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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

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DevanagariHindipublished322 pages

About this granth

Ek Omkar Satnam (एक ओंकार सतनाम) is a collection of Hindi talks by Osho (Acharya Rajneesh, 1931–1990) on Guru Nanak's Japji Sahib. The Japji is the foremost composition of the Sikh tradition, standing at the opening of the Guru Granth Sahib and recited each morning. It begins with the Mul Mantar, "Ik Onkar Satnam Karta Purakh", from which the book takes its title.

In these discourses Osho goes through the pauris of the Japji in order and speaks on remembrance of the Name, hukam (the divine order), the guru, meditation and surrender. He illustrates his points with episodes from Nanak's life, stories of saints and his own familiar parables, and presents Nanak's devotion as a path that can be lived in the midst of household life.

The book is arranged in a series of chapters with a table of contents and runs to about 322 pages. It suits readers who want to approach the Japji and the Sikh sant tradition through the eyes of a modern spiritual speaker.

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इस बाल्यकाल के बिना किसी परिश्रम स्वाध्याय के बिना ज्ञान तथा सब प्रकार के भोग
अनेक प्रकार सब प्रकार सिद्ध तथा सम्पूर्ण सुख भोगने योग्य जो उत्तम पदार्थ
मिले हैं, उनका उपभोग जो करते हैं।
जो विचार अथवा विवेक तथा ज्ञान रूपी नेत्रोंको बन्दकर सम्पूर्ण सुखरूप जल
पूर्ण के समान विषय भोगों रूपी जल में डूब रहे हैं जिससे न कभी पार पावेगा तथा
अनेक जन्म में, सो सो योनियों में जिस प्रकार मनुष्य विषय सुख भोग रहा है, सो तो
अन्य सब पशु पक्ष्यादि योनियों में सम्पूर्ण भोग प्राप्त होता ही रहता है। किन्तु,
उपकारी ज्ञान प्राप्त होकर जिस ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है सो तो प्राप्त धर्मात्मा
विचारवान पुरुष ही पुरुषार्थ के अभ्यास द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त करते हैं। जो विद्या
धर्म, ईश्वर रूप जो उपकारी ज्ञान जिससे सब प्रकार का सुख हो, सत्य, सुविचार,
विज्ञानादि रूप जो सदा साथ-साथ रहने वाला है सो अविद्यावान् को प्राप्त ही नहीं।
इस कारण-कारण ज्ञान रूपी धन को जो मनुष्य नहीं करते वे मूर्ख, विवेक शून्य
ही जन्म धारण किये
वृथा जन्म खो, काल रूप महा सर्पके मुखमें प्रवेश करते हैं।
सो अविद्यावान् मनुष्य पशुके समान ही है, कारण जिस प्रकार पशु खाता पीता
विषयको भोगता भोग भोगके कालके वश हो जाता है सो पशुके सदृश ही है। इसी
प्रकार मूढ नर जो सो अविद्यावान् को प्राप्त भोगोंके भोगनेमें सदा तत्पर रहता
कभी भी उस प्रभु का गुणानुवाद तो कभी भी नहीं करता, उस परम दयालु को जो
सब सुख दाता अविद्यावान् को भी सुख, सो सो ज्ञान प्राप्त कर उस प्रभुके
उपकारोंको भी याद नहीं करता, सो तो जन्म लेकर विष भक्षण करनेके तुल्य जीवन
को धारण किये हुए ही है, सो इस जन्म में भी दुःखी, पर जन्म भी दुःखी
सो अविद्यावान् मनुष्य अज्ञानता रूपी जाल में फंसा ही रहता है, जन्म-मरण
रूप भवके फन्दे को कभी त्याग नहीं सकता तथा सो अनेक प्रकार के दुःख भोगता
ही रहता है, जिस प्रकार बन्धन सहित कुत्ता कसाइयों के हाथमें जाकर अनेक
कष्टोंको वा दुःख-दारिद्र भोग को ही भोगता रहता है उसी भाँति, सो नर अज्ञानी
मूढ़ ही जन्म धारण कर सब कुछ खोता है।
सो अब सो सब भी अज्ञानता नाश हो तथा सुमति प्रकाश हो इसलिए प्रार्थना
पूर्वक प्रभु स्तुति की सो कही है, सो अब कृपा कर के, हे प्रभु सब दोषों हरिये?
जिससे शुद्ध होकर तुम्हारे पादारविन्दों में मन स्थित होकर सदा आनन्दित रहे
तथा सदा सब सुखोंके दाता प्रभुकी शरण में सदा मन स्थिर रहे, सो यह
सत्य ज्ञान का प्रकाश सब जीवों द्वारा प्राप्त हो सो प्रभुने कृपा करके वेद रूप
ज्ञान प्रकाश, वेद, सो सब का सब सब के कल्याणार्थ सब जीवोंके सुखके हेतु रचा,
जिस, सब का उद्धार हो तथा सब अज्ञान रूपी अन्धकार मिटकर सत्यता रूप सब
जीवों को कल्याण का प्रकाश वा आनन्द सदा प्राप्त होवे सो प्रभुने सब जीवोंके
ऊपर कृपा करके सत्य ज्ञान का प्रकाश जो किया है? सो उसका सब प्रकार नित्य
अभ्यास सो जो करेगा, उस अभ्यास की दृढ़तासे मन शुद्ध होकर प्रभुके
स्वरूपका ध्यान करके जिससे उस पद मोक्ष पदको प्राप्त कर लेता है, सो जब
मनुष्य अज्ञानता को तजकर सब जीवोंको इस उत्तम मार्ग पर चलावे तथा
स्वयं सत्य स्वरूप को मन वचन कर्म द्वारा सेवन कर मोक्षपद, पद प्राप्त करे,
सो संसार में जो कुछ भी है सो परमात्मा सबको ही समान रूप देकर उपकार
है, सो सब मनुष्य, सब का सब, सब प्रकार का कल्याण ही चाहे
सो जो सज्जन ऐसा करते हैं सो उत्तम हैं, तथा जो केवल अपना कल्याण
ही चाहते तथा दूसरों सदा का अनिष्ट ही, विचार ही मन में, परोपकार ही,
अथवा परोपकार शून्य सो नर पशु रूप ही जानिए
आज का दिन इस बात का बड़ा भारी आनन्द हुआ जिसका वर्णन वाणी से
भी नहीं हो सके तथा चित्त आनन्द स्वरूप परमात्मा के चरणारविन्दों में मग्न
हो, प्रार्थना रूप सब सत्य सुखकारी शब्द रूप है? अतः सबको सन्मार्ग पर चलना
योग्य
इसलिए सब जीवों का यह परम कर्तव्य है कि सो भी, सब प्रकार के
भय को त्याग कर सर्वव्यापक ईश्वर के ऊपर, सम्पूर्ण भाव तथा दृढ़ विश्वास करके
सब जीवों अपने आत्मा के समान समझ-बूझके परोपकार ही करना यह ही सब का
मुख्य काम है। क्या राजा, प्रजा सब कोई, परस्पर सब मिलकर, एक-दूसरे
जीवोंके सुखार्थ सब प्रकार से मन धन तन से सहायतार्थ ही प्रवृत्तरहें, सो ही
उत्तम मनुष्य सब को कहा गया।
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तब यह विचार कर और शान्त चित्तके अनुसंधानसे निश्चय करो! इस संसारमें धन और वैभवका सुख विनाशी,
क्षणभंगुर, जरा और मृत्युसे संकीर्ण, यह समझ कर इस संसार और सांसारिक भोगोंको तृणवत् समझकर
परित्याग कीजिये अथवा सब भोगोंको पर त्यागने न बने, अर्थात् भोगों विषय, जिस पर अपना विशेष
विचार वा अनुराग वा आसक्ति न होय उसे भोग कर उसीके द्वारा उस पर पुरुष परमात्माका साक्षात्कार
करें? जो ऐसा विचार न कर सके तथा भोग पदार्थोंके विषयमें लोभी न होवे, तो इसका फल क्या?
पश्चात्गामी होगा या नहीं? अर्थात् पश्चात्तापको ही प्राप्त होगा तथा अंतमें नरककी यातना भी भोगे
पर उस ईश्वर का साक्षात्कार वा मोक्ष पद कदापि न होवेगा और न ही सुख पावेगा! ईश्वर सबमें व्याप्त
इस सब जगत् को धारण करने वाला सब का प्रेरक परमात्मा जो सब जगत् में व्यापक होकर स्थित
होकर भी! अपने ज्ञानवान् मुमुक्षु भक्त को अविद्या रूपी अंधकार विषयक भोगों से रहित होने की
प्रेरणा करता व कहता, सावधान करो उस ईश्वर को जो सब का साक्षी वा सब में व्यापक, सब का धारक सब
का पालन कर्ता, यह समझ कर उस ईश्वर सबको व्यापता है उस ईश्वर को सर्व व्यापक जान ईश्वर
निमित्त सब कर्मोंको अर्पण कर नित्य अपने आत्माको तृप्त वा परमात्माको तृप्त कीजिये!
परमात्मा स्वयंप्रकाशित होने कारण सब पर कृपा करता हुआ सब जगत्के ऊपर व्याप्त हो रहा
है सो उस ईश्वर सबसे भिन्न वा पृथक्-पृथक्? विचार करो उस ईश्वरका साक्षात्कार वा ज्ञानके होनेपर
कोई संशय वा शोक वा अज्ञान अथवा क्लेश कभी नहीं रहता क्योंकि वह ईश्वर अविद्या, भ्रम
नाश का करवाने वाला
है उस ईश्वर को सब प्रकार देखना चाहिये? सो परमात्मा सर्वत्र व्याप्त सबको व्यापने वाला सब
पर सब का स्वयंप्रकाशित सर्वज्ञ सब शरीरोंके रूप रहित सूक्ष्म वा स्थूल, सूक्ष्म लिंग वा कारण देह
के नाश रहित जो सब जीवोंको कर्मोंका फल देने वाला
ईश्वर अपने दिव्य तेजसे सब जगत्को तृप्त, आनन्दित करता हुआ सब जगत्में व्यापक होकर
दिव्य रूप सर्वव्यापी सर्वेश्वर रूप सर्वज्ञ सब शरीरों रहित वा, सब जीवोंका प्रेरक शुद्ध व्यापक है,
सब प्रकार विशुद्धताके दाताभावसे जो निष्काम कर्म रूप परमात्माकी उपासना अथवा ध्यान रूप
उत्तम कर्मों द्वारा, ईश्वर सब दिव्य जीवोंका कल्याण सर्वदा करता रहता
ईश्वर सबका साक्षी होकर सबको तृप्त
वा सब पर दयाल वा पोषक, सबको उस ईश्वर रूप सूर्य वा तेजके सन्मुख वा शरण,
जिसमें जीव को सब दुख वा कष्ट नाश हो कर परम शान्ति प्राप्त हो, यही सब उत्तम मनुष्योंका
धर्म
हे सच्चिद् ब्रह्म परमात्मा भो, हे शिव रूप ईश्वर परमात्मा भो, हे सनातन रूप स्वामी परमात्मा भो, हे
सब जगत् कर्ता परमात्मा भो, हे पोषक रूप ईश्वर परमात्मा भो हे सब जगत् प्रेरक परमात्मा रूप हे प्रकाश-
स्वरूप भो, हे सूर्य रूप अविद्या-नाशक परमात्मा भो, हे कल्याण रूप, हे व्यापक रूप, हे
शुद्ध रूप, हे समस्त इस ब्रह्माण्डके स्वामी वा जगत्के सुख दाता स्वरूप सर्व ऐश्वर्यवान्
परमात्मा भो सब ऐश्वर्यवान् परमात्मा भो, सब शरीरोंमें व्यापने वाले वा सब जीवोंके कल्याण कर्ता
रूप ईश्वर परमात्मा भो, विद्या व ज्ञान दाता भो, हे केवल
सो ईश्वर सत्य प्रकाश रूप--
ॐ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह ।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर क्लीबे स्मर कृतँ स्मर ॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
इस प्रकारका विचार करने वाले मनुष्यके लिये ईश्वर कभी दूर वा गुप्त नहीं होता
ज्ञान वा उस पुरुष--ईश्वर भाव को जानकर, परमात्मा का साक्षात् वा दर्शन किया, इसके पश्चात्
वह जीव ईश्वरकी वा परमात्माकी सत्ता व सामर्थ्य तथा अपनी जीवात्माकी अल्पज्ञताको जान उस
परम परमात्माके शरण होकर परमात्माके साक्षात्कार सुख लाभ को प्राप्त हुआ वह अपने सत्य जीवन
को, सब जीवों ईश्वर, सबको ईश्वरके ही सब सम्बन्धी जीवात्माका सम्बन्ध समझता हुआ उत्तम
गति
को प्राप्त करके सब दुख वा अज्ञान कष्ट भोगोंसे छूट, हे सत्य स्वरूप वा ब्रह्म रूप ईश्वर
सब पर अपनी कृपासे सब जीवोंको सब प्रकारके भय क्लेशोंसे दूर रखिये, सब प्रकारके भय से ही
रक्षा कीजिये जिससे सब ही जीव भय क्लेशोंसे दूर रह कर आनन्दित रहें वा सब जीवोंको ईश्वर
कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य कभी किसी प्रकारके क्लेशमें नहीं पड़ता, इस बात को, विचार
कीजिये तथा स्मरण रखिये सब ही जीव, विचार करो उस ईश्वरको? ईश्वर कैसा ईश्वर, कैसा
वह परमात्मा परम दयाल व सर्वेश्वर सर्वव्यापक, वह कैसा ईश्वर होगा जो जीवोंको सब प्रकार
आत्मिक शान्ति प्रदान कर सब प्रकार के कष्ट, सब जीवोंके क्लेशों तथा दुर्गुणोंको छुड़वाता
वा भगाता? सदा ईश्वर अपनी सर्वशक्तिके ज्ञानद्वारा... ॥
सो विचार करो ईश्वर कैसा; क्योंकि उस ईश्वरका स्मरण करने वाला सब संशयों तथा
दुःखों से? तथा अविद्या के प्रभाव से छूटता? ईश्वर कैसा दयालु? इसका उत्तर आगे
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इस काम-काज सम्बन्धी विचार अपने नित्य-कर्म सम्बन्धी विचार पर जोर मारता रहेगा कि साक्षात्कार कहाँ और कहाँ
यह सांसारिक काम? लेकिन साक्षात्कार आवश्यकतानुसार
प्रत्येक अवस्था का एक धर्म है, जो प्रत्येक साधनावस्था साधक को करना पड़ता ही है। संसार
सम्बन्धी कर्त्तव्य साधनावस्था पर्यन्त चलते ही रहते हैं। जब शरीर को वस्त्र की भूख लगी तो वस्त्र देना
ही होगा, पर इस काम--काज सम्बन्धी चिन्तन करते हुए यदि हम प्रत्येक क्रिया ईश्वर-स्मरण युक्त
कर्त्तव्य-कर्म समझ कर करें तो चित्त का कोई विक्षेप इसमें बाधा नहीं पहुँचा सकता या कर्म ज्ञान-निष्ठा
रूप में परिणत होगा।
इसमें सन्देह नहीं, हे सच्चिदानन्द रूप ! प्रभु आपको भूलना ही, हे सच्चिदानन्द रूप! सर्वज्ञ
होने पर भी अन्य किसी विषय को सत्य, दृढ़ या नित्य मानना ही अविद्या? अविद्या का परिणाम दु:ख?
