्नामसहस्राणि रामनाम समं मतम् ॥
जपतः सर्वमन्त्रांश्च सर्ववेदांश्च पार्वति। तस्मात् कोटिगुणं पुण्यं रामनाम्नैव लभ्यते ॥ (२८१। २७-२८)

९९६* अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *[ संक्षिप्त पद्मपुराण

२२ कौसलेयः—कौसल्याजीके पुत्र। २३ खरध्वंसी—खर नामक राक्षसका नाश करनेवाले। २४ विराधवध-पण्डितः—विराध नामक दैत्यका वध करनेमें कुशल। २५ विभीषणपरित्राता—विभीषणके रक्षक। २६ दशग्रीवशिरोहरः—दशशीश रावणके मस्तक काटनेवाले। २७ सप्ततालप्रभेत्ता—सात तालवृक्षोंको एक ही बाणसे बींध डालनेवाले। २८ हरकोदण्ड-खण्डनः—जनकपुरमें शिवजीके धनुषको तोड़नेवाले। २९ जामदग्न्यमहादर्पदलनः—महान् अभिमानको चूर्ण करनेवाले। ३० ताडकान्तकृत्—ताड़का नामवाली राक्षसीका वध करनेवाले। ३१ वेदान्तपारः—वेदान्तके पारङ्गत विद्वान् अथवा वेदान्तसे भी अतीत। ३२ वेदात्मा—वेदस्वरूप। ३३ भवबन्धैकभेषजः—संसारबन्धनसे मुक्त करनेके लिये एकमात्र औषधरूप। ३४ दूषणत्रिशिरोऽरिः—दूषण और त्रिशिरा नामक राक्षसोंके शत्रु। ३५ त्रिमूर्तिः—ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीन रूप धारण करनेवाले। ३६ त्रिगुणः—त्रिगुणस्वरूप अथवा तीनों गुणोंके आश्रय। ३७ त्रयी—तीन वेदस्वरूप। ३८ त्रिविक्रमः—वामन अवतारमें तीन पगोंसे समस्त त्रिलोकीको नाप लेनेवाले। ३९ त्रिलोकात्मा—तीनों लोकोंके आत्मा। ४० पुण्यचारित्रकीर्तनः—जिनकी लीलाओंका कीर्तन परम पवित्र है, ऐसे। ४१ त्रिलोकरक्षकः—तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले। ४२ धन्वी—धनुष धारण करनेवाले। ४३ दण्डकारण्यवासकृत्—दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले। ४४ अहल्यापावनः—अहल्याको पवित्र करनेवाले। ४५ पितृभक्तः—पिताके भक्त। ४६ वरप्रदः—वर देनेवाले। ४७ जितेन्द्रियः—इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाले। ४८ जितक्रोधः—क्रोधको जीतनेवाले। ४९ जितलोभः—लोभकी वृत्तिको परास्त करनेवाले। ५० जगद्गुरुः—अपने आदर्श चरित्रोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को शिक्षा देनेके कारण सबके गुरु।

