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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

१३९-अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन

पातालखण्ड ] * अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन * ५७५


सर्वथा प्रयत्न करके मेरी प्रियाकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। रुद्र ! मेरी प्रियाका आश्रय लेकर तुम भी मुझे अपने वशमें कर सकते हो। यह बड़े रहस्यकी बात है, जिसे मैंने तुम्हें बता दिया है। तुम्हें यत्नपूर्वक इसे छिपाये रखना चाहिये। अब तुम भी मेरी प्रियतमा श्रीराधाकी शरण लो और मेरे युगल-मन्त्रका जप करते हुए सदा मेरे इस धाममें निवास करो।'

यह कहकर दयानिधान श्रीकृष्ण मेरे दाहिने कानमें पूर्वोक्त युगल-मन्त्रका उपदेश देकर मेरे देखते-देखते वहीं अपने गणोंसहित अन्तर्धान हो गये। तबसे मैं भी निरन्तर यहीं रहता हूँ। नारद ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पूछे हुए विषयका साङ्गोपाङ्ग वर्णन कर दिया।

सूतजी कहते हैं—शौनकजी ! पूर्वकालमें भगवान् शङ्करने साक्षात् श्रीकृष्णके मुखसे इस रहस्यका ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने नारदजीसे कहा और नारदजीने मुझे इसका उपदेश दिया था। [वही आज मैंने यहाँ आपको सुनाया है।] आपको भी उचित है कि इस परम अद्भुत रहस्यको सदा गोपनीय रखें—इसे हर एकके सामने प्रकट न करें।

शौनकने कहा—गुरुदेव ! आपकी कृपासे आज मैं कृतकृत्य हो गया; क्योंकि आपने मेरे सामने यह रहस्योंका भी रहस्य प्रकाशित किया है।

सूतजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! आप भी अहर्निश युगल-मन्त्रका जप करते हुए इन धर्मोंका पालन कीजिये। थोड़े ही दिनोंमें आपको भगवान्‌के दास्यभावकी प्राप्ति हो जायगी। मैं भी यमुनाके तटपर भगवान् गोपीनाथके नित्य-धाम वृन्दावनमें जा रहा हूँ। महादेवजीके मुखसे निकला हुआ यह उत्तम चरित्र परम पवित्र है, इसमें महान् अनुभव भरा हुआ है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, वे अवश्य ही भगवान्‌के परमपदको प्राप्त होते हैं। यह स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्तिका भी कारण और समस्त पापोंका नाशक है। जो लोग सदा भगवान् विष्णुकी सेवामें तत्पर रहकर इसका भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उन्हें विष्णुलोकसे कभी किसी तरह भी पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता।

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अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन

ऋषियोंने कहा—महाभाग ! हमलोगोंने आपके मुखसे भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त अद्भुत चरित्र सुना है और इससे हमें पूरा संतोष हुआ है। अहो ! भगवान् श्रीकृष्णका माहात्म्य भक्तोंको सद्गति प्रदान करनेवाला है, उससे किसको तृप्ति हो सकती है। अतः हम पुनः श्रीकृष्णका चरित्र सुनना चाहते हैं।

सूतजी बोले—द्विजवरो ! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया, यह जगत्‌को तारनेवाला है। आपलोग स्वयं तो कृतार्थ ही हैं; क्योंकि श्रीकृष्णके भक्तोंका मनोरथ सदा पूर्ण रहता है। श्रीकृष्णका पावन चरित्र साधु पुरुषोंको अत्यन्त हर्ष प्रदान करनेवाला है। अब मैं इस विषयमें एक अत्यन्त अद्भुत उपाख्यान सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, भगवान्‌के प्रिय भक्त देवर्षि नारदजी सब लोकोंमें घूमते हुए मथुरामें गये और वहाँ राजा अम्बरीषसे मिले, जिनका चित्त श्रीकृष्णकी आराधनामें