और इस अविद्या के सम्मुख सब प्रकार का संताप, संशय या मानसिक अशान्ति उत्पन्न करेगा,
और कभी शान्ति?
इसका नाश आत्मतत्त्वज्ञान रूपी प्रकाश से सब प्रकार अज्ञान रूपी अन्धकार मिटने पर पूर्ण
आनन्द मिलेगा।
हे प्रभु! मुझ स्वरूप को, हे ज्ञान रूप!
नित्य व अनित्य वस्तु के विवेक ज्ञान से प्राप्त ज्ञान रूपी दीप जलाकर
हे कारण-कार्यमय सब जगत् को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब संशय युक्त
रूप सब को प्रकाश कर, ज्ञान रूप सूर्य स्वरूप प्रकाश से सब का संहारक बनकर
अपने आप को व्यापक रूप में स्थिर कर परमेश्वर रूपी समुद्र में लय कर स्थिर रूप
करो, हे अ-कार्यमय सब रूप को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब रूप भ्रम को लय कर
चिदानन्दरूप सब जगत् रूप को हे परमात्मा लय, हे व्यापक रूप, हे प्रकाश रूप।
ऐसा हे जगत् प्रकाशक परमात्मा।
जिसके पास जो धन होगा वही, समय पड़ने पर उस धन द्वारा सहायता करेगा या
उस का लाभ उठा सकेगा। जिसके पास ज्ञान होगा, समय पड़ने पर उस ज्ञान द्वारा
अज्ञानता को दूर कर, प्रकाश का लाभ कर, संशय को दूर कर, भ्रम को दूर छुटकारा पा
सकेगा, जिससे शान्ति प्राप्त होगी? जो अपने को शरीर मान कर केवल शरीर सम्बन्धी धन
एकत्र करने में लगा रहा, जिसने न आत्मिक आवश्यकतानुसार अभ्यास किया, चिन्तन
करके तत्त्व का अभ्यास किया, संशय का नाश कर ज्ञान प्राप्त कर लिया तो वह किसका
अधिकारी है?
इस पर विचार कर लो कि यह सब संशय किसलिए या इस संशय का आधार कौन है, सो
अज्ञानता है, सो अज्ञानता केवल नाश होने वाली वस्तु मात्र नहीं, जबकि, अपने स्वरूप
का ज्ञान न होने तक, केवल भ्रम का रूप बन कर रहेगी।
जब अपने ज्ञान का, अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता तब संशय कहाँ रह
सकता? ज्ञान का या इस अविद्या का? जो सब तरह से भ्रम मात्र ही होगा! ज्ञान या इस
विद्यावान्? का आधार ही ज्ञान होगा! इस ज्ञान का स्वरूप प्रकाश स्वरूप स्वरूप
चिन्मय स्वरूप का प्रकाश सब ओर होगा!
इस विचार द्वारा हे जीव तू, अपने संशय को सब प्रकार दूर--कर ले कि, संशय
रहित! संशय का स्थान केवल भ्रम रूप सब तरह का होगा ही तब, जब तक तू विचार या
इस संशय रूप सब भ्रम को लय कर ज्ञान स्वरूप को न जाने या न जाने का कारण यह
होगा, सब केवल सब अज्ञानता रूप संशय, सब पर सब भ्रम मात्र सब को जान कर,
इस ज्ञान को, इस ज्ञान को, इस ज्ञान रूप स्वरूप रूप हे जीव तू सब ओर सब तरह
ज्ञान स्वरूप को जानकर प्रकाश रूप में व्यापक कर सब को जान ले, कि सब संशय
का लय ज्ञान व ज्ञान, ज्ञान मात्र ही या ज्ञान व ज्ञान रूप में ही है, जिससे इस
सब भ्रम संशय अभ्यास द्वारा सब ओर सत्य ज्ञान को, जो कि केवल ज्ञान मात्र स्वरूप--
ज्ञान व प्रकाश स्वरूप व्यापक प्रकाश हे प्रकाश रूपी परमात्मा।
सब प्रकार के संशय का स्वरूप अविद्या मात्र, विद्यावान् ज्ञान, नित्य ज्ञान,
अविकारी ज्ञान, व्यापक ज्ञान, प्रकाश का रूप ज्ञान होगा।
अभ्यास स्वरूप या इस अभ्यास के फल रूप में, सो संशय मात्र का नाश
निश्चय होगा।
चित्त जब ज्ञान रूप द्वारा स्थिर होकर हे प्रभु!
रूप सब जग भ्रम अविद्या को लय कर ज्ञान रूप, नित्य स्वरूप सब
आधार का रूप, नित्य स्वरूप सब आधार ज्ञान सब ओर, प्रकाश का रूप स्वरूप ही
होगा उस स्वरूप को ही सब! उस नित्य स्वरूप रूप से सब ओर व्यापक
व्यापक ही हो।
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यह सब भगवान् का रचा, भगवान् का अंश केवल परोपकार प्रयोजन का बना
हुआ ही जगत का स्वरूप या रूप है, तब काम, मद तथा लोभ रूपी विष फल क्यों इस पर
फलते या फल गये या फल रहे हैं और इन का फल भोग क्यों हो रहा है और हम या
आत्मा का इस रूप जगत अथवा संसार का इन चार फल भोगों रूपी सुख वा दुःख रूपी
से क्या भाव तथा कारण सम्बन्ध बना और बन रहा या बना रहेगा।
इस शंका का उत्तर पहले कह चुके--जैसे महाराज जनक राजर्षि अथवा
और राजा लोग या गृह लोग वा योगी लोग वा गृह आश्रम में वा जगत् के भोग रूप
पदार्थों का सेवन करते तथा रचते दृष्टि आते रहे; ऐसा ही काम रूपी भोग
केवल या सुख, जो ब्रह्म के अंश संसार सम्बन्ध स्वभाव ? ऐसा ही मद केवल अहंकार
रूप? लोभ केवल? आत्मा का केवल?
सो ऐसा ही उत्तर काल के प्रमाण, सो इन सब का जो अंश केवल कारण है,
सो तो परोपकार स्वरूप परमात्मा का अंश केवल स्वभाव? आत्मा का भोग केवल
उस अंश तक; सो अंश तो तीन काल सत्य रहने का फल का नाम था, ऐसा रूप
समझना ही तो प्रमाण
सो इस प्रकार काम केवल का फल तो काल रूप से फल जो इस पर लगा
काल रूप से काल के भोग केवल स्वरूप के प्रमाण रूप फल का? अथवा अविद्या
का केवल प्रमाण!
ऐसा अज्ञान जो जग के अज्ञान से जो उत्पन्न हुआ था, सो तो सब जग
भोग रूप या काम केवल भोग रहा? सो तो काल रूप फल का काल से सम्बन्ध,
आत्मा केवल का प्रमाण? ऐसा काम ही तो काल से उत्पन्न स्वरूप के फल का,
ऐसा भोग तो सब काल रूप ही का फल भोग रहा? आत्मा केवल आत्मा का?
ऐसा मद, जो कि जगत् के आधार स्वरूप से, काल से जग को जग से जो काम
केवल रूप भोग लगा सो तो अज्ञान, मद केवल अहंकार, सो केवल अज्ञान
सो जो अविद्या केवल स्वरूप सो तो काम केवल अज्ञान भोग रूप फल जो
केवल अज्ञान केवल स्वरूप का फल केवल अहंकार रूप फल का फल भोग रहा
केवल सो फल अविद्या का भोग तो केवल फल भोग रहा? मद का फल?
ऐसा काम फल? मद केवल का फल? जग केवल का भोग फल का! क्योंकि
जगत् तो भगवान्, सो काम अविद्या अहंकार रूप फल सब का फल भोग प्रमाण
जग रूप से ही केवल स्वरूप, क्योंकि कारण रूप से तो जग केवल
ऐसा ही रूप लोभ का, तब केवल जो सत्य केवल रूप से लोभ रूप फल
जग रूप में, सो तो जग के स्वरूप व्यवहारिक कारण केवल
केवल जग केवल का अंश, न अविद्या केवल का, न आत्मा केवल के केवल
स्वरूप रूप जग रूप केवल स्वरूप का फल लोभ, जगत् केवल जगत् रूप,
व्यवहारिक काल केवल स्वरूप केवल जगत् का फल, व्यवहारिक स्वरूप जग रूप
का, व्यवहारिक स्वरूप का केवल फल, सो जो जग का रूप फल लोभ, केवल
व्यवहारिक फल जग रूप में ही प्रमाण, सो तो सब केवल सत्य न सत्य का
रूप तो केवल व्यवहारिक ही का स्वरूप, ऐसा जग केवल, सत्य का न फल!