५१ ऋक्षवानरसंघाती—वानर और भालुओंकी सेनाका संगठन करनेवाले। ५२ चित्रकूट-समाश्रयः—वनवासके समय चित्रकूटपर्वतपर निवास करनेवाले। ५३ जयन्तत्राणवरदः—जयन्तके प्राणोंकी रक्षा करके उसे वर देनेवाले। ५४ सुमित्रापुत्र-सेवितः—सुमित्रानन्दन लक्ष्मणके द्वारा सेवित। ५५ सर्वदेवाधिदेवः—सम्पूर्ण देवताओंके भी अधिदेवता। ५६ मृतवानरजीवनः—मरे हुए वानरोंको जीवित करनेवाले। ५७ मायामारीचहन्ता—मायामय मृगका रूप धारण करके आये हुए मारीच नामक राक्षसका वध करनेवाले। ५८ महाभागः—महान् सौभाग्यशाली। ५९ महाभुजः—बड़ी-बड़ी बाँहोंवाले। ६० सर्वदेवस्तुतः—सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं, ऐसे। ६१ सौम्यः—शान्तस्वभाव। ६२ ब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंके हितैषी। ६३ मुनिसत्तमः—मुनियोंमें श्रेष्ठ। ६४ महायोगी—सम्पूर्ण योगोंके अधिष्ठान होनेके कारण महान् योगी। ६५ महोदारः—परम उदार। ६६ सुग्रीवस्थिर-राज्यदः—सुग्रीवको स्थिर राज्य प्रदान करनेवाले। ६७ सर्वपुण्याधिकफलः—समस्त पुण्योंके उत्कृष्ट फलरूप। ६८ स्मृतसर्वाघनाशनः—स्मरण करने-मात्रसे ही सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले। ६९ आदिपुरुषः—ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेके कारण सबके आदिभूत अन्तर्यामी परमात्मा। ७० महापुरुषः—समस्त पुरुषोंमें महान्। ७१ परमः पुरुषः—सर्वोत्कृष्ट पुरुष। ७२ पुण्योदयः—पुण्यको प्रकट करनेवाले। ७३ महासारः—सर्वश्रेष्ठ सारभूत परमात्मा। ७४ पुराणपुरुषोत्तमः—पुराणप्रसिद्ध क्षर-अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ लीलापुरुषोत्तम। ७५ स्मितवक्त्रः—जिनके मुखपर सदा मुसकानकी छटा छायी रहती है, ऐसे। ७६ मितभाषी—कम बोलनेवाले। ७७ पूर्वभाषी—पूर्ववक्ता। ७८ राघवः—रघुकुलमें अवतीर्ण। ७९ अनन्तगुण-

उत्तरखण्ड ] * श्रीराम-नामकी महिमा तथा श्रीरामके १०८ नामका माहात्म्य * ९९७


गम्भीरः — अनन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त एवं गम्भीर। ८० धीरोदात्तगुणोत्तरः* — धीरोदात्त नायकके लोकोत्तर गुणोंसे युक्त। ८१ मायामानुषचारित्रः — अपनी मायाका आश्रय लेकर मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करनेवाले। ८२ महादेवाभिपूजितः — भगवान् शङ्करके द्वारा निरन्तर पूजित। ८३ सेतुकृत् — समुद्रपर पुल बाँधनेवाले। ८४ जितवारीशः — समुद्रको जीतनेवाले। ८५ सर्वतीर्थमयः — सर्वतीर्थस्वरूप। ८६ हरिः — पाप-तापको हरनेवाले। ८७ श्यामाङ्गः — श्याम विग्रहवाले। ८८ सुन्दरः — परम मनोहर। ८९ शूरः — अनुपम शौर्यसे सम्पन्न वीर। ९० पीतवासाः — पीताम्बरधारी। ९१ धनुर्धरः — धनुष धारण करनेवाले। ९२ सर्वयज्ञाधिपः — सम्पूर्ण यज्ञोंके स्वामी। ९३ यज्ञः — यज्ञस्वरूप। ९४ जरामरणवर्जितः — बुढ़ापा और मृत्युसे रहित। ९५ शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता — रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गकी स्थापना करनेवाले। ९६ सर्वाघगणवर्जितः — समस्त पाप-राशिसे रहित। ९७ परमात्मा — परमश्रेष्ठ, नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव। ९८ परं ब्रह्म — सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापी एवं सर्वाधिष्ठान परमेश्वर। ९९ सच्चिदानन्दविग्रहः — सत्, चित् और आनन्द ही जिनके स्वरूपका निर्देश करानेवाला है, ऐसे परमात्मा अथवा सच्चिदानन्दमयदिव्यविग्रह। १०० परं ज्योतिः — परम प्रकाशमय, परम ज्ञानमय। १०१ परं धाम — सर्वोत्कृष्ट तेज अथवा साकेतधामस्वरूप। १०२ पराकाशः — त्रिपाद विभूतिमें स्थित परमव्योम नामक वैकुण्ठधामरूप, महाकाशस्वरूप ब्रह्म। १०३ परात्परः — पर—इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे भी परे परमेश्वर। १०४ परेशः — सर्वोत्कृष्ट शासक। १०५ पारगः — सबको पार लगानेवाले अथवा मायामय जगत्‌की सीमासे बाहर रहनेवाले। १०६ पारः — सबसे परे विद्यमान अथवा भवसागरसे पार जानेकी इच्छा रखनेवाले प्राणियोंके प्राप्य परमात्मा। १०७ सर्वभूतात्मकः — सर्वभूतस्वरूप। १०८ शिवः — परम कल्याणमय — ये श्रीरामचन्द्रजीके एक सौ आठ नाम हैं। देवि! ये नाम गोपनीयसे भी गोपनीय हैं; किन्तु स्नेहवश मैंने इन्हें तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है।†