५७६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


लगा हुआ था। मुनिश्रेष्ठ नारदके पधारनेपर साधु राजा अम्बरीषने उनका सत्कार किया और प्रसन्नचित्त होकर श्रद्धाके साथ आपलोगोंकी ही भाँति प्रश्न किया— 'मुने ! वेदोंके वक्ता विद्वान् पुरुष जिन्हें परम ब्रह्म कहते हैं, वे स्वयं भगवान् कमलनयन नारायण ही हैं। जो सबसे परे हैं, जिनकी कोई मूर्ति न होनेपर भी जो मूर्तिमान् स्वरूप धारण करते हैं, जो सबके ईश्वर, व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, सनातन हैं, समस्त भूत जिनके स्वरूप हैं, जिनका चित्तद्वारा चिन्तन नहीं किया जा सकता, ऐसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान किस प्रकार हो सकता है? जिनमें यह सारा विश्व ओतप्रोत है, जो अव्यक्त, एक, पर (उत्कृष्ट) और परमात्माके नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनसे इस जगत्‌का जन्म, पालन और संहार होता है, जिन्होंने ब्रह्माजीको उत्पन्न करके उन्हें अपने ही भीतर स्थित वेदोंका ज्ञान दिया, जो समस्त पुरुषार्थोंको देनेवाले हैं, योगीजनॉको भी जिनके तत्त्वका बड़ी कठिनाईसे बोध होता है, उनकी आराधना कैसे की जा सकती है? कृपया यह बात बताइये। जिसने श्रीगोविन्दकी आराधना नहीं की, वह निर्भय पदको नहीं प्राप्त कर सकता। इतना ही नहीं, उसे तप, यज्ञ और दानका भी उत्तम फल नहीं मिलता। जिसने श्रीगोविन्दके चरणारविन्दोंका रसास्वादन नहीं किया, उसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? भगवान्‌की आराधना समस्त पापोंको दूर करनेवाली है, उसे छोड़कर मैं मनुष्योंके लिये दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं देखता।* जिनके भ्रूभङ्ग मात्रसे समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति सुनी जाती है, उन क्लेशहारी केशवकी आराधना कैसे होती है? स्त्रियाँ भी किस प्रकारसे उनकी उपासना कर सकती हैं? ये सब बातें संसारकी भलाईके लिये आप मुझे बताइये। भगवान् भक्तिके प्रेमी हैं। सब लोग उनकी आराधना किस प्रकार कर सकते हैं? नारदजी! आप वैष्णव हैं, भगवान्‌के प्रिय भक्त हैं, परमार्थतत्त्वके ज्ञाता तथा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; इसलिये मैं आपसे ही यह बात पूछता हूँ। भगवान् श्रीकृष्णके विषयमें किया हुआ प्रश्न वक्ता, श्रोता और प्रश्नकर्ता—इन तीनों पुरुषोंको पवित्र करता है; ठीक उसी तरह, जैसे उनके चरणोंका जल श्रीगङ्गाजीके रूपमें प्रवाहित होकर तीनों लोकोंको पावन बनाता है। देहधारियोंका यह देह क्षणभङ्गुर है, इसमें मनुष्य-शरीरका मिलना बड़ा दुर्लभ है, उसमें भी भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका दर्शन तो मैं और भी दुर्लभ समझता हूँ। इस संसारमें यदि क्षणभरके लिये भी सत्सङ्ग मिल जाय तो वह मनुष्योंके लिये निधिका काम देता है; क्योंकि उससे चारों पुरुषार्थ प्राप्त हो जाते हैं। भगवन् ! आपकी यात्रा सम्पूर्ण प्राणियोंका मङ्गल करनेके लिये होती है। जैसे माता-पिताका प्रत्येक विधान बालकोंके हितके लिये ही होता है, उसी प्रकार भगवान्‌के पथपर चलनेवाले संत-महात्माओंकी हर एक क्रिया जगत्‌के जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही होती है। देवताओंका चरित्र प्राणियोंके लिये कभी दुःखका कारण होता है और कभी सुखका; किन्तु आप-जैसे भगवत्परायण साधुपुरुषोंका प्रत्येक कार्य जीवोंके सुखका ही साधक होता है। जो देवताओंकी जैसी सेवा करते हैं, देवता भी उन्हें उसी प्रकार सुख पहुँचानेकी चेष्टा करते हैं। जैसे छाया सदा शरीरके साथ ही रहती है, उसी प्रकार देवता भी कर्मके साथ रहते हैं—जैसा कर्म होता है, वैसी ही सहायता उनसे प्राप्त होती है, किन्तु साधु पुरुष स्वभावसे ही दीनोंपर दया करनेवाले होते हैं।† इसलिये भगवन् ! मुझे वैष्णव-धर्मोंका उपदेश कीजिये, जिससे वेदोंके स्वाध्यायका फल प्राप्त होता है।


