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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

१५०-गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति ..

उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१३
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गयीं ? ध्यान करके जब उन्होंने यह निश्चितरूपसे जान लिया कि उन्हें महादेवजीने ग्रहण कर लिया है, तब वे कैलास पर्वतपर गये। मुनिश्रेष्ठ वहाँ पहुँचकर वे तीव्र तपस्या करने लगे। उनके आराधना करनेपर मैंने अपने मस्तकसे एक बाल उखाड़ा और उसीके साथ त्रिपथगा गङ्गाजीको उन्हें अर्पण कर दिया। गङ्गाको लेकर वे पातालमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, गये। उस समय भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गङ्गा जब हरिद्वारमें आयीं, तब वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ श्रेष्ठ तीर्थ बन गया। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान तथा विशेषरूपसे श्रीहरिका दर्शन करके उनकी परिक्रमा करते हैं, वे दुःखके भागी नहीं होते। ब्रह्महत्या आदि पापोंकी अनेक राशियाँ ही क्यों न हों, वे सब सर्वदा श्रीहरिके दर्शनमात्रसे नष्ट हो जाती हैं। एक समय मैं भी हरिद्वारमें श्रीहरिके स्थानपर गया था, उस समय उस तीर्थके प्रभावसे मैं विष्णुस्वरूप हो गया। सभी मनुष्य वहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेमात्रसे वैकुण्ठ-लोकको प्राप्त होते हैं। परम सुन्दर हरिद्वार-तीर्थ मेरी दृष्टिमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह समस्त तीर्थोंमें श्रेष्ठ और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाला है।

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गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति

महादेवजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे तत्काल पापोंका नाश हो जाता है। जो मनुष्य सैकड़ों योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है।* नारद ! श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई 'गङ्गा' नामसे विख्यात नदी पापोंकी स्थूल राशियोंका भी नाश करनेवाली है। नर्मदा, सरयू, वेत्रवती (बेतवा), तापी, पयोष्णी (मन्दाकिनी), चन्द्रा, विपाशा (ब्यास), कर्मनाशिनी, पुष्पा, पूर्णा, दांपा, विदीपा तथा सूर्यतनया यमुना—इनमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब पुण्य गङ्गा-स्नानसे मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनीषी पुरुष समुद्रसहित पृथ्वीका दान करते हैं, उनको मिलनेवाला फल भी गङ्गा-स्नानसे प्राप्त हो जाता है। सहस्र गोदान, सौ अश्वमेध यज्ञ तथा सहस्र वृषभ-दानसे जिस अक्षय फलकी प्राप्ति होती है, वह गङ्गाजीके दर्शनसे क्षणभरमें प्राप्त हो जाता है। वह गङ्गा नदी महान् पुण्यदायिनी है, विशेषतः ब्रह्महत्यारोंके लिये परम पावन है। वे नरकमें पड़नेवाले हों तो भी गङ्गाजी उनके पाप हर लेती हैं। तात ! जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार गङ्गाके प्रभावसे पातक नष्ट हो जाते हैं। ये माता गङ्गा संसारमें सदा पवित्र मानी गयी हैं। इनका स्वरूप परम कल्याणमय है। माता जाह्नवीका स्वरूप दिव्य है। जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार नदियोंमें गङ्गा उत्तम हैं। जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती हैं, उन तीर्थमें स्नान और आचमन करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

[भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें जानेपर भगवान् श्रीविष्णु तथा यमुना, गङ्गा आदि नदियोंका किस प्रकार स्तवन करना चाहिये, यह बताया जाता है—]

त्वद्वातं प्रयतो ब्रवीमि यदहं सास्तु स्तुतिस्ते प्रभो
यद् भुञ्जे तव सन्निवेदनमथो यद्यामि सा प्रेष्यता।
यच्छ्रान्तः स्वपिमि त्वदङ्घ्रियुगले दण्डप्रणामोऽस्तु मे
स्वामिन् यच्च करोमि तेन स भवान् विश्वेश्वरः प्रीयताम् ॥