* कहीं-कहीं 'धीरो दान्तगुणोत्तरः' पाठ मिलता है, यह छपाईकी भूल जान पड़ती है। यदि ऐसा ही पाठ मानें तो ऐसा अर्थ करना चाहिये—'धीर एवं जितेन्द्रिय पुरुषके श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त।'

† ॐ श्रीरामो रामचन्द्रश्च रामभद्रश्च शाश्वतः। राजीवलोचनः श्रीमान् राजेन्द्रो रघुपुङ्गवः॥
जानकीवल्लभो जैत्रो जितामित्रो जनार्दनः। विश्वामित्रप्रियो दान्तः शरण्यत्राणतत्परः॥
बालिप्रमथनो वाग्मी सत्यवाक् सत्यविक्रमः। सत्यव्रतो व्रतफलः सदा हनुमदाश्रयः॥
कौसलेयः खरध्वंसी विराधवधपण्डितः। विभीषणपरित्राता दशग्रीवशिरोहरः॥
सप्ततालप्रभेत्ता च हरकोदण्डखण्डनः। जामदग्न्यमहादर्पदलनस्ताडकान्तकृत् ॥
वेदान्तपारो वेदात्मा भवबन्धैकभेषजः। दूषणत्रिशिरोऽरिश्च त्रिमूर्तिस्त्रिगुणेश्वरः॥
त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा पुण्यचारित्रकीर्तनः। त्रिलोकरक्षको धन्वी दण्डकारण्यवासकृत्॥
अहल्यापावनश्चैव पितृभक्तो वरप्रदः। जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितलोभो जगद्गुरुः॥
ऋक्षवानरसङ्घाती चित्रकूटसमाश्रयः। जयन्तत्राणवरदः सुमित्रापुत्रसेवितः॥
सर्वदेवाधिदेवश्च मृतवानरजीवनः। मायामारीचहन्ता च महाभागो महाभुजः॥
सर्वदेवस्तुतः सौम्यो ब्रह्मण्यो मुनिसत्तमः। महायोगी महोदारः सुग्रीवस्थिरराज्यदः॥
सर्वपुण्याधिकफलः स्मृतसर्वाघनाशनः। आदिपुरुषो महापुरुषः परमः पुरुषस्तथा॥
पुण्योदयो महासारः पुराणपुरुषोत्तमः। स्मितवक्त्रो मितभाषी पूर्वभाषी च राघवः॥
अनन्तगुणगम्भीरो धीरोदात्तगुणोत्तरः। मायामानुषचारित्रो महादेवाभिपूजितः॥
सेतुकृज्जितवारीशः सर्वतीर्थमयो हरिः। श्यामाङ्गः सुन्दरः शूरः पीतवासा धनुर्धरः॥
सर्वयज्ञाधिपो यज्ञो जरामरणवर्जितः। शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता सर्वाघगणवर्जितः॥