* अनाराधितगोविन्दो न विन्दति यतोऽभयम्। न तपोयज्ञदानानां लभते फलमुत्तमम् ॥
अनास्वादितगोविन्दपादाम्बुजरसो नरः। मनोरथकथानीतं कथमाकलयेत्फलम् ॥
हरेराराधनं हित्वा दुरितौघनिवारणम्। नान्यत्पश्यामि जन्तूनां प्रायश्चित्तं परं मुने ॥ (८४। १५—१७)
† श्रोतारमथ वक्तारं प्रष्टारं पुरुषं हरेः। प्रश्नः पुनाति कृष्णस्य तदङ्घ्रिसलिलं यथा ॥
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः। तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ॥

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**नारदजीने कहा—**राजन् ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। तुम भगवान् श्रीविष्णुके भक्त हो और एकमात्र लक्ष्मीपतिको सेवन ही परमधर्म है—इस बातको जानते हो। जिन विष्णुकी आराधना करनेपर समस्त विश्वकी आराधना हो जाती है तथा जिन सर्वदेवमय श्रीहरिके संतुष्ट होनेपर सारा जगत् संतुष्ट हो जाता है, जिनके स्मरण मात्रसे महापातकोंकी सेना तत्काल थर्रा उठती है, वे भगवान् श्रीनारायण ही सेवनके योग्य हैं। राजन् ! सब ओर मृत्युसे घिरा हुआ कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो अपनी इन्द्रियोंके सकुशल रहते हुए श्रीमुकुन्दके चरणारविन्दोंका सेवन न करे। भगवान् तो ऋषियों और देवताओंके भी आराध्यदेव हैं।* भगवान्‌के नाम और लीलाओंका श्रवण, उनका निरन्तर पाठ, श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, उनका आदर तथा उनकी भक्तिका अनुमोदन—ये सब मनुष्यको तत्काल पवित्र कर देते हैं। वीर! भगवान् उत्तम धर्मस्वरूप हैं, वे विश्व-द्रोहियोंको भी पावन बना देते हैं। कारण-कार्य आदिके भी जो कारण हैं, भगवान् उनके भी कारण हैं; किन्तु उनका कोई कारण नहीं है। वे योगी हैं। जगत्के जीव उन्हींके स्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत् ही उनका रूप है। श्रीहरि अणु, बृहत्, कृश, स्थूल, निर्गुण, गुणवान्, महान्, अजन्मा तथा जन्म-मृत्युसे परे हैं; उनका सदा ही ध्यान करना चाहिये। सत्पुरुषोंके सङ्गसे कीर्तन करने योग्य भगवान् श्रीकृष्णकी निर्मल कथाएँ सुननेको मिलती हैं, जो आत्मा, मन तथा कानोंको अत्यन्त सरस एवं मधुर जान पड़ती हैं। भगवान् भावसे—हृदयके प्रगाढ़ प्रेमसे प्राप्त होते हैं, इस बातको तुम स्वयं भी जानते हो; तथापि तुम्हारे गौरवका ख्याल करके संसारके हितके लिये मैं भी कुछ निवेदन करूँगा। जिसे परब्रह्म कहते हैं, जो पुरुषसे परे और सर्वोत्कृष्ट है तथा जिसकी मायासे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌की सत्ता प्रतीत होती है, वह तत्त्व भगवान् अच्युत ही हैं। वे भक्तिपूर्वक पूजित होनेपर सभी मनोवाञ्छित वस्तुएँ प्रदान करते हैं। राजन्! जो मनुष्य मन, वाणी और क्रियासे भगवान्‌की आराधनाम लगे हैं, उनके व्रत-नियम बतलाया हूँ, इससे तुम्हें प्रसन्नता होगी। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) तथा निष्कपटभावसे रहना—ये भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये मानसिक व्रत कहे गये हैं। नरेश्वर! दिनमें एक बार भोजन करना, रात्रिमें उपवास करना और बिना माँगे जो अपने-आप प्राप्त हो जाय उसी अन्नका उपयोग करना—यह पुरुषोंके लिये कायिक व्रत बताया गया है। वेदोंका स्वाध्याय, श्रीविष्णुके नाम एवं लीलाओंका कीर्तन तथा सत्यभाषण करना एवं चुगली न करना—यह वाणीसे सम्पन्न होनेवाला व्रत कहा गया है। चक्रधारी भगवान् विष्णुके नामोंका सदा और सर्वत्र कीर्तन करना चाहिये। वे नित्य शुद्धि करनेवाले हैं; अतः उनके कीर्तनमें कभी अपवित्रता आती ही नहीं। वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी आचारोंका विधिवत् पालन करनेवाले पुरुषके द्वारा परम पुरुष श्रीविष्णुकी सम्यक् आराधना होती है। यह मार्ग भगवान्‌को संतुष्ट करनेवाला है। स्त्रियाँ मन, वाणी और शरीरके संयमरूप व्रतों तथा हितकारी आचरणोंके द्वारा अपने पतिरूपी दयानिधान वासुदेवकी उपासना करती हैं। शूद्रोंके लिये द्विजाति तथा स्त्रियोंके लिये पति ही श्रीकृष्णचन्द्रके


