एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब यह विचार कर और शान्त चित्तके अनुसंधानसे निश्चय करो! इस संसारमें धन और वैभवका सुख विनाशी,
क्षणभंगुर, जरा और मृत्युसे संकीर्ण, यह समझ कर इस संसार और सांसारिक भोगोंको तृणवत् समझकर
परित्याग कीजिये अथवा सब भोगोंको पर त्यागने न बने, अर्थात् भोगों विषय, जिस पर अपना विशेष
विचार वा अनुराग वा आसक्ति न होय उसे भोग कर उसीके द्वारा उस पर पुरुष परमात्माका साक्षात्कार
करें? जो ऐसा विचार न कर सके तथा भोग पदार्थोंके विषयमें लोभी न होवे, तो इसका फल क्या?
पश्चात्गामी होगा या नहीं? अर्थात् पश्चात्तापको ही प्राप्त होगा तथा अंतमें नरककी यातना भी भोगे
पर उस ईश्वर का साक्षात्कार वा मोक्ष पद कदापि न होवेगा और न ही सुख पावेगा! ईश्वर सबमें व्याप्त
इस सब जगत् को धारण करने वाला सब का प्रेरक परमात्मा जो सब जगत् में व्यापक होकर स्थित
होकर भी! अपने ज्ञानवान् मुमुक्षु भक्त को अविद्या रूपी अंधकार विषयक भोगों से रहित होने की
प्रेरणा करता व कहता, सावधान करो उस ईश्वर को जो सब का साक्षी वा सब में व्यापक, सब का धारक सब
का पालन कर्ता, यह समझ कर उस ईश्वर सबको व्यापता है उस ईश्वर को सर्व व्यापक जान ईश्वर
निमित्त सब कर्मोंको अर्पण कर नित्य अपने आत्माको तृप्त वा परमात्माको तृप्त कीजिये!
परमात्मा स्वयंप्रकाशित होने कारण सब पर कृपा करता हुआ सब जगत्के ऊपर व्याप्त हो रहा
है सो उस ईश्वर सबसे भिन्न वा पृथक्-पृथक्? विचार करो उस ईश्वरका साक्षात्कार वा ज्ञानके होनेपर
कोई संशय वा शोक वा अज्ञान अथवा क्लेश कभी नहीं रहता क्योंकि वह ईश्वर अविद्या, भ्रम
नाश का करवाने वाला
है उस ईश्वर को सब प्रकार देखना चाहिये? सो परमात्मा सर्वत्र व्याप्त सबको व्यापने वाला सब
पर सब का स्वयंप्रकाशित सर्वज्ञ सब शरीरोंके रूप रहित सूक्ष्म वा स्थूल, सूक्ष्म लिंग वा कारण देह
के नाश रहित जो सब जीवोंको कर्मोंका फल देने वाला
ईश्वर अपने दिव्य तेजसे सब जगत्को तृप्त, आनन्दित करता हुआ सब जगत्में व्यापक होकर
दिव्य रूप सर्वव्यापी सर्वेश्वर रूप सर्वज्ञ सब शरीरों रहित वा, सब जीवोंका प्रेरक शुद्ध व्यापक है,
सब प्रकार विशुद्धताके दाताभावसे जो निष्काम कर्म रूप परमात्माकी उपासना अथवा ध्यान रूप
उत्तम कर्मों द्वारा, ईश्वर सब दिव्य जीवोंका कल्याण सर्वदा करता रहता
ईश्वर सबका साक्षी होकर सबको तृप्त
वा सब पर दयाल वा पोषक, सबको उस ईश्वर रूप सूर्य वा तेजके सन्मुख वा शरण,
जिसमें जीव को सब दुख वा कष्ट नाश हो कर परम शान्ति प्राप्त हो, यही सब उत्तम मनुष्योंका
धर्म
हे सच्चिद् ब्रह्म परमात्मा भो, हे शिव रूप ईश्वर परमात्मा भो, हे सनातन रूप स्वामी परमात्मा भो, हे
सब जगत् कर्ता परमात्मा भो, हे पोषक रूप ईश्वर परमात्मा भो हे सब जगत् प्रेरक परमात्मा रूप हे प्रकाश-
स्वरूप भो, हे सूर्य रूप अविद्या-नाशक परमात्मा भो, हे कल्याण रूप, हे व्यापक रूप, हे
शुद्ध रूप, हे समस्त इस ब्रह्माण्डके स्वामी वा जगत्के सुख दाता स्वरूप सर्व ऐश्वर्यवान्
परमात्मा भो सब ऐश्वर्यवान् परमात्मा भो, सब शरीरोंमें व्यापने वाले वा सब जीवोंके कल्याण कर्ता
रूप ईश्वर परमात्मा भो, विद्या व ज्ञान दाता भो, हे केवल
सो ईश्वर सत्य प्रकाश रूप--
ॐ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह ।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर क्लीबे स्मर कृतँ स्मर ॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
इस प्रकारका विचार करने वाले मनुष्यके लिये ईश्वर कभी दूर वा गुप्त नहीं होता
ज्ञान वा उस पुरुष--ईश्वर भाव को जानकर, परमात्मा का साक्षात् वा दर्शन किया, इसके पश्चात्
वह जीव ईश्वरकी वा परमात्माकी सत्ता व सामर्थ्य तथा अपनी जीवात्माकी अल्पज्ञताको जान उस
परम परमात्माके शरण होकर परमात्माके साक्षात्कार सुख लाभ को प्राप्त हुआ वह अपने सत्य जीवन
को, सब जीवों ईश्वर, सबको ईश्वरके ही सब सम्बन्धी जीवात्माका सम्बन्ध समझता हुआ उत्तम
गति
को प्राप्त करके सब दुख वा अज्ञान कष्ट भोगोंसे छूट, हे सत्य स्वरूप वा ब्रह्म रूप ईश्वर
सब पर अपनी कृपासे सब जीवोंको सब प्रकारके भय क्लेशोंसे दूर रखिये, सब प्रकारके भय से ही
रक्षा कीजिये जिससे सब ही जीव भय क्लेशोंसे दूर रह कर आनन्दित रहें वा सब जीवोंको ईश्वर
कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य कभी किसी प्रकारके क्लेशमें नहीं पड़ता, इस बात को, विचार
कीजिये तथा स्मरण रखिये सब ही जीव, विचार करो उस ईश्वरको? ईश्वर कैसा ईश्वर, कैसा
वह परमात्मा परम दयाल व सर्वेश्वर सर्वव्यापक, वह कैसा ईश्वर होगा जो जीवोंको सब प्रकार
आत्मिक शान्ति प्रदान कर सब प्रकार के कष्ट, सब जीवोंके क्लेशों तथा दुर्गुणोंको छुड़वाता
वा भगाता? सदा ईश्वर अपनी सर्वशक्तिके ज्ञानद्वारा... ॥
सो विचार करो ईश्वर कैसा; क्योंकि उस ईश्वरका स्मरण करने वाला सब संशयों तथा
दुःखों से? तथा अविद्या के प्रभाव से छूटता? ईश्वर कैसा दयालु? इसका उत्तर आगे
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