प्रभो ! मैं शुद्धभावसे आपके सम्बन्धमें जो कुछ भी चर्चा करता हूँ, वही आपके लिये स्तुति हो। जो कुछ भोजन करता हूँ, वह आपके लिये नैवेद्यका काम दे। जो चलता-फिरता हूँ, वही आपकी सेवा-टहल समझी जाय। जो थककर सो जाता हूँ, वही आपके लिये


* गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ (२३।२)

६१४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

साष्टाङ्ग प्रणाम हो तथा स्वामिन् ! मैं जो कुछ करता हूँ, उससे आप जगदीश्वर श्रीविष्णु प्रसन्न हों।
दृष्टेन वन्दितेनापि स्पृष्टेन च धृतेन च।
नरा येन विमुच्यन्ते तदेतद् यामुनं जलम्॥
जिसके दर्शन, वन्दन, स्पर्श तथा धारण करनेसे मनुष्य भव-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वही यह यमुनाजीका जल है।
तावद् भ्रमन्ति भुवने मनुजा भवोत्य-
दारिद्र्यरोगमरणव्यसनाभिभूताः ।
यावज्जलं तव महानदि नीलनीलं
पश्यन्ति नो दधति मूर्धसु सूर्यपुत्रि ॥
सूर्यपुत्री महानदी यमुनाजी ! मनुष्य इस जगत्‌में प्राप्त होनेवाले दरिद्रता, रोग और मृत्यु आदि दुःखोंसे पीड़ित होकर तभीतक संसारमें भटकते रहते हैं, जबतक वे नीलमणिके सदृश आपके नीले जलका दर्शन नहीं करते अथवा उसे अपने मस्तकपर नहीं चढ़ाते।
यत्संस्मृतिः सपदि कृन्तति दुष्कृतौघं
पापावलीं जयति योजनलक्षतोऽपि ।
यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति
दिष्ट्या हि सा पथि दृशोर्भविताद्य गङ्गा ॥
जिनकी स्मृति पापराशिका तत्काल नाश कर देती है, जो लाख योजन दूरसे भी पापोंके समूहको परास्त करती हैं, जिनका नाम उच्चारण किये जानेपर सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र कर देता है, वे गङ्गाजी आज सौभाग्यवश मेरे दृष्टिपथमें आयेंगी।
आलोकोत्कण्ठितेन प्रमुदितमनसा वर्त्म यस्याः प्रयातं
सद् यस्मिन् कृत्यमेतामथ प्रथमकृती जज्ञिवान् स्वर्गसिन्धुम् ।
स्नानं सन्ध्या निवापः सुरयजनमपि श्राद्धविप्राशनाद्यं
सर्वं सम्पूर्णमेतद् भवति भगवतः प्रीतिदं नात्र चित्रम् ॥
मनुष्य दर्शनके लिये उत्कण्ठित तथा प्रसन्नचित्त होकर जिसके पथका अनुसरण करता है, जिसके तटपर समस्त शास्त्रविहित कर्म उत्तमतापूर्वक सम्पन्न होते हैं, उन गङ्गाजीको आदि सृष्टिके रचयिता ब्रह्माजीने पहले स्वर्गङ्गाके रूपमें उत्पन्न किया था। उनके तटपर किया हुआ स्नान, सन्ध्या, तर्पण, देवपूजा, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन आदि सब कुछ परिपूर्ण एवं भगवान्‌को प्रसन्नता प्रदान करनेवाला होता है-इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है।
द्रवीभूतं परं ब्रह्म परमानन्ददायिनि ।
अर्घ्यं गृहाण मे गङ्गे पापं हर नमोऽस्तु ते ॥
परमानन्द प्रदान करनेवाली गङ्गाजी ! आप जल-रूपमें अवतीर्ण साक्षात् परब्रह्म हैं। आपको नमस्कार है। आप मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये और मेरे पाप हर लीजिये।
साक्षाद्धर्मद्रवौघं मुररिपुचरणाम्भोजपीयूषसारं
दुःखस्वाब्धेस्तरित्रं सुरदनुजनुतं स्वर्गसोपानमार्गम्।
सर्वांहोहारि वारि प्रवरगुणगणं भासि या संवहन्ती
तस्यै भागीरथि श्रीमत्ति मुदितमना देवि कुर्वे नमस्ते ॥
श्रीमती भागीरथी देवी ! जो जलरूपमें परिणत साक्षात् धर्मकी राशि है, भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई सुधाका सार है, दुःखरूपी समुद्रसे पार होनेके लिये जहाज है तथा स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी है, जिसे देवता और दानव भी प्रणाम करते हैं, जो समस्त पापोंका संहार करनेवाला, उत्तम गुणसमूहसे युक्त और शोभा-सम्पन्न है, ऐसे जलको आप धारण करती हैं। मैं प्रसन्नचित्त होकर आपको नमस्कार करता हूँ।
स्वःसिन्धो दुरिताब्धिमग्नजनतासंस्तारणि प्रोल्लसत्-
कल्लोलामलकान्तिनाशिततस्तोमे जगत्पावनि ।
गङ्गे देवि पुनीहि दुष्कृतभयक्रान्तं कृपाभाजनं
मातर्मां शरणागतं शरणदे रक्षाद्य भो भीषितम् ॥
स्वर्गलोककी नदी भगवती गङ्गे ! आप पापके समुद्रमें डूबी हुई जनताको तारनेवाली हैं, अपनी उठती हुई शोभायुक्त लहरोंकी निर्मल कान्तिसे पापरूपी अन्धकार-राशिका नाश करती हैं तथा जगत्‌को पवित्र करनेवाली हैं; मैं पापके भयसे ग्रस्त और आपका कृपा-भाजन हूँ। शरणदायिनी माता ! आपकी शरणमें आया हूँ; आज मुझ भयभीतकी रक्षा कीजिये।
हं हो मानस कम्पसे किमु सखे त्रस्तो भयान्नारकात्
किं ते भीतिरिति श्रुतिर्दुरितकृत् संजायते नारकी।
मा भैषीः शृणु मे गतिं यदि मया पापाचलस्पर्धिनी
प्राप्ता ते निरयः कथं किमपरं किं मे न धर्मो धनम् ॥