संसारेऽस्मिन् क्षणाद्धेऽपि सत्सङ्गः शेवधिर्नृणाम्। यस्मादवाप्यते सर्वं पुरुषार्थचतुष्टयम्॥
भगवन् भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्। बालानां च यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम्॥
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च। सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम्॥
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्। छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः॥ (८४। २२—२७)
* साधु पृष्टं महीपाल विष्णुभक्तिमता त्वया। जानता परमं धर्ममेकं माधवसेवनम्॥
यस्मिन्नाराधिते विष्णौ विश्वमाराधितं भवेत्। तुष्टे च सकलं तुष्टे सर्वदेवमये हरौ॥
यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंहतिः। तत्क्षणात् त्रासमायाति स सेव्यो हरिरेव हि॥
को नु राजन्निन्द्रियवान् मुकुन्दचरणाम्बुजम्। न भजेत् सर्वतोमृत्युपरपारममुषिदैवतैः॥ (८४। २९—३२)

५७८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


स्वरूप हैं; अतः उनको शास्त्रोक्त मार्गसे इन्हींका पूजन करना चाहिये।* ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन वर्णोंके लोग ही वेदोक्त मार्गसे भगवान्‌की आराधना करें। स्त्री और शूद्र आदि केवल नाम-जप या नाम-कीर्तनके द्वारा ही भगवदाराधनके अधिकारी हैं। भगवान् लक्ष्मीपति केवल पूजन, यजन तथा व्रतोंसे ही नहीं संतुष्ट होते। वे भक्ति चाहते हैं; क्योंकि उन्हें 'भक्तिप्रिय' कहा गया है। पतिव्रता स्त्रियोंका तो पति ही देवता है। उन्हें पतिमें ही श्रीविष्णुके समान भक्ति रखनी चाहिये तथा मन, वाणी, शरीर और क्रियाओंद्वारा पतिकी ही पूजा करनी चाहिये। अपने पतिका प्रिय करनेमें लगी हुई स्त्रियोंके लिये पति-सेवा ही विष्णुकी उत्तम आराधना है। यह सनातन श्रुतिका आदेश है। विद्वान् पुरुष अग्निमें हविष्यके द्वारा, जलमें पुष्पोंके द्वारा, हृदयमें ध्यानके द्वारा तथा सूर्यमण्डलमें जपके द्वारा प्रतिदिन श्रीहरिकी पूजा करते हैं।†