केवल तो व्यवहारिक का स्वरूप सब व्यवहार के अंश केवल के व्यवहार
रूप में केवल, जग केवल के जग केवल स्वरूप में, जग के रूप का केवल
केवल रूप
केवल ऐसा ज्ञान रूप, जो केवल ज्ञान, ज्ञान न जग रूप का, न जग केवल
काल रूप ज्ञान न केवल
केवल जग के स्वरूप के केवल रूप से केवल ज्ञान स्वरूप केवल रूप से
व्यवहारिक सत्य स्वरूप केवल, सो व्यवहार केवल ज्ञान स्वरूप, सो व्यवहारिक
केवल स्वरूप सब जग के भोग केवल स्वरूप, सो जग केवल ज्ञान स्वरूप,
केवल से केवल के स्वरूप केवल स्वरूप स्वरूप, केवल के केवल रूप सब
जग-रूप ज्ञान रूप
जग जग-रूप से ही सब ज्ञान रूप है, केवल ज्ञान केवल रूप केवल का
भोग केवल केवल सत्य केवल के व्यवहार ज्ञान, जग रूप से केवल सब केवल
रूप का केवल, जग रूप का स्वरूप
ऐसा ही जग के रूप से केवल, सो तो काल; सो तो काल के प्रमाण,
सो जग के प्रमाण ही प्रमाण
अब जग का केवल रूप सब परोपकार रूप से तो ज्ञान रूप फल रूप से तो
जग केवल रूप से ज्ञान रूप ही फल व्यवहारिक रूप से ज्ञान रूप सब ज्ञान का
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विचार कर लें कि क्या लाभ है, तो ऐसा ही मन को न कहें, वरन् परिस्थिति को
समझें जिसका भय लगा है और विवश होकर ही तो ऐसा काम करना पड़ रहा
होता है, विवशता को जान लेने पर ही भय कम
हो सकता है।
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द्वादश स्कन्ध कथा (उत्तरार्ध सहित)

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्रीमद्भागवत महापुराण
द्वादश स्कन्ध कथा (उत्तरार्ध सहित)
अध्याय 34
तस्मात् त्वमद्य मद्वाचं शृणु सत्यं वदाम्यहम्।
यद्द्वा मुकुन्दं भजते यावद् वित्तं समाहितः॥
शृण्वन् सुपुण्यं विष्णोस्तु तस्मात् पापान् विमुच्यते।
सद्यः करोति तन्मर्त्यं मुच्यते सर्व किल्बिषैः॥
तस्मात् त्वमद्य मे भूयो शृणुष्व वचनं मम।
यन्मया कथितं सर्वं "सत्यं" तत् सर्वं शृणु॥
शुकदेव जी कहते हैं- अब व्यास जी परीक्षित को ज्ञान प्रदान करते हुए
कहने लगे, हे राजन! इस इस संसार रूपी सागर में, जो जीव अपने कर्मों द्वारा
बंधा हुआ रहता है, वासना रूपी रस्सी से, संसार रूपी जाल अत्यंत विशाल
और अत्यंत गंभीर है। इस में जो गिर जाता है वह जब तक भगवान् का भजन नहीं करता,
तब तक आवागमन रूपी चक्र में घूमता रहता है। इसलिए भगवान् की शरण में जाना,
ही सब प्रकार
सुख और सब प्रकार का कल्याण है। जिस प्रकार से एक नाव से एक
पार से दूसरे पार जाया जाता है, उसी प्रकार से भगवान् की भक्ति से यह
जीव भव सागर से, आवागमन रूपी बन्धन से छूट जाता है। परंतु जो
इस बात को नहीं जान पाता और संसार में ही लगा रहता है, वह माया के चक्र
से कभी भी छूट नहीं पाता। इसलिए अब हे राजन! तुम इस प्रकार के ज्ञान
उपदेशों को सुनो।
वास्तव में राजा ज्ञान से ज्ञानवान् होता है या वह ज्ञान पाता है, क्योंकि वह
तो संसार रूपी राज्य शासन के चक्र में पड़ा ही रहता है। इसलिए ज्ञानवान्
बनकर ही वह इस संसार से पार उतर सकता है।
राजाओं के लिए तो यह ज्ञान आवश्यक है, जो राजा ज्ञान से युक्त
होता है, उसका कैसा? राज्य हो या न हो, उसकी तो हर दशा में मुक्ति
तय होती है। इस प्रकार से वह ज्ञानवान्, राजाओं का ही उद्धार
करने में समर्थ है। अतः, ज्ञान ही सब कुछ है। इस प्रकार राजा परीक्षित
को ज्ञान, उपदेश ज्ञानियों द्वारा दिया गया, जो कि परम आवश्यक था।
जब तक ज्ञान न हो जाए, तब तक वह कुछ भी जान न सके। जो
इस ज्ञानोपदेश को सुनकर के उस ज्ञान स्वरूप को समझता हुआ मुक्ति को
प्राप्त करने लगता है, उसको संसार के सभी सुखों से मुक्ति मिल जाती
है, फिर वह सब कुछ छोड़ कर के, परम पद को प्राप्त कर लेता है।
इस सब ज्ञान को सुनकर राजा परीक्षित बोले, हे मुने! आपका कथन सत्य है,
ज्ञान द्वारा ही भव सागर से पार उतरा जा सकता है।
कहा गया, धीरे-धीरे ज्ञान, विवेक जाग उठता है और ज्ञान से, अपने
रूप का भान हो जाता है। जो कि भगवान् के ज्ञान का ही एक रूप है।
इस प्रकार से इस ज्ञान को पाकर के मनुष्य अपने को जान पाता है। जो
अज्ञानी मनुष्य अपने को नहीं पहचान सकता, ज्ञान के अभाव के कारण ही
तो, वह संसार में भटकता रहता है। ज्ञान के द्वारा, ही मुक्ति का मार्ग खुल
सकता है। अतः, ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा सब प्रकार के संशयों का नाश कर
ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए।
ज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्य मार्ग पर चलना ही परम धर्म है।
ज्ञान स्वरूप परमात्मा को जो जान लेता है, उसका उद्धार हो जाता है।
परमात्मा सर्वव्यापी हैं। वह तो सब जगह विद्यमान हैं। मनुष्य अज्ञानवश
उन्हें पहचान नहीं पाता। अज्ञान का पर्दा हटते ही परमात्मा के दर्शन हो
जाते हैं। इसलिए हे परीक्षित! अब तुम ज्ञान रूपी नेत्रों से परमात्मा को देखो।
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विषयाशक्त होकर जो आत्मज्ञान को ना जानकर केवल आ--काश की तरफ देखता,
केवल सो जाता रहता, केवल सो कर उठकर शौच मुख प्रक्षालनादिक क्रियाओं
निमित्त इधर उधर जाता आता हुआ रहता तथापि उस आत्मा को एक क्षण भी
विचारता ना, सो किसका भला करता? अपना भला? कैसा भला कि जब कि वह
वृथा खोवेगा? तब किस प्रकार इस नर देह के अवसर को पाकर अपना कल्याण
कर ही सकेगा।
विषयभोग तो यह केवल अविद्या, कर्म या पुद्गल कर्म जनित सुख जान कर
जो इन विषयभोग रूप, महामोहरूपी तम निवारक इस ज्ञान नेत्र को केवल विषय
वासना रूप अंध कर खो बैठा सो कैसे भला, क्योंकि जो इस प्रकार खोवे उसको तो
सब कोई अंधा ही, पर जो यह नर देह जीवात्मा पुण्यात्मा पाकर उस भव-जल पार
कर लेता वह सब इस अवसर को पाकर न केवल अपने को ही तारेगा वरन अन्य
जन्म-जन्मांतरों के पापकर्मों को भी भस्म करने समर्थ होगा।
सो जीवात्मा केवल इस प्रकार संसार के मिथ्या बंधनों को यदि बांध लेता,
पश्चात्ताप की अग्नि हृदय मध्य प्रज्वलित न होने देता, और आत्मा में न रमता, उस
पुरुष के इस संसार रूप अंध कूप में गिरे, बिना पश्चात्ताप के कौन निकाले? वह ज्ञान
नेत्रहीन, इस संसार महाभयानक कूप में गिरता-पड़ता हुआ सब ही समय इस
प्रकार अपने समय को वृथा ही ना खोता वरन सब ही नर देह के अवसर पाकर उस
परम पद को प्राप्त करने वाले उत्तम पुरुषार्थ को करता।
इस प्रकार ज्ञानीजन विचार कर के अज्ञानांध होकर इस विषय रूप कूप मध्य
पड़े हुए जन को जो कि काम-क्रोध, अहंकार-ममकार, राग-द्वेषादिक
इस प्रकार इन अज्ञानियों के अज्ञान भावों को देख कर परम ज्ञानी पुरुष भी
महादोषी जन जानकर इन मिथ्या ज्ञान को धारण कर स्वयं तो न बंधे पर इस प्रकार
सर्व समय ही, जब तक आत्मा अविनाशी परमात्मा को प्राप्त ना होवे तब तक ही,
उस पद हेतु निरंतर ध्यान रूप साधन में रत व केवल आत्म-साधना ही कर निज
स्वरूप साक्षात जानेगा।
इस प्रकार जो ज्ञान ही, परमात्म, परमतत्त्वानुशीलन हेतु साधन रूप
जानकर, ज्ञान-चक्षु द्वारा निज स्वरूप को देखते हैं, उन भव्य
जन का संसार ही निष्प्रयोजन हो गया, फिर उनको तो ना ही कर्म जनित सुख की
ही चाह, ना ही राग, ना द्वेष उन को केवल व केवल परम पद से, सब ओर से
उदासीनादि भावों सहित रहते हुए, उस पद को प्राप्त हो जाता।
ज्ञान के इस रूप को जानकर परम तत्व का ध्यान करने वाले जन
को केवल सब प्रकार राग द्वेष आदि से विरक्त होकर केवल उस परमात्म
स्वरूप का ज्ञान करना ही निज आत्मा का मुख्य कर्तव्य जानकर, उस ज्ञान
स्वरूप नित्य आत्म पद को प्राप्त करना, काम, क्रोध, लोभ, मोह,
अहंकार, दंभ, मद आदि षड् रिपु रूपी काम कौन करता? इन ही रिपु
रूपी महा दुर्धर बंधनों को जो जन ज्ञान रूपी तलवार द्वारा काट देता है सो
ही उस परमात्मा के यथार्थ रूप को! ना कि सब प्रकार अज्ञान जन समान
अन्य, जो ज्ञान के परम रहस्य को न जानते हुए भी अज्ञानी ही रहते हैं?
सो जीवात्मा को सब ओर चित्त को स्थिर कर, महाशून्य या
परम पद परमात्मा नित्य रूप ध्यान करना चाहिए जो कि इस भव-जल
रूप संसार के सर्व पाप कर्मों को नष्ट कर देने वाला व केवल
आत्मा को निज ज्ञान रूप में स्थिर कर सब ओर से मुक्ति, सब ओर
से परम सुख को दे, सो सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त कर भव-जल से
पार निकल कर सर्व प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर निज परमानंद
के प्रकाश रूप में ही अवस्थित होना चाहिए व वही, सो अपने को उस रूप
में लीन होना अति आवश्यक जानकर केवल निज आत्मा का ही
ध्यान करना चाहिए।
इस प्रकार जो अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अपने आप में लीन, उस
स्वरूप व अखंड परम ज्योति स्वरूप परमात्म को प्राप्त कर, सब से अलग होकर निज
स्वरूप पद को प्राप्त कर ही लिया जाता है।
अतः जीवात्मा को परमात्मा का ध्यान सब ओर एकाग्र होकर ही करना
व योग्य, सो जीवात्मा ऐसा रूप होगा? फिर तो वह परमात्मा रूप ही बनकर सब
रूपी माया को निवारक होगा? उस परम शांत स्वरूप होगा? तब ही यह जीव अपने स्वरूप
को पावे।
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गायकवृन्द गाते व बजातेथे कि, महाप्रभुजी परिकरों सहित लीला में पधारे। इसके
बाद सब लोग रोने लगे। समस्त ब्रजवासी एकत्र हो दर्शन करने पधारे। नन्दजी रोते
हुए कहने लगे कि बेटा कृष्ण तूने कहाँ गमन किया? क्या किसी नेतुझे डाँटा, या
कोई कष्ट दिया, या भैया, यह जानकर कि नंदबाबा तो बूढे हैं इसलिये अब मथुरा
चलना चाहिये तथा तूने तो विचार किया होगा कि नंद बाबा बूढे हैं, इनसे तो कुछ बनेगा
नहीं तथा इसीलिये तूने यह निश्चय किया।
नंद रोने लगे, यशोदाजी रोने लगीं तथा रोते रोते रो पड़ीं, उस समय सबलोग भी रोने
लगे। इसके अनन्तर श्री महाप्रभुजी ने, अपने निज स्वरूप द्वारा, ब्रजमंडल लीला का रस दान
दिया... ॥
जब श्रीकृष्ण बलरामजी को लेकर अक्रूरजी रथ पर बैठाकर चले तो गोपियों ने आकर
अक्रूरजी का रथ रोक लिया कि आप कौन हो? यह हमारा लाल तो नंद यशोदा का बालक होकर
आया है। तुम कौन होते हो ले जानेवाले। हम तो जाने नहीं देंगी। तब श्री बलरामजी ने गोपियों को
समझाया कि तुम जाने दो। हमारे जानेके बाद नन्द यशोदा भी पीछे-पीछे आ ही रहे हैं। तुम
सबको हम साथ ले चलेंगे। जब ब्रज मंडल से मथुरा तक का पक्की सड़क मार्ग ही बन गया
तब श्रीकृष्ण की ओर देखकर गोपी कहने लगी कि आप अपने पिता नन्दजी से भी बड़े हो गये
क्या जो हम सब छोड़कर तुम्हारे साथ चलेंगी? हम तो नन्द बाबा के साथ जायेंगी? तब
श्रीकृष्ण ने कहा, ठीक है। तब गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा, हम सब लोग जब तक नन्द
यशोदा नहीं आयेंगे तब तक यहाँ पर ही रहेंगी। हम सब लोग आपके साथ मथुरा में कभी
न जायेंगी। हमलोग तो नन्द यशोदा के साथ ही रहेंगी।
इस प्रकार मथुरा की ओर रथ लेकर अक्रूरजी चले। अक्रूरजी ने जब कृष्ण बलरामजी
की ओर देखा तथा इस बात का विचार करने लगे कि मथुरा में कंस तो बहुत बलवान् है। यह
बालक क्या लड़ेंगे? इन बालकों का कोमल शरीर देखकर कंस कैसे दया करेगा या मारेगा
अथवा जीतेगा? अक्रूरजी को सन्देह हुआ।
जब रथ यमुना तट पर पहुँचा, तब अक्रूरजी ने मन में विचार किया कि संध्या वन्दन
का समय हुआ है। अतएव यमुना जल में स्नान करके संध्या वन्दन करू तो क्या होगा?
