एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
Page 251 of 322
Read in contextॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्रीमद्भागवत महापुराण
द्वादश स्कन्ध कथा (उत्तरार्ध सहित)
अध्याय 34
तस्मात् त्वमद्य मद्वाचं शृणु सत्यं वदाम्यहम्।
यद्द्वा मुकुन्दं भजते यावद् वित्तं समाहितः॥
शृण्वन् सुपुण्यं विष्णोस्तु तस्मात् पापान् विमुच्यते।
सद्यः करोति तन्मर्त्यं मुच्यते सर्व किल्बिषैः॥
तस्मात् त्वमद्य मे भूयो शृणुष्व वचनं मम।
यन्मया कथितं सर्वं "सत्यं" तत् सर्वं शृणु॥
शुकदेव जी कहते हैं- अब व्यास जी परीक्षित को ज्ञान प्रदान करते हुए
कहने लगे, हे राजन! इस इस संसार रूपी सागर में, जो जीव अपने कर्मों द्वारा
बंधा हुआ रहता है, वासना रूपी रस्सी से, संसार रूपी जाल अत्यंत विशाल
और अत्यंत गंभीर है। इस में जो गिर जाता है वह जब तक भगवान् का भजन नहीं करता,
तब तक आवागमन रूपी चक्र में घूमता रहता है। इसलिए भगवान् की शरण में जाना,
ही सब प्रकार
सुख और सब प्रकार का कल्याण है। जिस प्रकार से एक नाव से एक
पार से दूसरे पार जाया जाता है, उसी प्रकार से भगवान् की भक्ति से यह
जीव भव सागर से, आवागमन रूपी बन्धन से छूट जाता है। परंतु जो
इस बात को नहीं जान पाता और संसार में ही लगा रहता है, वह माया के चक्र
से कभी भी छूट नहीं पाता। इसलिए अब हे राजन! तुम इस प्रकार के ज्ञान
उपदेशों को सुनो।
वास्तव में राजा ज्ञान से ज्ञानवान् होता है या वह ज्ञान पाता है, क्योंकि वह
तो संसार रूपी राज्य शासन के चक्र में पड़ा ही रहता है। इसलिए ज्ञानवान्
बनकर ही वह इस संसार से पार उतर सकता है।
राजाओं के लिए तो यह ज्ञान आवश्यक है, जो राजा ज्ञान से युक्त
होता है, उसका कैसा? राज्य हो या न हो, उसकी तो हर दशा में मुक्ति
तय होती है। इस प्रकार से वह ज्ञानवान्, राजाओं का ही उद्धार
करने में समर्थ है। अतः, ज्ञान ही सब कुछ है। इस प्रकार राजा परीक्षित
को ज्ञान, उपदेश ज्ञानियों द्वारा दिया गया, जो कि परम आवश्यक था।
जब तक ज्ञान न हो जाए, तब तक वह कुछ भी जान न सके। जो
इस ज्ञानोपदेश को सुनकर के उस ज्ञान स्वरूप को समझता हुआ मुक्ति को
प्राप्त करने लगता है, उसको संसार के सभी सुखों से मुक्ति मिल जाती
है, फिर वह सब कुछ छोड़ कर के, परम पद को प्राप्त कर लेता है।
इस सब ज्ञान को सुनकर राजा परीक्षित बोले, हे मुने! आपका कथन सत्य है,
ज्ञान द्वारा ही भव सागर से पार उतरा जा सकता है।
कहा गया, धीरे-धीरे ज्ञान, विवेक जाग उठता है और ज्ञान से, अपने
रूप का भान हो जाता है। जो कि भगवान् के ज्ञान का ही एक रूप है।
इस प्रकार से इस ज्ञान को पाकर के मनुष्य अपने को जान पाता है। जो
अज्ञानी मनुष्य अपने को नहीं पहचान सकता, ज्ञान के अभाव के कारण ही
तो, वह संसार में भटकता रहता है। ज्ञान के द्वारा, ही मुक्ति का मार्ग खुल
सकता है। अतः, ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा सब प्रकार के संशयों का नाश कर
ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए।
ज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्य मार्ग पर चलना ही परम धर्म है।
ज्ञान स्वरूप परमात्मा को जो जान लेता है, उसका उद्धार हो जाता है।
परमात्मा सर्वव्यापी हैं। वह तो सब जगह विद्यमान हैं। मनुष्य अज्ञानवश
उन्हें पहचान नहीं पाता। अज्ञान का पर्दा हटते ही परमात्मा के दर्शन हो
जाते हैं। इसलिए हे परीक्षित! अब तुम ज्ञान रूपी नेत्रों से परमात्मा को देखो।
251