अहिंसा पहला, इन्द्रिय-संयम दूसरा, जीवोंपर दया करना तीसरा, क्षमा चौथा, शम पाँचवाँ, दम छठा, ध्यान सातवाँ और सत्य आठवाँ पुष्प है। इन पुष्पोंके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण संतुष्ट होते हैं। नृपश्रेष्ठ ! अन्य पुष्प तो पूजाके बाह्य अङ्ग हैं, भगवान् उपर्युक्त पुष्पोंसे ही प्रसन्न होते हैं; क्योंकि वे भक्तिके प्रेमी हैं। जल वरुण देवताका [प्रिय] पुष्प है, घी, दूध और दही—चन्द्रमाके पुष्प हैं, अन्न आदि प्रजापतिके, धूप-दीप अग्निका और फल-पुष्पादि वनस्पतिका पुष्प है ! कुश-मूलादि पृथ्वीका, गन्ध और चन्दन वायुका तथा श्रद्धा विष्णुका पुष्प है। बाजा विष्णुपद (विष्णु-प्राप्तिका साधन) माना गया है। इन आठ पुष्पोंसे पूजित होनेपर भगवान् विष्णु तत्काल प्रसन्न होते हैं। सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, हृदयाकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और सम्पूर्ण प्राणी—ये भगवान्‌की पूजाके स्थान हैं। सूर्यमें त्रयीविद्या (ऋक्, यजु, साम) के द्वारा और अग्निमें हविष्यकी आहुतिके द्वारा भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये। श्रेष्ठ ब्राह्मणमें आवभगतके द्वारा, गौओंमें घास और जल आदिके द्वारा, वैष्णवमें बन्धुजनोचित आदरके द्वारा तथा हृदयाकाशमें ध्याननिष्ठाके द्वारा श्रीहरिकी आराधना करनी उचित है। वायुमें मुख्य प्राण-बुद्धिके द्वारा, जलमें जलसहित पुष्पादि द्रव्योंके द्वारा, पृथ्वी अर्थात् वेदी या मृण्मयी मूर्तिमें मन्त्रपाठपूर्वक हार्दिक श्रद्धाके साथ समस्त भोग-समर्पणके द्वारा, आत्मामें अभेद-बुद्धिसे क्षेत्रज्ञके चिन्तनद्वारा तथा सम्पूर्ण भूतोंमें भगवान्‌को व्यापक मानकर उनके प्रति समतापूर्ण भावके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। इन सभी स्थानोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित भगवान्‌के चतुर्भुज एवं शान्त रूपका ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त होकर आराधन करना उचित है। ब्राह्मणोंके पूजनसे भगवान्‌की भी पूजा हो जाती है। तथा ब्राह्मणोंके फटकारे जानेपर भगवान् भी तिरस्कृत होते हैं। वेद और धर्मशास्त्र जिनके आधारपर टिके हुए हैं, वे ब्राह्मण भगवान् विष्णुके ही स्वरूप हैं; उनका नामोच्चारण करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाते हैं। राजन् ! संसारमें धर्मसे ही सब प्रकारके शुभ फलोंकी प्राप्ति होती है और धर्मका ज्ञान वेद तथा धर्मशास्त्रसे होता है। उन दोनोंके भी आधार इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही हैं; अतः उनकी पूजा करनेसे जगदीश्वर ही पूजित होते हैं। देवाधिदेव विष्णु यज्ञ और दानोंसे, उग्र तपस्यासे, योगके अभ्याससे तथा सम्यक् पूजनसे भी उतने प्रसन्न नहीं होते, जितना ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे होते हैं। वेदोंके जाननेवाले ब्रह्माजी भी ब्राह्मणोंके भक्त हैं। ब्राह्मण देवता हैं, इस बातके वे ही प्रवर्तक हैं। वे ब्राह्मणोंको देवता मानते हैं; अतः


* पतिरूपो हितार्थैर्मनोवाक्कायसंयमैः । व्रतैराध्यते स्त्रीभिर्वासुदेवो दयानिधिः ॥
स्वागमोक्तेन मार्गेण स्त्रीशूद्रैरपि पूजनम्। कर्तव्यं कृष्णचन्द्रस्य द्विजातिवररूपिणः ॥ (८४। ४७-४८)
† स्त्रीणां पतिव्रतानां तु पतिरेव हि दैवतम्। स तु पूज्यो विष्णुभक्त्या मनोवाक्कायकर्मभिः ॥
स्त्रीणामथाधिकतया विष्णोराराधनादिकम्। पतिप्रियरतानां च श्रुतिरेषा सनातनी ॥
हविषाग्नौ जले पुष्पैर्ध्यानेन हृदये हरिम्। यजन्ति सूर्यो नित्यं जपेन रविमण्डले ॥ (८४। ५१-५२, ५५)

पातालखण्ड ] * अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन * ५७९


ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर ही उन्हें भी संतोष होता है।

मातृकुल और पितृकुल—दोनों कुलोंके पूर्वज चिरकालसे नरकमें डूबे हों तो भी जब उनका वंशधर पुत्र श्रीहरिकी पूजा आरम्भ करता है, उसी समय वे स्वर्गमें चले जाते हैं। जिनका चित्त विश्वरूप वासुदेवमें आसक्त नहीं हुआ, उनके जीवनसे तथा पशुओंकी भाँति आहार-विहार आदि चेष्टाओंसे क्या लाभ।* राजन् ! अब मैं विष्णुका ध्यान बतलाता हूँ, जो अबतक किसीने देखा न होगा, वह नित्य, निर्मल एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला ध्यान तुम सुनो। जैसे वायुहीन स्थानमें रखा हुआ दीपक स्थिरभावसे अग्निमय स्वरूप धारण करके प्रज्वलित होता रहता है और घरके समूचे अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार ध्यानस्थ आत्मा सब प्रकारके दोषोंसे रहित, निरामय, निष्काम, निश्चल तथा वैर और मैत्रीसे शून्य हो जाता है। श्रीकृष्णका ध्यान करनेवाला पुरुष शोक, दुःख, भय, द्वेष, लोभ, मोह तथा भ्रम आदिसे और इन्द्रियोंके विषयोंसे भी मुक्त हो जाता है। जैसे दीपक जलते रहनेसे तेलको सोख लेता है, उसी प्रकार ध्यान करनेसे कर्मका भी क्षय हो जाता है।