इस प्रकार विचार कर अक्रूर जी रथ से उतरकर यमुना जल में गये। स्नान करके जैसे ही
ही जल में डुबकी लगाई, वैसेही जल में कृष्ण और बलराम को देखा। अक्रूरजी
घबराकर जल से बाहर निकल आये, देखा कि दोनों भाई तो रथपर बैठे हैं। अक्रूरजी
को आश्चर्य हुआ कि दोनों जल में हैं या रथ में हैं। जब अक्रूर जी ने मन में सन्देह
किया तो तुरन्त अक्रूरजी को जल में भी चतुर्भुज रूप में एवं रथ में भी चतुर्भुज रूप में
दर्शन दिया। फिर अक्रूर जी ने जल में शेषशायी रूप का दर्शन किया।
दर्शन करके जब अक्रूरजी जल से बाहर निकले, देखा कि दोनों रथ पर सामान्य
रूप से बैठे हैं। अक्रूरजी ने मनमें विचार किया कि अवश्य ही यह कोई भगवान् का अवतार
है। कोई साधारण मनुष्य नहीं है। अक्रूरजी हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। तब श्रीकृष्ण
ने अक्रूरजी से पूछा कि चाचाजी आपने जल में कोई अचरज देखा है क्या?
इस पर अक्रूरजी ने कहा कि प्रभु जो कुछ आश्चर्य है वह सब आपमें ही है। आश्चर्य
भरा संसार आप में ही है। तब अक्रूरजी ने अक्रूर घाट पर श्रीकृष्ण एवं बलराम की अनेक
स्तुति की। अक्रूरजी को मुक्ति हुई। इसके अनन्तर श्रीकृष्ण बलराम मथुरा में पहुँचे। मथुरा
पहुँचकर रजक, दर्जी, कुब्जा आदि का उद्धार किया। कंस के कुवलयापीड, चाणूर, मुष्टिक,
कंसआदि का वध करके अपने माता-पिता को मुक्त कराया?
जब कंस का वध, तब कंस की दो पत्नियां थीं? एक अस्ति और एक प्राप्ति
उनका नाम क्या? एक अस्ति का नाम, एक का, प्राप्ति नाम था? इन दोनों का पति मरा
कहा कि? हम दोनों विधवा हो गईं!
वह अपने पिता के पास, मगध में अपने पिता के पास जाकर कहने लगीं कि हमारे
पिता के जीवित रहते हुए हमारा पति मर गया तो क्या फायदा हुआ? जरासन्ध कहने लगा कि कंस
मारा गया कंस पक्षी जितने थे सब
मारे गये तब हम क्या करेंगे, तब उसने कहा कि हम जरासंध... ने सेना
सब को लेकर चढ़ाई किया तो कृष्ण सब सेना मार भगाया
फिर वह लौट कर गया, फिर सेना एकत्र कर के ले आया। वह, इस प्रकार सत्रह
सेनापति को लेकर आया, वह सत्रह सौ अक्षौहिणी की सेना लेकर गया था सेना मरा, तब
सत्रह अक्षौहिणी की सेना को न केवल एकबार समाप्त किया, इस बार सत्रह सौ अक्षौहिणी
सेना को सेना सहित जरासंध मरा तब भगवान् द्वारिका चले गये और जरासंध
द्वारिका गया सब कुछ द्वारिका में जला कर भस्म कर दिया तब रुक्मणी के साथ विवाह
कर के सेना सहित मथुरा वापस आ गये इस प्रकार से जरासंध का नाश करके भगवान् द्वारिकाधीश कहलाये।
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जिसे हम सब सम्भालें, वह सब सम्भालेगा और न केवल इस लोक योग्य वरन् अगले लोक
योग्य सम्भालने योग्य न रहेगा।
सम्भालने योग्य शरीर रहा, सम्भालने का समय-अंग रहा, समय-अंग
सम्भाला विचार-विचार सम्झा तो विचार रूपी आधार मिला।
तन-का सम्भाल करना रहा सो तन-का सम्भाल सम्झा हो, पर जो ज्ञान रूप
रहा, सो सम्भालने रूप न सम्झा गया सो सम्भालने रूप न सम्झा हो, ज्ञान
विषय सम्झा गया सो ज्ञान विषय सम्झा सो विचार का साधन न रहा, केवल
मन का विषय सम्झा सो साधन सम्भालने सम्झा सो सम्भालने योग्य सम्झा
सो जो विषय सम्झा सो साधन सम्झा सम्भालने सो साधन के सम्भालने योग्य
विचार-विचार रूप रहा सो साधन न, सो विचार-विचार रहा सो यह, सो विचार-
विचार रूप रहा सम्झा, केवल सम्भालने सम्झा सो केवल रूप रहा सोई
सम्भालने के सम्भालने सम्झा सो केवल ही सम्भालने योग्य साधन सम्झा हो,
सो सम्भालने योग्य सो साधन केवल सम्झा गया, ज्ञान रूप रहा नहीं!
और सम्भालने-सम्भालने का विचार रहा सोई सम्झा गया सोई रूप ज्ञान
विषय का ज्ञान रहा सो न सो रूप सम्भालने-सम्भालने का साधन रहा, सो
साधन न सम्झा सो केवल साधन सम्झा हो, विचार हो, साधन का साधन
रूप ज्ञान सम्झा सो केवल रूप ज्ञान का ज्ञान न ज्ञान का ज्ञान रहा, ज्ञान के
ज्ञान रूप केवल सम्झा सो साधन का ज्ञान सम्झा सो केवल साधन रूप ज्ञान
ज्ञान का सो रहा, सो ज्ञान का सम्झा रूप सो सम्भाल के ज्ञान का ज्ञान रहा
ज्ञान सम्झा सो ज्ञान न रहा, ज्ञान सो तन-का सम्भाला, सो सम्भालने योग्य रहा
सो साधन सम्भाल सम्झा केवल ज्ञान सम्झा सो ज्ञान रहा सो ज्ञान के
ज्ञान सम्भाल रूप सम्झा सो सम्भालने सम्भाल का ज्ञान के ज्ञान सम्झा
रूप सम्भालने रूप सम्भाला सम्झा सो ज्ञान के सम्भालने योग्य सम्झा
सो सम्भाल का हो, केवल सो रूप हो, ज्ञान सो रूप का हो सम्झा, ज्ञान रूप
केवल तन के ही सम्भालने के सम्भालने रूप ज्ञान रूप रहा।
सो जो ज्ञान हो, उस रूप का रूप रहा न रहा, सो उस का ज्ञान केवल रहा
सम्झा सो रूप केवल ज्ञान का रहा सो केवल रूप का ज्ञान सो रूप ज्ञान
का ज्ञान रहा, सो यह ज्ञान के ज्ञान रूप सो सो तन-सम्भाल सम्झा गया रूप सो
सम्झा सो ज्ञान का केवल रूप ज्ञान रूप सम्झा गया सो ज्ञान रूप रहा न?
सम्झा गया सो सो ज्ञान रूप केवल ज्ञान सम्झा केवल ज्ञान रूप सम्झा।
ज्ञान रूप सो तन--मन रूप का रूप हो सम्झा सो ज्ञान रूप तन--मन
ज्ञान रूप सो ज्ञान का ज्ञान सम्भाल सम्झा रूप रहा सो ज्ञान केवल हो
केवल सम्भाल रूप तन-का रूप हो ज्ञान रूप सो ज्ञान रूप रूप
सम्भाल रूप सो ज्ञान रूप ज्ञान सम्भाल सो ज्ञान केवल रूप का ज्ञान रूप
सम्झा रूप सो रहा, सो जो ज्ञान केवल सम्झा न रहा केवल रूप ज्ञान
सम्भालने सो न रूप सम्झा गया सो सम्भाल सम्भाल रूप रूप सम्झा
सो ज्ञान सो रूप ज्ञान सम्भाल सम्झा सो ज्ञान रूप सम्झा रूप ज्ञान
केवल सम्झा हो, सो सो सम्झा न रहा।
सम्झा सो रूप केवल रूप का रूप सो सो ज्ञान रूप रूप ज्ञान रूप
ज्ञान केवल सम्झा, केवल सो ज्ञान सम्झा रूप सो ज्ञान रूप ज्ञान रूप सो
ज्ञान केवल रूप ज्ञान सो सो ज्ञान सो ज्ञान केवल ज्ञान केवल सो ज्ञान
केवल केवल रूप रूप रूप केवल रूप सो सो ज्ञान रूप सो केवल सो
केवल रूप सो रूप रूप सो केवल केवल केवल केवल केवल केवल सम्भाल
सो केवल रूप तन--सम्भाल तन--का सम्झा सो ज्ञान सो रूप तन--का सम्झा रूप
सो तन--का ज्ञान रूप सो सो ज्ञान सम्भालने का हो न? सम्भाल केवल
सम्भाल केवल रूप रूप सम्झा सो रूप सो ज्ञान के ज्ञान सो हो, सम्झा
सम्झा केवल रूप रूप सो ज्ञान सो सम्झा रूप! सम्झा सम्भालने सो सो ज्ञान
ज्ञान रूप सो सो सम्भाल के सम्झा सम्झा रूप ज्ञान सो रूप सो ज्ञान ज्ञान
रूप सम्भालने हो, सम्झा सो रहा, सो ज्ञान रूप सो ज्ञान केवल रूप सो सम्झा
रूप हो, सम्झा केवल रूप रूप ज्ञान रूप रूप सम्भाल के सम्भालने रूप
रूप केवल ज्ञान रूप सम्झा ज्ञान रूप केवल ज्ञान रूप केवल ज्ञान सो रूप
तन--ज्ञान के सम्भाल तन--सम्झा केवल ज्ञान ज्ञान सम्झा केवल ज्ञान रूप सो
केवल सो ज्ञान, सम्झा सो सम्भाल रूप ज्ञान रहा न? सो सम्झा सो ज्ञान,

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भगवान्‌को याद करो अथवा कोई पर द्रव्य अवलम्बन आधार बने, सम्हाल, सम्हाल! यह सब
मोह भाव उत्पन्न होने का निमित्त कहलायेगा!
