पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२५२- परशुरामावतारकी कथा
उत्तरखण्ड ] * परशुरामावतारकी कथा * ९४७
निर्मल जल मेरुपर्वतके शिखरपर गिरा और जगत्को पवित्र करनेके लिये चारों दिशाओंमें बह चला। वे चारों धाराएँ क्रमशः सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्राके नामसे प्रसिद्ध हुईं। मेरुके दक्षिण ओर जो धारा चली, उसका नाम अलकनन्दा हुआ। वह तीन धाराओंमें विभक्त होनेके कारण त्रिपथगा और त्रिस्रोता कहलायी। वह लोकपावनी गङ्गा तीन नामोंसे प्रसिद्ध हुई। ऊपर—स्वर्गलोकमें मन्दाकिनी, नीचे—पाताललोकमें भोगवती तथा मध्य अर्थात् मर्त्यलोकमें वेगवती गङ्गा कहलाने लगी। ये गङ्गा मनुष्योंको पवित्र करनेके लिये प्रकट हुई हैं। इनका स्वरूप कल्याणमय है। पार्वती ! जब गङ्गा मेरुपर्वतसे नीचे गिर रही थीं, उस समय मैंने अपनेको पवित्र करनेके लिये उन्हें मस्तकपर धारण कर लिया। जो श्रीविष्णुचरणोंसे निकली हुई गङ्गाका पावन जल अपने मस्तकपर धारण करेगा अथवा उनके जलका पान करेगा, वह निःसन्देह सम्पूर्ण जगत्का पूज्य होगा।
तदनन्तर राजा भगीरथ और महातपस्वी गौतमने तपस्याके द्वारा मेरी पूजा करके गङ्गाजीके लिये मुझसे याचना की। तब मैंने सम्पूर्ण विश्वका हित करनेके लिये कल्याणमयी वैष्णवी गङ्गाका जल उन दोनों महानुभावोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक दान किया। महर्षि गौतम जिस गङ्गाको ले गये, वे गौतमी (गोदावरी) कही गयी हैं और राजा भगीरथने जिनको भूमिपर उतारा, वे भागीरथी गङ्गाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। यह मैंने प्रसङ्गवश तुमसे गङ्गाजीके प्रादुर्भावकी उत्तम कथा सुनायी है। तदनन्तर भक्तवत्सल भगवान् नारायणने दैत्यराज बलिको रसातलका उत्तम लोक प्रदान किया और उन्हें सब दानवों, नागों तथा जल-जन्तुओंका कल्पभरके लिये राजा बना दिया। इस प्रकार कश्यपनन्दन वामनका वेष धारण करके अविनाशी भगवान् विष्णुने बलिसे तीनों लोक लेकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रको दे दिया। तब देवता, गन्धर्व तथा परम तेजस्वी ऋषियोंने दिव्य स्तोत्रोंसे भगवान्का स्तवन और पूजन किया। तत्पश्चात् अपना विराट् रूप समेटकर भगवान् अच्युत वहीं अन्तर्धान हो गये। इस तरह प्रभावशाली श्रीविष्णुने इन्द्रकी रक्षा की और इन्द्रने उनकी कृपासे तीनों लोकोंका महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया। शुभे! यह मैंने तुमसे वामन अवतारके वैभवका वर्णन किया है।
★ परशुरामावतारकी कथा ★
श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती ! भृगुवंशमें द्विजवर जमदग्नि अच्छे महात्मा हो गये हैं। वे सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् और महान् तपस्वी थे। धर्मात्मा जमदग्निने इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये गङ्गाके किनारे एक हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्रने कहा—'विप्रवर! तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'
जमदग्नि बोले—देव! मुझे सदा सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सुरभि गौ प्रदान कीजिये।
तब देवराज इन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सुरभि गौ प्रदान की। सुरभिको पाकर महातपस्वी जमदग्नि दूसरे इन्द्रकी भाँति महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न होकर रहने लगे। उन्होंने राजा रेणुककी सुन्दरी कन्या रेणुकाके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। तत्पश्चात् परम धार्मिक जमदग्निने पुत्रकी कामनासे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ किया और उस यज्ञके द्वारा देवराज इन्द्रको सन्तुष्ट किया। सन्तुष्ट होनेपर शचीपति इन्द्रने जमदग्निको एक महाबाहु, महातेजस्वी और महाबलवान् पुत्र होनेका वरदान दिया। समय आनेपर विप्रवर जमदग्निने रेणुकाके गर्भसे एक महापराक्रमी और बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जो भगवान् विष्णुके अंशके अंशसे प्रकट हुआ था। उसमें सब प्रकारके शुभ लक्षण मौजूद थे। पितामह भृगुने आकर उस महापराक्रमी पुत्रका नामकरण-संस्कार किया और बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका नाम 'राम' रखा। जमदग्निका पुत्र होनेके कारण वह जामदग्न्य भी कहलाया। भार्गववंशी बालक
४८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