उत्तराखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१५


ऐ मेरे चित्त ! ओ मित्र ! तुम नरकके भयसे त्रस्त होकर काँप क्यों रहे हो ? क्या तुम्हें यह सोचकर भय हो रहा है कि पापी मनुष्य नरकमें पड़ता है—ऐसा श्रुतिका कथन है। सखे ! इसके लिये भय न करो; मेरी क्या गति होगी—यह बताता हूँ, सुनो; यदि मुझे पापोंके पहाड़से भी टक्कर लेनेवाली भगवती गङ्गा प्राप्त हो गयी हैं तो तुम्हें नरककी प्राप्ति कैसे हो सकती है अथवा दूसरी कोई दुर्गति भी क्यों होगी। क्या मेरे पास धर्मरूपी धन नहीं है ?

स्वर्वासाधिप्रशंसामुदमनुभवितुं मज्जनं यत्र चोक्तं
स्वर्नार्यो वीक्ष्य हृष्टा विबुधसुरपतिप्राप्तिसंभावनेन ।
नीरे श्रीजह्नुकन्ये यमनियमरताः स्नान्ति ये तावकीने
देवत्वं ते लभन्ते स्फुटमशुभकृतोऽप्यत्र वेदाः प्रमाणम् ॥

जिस गङ्गाजीके जलमें किया हुआ स्नान स्वर्गलोकके निवास तथा प्रशंसाके आनन्दकी अनुभूतिका कारण बताया गया है, वहाँ किसीको स्नान करते देख स्वर्गलोककी देवियाँ एक नूतन देवता अथवा इन्द्रके मिलनेकी संभावनासे बहुत प्रसन्न होती हैं। जह्नुपुत्री गङ्गे ! जो लोग यम-नियमोंका पालन करते हुए आपके जलमें स्नान करते हैं, वे पहलेके पापी होनेपर भी निश्चय ही देवत्व प्राप्त कर लेते हैं—इस विषयमें वेद प्रमाण हैं।

बुद्धे सद्बुद्धिरेवं भवतु तव सखे मानस स्वस्ति तेऽस्तु
आस्तां पादौ पदस्थौ सततमिह युवां साधुदृष्टी च दृष्टी ।
वाणि प्राणप्रियेऽधिप्रकटगुणवपुः प्राप्नुहि प्राणपुष्टिं
यस्मात् सर्वैर्भवद्भिः सुखमतुलमहं प्राप्नुयां तीर्थपुण्यम् ॥

बुद्धे ! सदा इसी प्रकार तुम्हारी सद्बुद्धि बनी रहे। सखे मन ! तुम्हारा भी कल्याण हो। चरणो ! तुम भी इसी प्रकार योग्य पद (स्थान) पर स्थित रहो। नेत्रो ! तुम दोनों भी उत्तम दृष्टिसे सम्पन्न रहो। वाणी ! तुम प्राणोंकी प्रिया हो तथा प्रकट हुए उत्तम गुणोंसे युक्त शरीर ! तुम्हारी प्राणशक्तिका पोषण हो; क्योंकि मैं तुम सब लोगोंके साथ आज अतुलित सुख प्रदान करनेवाले तीर्थजनित पुण्यको प्राप्त करूँगा।

श्रीजाह्नवीरविसुतापरमेष्ठिपुत्री-
सिन्धुत्रयाभरण तीर्थवर प्रयाग ।
सर्वेश मामनुगृहाण नयस्व चोर्ध्व-
मन्तस्तमोदशविधं दलय स्वधाम्ना ॥

गङ्गा, यमुना और सरस्वती—इन तीनों नदियोंको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले तीर्थराज प्रयाग ! सर्वेश्वर ! मुझपर अनुग्रह करो, मुझे ऊँचे उठाओ तथा मेरे अन्तःकरणके दस प्रकारके अविद्यान्धकारको अपने तेजसे नष्ट करो।

वागीशविष्णुवीशपुरन्दराद्याः
पापप्रणाशाय विदां विदोऽपि ।
भजन्ति यत्तीरमनीलनीलं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा इन्द्र आदि देवता और विद्वानोंमें श्रेष्ठ विद्वान् (ऋषि-महर्षि) भी जिसके श्वेत-कृष्णजलसे शोभित तटका सेवन करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

कलिन्दजासङ्गमवाप्य यत्र
प्रत्यागता स्वर्गधुनी धुनोति ।
अध्यात्मतापत्रितयं जनस्य
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

जहाँ आयी हुई गङ्गा कलिन्दनन्दिनी यमुनाका सङ्गम पाकर मनुष्योंके आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंका नाश करती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

श्यामो वटोऽश्यामगुणं वृणोति
स्वच्छायया श्यामलया जनानाम् ।
श्यामः श्रमं कृन्तति यत्र दृष्टः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

जहाँ श्यामवट उज्ज्वल गुण धारण करता है तथा दर्शन करनेपर अपनी श्यामल छायासे मनुष्योंके जन्म-मरणरूप श्रमका नाश कर डालता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

ब्रह्मादयोऽप्यात्मकृतिं विहाय
भजन्ति पुण्यात्मकभाग्यधेयम् ।
यत्रोज्झिता दण्डधरः स्वदण्डं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥

६१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


ब्रह्मा आदि देवता भी अपना काम छोड़कर जिस पुण्यमय सौभाग्यसे युक्त तीर्थका सेवन करते हैं तथा जहाँ दण्डधारी यमराज भी अपना दण्ड त्याग देते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

यत्सेवया देवनृदेवतादि-
देवर्षयः प्रत्यहमाममन्ति।
स्वर्गं च सर्वोत्तमभूमिराज्यं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

देवता, मनुष्य, ब्राह्मण तथा देवर्षि भी प्रतिदिन जिसके सेवनसे स्वर्ग एवं सर्वोत्तम भूमण्डलका राज्य प्राप्त करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

एनांसि हन्तीति प्रसिद्धवार्ता
नामप्रतापेन दिशो द्रवन्ती।
यस्य त्रिलोकी प्रतता यशोभिः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

प्रयाग अपने नामके प्रतापसे समस्त पापोंका नाश कर डालता है, यह प्रसिद्ध वार्ता सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई है। जिसके सुयशसे सारी त्रिलोकी आच्छादित है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

धत्तोऽभितश्चामरचारुकान्ती
सितासिते यत्र सरिद्वरेण्ये।
आद्यो वटश्छत्रमिवातिभाति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

जहाँ दोनों किनारे श्याम और श्वेत सलिलसे सुशोभित दो श्रेष्ठ सरिताएँ यमुना और गङ्गा चँवरकी मनोहर कान्ति धारण कर रही हैं और आदि वट (अक्षयवट) छत्रके समान सुशोभित होता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

ब्राह्मीनपुत्रीत्रिपथास्त्रिवेणी-
समागमेनाक्षतयागमात्रान्।
यत्राप्लुतान् ब्रह्मपदं नयन्ति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥

सरस्वती, यमुना और गङ्गा—ये तीन नदियाँ जहाँ डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको, जो त्रिवेणी-संगमके सम्पर्कसे अक्षत यागफलको प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्मलोकमें पहुँचा देती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।

केषाञ्चिजन्मकोटिर्व्रजति सुवचसा यामि यामीति यस्मिन्
केषाञ्चित्प्रोषितानां नियतमतिपतेद् वर्षवृन्दं वरिष्ठम्।
यः प्राप्तो भाग्यलक्षैर्भवति भवति नो वा स वाचामवाच्यो
दिष्ट्या वेणीविशिष्टो भवति दृगतिथिः किं प्रयागः प्रयागः॥

‘मैं प्रयागमें जाऊँगा, जाऊँगा’ इन सुन्दर बातोंमें ही कितने ही लोगोंके करोड़ों जन्म बीत जाते हैं [और प्रयागकी यात्रा सुलभ नहीं होती]। कुछ लोग घरसे चल तो देते हैं, पर मार्गमें ही फँस जानेके कारण उनके अनेकों वर्ष समाप्त हो जाते हैं। लाखों बार भाग्यकी सहायता होनेपर भी जो कभी प्राप्त होता है और कभी नहीं भी होता, वह त्रिवेणी-संगम-विशिष्ट उत्तम यज्ञभूमि प्रयाग वाणीसे परे है। क्या मेरा ऐसा भाग्य है कि वह मेरे नेत्रोंका अतिथि हो सके ?

लोकानामक्षमाणां मखकृतिषु कलौ स्वर्गकामैर्जपस्तु-
त्यादिस्तोत्नैर्वचोभिः कथममरपदप्राप्तिचिन्तातूराणाम्।
अग्निष्टोमाश्वमेधप्रमुखमखफलं सम्यगालोच्य साङ्गं
ब्रह्माद्यैस्तीर्थराजोऽभिमतद उपदिष्टोऽयमेव प्रयागः॥

कलियुगमें मनुष्य स्वर्गकी इच्छा होते हुए भी यज्ञ-यगादि करनेमें असमर्थ होनेके कारण जप, स्तुति, स्तोत्र एवं पाठ आदिके द्वारा किस प्रकार अमरपदकी प्राप्ति हो—इस चिन्तासे आतुर होंगे; उनको अङ्गोंसहित अग्निष्टोम और अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल कैसे मिले—इसकी भलीभाँति आलोचना करके ब्रह्मा आदि देवताओंने इस तीर्थराज प्रयागको ही सब प्रकारके अभीष्ट फलोंका दाता बताया है।

मया प्रमादात्तुरतादिदोषतः
संध्याविधिर्नो समुपासितोऽभूत्।
चेदत्र संध्यां चरतोऽप्रमादतः
संध्यास्तु पूर्णाखिलजन्मनोऽपि मे॥

यदि मैने प्रमाद और आतुरता आदि दोषोंके कारण भलीभाँति संध्योपासना नहीं की है तो यहाँ सावधानता-पूर्वक संध्या करनेसे मेरे सम्पूर्ण जन्मकी संध्योपासना पूर्ण हो जाय।

अन्यत्रापि प्रगर्जन्महिमनि तपसि प्रेमिभिर्विप्रकृष्टै-
र्ध्यातः संकीर्तितो योऽभिमतपदविधातानिशं निर्व्यपेक्षम्।

उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१७
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श्रीमत्पांशुं त्रिवेणीपरिवृढमतुलं तीर्थराजं प्रयागं
गोऽलंकारप्रकाशं स्वयममरवरैश्चार्चितं तं नमामि ॥
जो माघमासमें अपनी महिमाके विषयमें अन्यत्र भी गर्जना करता है, प्रेमीजनोंके दूरसे भी अपना ध्यान और कीर्तन करनेपर जो बिना किसीकी सहायताके निरन्तर अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है, जिसकी धूलिराशि शोभासे सम्पन्न है, जो त्रिवेणीका स्वामी है, जिसकी संसारमें कहीं भी तुलना नहीं है तथा जिसका दिव्य स्वरूप अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशमान है, उस श्रेष्ठ देवताओं-द्वारा पूजित तीर्थराज प्रयागको मैं प्रणाम करता हूँ।

अस्माभिः सुतपोऽन्वतापि किमहोऽज्यन्त किं वाध्वराः
पात्रे दानमदायि किं बहुविधं किं वा सुराश्चार्चिताः ।
किं सत्तीर्थमसेवि किं द्विजकुलं पूजादिभिः सत्कृतं
येन प्राप्त सदाशिवस्य शिवदा सा राजधानी स्वयम् ॥
अहो ! हमलोगोंने क्या कोई उत्तम तपस्या की थी ? अथवा यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ? या किसी सुपात्रको नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान दिया था ? अथवा देवताओंकी पूजा की थी ? या किसी उत्तम तीर्थका सेवन किया था ? अथवा ब्राह्मणवंशका पूजा आदिके द्वारा सत्कार किया था, जिससे भगवान् सदाशिवकी यह कल्याणदायिनी राजधानी काशी हमें स्वयं ही प्राप्त हो गयी !

भाग्यैर्मेऽधिगता ह्यनेकजनुषां सर्वाघविध्वंसिनी
सर्वाश्चर्यमयी मया शिवपुरी संसारसिन्धोस्तरी ।
लब्धं तज्जनुषः फलं कुलमलंचक्रे पवित्रीकृतः
स्वात्मा चाप्यखिलं कृतं किमपरं सर्वोपरिष्टात् स्थितम् ॥
मेरे बड़े भाग्य थे, जो अनेक जन्मोंकी पापराशिका विध्वंस करनेवाली संसार-समुद्रके लिये नौकारूपा यह सर्वाश्चर्यमयी शिवपुरी मुझे प्राप्त हुई। इससे जन्म लेनेका फल मिल गया। मेरे कुलकी शोभा बढ़ गयी। मेरी अन्तरात्मा पवित्र हो गयी तथा मेरे सम्पूर्ण कर्तव्य पूर्ण हो गये। अधिक क्या कहूँ, अब मैं सर्वोपरि पदपर प्रतिष्ठित हो गया।

जीवन्नरः पश्यति भद्रलक्षमेवं वदन्तीति मृषा न यस्मात् ।
तस्मान्मया वै वपुषेदृशेन प्राप्तापि काशी क्षणभङ्गुरेन ॥
मनुष्य जीवित रहे तो वह लाखों कल्याणकी बातें देखता है—ऐसी जो किंवदन्ती है, वह झूठी नहीं है; इसीलिये मैंने इस क्षणभङ्गुर शरीरसे भी काशी-जैसी पुरीको प्राप्त कर लिया।

काश्यां विधातुममरैरपि दिव्यभूमौ
सत्तीर्थलिङ्गगणनाञ्चर्नतो न शक्या ।
यानीह गुप्तविवृतानि पुरातनानि
सिद्धानि योजितकरः प्रणमामि तेभ्यः ॥
काशीपुरीकी दिव्य भूमिमें कितने उत्तम तीर्थ और लिङ्ग हैं, उनकी पूजनपूर्वक गणना करना देवताओंके लिये भी असंभव है। यहाँ गुप्त और प्रकटरूपसे जो-जो पुरातन सिद्धपीठ हैं, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

किं भीत्या दुरितात्कृतात् किमु मुदा पुण्यैरगण्यैः कृतैः
किं विद्याभ्यसनानन्मदेन जडतादोषाद् विषादेन किम् ।
किं गर्वेण धनोदयादधनतातपेन किं भो जनाः
स्नात्वा श्रीमण्णिकर्णिकापयसि चेद् विश्वेश्वरो दृश्यते ॥
मनुष्यो ! यदि श्रीमणिकर्णिकाके जलमें स्नान करके भगवान् विश्वनाथजीका दर्शन किया जाता हो तो पूर्वकृत पापोंसे भयकी क्या आवश्यकता है। अथवा किये हुए अगणित पुण्योंद्वारा प्राप्त होनेवाले आनन्दसे भी क्या लेना है। विद्याभ्यासको लेकर घमंड या मूर्खताके लिये खेद करनेसे क्या लाभ है ? धनकी प्राप्तिसे होनेवाले गर्व तथा निर्धनताके कारण होनेवाले संतापसे भी क्या प्रयोजन है।

अल्पस्फीतिनिरामयापि तनुताप्रव्यक्तशक्त्यात्मता
प्रोत्साहाढ्यबलेन केवलमनोरागाद्द्वितीयेन यत् ।
अप्राप्यापि मनोरथैरविषया स्वप्नप्रवृत्तेरपि
प्राप्ता सापि गदाधरस्य नगरी सद्योऽपवर्गप्रदा ॥
जो स्वल्प समृद्धिसे युक्त होनेपर भी निरामय (नाशरहित) है, सूक्ष्मताके द्वारा ही जो अपनी शक्ति-शालिता सूचित कर रही है, अप्राप्य होनेपर भी जो उत्साहयुक्त बल तथा विशुद्ध मानसिक अनुरागसे प्राप्त होती है, मनोरथोंकी भी जहाँतक पहुँच नहीं है, जो स्वप्नमें भी सुलभ नहीं होती, वह तत्काल मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवान् गदाधरकी नगरी गया आज मुझे प्राप्त हुई है।

१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


मन्ये नात्मकृतिर्न पूर्वपुरुषप्राप्तेर्बलं चात्र त-
त्रापीदं स्वजनप्रमाणमचलं किं शापतापादिकम्।
या दुष्प्रापगयाप्रयागयमुनाकाशीषु पर्वागमात्
प्राप्तिस्तत्र महाफलो विजयते श्रीशारदानुग्रहः ॥

कोई पुण्यपर्व आनेपर जो गया, प्रयाग, यमुना और काशी आदि दुर्लभ तीर्थोंमें आनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, उसमें महान् फलदायक भगवती शारदाका अनुग्रह ही एकमात्र कारण है; उसीकी विजय है। मैं इसे अपना पुरुषार्थ नहीं मानता। पूर्वजोंने जो यहाँ आकर पुण्योपार्जन किया है, उसका बल भी इसमें सहायक नहीं है तथा स्वजनवर्गकी अविचल शक्ति भी इसमें कारण नहीं है। इन तीर्थोंमें आनेपर शाप-ताप आदि क्या कर सकते हैं।