निमित्त रूप, रागप्रशस्त, सर्वोत्कृष्ट, पर द्रव्यरूप पाँच परमेष्ठी मात्र निमित्त रूप,
यह सम्यक्त्व का निमित्त नहीं अथवा मात्र राग उत्पन्न होगा, जिससे पुण्य
बन्धक कर्मका उदय आत्मा विकार भावको उत्पन्न करे निमित्तता से, विकार का कारण पर
निमित्तता से, विकार का उत्पत्तिके दो प्रकार एक व्यवहारिक जो कर्म उदय होने पर
विकार उत्पन्न हुआ
यह जो राग उत्पन्न हुआ यह पर द्रव्य निमित्त से, यह राग दूसरा निमित्त से, राग कर्म
निमित्त से राग से, सर्वोत्कृष्ट निमित्त से, पर द्रव्य मात्र निमित्त कर्मोदय से उत्पन्न
सर्वोत्कृष्ट सर्वोपरि का यह जीव विकार भावसे जो कर्म उदय से उत्पन्न हुआ यह कर्म बन्ध
का निमित्त है। इसका उपादान कौन? यह विकार उपादान राग द्रव्य कर्म बंधने के बाद राग
का उपादान रागद्रव्य स्वयं राग रूप
यह निमित्त की दृष्टि उपादान का जो यह ज्ञान होगा, जो यह राग होगा सो कु-ज्ञान राग का
निमित्त पर से यह जानना उपादान पर राग राग का यह ज्ञान, सो राग रूप आत्मा राग मात्र
मिथ्या अज्ञान स्वरूप ही यह ज्ञान होगा! पर द्रव्य रूप ज्ञान
दृष्टांत क्या होगा? पर द्रव्य अथवा पर वस्तु रागका निमित्त कहलायेगा तो, पर द्रव्य
रागका उपादान रूप तो आत्मा मिथ्या ज्ञान उपादान रूप राग मिथ्यात्व उपादान कहलायेगा
आत्मा राग उपादान रूप राग रूप उपादान कहलाया रागका उपादान स्वयं आत्मा, उपादान
उपादेय रूपी-ज्ञानको निमित्त ज्ञानके उपादान रागके पर द्रव्यको रागके उपादान रूप माना, तो पर
द्रव्य ज्ञान रूप राग उपादान माना मिथ्यात्व का कारण कहलाया या उपादान रूप राग मात्र रागका
उपादान रूप, उपादानका जो उपादान का रूप था, विकार उत्पन्न ज्ञान उपादानका
रागका राग ही विकार राग रूप जो ज्ञान उस उपादान का ज्ञान था, राग का राग रूप
रूप
दृष्टांत द्वारा कहो, दृष्टांत ज्ञान-स्वरूप की स्थिति को उपादान माना, दृष्टांत रूप उपादान
दृष्टि का ज्ञान होगा
इस पद उपादानका यह विस्तार है, पर निमित्त का, सर्वोत्कृष्टता का, राग मात्र राग
रागका कु-- उपादानका यह विस्तार उपादानका कहलाया सो, व्यवहारिक यह जो विचार चला
सो--उपादान रूप राग मात्र निमित्त-उपादान का विस्तार है, पर निमित्त रागका यह ज्ञान हो
राग का ज्ञान उपादान ज्ञान था! सो राग उपादानका जो विस्तार ज्ञान द्वारा जाना गया,
उपादान माना, इससे विकार ज्ञानका जो ज्ञान था, राग मात्र ज्ञान उपादान माना कहलाया,
विकार उपादानका दृष्टांत द्वारा कु-ज्ञान का उपादान उपादानका विस्तार ज्ञान उपादान कहलाया
राग ज्ञान-उपादान का उपादान विकार ज्ञान उपादान माना गया जो उपादानका ज्ञान राग रूप
कहलाया सो, विकार विकार का उपादानका विकार द्वारा रूप जो उपादानका उपादानका ज्ञान था
राग उपादानका राग ज्ञान राग उपादानका राग... ।
विकार रूप जो उपादानका यह उपादानका जो विस्तार कहलाया राग मात्र रागका
रूप उपादान का ज्ञान राग उपादान कहलाया, जिससे यह उपादान उपादानका यह राग उपादान
रूप निमित्त कहलाता उपादानका उपादानका विकार रूप उपादान का विकार यह उपादान कहलाया
विकार उपादानका जो विकार रागका यह विकार रूप विकार उपादान कहलाया जो विकार रागका
ज्ञान था उपादान उपादानका यह विकार रूप उपादान ज्ञान उपादानका उपादान कहलाया
जो यह विकार उत्पन्न हुआ उपादान का जो राग उपादान कहलाया सो, यह ज्ञान विकार का यह
उपादान का ज्ञान था।
दृष्टांत द्वारा कहो, राग का उपादान क्या, राग का निमित्त क्या, राग का उपादान हुआ,
राग का उपादान हुआ, कर्म, पर, निमित्त का राग उपादान रूप से जो पर का राग हुआ
ज्ञान उपादान कहलाया, तो उस पर ज्ञान का उपादान रूप उपादान का ज्ञान
विकार का उपादान उपादान राग उपादान का पर राग राग उपादान ज्ञान विकार-उपादान
रूप राग का कु-ज्ञान का ज्ञान जो राग राग का उपादान ज्ञान उपादान रूप रागका ज्ञान
उपादानका ज्ञान राग का ज्ञान राग का ज्ञान राग उपादानका राग का राग ज्ञान रागका
विकार का उपादान राग का ज्ञान ज्ञान राग उपादानका राग उपादानका राग विकार का
ज्ञान विकार ज्ञान राग राग उपादान था, विकार का, ज्ञान का जो विकार रूप विकार
यह विकार का जो ज्ञान राग रागका ज्ञान जो उपादानका राग ज्ञान रागका राग ज्ञान था?
राग का राग राग उपादान ज्ञान उपादानका राग राग उपादान राग राग राग राग
राग का राग राग उपादान राग विकार का विकार राग विकार-ज्ञान कहलाता
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उनका जीवन-मरण परमात्मा का ध्यान और ईश्वर भजनपर ही तो था जिससे उनका
आत्मा तो सदा पवित्र ही रहा और शरीर भी पवित्र पावन हो गया! इन पवित्र तथा
महात्मा के चरण जिस स्थानपर पड़े उस पवित्र स्थानपर उन तीन पवित्र महात्माओं का एक पवित्र
स्थान बन गया है, जो कालान्तरमें परमेश्वरके एक मन्दिरके रूपमें बदल गया तथा आज
भी यह तीर्थस्थानके रूपमें आबालवृद्ध सब लोगों का श्रद्धा व भक्ति
का केन्द्र बना हुआ है? पाठक इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है? संसार का एक मात्र सत्य
ईश्वर भजन और सत्य के मार्ग पर चलना तथा पवित्र आचरण ही तो है! धन हो, दौलत
सब यहीं रहकर धूल में मिल जाता है, पर जो भी एक क्षण प्रभु का नाम स्मरण कर लिया जाता
है, वही जीवन को सार्थक करता है; अन्तमें प्रभु का स्मरणही सदा काम आता है,
अन्य सब बातें व्यर्थ सिद्ध
सांसारिक व्यवहारबुद्धिसे यह भी यह स्पष्टतः सिद्ध हो जाता हैकि सांसारिक ऐश्वर्य और वैभवकी
तुलनामें आन्तरिक शान्ति और ईश्वरभक्ति बहुत बढ़कर है। एक राजा या बादशाह चाहे अपनी
धन सम्पदा तथा अपनी विषयवासना तृप्त करनेके लिये सांसारिक सुखोंको जुटा सकता है पर मनकी
शान्ति ईश्वरके चरणोंमें ही प्राप्त होती है। जबतक मनुष्यके हृदयमें परमात्माकी भक्ति जाग्रत्
नहीं होती तब तक मनुष्य संसारमें चाहे कितने भी ऊँचे पदपर आरूढ़ हो जाय उसे
कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती? इसलिए मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करनी
व प्रार्थना से, वह ईश्वर की कृपा
प्राप्त करसकता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से ईश्वर की आराधना करता हुआ सब काम
निष्कामभावसे प्रभु को अर्पण कर देता हैउसका कल्याण निश्चित है; वह मनुष्यसंसारमें परम सुखी हो
जाता है। जो मनुष्य परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करता है और कहता है कि, हे प्रभु!
मैं तो सर्वथा ही अकिञ्चन हूँ। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूं, हे
नाथ! मुझपर दया का हाथ रखिए। तो परमात्मा उस पर प्रसन्न होकर, उसके सब दुःखों को दूर कर देते
हैं। यह परम सत्य बात है, कि परमात्माकी कृपा सबपर समान भाव से बरसती है। कोई अपनी अज्ञानताके
कारण उस अमृत-वर्षाका लाभ नहीं उठा पाता तो इसमें मेघका क्या दोष, अमृत वर्षा तो सबके लिये
एक-सी ही होती है।
क्या किसीका कोई ऐसा उपकारी हो सकता है? संसारमें सब काम स्वार्थ के वशीभूत होकर
ही किये जाते हैं। कोई किसीका निःस्वार्थ उपकारी नहीं हो सकता, एक ईश्वर ही ऐसा उपकारी
है जो सदा सबका भला चाहता, सबका भला करता है, चाहे कोई उसपर विश्वास करे, या न करे।
सबपर उसकी असीम दया बरसती रहती है। मनुष्यको चाहिये कि वह उस सर्वशक्तिमान् दयामय
परमेश्वरकी आराधना करे और अपने जीवनको पवित्र और सफल बनावे। ईश्वरकी आराधनाके लिये
आन्तरिक पवित्रता और ईश्वरके प्रति अनन्य अनुराग ही अपेक्षित है। न तो जप-तप, न ही
तीर्थयात्रा और न ही केवल पूजा-पाठसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं।
जो मनुष्य सांसारिक माया-मोहमें पड़कर उस सर्वशक्तिमान् ईश्वर को भूल कर बैठता है
और केवल भौतिक सुख-साधनोंमें ही अपने जीवनको व्यतीत कर देता है, वह अन्तमें पछताता है।
सांसारिक सम्पत्ति कभी किसीके साथ नहीं जाती, केवल मनुष्यके शुभ-कर्म ही उसके साथ जाते हैं।
अतः मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगाना चाहिये, जिससे उसका उद्धार हो सके।
जो मनुष्य सब कुछ प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर देता है और केवल ईश्वरका होकर
रहता है, वह सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अतः हमें चाहिये कि हम परमात्माकी
शरण ग्रहण करें और अपने जीवनको सार्थक बनावें।
इस प्रकार हमें अपने जीवनमें ईश्वर-भक्ति, सत्य और सदाचारको अपनाना चाहिये।
जो मनुष्य इस मार्गपर चलता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।
प्रस्तुत कथासे हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें ईश्वरकी भक्तिमें लीन रहना चाहिये।

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यद्यपि इसका उपाय, इस विकत्थनशील युग सब ओर ढूँढ करके भी नहीं पा रहा शक्तिशाली
भी, पर आत्मज्ञानके विस्मृतिजन्य अज्ञानकी स्थिति सबको ही प्राप्त हो परमात्माके इस महान्
साम्राज्य को ऐन्द्रजालिकता का रूपक बना रही, सो आश्चर्यजनक बात केवल यही नहीं,
आश्चर्य यहाँ यह, किस तरह यहाँ परमात्मा स्थित है? उसका स्वभाव केवल ज्ञान रूपी
रहकर सब सांसारिकोंको देख कर केवल सब का साक्षी ही, पर हो रहा अपने उस स्वरूप को विस्मृत,
जड़-चेतनमय सब जग अपनी सत्ता समझ करके।
अज्ञानकी निद्रावस्थाको तो देखा जाता ही सदा ही जगत् रूपी सब ही इन जीवों
द्वारा ही तो जग यह परमात्मा का स्वरूप समझा जाता ही सब ओर। केवल साक्षी? केवल निर्लिप्त
केवल सब दृष्टा? केवल सब ही को सब ओर से सब को आत्मज्ञानका असीमित प्रकाश देकर
सब को ही आत्मभाव से सब को प्रेरित कर सब के हृदय में जग ही रहा! सो केवल जड़-
चेतनमय ही, केवल यह अपने ज्ञान को केवल प्रगट करके ही ही! यह सब बात ही तो सब ही
द्वारा विस्मृत, सो केवल ज्ञान रूप साक्षी, सब ओर आत्मिक प्रकाश केवल सब ही ओर
देकर इस चेतन स्वरूप जग को सदा ही चेतन, सब ओर प्रकाश रूप करता जग ही रहा।
सब ओर परमात्मा को तो केवल जगत् ही जाना सब ओर। सब ओर आत्मा ही तो परमात्मा
सो केवल केवल ही, केवल आत्मा केवल ही! सब का चेतन, जगत् का रूप सब ही चेतन
ही अज्ञानवश ही सब ही जगत् में, केवल साक्षी ही सब ओर जगत् को केवल एक
परमात्मा ही, केवल ही तो प्रकाश ही केवल रूप जगत् में ही, सब ओर फैला रूप
व्यापक स्वरूप? केवल केवल ही? आत्मा ही केवल रूप जगत् स्वरूप ही? आत्मा परमात्मा
ही, केवल केवल परमात्ममय ही सब ओर रूप ही, सो केवल जगत् रूप ही, सब
ओरका परमात्मा सब ओर जगत् स्वरूप ही तो है।
सो केवल यह केवल आत्मा ही अज्ञानमय रूप जगत्, केवल सब ओर समझा गया,
अविद्यावशात् जड़--रूप ही! केवल ज्ञान सब ओर आत्मिक रूप ही, केवल सब
प्रकाश ही, केवल चेतन ही? केवल सब दृष्टा ही, सब ओर सब ओर प्रकाश ही सब
ओर तो यह ज्ञान ही प्रगट है? परमात्मा सब ओर जगत् के रूप में ज्ञान रूपी
सब को सब ओर ज्ञान प्रकाश देकर ही केवल सदा साक्षी रूप से केवल अज्ञानवश
को केवल सब ओर प्रगट ज्ञान परमात्मा सब ओर ज्ञान रूप सब सांसारिकों को ज्ञान
रूप ही प्रगट है।
सो केवल परमात्माका यह केवल रूप ही सब जगत् में तो केवल ज्ञान रूप,
केवल चेतन रूप सब ही जगत्को परमात्मा सब अपने स्वरूप प्रकाश ही से सब ओर
ही सदा ही ज्ञान रूप सब ओर से, सो केवल सब ओर चेतन स्वरूप जगत् ही, केवल
सब ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही, केवल सब ही केवल सब ओर से परमात्मा
रूप ही तो, केवल सब ही परमात्मा रूप ही केवल सब ओर जगत् में केवल ही ज्ञान
ही? केवल ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही? केवल केवल ज्ञान, केवल केवल
सब ओर ही तो सांसारिकों द्वारा ही ज्ञान रूप ही तो ज्ञान रूप विस्मृत समझा
जा रहा ही तो केवल सब ओर ज्ञान ही सब ओर रूप ही तो केवल ज्ञान रूप सब ओर
सब जग ही ज्ञान रूप केवल सब ओर ज्ञान रूप सब ओर परमात्मा स्वरूप ही केवल ही
परमात्मा सब ओर प्रकाश परमात्मा स्वरूप ही सब ओर परमात्मा रूप सब ओर केवल
केवल ज्ञान ही? परमात्मा सब ओर प्रकाश ही तो है, केवल ही ज्ञान ही केवल
परमात्मा का तो केवल जगत् ही तो ज्ञान-स्वरूप जगत् ही तो सब ओर केवल
सब ओर व केवल ज्ञान ही, व सब ओर सब चेतन ज्ञान-स्वरूप जड़-चेत जगत्
सब ओर सब ही भगवान् ही सब ओर तो केवल ही तो केवल ही ज्ञान रूप स्वरूप
सब ओर है।
केवल ज्ञान रूप जगत् ही तो सब का स्वरूप ही सब ओर चेतन रूप सब
ओर ही? सब ओर जगत् स्वरूप ही सब ओरका परमात्मा ही स्वरूप? ज्ञान रूपी,
सब ओर ज्ञान रूपी चेतन सब ही स्वरूप ही, केवल सब केवल सब केवल
केवल जगत् ही! सब ही केवल केवल सब ओर ही केवल है।
सब ओर केवल ज्ञान रूप परमात्मा सब ही जगत् सब ओर केवल ही चेतन
व सब ही तो केवल स्वरूप सब ही ज्ञान ही सब संसारमय सब संसार स्वरूप
ही सब ओर केवल व सब ही ज्ञान व सब ओर ज्ञान केवल ही सब ओर ही, केवल
ही सब ज्ञान ही, केवल ज्ञान ही, सो तो यह केवल ही तो ज्ञान रूप केवल ही
जगत् सब स्वरूप जगत् ई-श ही सब ओर ही तो सदा ही केवल ही ज्ञान ही सदा
सब ओर ही केवल चेतन सब ओर परमात्मा ईश-रूप सब ओर सब ओर ही
जड़-चेत जगत्, परमात्मा केवल जगत् ही सब ओर रूप सब ओर केवल चेतन,
परमात्मा स्वरूप ज्ञान केवल सदा परमात्मा सब परमात्मा ही है,
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कुण्डलीयाँ बनाओगे तो इस जगत का काम ही खतम हो जायगा अर्थात् तुम! जो कुछ
सब कुछ करने वाले समस्त ही अपने को ही सर्वो-परि मान लोगे तो जगत उत्पत्तिकर्ता का
तो काम बन्द ही हो जाना पड़ा।
विचार के देखो, सृष्टि को पैदा करने वाले सब की ही कद्र को जानतेहुये
काम करते चले गये वा हैं, सो सब को ही संसार में अपने मन से ही सब को
सुख देने वाले साधन देकर नियत किया वा जन्म-मरण के फेरे सब पदार्थों
अपने बनाये स्वरूप नियत किये वा सब शक्तियां दी शक्ति रूप साधन बना संसार
की पालना की व्यवस्था।
भला जिस ने कुण्डलीयाँ बना संसार को पैदा न किया होता, किसी ने
परमात्मा किसी को संसार में भेजा, किसी ने संसारी जीवन ही न तो सब को
दिया संसार बन न सका बिना परमात्मा शक्ति के सब ही को सब को ही अपनी
ही शक्ति बना, सो तो बना परमात्मा का बनाया ही सब कुछ बना तो कुण्डली
के द्वारा भला कब कुण्डली बनाने वाले का सम्बन्ध सब से बना सकता है।
जरा सोच समझ कर तो ही देखो तो, भला कुण्डली बनाने वाले ने क्या
सब को बनाया वा बना सकता है संसार को, जो सब का सम्बन्ध सब से इस
रूप बना सकता है जिस का सब से सब सम्बन्ध बने, न कुण्डली ही के द्वारा कोई
बन सका संसार न ही बन सकता कभी संसार, न कुण्डली के साधन द्वारा कोई
संसार में सब काम चला सका, न बना सकता ही है सब काम सब का बना
कुण्डली द्वारा संस्कार का काम तो, सो तो सब काम सर्वशक्तिमान के बनाये ही
से चला संसार व्यवस्था का संसार स्वरूप व्यवस्था के साथ चलता ही रहा
या चल रहा या चले ही तो संसार का सब काम बन सके या बन सका, सब
ही का सब कुछ सब से बना हुआ, सब का मिला हुआ।
जरा तो ही तो सब ही सोच कर देखो कुण्डली बनाकर भला सब काम का
ठिकाना क्या बन सकता था। क्या कभी शक्ति के बिना जन्म-मरण काम सब या
जन्म-मरण सब सब को कुण्डलियों के द्वारा हो सका था क्या या हो रहा या होगा ही
जिस काम को संसारी जीव द्वारा सब ही को सब कुछ दिया गया, जिस ने सब को
बनाया उसी द्वारा सब कुछ चला वा दिया हुआ सब को सब कुछ संसार द्वारा सब को
सब कुछ सब को दिया गया वा मिल रहा, सो सब साधन तो सब को परमात्मा
ही, कुण्डलियों द्वारा नहीं-सब कुछ मिल सका।
भला जब सब कुछ सब का चलाने वाले को ही आधार बना माना गया,
किसी ने आज तक सब सब काम संसार द्वारा सब ही का तो किया वा, सब कुछ
दिया? सो तो सब कुछ सब ही का काम था, जो सब का आधार बना चला आ
रहा, सो संसार सब को ही सब काम सब ही का सब कुछ द्वारा संसार को ही आधार
बना, सब संसार सब को ही सब कुछ बना ही दिया! तो जिस को, जो कुछ
बना मिलना था सब मिला! जन्म-मरण का सब साधन सब मिला! सो सब
मिला सब मिला, सब कुण्डली द्वारा मिला? किसी तरह भी सब कुछ तो
परमात्मा का बनाया जन्म-मरण का सब काम बना, सो सब अपना दिया सब को
दिया सब काम जो कुण्डली द्वारा न सब का हो सका न सब कुण्डली से सब का
काम चला ही सब संसार का, न किसी तरह भी परमात्मा शक्ति भिन्न-भिन्न या
सब प्रकार की थी, जो बिना शक्ति साधन परमात्मा के अपना काम कर या हो
सकती या हो, किसी का सब काम सब प्रकार का सब ही रूप से आधार
सब कुछ ही का बना रूप स्वरूप सब शक्ति परमात्मा के सर्वव्यापी व्यवस्था
सब प्रकार से बना ही सब जन्म-मरण काम का।
बिना सब को परमात्मा की व्यवस्था सब काम को किये न, तो काम
चलता न कभी! ना न काम हो सब काम सकता? सो तो सब सब काम चला ही
शक्ति के द्वारा बना, ना काम सब रूप में सब का सब काम बनाता या बनता
सो परमात्मा का, संसार का रूप सब शक्ति के द्वारा ही सब जन्म-मरण बना
सब प्रकार से जगत में सब का साधन बना बना जगत रूप में सब को साधन सब
तरह से ही मिला रहा वा रहा, जिस का साधन आधार संसार बना हुआ।
सो शक्ति ज्ञान सब सब सब काम सब आधार रूप में सब सब को ही दिया
जिस द्वारा सब ही को संसार का सब ही तो सब काम बन कर सब का साधन
बनके ही चला सब काम बना, सो बना सब का सब काम सब ही काम से सदा
हुआ चला, सो ही सदा चला चला सब व्यवस्था नियम सब ही को सब सब सब
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इस प्रकार जो पुरुष केवल भोग की ओर दौड़ लगा रहा है और सब कुछ भोगने का मद जिसके
भीतर जम जाताहै वह पाप-धर्म के भय तथा लोक-लाज से डर कर, जिसे लोक में पाप-
कर्म कह कर पुकारा गया है और जिसे सब बुरा मानते हैं और जो पाप के मार्ग हैं उन
पर सब कुछ त्याग कर दौड़ेगा ही दौड़ेगा। ऐसा क्यों? क्योंकि उस पापी मनुष्य के
विवेक शक्ति पर परदा पड़ गया है और इस परदे के कारण उसका विवेक मारा जा चुकाहै।
विवेक नष्ट न हो इसके लिए यह ही उपाय है जिस से मनुष्य सचेत हो सके कि
वह मन को सर्वथा वश में करे। पर जो वश में न करके मन के वश में होकर चलेगा
वह तो पाप का मार्ग कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि पाप तो मन ही कराता है? जिसे मन कहेगा!
वह तो वो सब कुछ करेगा चाहे वो पाप कर्म हों और फिर उस मन को यह भी ज्ञान
नहीं रहता कि, जिसे लोग पाप कहते हैं वह मन ही सब कुछ करा रहा है। तब
तो वो पाप कर्मों में ही सुख का अनुभव करने लगता है और जब पाप में आनन्द आने लगे, तो
वो कभी निष्पाप बन नहीं सकता है... ऐ मन तू तो उस परम-पिता परमेश्वर का केवल
चिन्तन कर, जो कि सब का रचने वाला आधार व प्रभु, सब को जन्म देकर सब का पालन करने
वाला स्वामी।
सो वो प्रभु सब का उपकार तथा कल्याण ही करता है, अतः तू ही अपने
कल्याण की इच्छा कर और इस पाप के दल-दल रूपी पंक से निकल कर विवेक रूपी
जल घट से उस पाप रूपी मैल को धो कर पवित्र हो, इस ही कार्य रूप में अपनी
सारी शक्ति को तू नियोजित कर दे, तेरा कभी अनिष्ट नहीं होगा।
भोगों की लोलुपता मनुष्य केवल मात्र सुख के ही लिए करता है, जिसे भोगों
का सुखसमझा जाताहै यह सुख भ्रम मात्र होता, केवल न होने का आभास ही होता
इस प्रकार के झूठे सुख में जो मनुष्य सब कुछ भूल कर बैठता है और सब कुछ गंवा
कर बैठ कर रोता पश्चाताप ही करता, पर पश्चाताप से तो बिगड़ा हुआ समय तो
वापिस लौटाया नहीं जाता, न ही सुख मिलता, जो पश्चाताप मन करा रहा था
इसलिए पश्चाताप की ओर न जाकर मन को वश करके जन्म-मरण से मुक्ति
पाकर आनन्द प्राप्त किया जावे जिस से आवा गमन के संकट से छूट मुक्ति
रूपी परम शान्ति मिले, जो मुक्ति पाकरसदा सब सुखों का ही भोग करे,
सब प्रकार के दुःखों से छूटे।
जब तक मन में मोह है, तब तक माया मनुष्य को सब तरह रूप दिखा कर
भुलावे में डाल कर भरमाती ही रहेगी, जो भरम गया उसे शान्ति का मार्ग कभी
प्राप्त हो ही नहीं सकता। भरम से जो बच गया, सो सब कुछ शान्ति का प्राप्त कर लेगा।
जब तकयह मनुष्य मोह रूपी जाल में फंसा, तब तक किसी तरह भी यह बच ही नहीं
सकता। मोह का जाल ऐसा दृढ़ होता है कि ज्ञानी-विज्ञानी भी इस में फंस कर
गिरते हैं, जिन्हें भी मोह का जाल अपने में जकड़ ले; सांसारिक वासना और मोह से
ही तो सब कुछ है, जो कुछ भी इस संसार में।
जो कुछ किया गया अथवा जो हो सकता है सब माया के प्रभाव काम-क्रोध के
कारण व लोभ लालच तथा वासना रूपी लहरों तथा तृष्णाओं के कारण ही मनुष्य करता
ही रहता जिसपर वासना का जोर न चले, वह ही इन सबपे विजय प्राप्त कर सकताहै।
पर वासना मनुष्य को सब ओर से घेरकर सदा अपने वश में रखती, जिस से छूट पाना
ही मुश्कील।
जिसे ज्ञान हुआ, विद्या पढ़ी, पर वासना से मन को न हटाया तोसब कुछ
का व्यर्थ ही हुआ... ऐ मन तूउस सब माया रूपी सांसारिक बन्धन से छूट, मन जिस
रूप बना उस परमात्मा को पा सकता है उस परमात्मा के ज्ञान को मन रूपी जल
से धो कर साफ कर ले जिससे, तू मुक्त हो कर उस परम पद को पा सके जो तेरा पद,
ज्ञान का रूप है, जब तू उस ज्ञान स्वरूप प्रभु को जाने, तभी मुक्ति का मार्ग पा
सकता है मेरे मन!
जिसे मुक्ति मार्ग चाहिए वो सब से पहले अपनी वासनाओं का त्याग करे
जो वासना सब तरह की इच्छाओं का घर तथा वासना ही मुख्य कारण है; न तो वो ज्ञान
प्राप्त करसकता है, न ज्ञान रूपी सत्य परमात्मा को ही पा सकता क्योंकि वासना व
सांसारिक वासना रूपी वासनाएं ही तो ज्ञान रूपी दीप को बुझाती हैं। ज्ञान का
परमात्मा रूपी दीपक यदि जलता रहे तथा बुझने न पावे, तोमुक्ति का ज्ञान
प्राप्त हुवाजिससे यह जीवात्मा उस प्रभु व ज्ञान के प्रकाश द्वारा सत्य को
जान कर सत्य में ही लय पावे। सत्य परमात्मा समस्त सृष्टि रूपी माया का रचयिता है,
पल-भर समस्त संसार को, पलक के झपकने में समाप्त कर सकता अथवा निर्माण करा
देता है, सो उस सत्य स्वरूप को जान कर उसपरमपिता परमात्मा की शरण को प्राप्त हो
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इस प्रकार हम विचार कर सकते, अथवा कह सकते कि मनुष्य जन्म का क्या अर्थ? उस मनुष्य का जीवन
भी तो व्यर्थ कहलाने योग्य रहा जिसे मनुष्य जन्म तो प्राप्त हुआपरन्तु वह मनुष्य बन न सका
अथवा यों कहो, हे देव, यदि ऐसा मानव मुझे या अन्य किसी विवेक को जन्म देने योग्य हो तब
भी ठीक!
सो यह विचार निसंकोच प्रकट हो रहा था, जिससे उनके मानसिक द्वन्द्वका
समाधान मिलना सम्भव हो सके। सो जब विवेक जागृत हुआ तब देश-विदेश की समस्या
सामने रख उसने उस माता-पिता तथा उन सभी अन्य लोगों से वार्तालाप न आरम्भित की, व
साधारण रूप से समाधान कर दिया कि भारत को इस काल-रूपी संकट तथा इस भारी
दुःख बाधा संकट रूप उस भव रूपी कूप से अन्य संशय-कलुषित व्यक्ति नही निकाल
सकते उस को, जिनका मन, हृदय कलुषित रहा
पर जो लोग देश के सब नर और नार को एक मान कर चल रहे, उनकी अहिंसा,
उनका संगठन, सत्यप्रिय व्यवहार, यह... ही ऐसा शस्त्र तथा अस्त्र सिद्ध होगा जो
संसार रूपी इन दोनों शक्तिशाली विरोधी शक्तियोंके सामने टिक सकेगा, जब हम
संसारके किसी भी दल का आश्रय स्वीकारेंगे तो अन्य शक्तिशाली दल से भयभीत
होते ही, हम उस संकट से छुटकारा पानेके लिये कुछ समय पहले फिर भी भय पाते रहेंगे
यदि हम एक अन्य महान् शक्ति का रूप स्वतः अपने भीतर पैदा कर लेते जिसे सत्य कहा
सकता रहा हो, समय आ पड़े तो, हम तो सब मिल कर एक संगठित शक्ति बन जांय, और
संसारके किसी अन्य दल का भय भी न रहे
इस विचार धारा को सुन कर, जो लोग पहले ही अशिष्ट थे, उन सब जन समूह
तथा अन्य जन ने जब विवेक-बुद्धिके इस विचार का विचार कर लिया तथा समझ भी
गये तब उनका हृदय यह समझ कर कि भारत, जो पराधीन हुआ बैठा था उसने
तथा अन्य सब लोगोंने मिलकर यह तय किया स्वाधीनता तो जो मिले वही उचित
रहेगीऔर सब जनसमूह ने उस बात को स्वीकारना आरम्भ कर
विवेकने जब यह बात समझी कि स्वाधीनता पाने का यही पथ, सत्यनिष्ठा
सदाचार ही सब सम्भव करने वाला बन रहा, इससे उनके साथी अलबेला आदि
सब विस्मित हो विवेक अलबेलाके ही विचार को मानने लगे, इससे उनकी जो पहली
धारणा थी विरोधी से सहयोग न साधनेके लिये कष्ट, संकट तो उठाने पड़ेंगे पर उस
मार्गको नहीं छोड़ना
विवेक के प्रति माता प्रेम, अलबेला का प्रेम अपने प्रति सम्मुख, उस बात ने विवेक
आत्माको विचलित नहीं किया कि भारत को संकट तथा कठिनाइयोंसे छुड़ाना होगा, इसके
सम्बन्ध में विवेक का मन सब ओर भ्रमण किया, जिससे विवेक का संकट दूर होने लगा
साथ ही समाज सुधार आरम्भ
वह तो जानता रहा ही था कि भारत-मर्यादा प्राचीन विचार पर ही स्थित-
रहित होकर भारत आज जिस रूपमें खड़ा था, उसकी रक्षा करना एक व्यक्ति
का कार्य अथवा किसी एक दल विशेष द्वारा नहीं माना जा सकता रहा होगा, बल्कि
सब मिल करही ऐसा कर सकते थेऔर, जब आत्मिक दुर्बलता सम्पूर्ण देशमें
व्यापकतर दिखाई दे, सामाजिक संगठन केवल विचार तक ही सीमित हो कर बिखर-
सागया दिखाई पड़ने लगातथा देश के दो सम्प्रदायों के बीच, जो कि अपने समाजके
अन्य अन्य अंगों जैसे माने जाते रहे थे उनके बीच ऐसा भेद खड़ा हो चुका
था, जिससे समाज विच्छिन्न
होने लगातथा स्वाधीनता का लक्ष्य पीछे पड़ जाने लगा तथा धर्म के नामपर
अनेक घिनौने काण्ड देश के भिन्न भागों में प्रकट हो रहेथे, जिससे ऐसा नर,
जिसके दो विचार थे, जो सदा सर्वदा धर्मके नाम पर लड़ते रहे, वह अपने स्वार्थ
साधने के लिये विदेशी-ताकत कासहारा लेते, इससे यह, सिद्ध था, कि भारत दोनों
ओर से पिस रहाथाऔर इस बात से भी भय, कि कल सम्भव था विदेशी तो
भारत को छोड़ ही जाये, पर भारतीय ही आपस में कट-मरें, जो दशा आज के युग
में देश की दिखाई दे, उस संकटसे देश को मुक्त करने-करानेके लिये ही, भारत
संस्कृति सब धर्मों का आदर करती रही है, तो सब धर्म एकसाथ मिल परस्पर
सहानुभूति पूर्वक काम करते
तो आज भारत का मुख और उसकी अपनी संस्कृति विश्व भरमें अपनी विशेष प्रतिष्ठा
प्राप्त किये ही थीऔर उस का कारण विवेक का यह विचार ही था जिसने अलबेलाको ही
प्रभावित नहीं किया बल्कि भारत के दो दल विशेष जो परस्पर लड़ते रहने को तैयार रहते
आयेथे उन सब को विवेक समाज की यह सीख मिली, कि आपस में लड़कर सदा
व्यर्थ, पर विचार व एक होकर अपने देश को उस संकट से सदा सुरक्षित रखिये
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उस उपद्रवकारी मनुष्य को यह बात ठीक तरह समझ लेनी चाहिए कि भारत का हर सच्चा नागरिक जो
चाहे या नचाहे रूप में भारत का अन्न खाता अथवा कपड़ा पहनता है; या भारतीय डाक्टरों की चिकित्सा
अथवा जीवन औषधि पाता अथवा भारत भूमि द्वारा प्रदत्त आमोद-प्रमोदनों अथवा पद, प्रतिष्ठा को,
जो भारतमाता अथवा उस समाज का अंग अथवा अंश बनकर सब कुछ भोगता हुआ सुखिया रहता है
उसका धर्म बनता, कि कृतघ्न न होकर कम से कम भारत का तो सम्मान करे ही जिससे उस देशद्रोही
रूप में उस उपद्रवकारी जन को समझना
तो चाहिए कि व्यवहार में वह कोई भी रूप क्यों न अपनाए पर परमात्मा के सच्चे न्याय रूप में
उसका सुख केवल इस बात समझकर नष्ट अवश्य होगा क्योंकि, इस स्थिति का उसका कोई
सच्चा साथीदार बनेगा, न माता पिता, रिश्तेदार, सब उससे अपना संबंध केवल स्वार्थ
रूप ही मानकर या अज्ञानतावश ही निभाएंगे, न्याय रूप में परमात्मा की कचहरी में वह अकेला ही
ही होगा? तो विचारना का रहेगा भला? कृतघ्नता का न्याय बनेगा? जो मनुष्यता के सर्व
ही विपरीत या पाप में गिना गया, इसके सिवाय और क्या रूप उपद्रवकारी को प्राप्त हो
सब समय या रूप में विचार सकते हो? न्याय रूप ही तो ऐसा सत्यता का एकमात्र
व्यवस्थापक कहा जाएगा
हर समय अपने विचार को शुद्ध रख, जिससे कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य परमात्मा
स्वरूप को समझ कर ही पालन कर के श्रेष्ठ कर्मों का फल प्राप्त कर सके, ना कि केवल शरीर
को सन्तुष्ट रूप रख कर ही सुख अनुभव करता रहे; या तो ऐसे रहो, जिससे कि सबका
कल्याण हो या सबका अहित करने वाले उस वातावरण से स्वयं को अलग कर
निर्भय बना कर सब को प्रेरणा देकर जीवन सफल किया जाए जिससे स्वयं सब कुछ श्रेष्ठ
बनते हुए सब को सन्मार्ग प्रेरणा देकर शुद्ध, पवित्र हो कर न केवल अपना भला, बल्कि
सब का ही कल्याण कर प्रभु कृपा प्राप्त, सबको ही उस परमात्मा रूप सच्चा
साथीदार तो हर एक जीवात्मा का केवल प्रभु, और केवल परमात्मा ही अपना एक
सर्वसमर्थ सच्चा और जीवन-दाता परमेश्वर रहा और सदा रहेगा भी केवल परमात्मा रूप सच्चा
प्रभु सब का ही, सब ही का स्वामी सदा प्रभु सब समय में सहारा दे तो सकता है पर मनुष्य न
बात को न मान कर केवल स्वार्थ, या सब कुछ अपने कर्मों द्वारा सब कुछ सोच कर ही
अहंकारपूर्वक कर्म, विचार करता हुआ, हर समय केवल भ्रम में भटकता हुआ ही परमात्मा
शक्ति अथवा कृपा से वंचित हो जाता, जो कि सबसे बड़ा पाप
विचार वास्तविकता त्यागकर या सब कुछ नश्वर समझ त्यागने वाले मनुष्य को
किया, जब सब कुछ त्याग कर सब कुछ प्रभु को, अपने सब विचार समर्पण करता हुआ
प्रभु शरणागत हो सब रूप से हर एक का सच्चा कल्याण करता हुआ सब कुछ पाकर भी,
वास्तविकता त्यागे बिना रहता, तो भगवान, परमात्मा, विचार भला? या तो प्रभु सब
नियम सत्यता त्याग करता, जो प्रभु शरण केवल परमात्मा की ही कृपा समझकर त्याग करता,
प्रभु का भक्त, सब संसार को त्यागकर केवल प्रभु कृपा पर निर्भर करता, वह प्रभु कृपा वंचित
क्यों रहता? परमात्मा भक्त की वास्तविक स्थिति ही, यह होगी, कि प्रभु का सब प्रकार
का सहारा, प्रभु कृपा से सब प्रकार केवल ईश्वर के ही सब कुछ समझ सकता है प्रभु कृपा से
सहज रूप से सब का पालन प्रभु, स्वयं ही सब कुछ करा रहा, तो न तो कोई
व्यक्तिगत द्वेष रखता है, न किसी बात का पश्चाताप करता हुआ रोता है, हर समय
केवल हर सांस प्रभु का स्मरण ही, हर पल प्रभु का ध्यान करता, इसके सिवाय प्रभु
कृपा का कोई रूप नहीं बल्कि प्रभु की शरणागत अवस्था को ही मनुष्य जीवन का एक
मात्र रूप या परिणाम कहा गया व माना जाएगा
परमात्मा की सच्ची शरण ही मनुष्य जन्म को पाकर हर एक को सच्चा रास्ता
दे कर हर समय प्रसन्न रख कर अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकती, केवल प्रभु शरण
ही सब प्रकार मंगल रूप व हर अनिष्ट निवारण करने वाली बन सकती, प्रभु कृपा
केवल हर एक का सब रूप से सब रूप में कल्याण सब अवस्था में व सब काल में
करेगी
परमात्मा का स्मरण ही सब कुछ रूप में सच्चा सहारा जीवात्मा का बन कर सच्चा फल
देकर परमात्मा स्वरूप दर्शन करा कर प्रभु कृपा का पात्र बनाता होगा या नहीं? केवल
प्रभु शरण ही जीवात्मा रूप मनुष्य व केवल प्रभु ही हर प्रकार से समर्थ रहा अथवा रहेगा,
सब जीवात्माओं परमात्मा रूप ही तो है सब रूप में प्रभु का ध्यान कर ही तो सब प्रभु,
हर रूप में सब कुछ प्राप्त हो सकता है, सब कुछ केवल प्रभु सब कुछ करने वाला, प्रभु!
सब प्रकार सब कुछ देने वाला व केवल प्रभु ही हर बात का हर समय हर रूप से
सब रूप सत्य प्रदान करे, भगवान्! केवल कृपा करो सब पर सब व केवल प्रभु ही
सब को दया कर, सब का कल्याण ही हो सकता प्रभु, कृपा करो प्रभु!
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यह स्वाध्याय केवल धर्म का ही या अध्यात्म का रस या स्वाद ही नहीं है।
स्वाध्याय मन का रस लेकर उसके द्वारा रस प्राप्त कर आत्मा तक पहुँचने
का प्रथम सोपान हो जाता अथवा बनता है, अथवा स्वाध्याय आत्मा का रस ही
या अध्यात्म का, आत्मा स्वयं ही रस स्वरूप तो स्वयं आत्मा आनन्दस्वरूप ही
होता
पर मनको स्थिर कर लें तो ही यह रस, आस्वादन होगा, अन्यथा
स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय का रस प्राप्त होना भी एक बहुत बड़ी साधना ही हो
जाती या फिर व्यर्थ मन का ही व्यापार बनता होगा? मन तो स्थिर रहा कभी-कभी
होगा, पर मन का भी स्वभाव है कि वह व्यर्थ स्वाध्याय करता रहे केवल रस लेने
के ही खातिर व्यर्थ, या स्वाध्याय का प्रभाव भी तो आत्मा तक ही रस रूप बन कर
पहुँचता रहता है?
इसका क्या उत्तर होगा? मन तो या स्वाध्याय द्वारा भी, या मन को रस तो
मिल रहा, रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त मन कर रहा, तो मन तो तृप्त हो चुका था
रस प्राप्त कर, या मन तृप्त न हो सका, तृप्त होता फिर स्वाध्याय
क्यों करता रहा! या फिर मन तो सब कुछ कर चुका था या केवल एक ही
रस स्वाध्याय द्वारा प्राप्त कर लेना-देना चाहता था या उसका स्वभाव
अथवा मन तृप्त न ही हो सका था यह रस प्राप्त कर लेने मात्र से,
केवल रस, स्वाद मात्र स्वाध्याय द्वारा प्राप्त तो कर लिया था तृप्त होने
तक रस, स्वाद ले चुका था; मन तृप्त नहीं हुआ, तृप्त तो मन होना
था; मन तो तृप्त नहीं हुआ? मन तो तृप्त हुआ ही? मन तृप्त हुआ ही न? तृप्त
तो आत्मा ही मन द्वारा रस प्राप्त कर तृप्त हो सका था, या तृप्त
ही स्वाध्याय द्वारा या आत्मा तक पहुँच कर ही रस प्राप्त होना था।
आत्मा-स्वभाव ही रस रूप या आत्मा आनन्द रूप तो होता ही, जब कभी मन
आत्मा से तृप्त न हो पा रहा, कभी-कभी व्यर्थ स्वाध्याय करता रहा, तो वह
तृप्त रस आत्मा से स्वाध्याय से था, तृप्त स्वाद से, तृप्त मन रस-तृप्ति मात्र
तक तृप्त रहा, मन तृप्त-आत्मा? तृप्त तो आत्मा द्वारा तृप्त स्वाध्याय
स्वाध्याय से हुआ था? मन तो स्वाध्याय का रस ले रहा था तृप्त तो, रस
तृप्त तो आत्मा से था, तृप्त स्वाद मात्र से मन था? मन तृप्त हुआ या नहीं
तृप्त तो या आत्मा रस-रूप से आत्मा
मन को स्वाध्याय के द्वारा रस तृप्त तो कर ही दिया था स्वाध्याय न रस का
रस रूप स्वाध्याय तो या तृप्त तो हो चुका होगा आत्मा द्वारा या स्वाध्याय का
तृप्त स्वरूप या तृप्त करने का आधार स्वाध्याय ही रहा होगा या आत्मा रस रूप
द्वारा ही स्वाध्याय से ही रस तृप्त हो रहा
तृप्त तो आत्मा, तृप्त तो रस से तृप्त हो गया, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
आत्मा तृप्त हो गया, या तृप्त तो आत्मा ही था केवल स्वाध्याय का रस आत्मा
पाया था? रस स्वाध्याय द्वारा ही तो आत्मा को रस के द्वारा तृप्त हुआ,
तृप्त होना ही आत्मा रस का स्वाध्याय बना, तृप्त मन तृप्त रस से मन रस का
रस था, तृप्त मन रस मात्र तक तृप्त रहा, तृप्त तो आत्मा रस तृप्त मन रस
द्वारा बना, तृप्त मन तृप्त रस स्वाध्याय द्वारा स्वाध्याय स्वाध्याय आत्मा का
ही रूप बन तृप्त रस मन तक पहुँचा
तृप्त आत्मा था, तृप्त आत्मा द्वारा मन को स्वाध्याय प्राप्त हो या
तृप्त आत्मा ही स्वरूप रहा
जो तृप्त होता तो मन आत्मा तक तो रस तृप्त स्वरूप मन स्वाध्याय का
स्वाध्याय बन तृप्त होता ही रस से? मन तृप्त आत्मा का स्वाद ले रहा था, आत्मा
तृप्त रस आत्मा ही तृप्त हो रहा था? मन तो तृप्त रस के रस मात्र तृप्त था!
तृप्त स्वाध्याय स्वाध्याय बना, तृप्त तो रस तृप्त था, तृप्त रस तो तृप्त आत्मा ही
रस का रस रहा था? या आत्मा का तृप्त होना स्वरूप था? या जो स्वाध्याय द्वारा
तृप्त रस स्वाध्याय का, तृप्त तो स्वाध्याय रस स्वाध्याय ही तृप्त रस द्वारा
तृप्त बना? तृप्त तो रस तृप्त रहा तृप्त हो कर तृप्त रहा तृप्त रस तृप्त तृप्त
तृप्त ही तृप्त का तृप्त रूप या तृप्त रस तृप्त ही तृप्त हो रस स्वाध्याय का
स्वाध्याय
रस तृप्त रहा, स्वाध्याय द्वारा तृप्त? तृप्त तो तृप्त आत्मा, तृप्त तृप्त
रहा? स्वाध्याय का तृप्त तो मन ही रहा तृप्त आत्मा द्वारा तृप्त रस तृप्त,
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परमात्माका वियोग कभी किसी अवस्था विशेषमें नहीं होता, प्रत्युत परमात्माका वियोग
सर्वथा असत् है?
इसका उत्तर यह दिया गया कि उत्पत्ति और विनाश तो प्रकृति और प्रकृतिके कार्य
शरीरादिके होते हैं। प्रकृतिके कार्यके वियोगको तो हम वियोग मानते हैं, पर प्रकृतिके कार्यके साथ
परमात्माका जो नित्य योग है, उस नित्य योगको नहीं मानते। यद्यपि प्रकृतिका कार्य और नित्य
तत्त्व दोनों एक हैं, दोनों सत् हैं, प्रकृतिके कार्य और
जीव का नित्य सम्बन्ध केवल परमात्माके साथ ही है। जब जीव परमात्माका
स्वरूप ही है तब जीव परमात्माका अंश होकर भी परमात्माके वास्तविक तत्त्वको नहीं जान रहा
केवल इस बात को, इस मूल बात को, इस तत्त्वको जान लेनेपर अज्ञानका नाश हो
जायगा। मनुष्य जब तक इस प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर रख रहा है तबतक परमात्मासे अलग ही
बना रहेगा। पर जब यह मान लेगा कि 'मैं केवल ईश्वरका हूँ? मेरा ईश्वर ही सब कुछ है? केवल
मेरा प्रभुके साथ ही नित्य सम्बन्ध है?
साधक जब केवल परमात्माको अपना मान लेता है तब वह प्रकृतिको अपनेसे अलग कर देता
परमात्माको सब कुछ मान लेनेसे ही, यह जीव प्रकृति-संसारके बन्धनसे छूट जायगा। जब--
परमात्माको ही अपना मान ले, तो उसका मन, उस जीवका मन--चित्त सब कुछ ईश्वरके चरणोंमें
लग जाय। फिर वह ईश्वरके चरणोंमें लीन होकर ईश्वरके साथ एक हो जाय तब वह ईश्वरके साथ
सम्बन्धका रस पाने लगे तब वियोग कहाँ? परमात्मा तो सब जगह परिपूर्ण हैं।
इस प्रकार जब वह परमात्माके स्वरूपको जान लेता है तब वह, केवल उस भगवान्के
ध्यानमें रत रहेगा।
जब ऐसा जान लेता है तब वह जीव सब जगह और सब कालमें परमात्माकी सत्ताका ही अनुभव
करने लगेगा। जब परमात्माको सब कुछ समझता है तब वह संसारको ईश्वरका स्वरूप ही मानेगा।
अतः, वियोगकी सम्भावना कहाँ रही? ईश्वरकी सत्तासे अलग न संसारका अस्तित्व है और न उस
जीवका स्वरूप ही? जब सब भगवान् ही हैं तब परमात्मासे भिन्न क्या रहा? जब
सब भगवान् ही हैं? केवल यह न जाननेके कारण ही जीव इस मिथ्या वियोगका अनुभव
कर रहा है।
जब वह इस बातको समझता है कि भगवान्के सब ओर होनेपर भी जो जीव अपनेको
भिन्न मान रहा है उसका कारण उसका यह अज्ञान ही है कि वह भगवान्को अपनेसे
अलग समझ रहा है, इसीसे वह भटक रहा है, पर जब, ज्ञान उत्पन्न होनेपर वह अपने स्वरूपको
भी उस स्वरूपका ही अंश मानने लगता है तब उसका जन्म-मरणरूप यह सब प्रपञ्च नष्ट हो
जाता है।
सब कुछ परमात्माका ही अंश होनेके कारणसे ही, सबमें एक ही, उस एक परमात्माका अंश ही
व्यापक होनेसे परमात्मासे अलग कोई नहीं है, परमात्माका स्वरूप सबमें व्यापक है।
अतएव, परमात्माका नित्य-योग स्वाभाविक रूपसे सबके भीतर वर्तमान होनेपर भी
अज्ञान, भ्रमके कारण उस नित्यको न जाननेसे जीव इस संसारके नश्वर सुखको ही सुख
समझता रहता है।
वास्तवमें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, उस ईश्वरके सिवाय अन्य कुछ
है ही नहीं! जब नित्य-तत्त्व ही सब जगह व्याप्त है तब जीवका यह जो वियोगका
भाव है, वह केवल भ्रमके कारण ही है। जब मनुष्य अपने आपको इस भ्रमसे छुड़ा
लेता है तब वह इस बातको समझ जाता है कि परमात्माका वियोग सर्वथा असत् है।
सब ओर और सब समयमें केवल वही एक परमात्मा ही परमात्मा व्यापक हैं। इस प्रकारके
तत्त्वज्ञानसे सब भ्रम दूर हो जाते हैं।
परमात्माका कभी किसीके साथ वियोग नहीं होता। प्रत्युत परमात्माका वियोग
केवल उस अज्ञानी व्यक्तिके मनमें ही रहता है। परमात्माका स्वरूप सर्वथा अखण्ड है। जो मनुष्य
संसारके प्रपञ्चमें फँसा रहता है और भगवान्के स्वरूपको भूल जाता है, वह
अज्ञानके कारण अपनेको परमात्मासे अलग मानता है, पर जो मनुष्य ईश्वरका भजन-कीर्तन
करता है और भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता रहता है वह इस संसारके आवागमनसे
मुक्त होकर उस परमधामको प्राप्त कर लेता है जहाँ परमात्माका नित्य-योग रहता है!
इस प्रकारसे जब मनुष्य अपनेको सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर देता है
तब वह इस संसारके सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जब तक मनुष्य अज्ञानमें फँसा रहता
है तबतक वह इस बातको समझ नहीं पाता कि उसका ईश्वरके साथ नित्य सम्बन्ध है,
परन्तु जब भगवान्की कृपासे उसके भीतर ज्ञानका प्रकाश होता है तब वह सब संशयोंसे
मुक्त हो जाता है। अतएव परमात्माके साथ कभी किसीका वियोग हो ही नहीं सकता।
परमात्मा सर्वत्र और सब समयमें विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह अपने सारे
सांसारिक कार्य परमात्माके निमित्त करे और अपने चित्तको केवल परमात्माके
ध्यानमें लगाये रखे।
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