मानद ! भगवान् शङ्कर आदिने ध्यान दो प्रकारका बतलाया है—निर्गुण और सगुण। उनमेंसे प्रथम अर्थात् निर्गुण ध्यानका वर्णन सुनो। जो लोग योग-शास्त्रोक्त यम-नियमादि साधनोंके द्वारा परमात्म-साक्षात्कारका प्रयत्न कर रहे हैं, वे ही सदा ध्यानपरायण होकर केवल ज्ञानदृष्टिसे परमात्माका दर्शन करते हैं। परमात्मा हाथ और पैरसे रहित है, तो भी वह सब कुछ ग्रहण करता और सर्वत्र जाता है। मुखके बिना ही भोजन करता और नाकके बिना ही सूँघता है। उसके कान नहीं हैं, तथापि वह सब कुछ सुनता है। वह सबका साक्षी और इस जगत्‌का स्वामी है। रूपहीन होकर भी रूपसे सम्बद्ध हो पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत हुआ-सा प्रतीत होता है। वह समस्त लोकोंका प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌के प्राणी उसकी पूजा करते हैं। बिना जीभके ही वह सब कुछ वेद-शास्त्रोंके अनुकूल बोलता है। उसके त्वचा नहीं है, तथापि वह शीत-उष्ण आदि सब प्रकारके स्पर्शका अनुभव करता है। सत्ता और आनन्द उसके स्वरूप हैं। वह जितेन्द्रिय, एकरूप, आश्रयविहीन, निर्गुण, ममतारहित, व्यापक, सगुण, निर्मल, ओजस्वी, सबको वशमें करनेवाला, सब कुछ देनेवाला और सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ है। वह सर्वत्र व्यापक एवं सर्वमय है। इस प्रकार जो अनन्य-बुद्धिसे उस सर्वमय ब्रह्मका ध्यान करता है, वह निराकार एवं अमृततुल्य परम पदको प्राप्त होता है।

महामते ! अब मैं द्वितीय अर्थात् सगुण ध्यानका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो। इस ध्यानका विषय भगवान्‌का मूर्त किंवा साकार रूप है। वह निरामय—रोग-व्याधिसे रहित है, उसका दूसरा कोई आलम्ब—आधार नहीं है [वह स्वयं ही सबका आधार है]। राजन् ! जिनकी वासनासे यह सारा ब्रह्माण्ड वासित है—जिनके संकल्पमें इस जगत्‌का वास है, वे भगवान् श्रीहरि इस विश्वको वासित करनेके कारण ही वासुदेव कहलाते हैं। उनका श्रीविग्रह वर्षाऋतुके सजल मेघके समान श्याम है, उनकी प्रभा सूर्यके तेजको भी लज्जित करती है। उनके दाहिने भागके एक हाथमें बहुमूल्य मणियोंसे चित्रित शङ्ख शोभा पा रहा है और दूसरेमें बड़े-बड़े असुरोंका संहार करनेवाली कौमोदकी गदा विराजमान है। उन जगदीश्वरके बायें हाथोंमें पद्म और चक्र सुशोभित हो रहे हैं। इस प्रकार उनके चार भुजाएँ हैं। वे सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। 'शाङ्गं' नामक धनुष धारण करनेके कारण उन्हें शाङ्गीं भी कहते हैं। वे लक्ष्मीके स्वामी हैं। [उनकी झाँकी बड़ी सुन्दर है—] शङ्खके समान मनोहर ग्रीवा, सुन्दर गोलाकार मुखमण्डल तथा पद्म-पत्रके समान बड़ी-बड़ी आँखें [—सभी आकर्षक हैं]। कुन्द-जैसे चमकते हुए दाँतोंसे भगवान्


* नरकेऽपि चिरं मग्नाः पूर्वजा ये कुलद्वये। तदैव यान्ति ते स्वर्गं यदार्चति सुतो हरिम्॥
किं तेषां जीवितेनेह पशुवच्चेष्टितेन किम्। येषां न प्रवणं चित्तं वासुदेवे जगन्मये॥ (८४।७२-७३)