यः श्राद्धसमये दूरात्स्मृतोऽपि पितृमुक्तिदः।
तं गयायां स्थितं साक्षान्नमामि श्रीगदाधरम् ॥

जो श्राद्ध-कालमें दूरसे स्मरण करनेपर भी पितरोंको मोक्ष प्रदान करते हैं, गयामें स्थित उन साक्षात् भगवान् श्रीगदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ।

पन्थानं समतीत्य दुस्तरमिमं दूराद्दवीयस्तरं
क्षुद्रव्याघ्रतरक्षकण्टकफणिप्रत्यर्थिभिः संकुलम्।
आगत्य प्रथमं ह्ययं कृपणवाग् याचेज्जनः कं परं
श्रीमद्द्वारि गदाधर प्रतिदिनं त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते ॥

भगवान् गदाधर ! यह आपका दास मक्खी, मच्छर, बाघ, चीते, काँटे, सर्प तथा लुटेरोंसे भरे हुए इस दुस्तर मार्गको, जो दूरसे भी दूर पड़ता है, तै करके पहले-पहल यहाँ आया है और दीन वाणीमें आपसे याचना करता है। भला, आपके सिवा और किसके सामने यह हाथ फैलाये। भगवन् ! यह सेवक प्रतिदिन आपके शोभासम्पन्न द्वारपर आकर दर्शनके लिये उत्कण्ठित रहता है।

सर्वात्मन्निजदर्शनेन च गयाश्राद्धेन वै दैवतान्
प्रीणन् विश्वमनीहवत् कथमिहौदासीन्यमालम्बसे।
किं ते सर्वद निर्दयत्वमधुना किं वा प्रभुत्वं कलेः
किं वा सत्त्वनिरीक्षणं नृषु चिरं किं वास्य सेवारुचिः ॥

सर्वात्मन् ! आप अपने दर्शनसे तथा गयामें किये जानेवाले श्राद्धसे देवताओंसहित सम्पूर्ण विश्वको तृप्त करते हैं; फिर मेरे सामने क्यों निश्चेष्ट-से होकर उदासीन भाव धारण कर रहे हैं ? भक्तको सर्वस्व देनेवाले दयामय ! क्या इस समय आपने निर्दयता धारण कर ली है ? या यह कलियुगका प्रभाव है ? अथवा देर लगाकर आप मनुष्योंके सत्त्व (शुद्ध भाव एवं धैर्य) की परीक्षा ले रहे हैं या इस दासकी भगवत्सेवामें कितनी रुचि है, इसका निरीक्षण कर रहे हैं ?

गदाधर मया श्राद्धं यच्चीर्णं त्वत्प्रसादतः।
अनुजानीहि मां देव गमनाय गृहं प्रति ॥*

गदाधर ! आपकी कृपासे मैंने यहाँ श्राद्धका अनुष्ठान किया है; [इसे स्वीकार कीजिये और] देव ! अब मुझे घर जानेकी आज्ञा दीजिये।

एवं हि देवतानां च स्तोत्रं स्वर्गार्थदायकम्।
श्राद्धकाले पठेन्नित्यं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
सर्वतीर्थसमं स्नानं श्रवणात्पठनाज्जपात् ॥
प्रयागस्य च गङ्गाया यमुनायाः स्तुतेर्द्विज।
श्रवणेन विनश्यन्ति दोषाश्चैव तु कर्मजाः ॥
(२३।५१, ५३, ५४)

इस प्रकार यह देवताओंका स्तोत्र स्वर्ग एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें तथा प्रतिदिन स्नानके समय इसका पाठ करता है, उसे सब तीर्थोंमें स्नानके समान पुण्य होता है। इसके श्रवण, पाठ तथा जपसे उक्त फलकी सिद्धि होती है। ब्रह्मन् ! प्रयाग, गङ्गा तथा यमुनाकी स्तुतिका श्रवण करनेसे कर्मजन्य दोष नष्ट हो जाते हैं।


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* अध्याय २३ श्लोक १५से ५०तक।