...ाम धीरे-धीरे बड़े हुए। उपनयन-संस्कारके पश्चात् उन्होंने सब विद्याओंमें प्रवीणता प्राप्त कर ली। तदनन्तर विप्रवर राम शालग्राम पर्वतके शिखरपर तपस्या करनेके लिये गये। वहाँ उन्हें परमतेजस्वी ब्रह्मर्षि कश्यपजीका दर्शन हुआ। रामने बड़े हर्षके साथ उनका पूजन किया। तब उन्होंने रामको विधिपूर्वक अविनाशी वैष्णव मन्त्रका उपदेश दिया। महात्मा कश्यपसे मन्त्रका उपदेश पाकर राम विधिपूर्वक लक्ष्मीपति श्रीविष्णुकी आराधना करने लगे। उन्होंने दिन-रात षडक्षर महामन्त्रका जप करते हुए
कमलनयन श्रीहरिके ध्यानपूर्वक अनेक वर्षोंतक तपस्या की। महातपस्वी ब्रह्मर्षि जमदग्नि जितेन्द्रिय एवं मौनभावसे तप करते हुए गङ्गाके सुन्दर तटपर निवास करते थे। उन्होंने यज्ञ, दान आदि महान् धर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। इन्द्रकी दी हुई गौके प्रसादसे उनके पास सब सम्पत्तियाँ भरी-पूरी रहती थीं।
एक समयकी बात है—हैहयराज अर्जुन सब राष्ट्रोंको जीतकर अपनी सारी सेनाके साथ जमदग्नि मुनिके आश्रमपर आये। राजाने महाभाग मुनिवरका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया, उनकी कुशल पूछी और उन्हें भाँति-भाँतिके वस्त्र तथा आभूषण दान किये। मुनिने भी अपने घरपर आये हुए राजाका मधुपर्ककी विधिसे प्रेमपूर्वक सत्कार किया तथा शक्तिशालीनी सुरभि गौके प्रभावसे सेनासहित राजाको उत्तम भोजन दिया। राजाको उस गौकी शक्ति देखकर बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने महर्षि जमदग्निसे उस गौको माँगा।
जमदग्नि मुनिके अस्वीकार करनेपर हैहयराजने उस सबला गौको बलपूर्वक ले लिया। तब महाभागा सबलाने क्रोधमें भरकर अपने सींगोंसे राजाके सब सैनिकोंको मार डाला। तदनन्तर स्वयं अन्तर्धान होकर क्षणभरमें इन्द्रके पास जा पहुँची। इधर अपनी सेनाका विनाश देखकर राजा अर्जुन क्रोधसे पागल हो उठा। उसने मुक्कोंसे मार-मारकर मुनि जमदग्निका वध कर डाला और लौटकर अपने नगरमें प्रवेश किया।
उधर रामने देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया। भगवान्ने अपने परशु, वैष्णव महाधनुष और अनेक दिव्यास्त्र प्रदान करके उनसे कहा—'मैं तुम्हें अपनी उत्तम शक्ति प्रदान करता हूँ। मेरी शक्तिसे आविष्ट होकर तुम पृथ्वीका भार उतारने और देवताओंका हित करनेके लिये दुष्ट राजाओंका वध करो। इस समय पृथ्वीपर बहुत-से मदोन्मत्त राजा एकत्र हो रहे हैं। उन्हें मारकर समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी अपने अधिकारमें कर लो और महान् पराक्रमसे सम्पन्न हो धर्मपूर्वक इसका पालन करो। फिर समय आनेपर मेरी ही कृपासे मेरे परमपदको प्राप्त होओगे।' भगवान् विष्णुके अन्तर्धान होनेपर राम भी तुरंत अपने पिताके आश्रमको लौट गये। वहाँ जब उन्होंने अपने पिताको मारा गया देखा तो वे क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और इस पृथ्वीको क्षत्रियविहीन करनेकी इच्छासे हैहयराजके नगरमें जा पहुँचे। वहाँ राजाको ललकारकर महायुद्धमें प्रवृत्त हुए और उसकी सेनाका संहार करके अन्तमें उन्होंने उसको भी मार डाला।
इस प्रकार सहस्रबाहु अर्जुनका वध करनेके अनन्तर प्रतापी परशुरामजीने कुपित होकर सम्पूर्ण राजाओंका संहार कर डाला। केवल राजा इक्ष्वाकुके महान् कुलपर उन्होंने हाथ नहीं उठाया। एक तो वह नानाका कुल था, दूसरे माता रेणुकाने इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको मारनेकी मनाही कर दी थी। इसलिये उक्त वंशकी उन्होंने रक्षा की।
इस प्रकार क्षत्रियोंका संहार करनेके पश्चात् प्रतापी परशुरामजीने अश्वमेध नामक महायज्ञका विधिवत् अनुष्ठान किया और उसमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सात द्वीपोंसहित पृथ्वी दान कर दी। तदनन्तर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रममें तपस्या करनेके लिये चले गये। पार्वती ! यह मैंने तुमसे परशुरामजीके चरित्रका वर्णन किया है। वे भगवान् विष्णुकी शक्तिके आवेशावतार थे। इसीलिये शक्तिके आवेशसे उन्होंने जो कुछ किया, उसकी उपासना नहीं करनी चाहिये। भगवद्भक्त महात्माओं तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके अवतार ही उपासना करनेयोग्य हैं; क्योंकि वे अपने ईश्वरीय गुणोंसे परिपूर्ण हैं और उपासना करनेपर मनुष्योंको मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं।