Skip to content
SarvaKosh
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

Page 245 of 322

Read in context
Page 245

इस बाल्यकाल के बिना किसी परिश्रम स्वाध्याय के बिना ज्ञान तथा सब प्रकार के भोग
अनेक प्रकार सब प्रकार सिद्ध तथा सम्पूर्ण सुख भोगने योग्य जो उत्तम पदार्थ
मिले हैं, उनका उपभोग जो करते हैं।
जो विचार अथवा विवेक तथा ज्ञान रूपी नेत्रोंको बन्दकर सम्पूर्ण सुखरूप जल
पूर्ण के समान विषय भोगों रूपी जल में डूब रहे हैं जिससे न कभी पार पावेगा तथा
अनेक जन्म में, सो सो योनियों में जिस प्रकार मनुष्य विषय सुख भोग रहा है, सो तो
अन्य सब पशु पक्ष्यादि योनियों में सम्पूर्ण भोग प्राप्त होता ही रहता है। किन्तु,
उपकारी ज्ञान प्राप्त होकर जिस ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है सो तो प्राप्त धर्मात्मा
विचारवान पुरुष ही पुरुषार्थ के अभ्यास द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त करते हैं। जो विद्या
धर्म, ईश्वर रूप जो उपकारी ज्ञान जिससे सब प्रकार का सुख हो, सत्य, सुविचार,
विज्ञानादि रूप जो सदा साथ-साथ रहने वाला है सो अविद्यावान् को प्राप्त ही नहीं।
इस कारण-कारण ज्ञान रूपी धन को जो मनुष्य नहीं करते वे मूर्ख, विवेक शून्य
ही जन्म धारण किये
वृथा जन्म खो, काल रूप महा सर्पके मुखमें प्रवेश करते हैं।
सो अविद्यावान् मनुष्य पशुके समान ही है, कारण जिस प्रकार पशु खाता पीता
विषयको भोगता भोग भोगके कालके वश हो जाता है सो पशुके सदृश ही है। इसी
प्रकार मूढ नर जो सो अविद्यावान् को प्राप्त भोगोंके भोगनेमें सदा तत्पर रहता
कभी भी उस प्रभु का गुणानुवाद तो कभी भी नहीं करता, उस परम दयालु को जो
सब सुख दाता अविद्यावान् को भी सुख, सो सो ज्ञान प्राप्त कर उस प्रभुके
उपकारोंको भी याद नहीं करता, सो तो जन्म लेकर विष भक्षण करनेके तुल्य जीवन
को धारण किये हुए ही है, सो इस जन्म में भी दुःखी, पर जन्म भी दुःखी
सो अविद्यावान् मनुष्य अज्ञानता रूपी जाल में फंसा ही रहता है, जन्म-मरण
रूप भवके फन्दे को कभी त्याग नहीं सकता तथा सो अनेक प्रकार के दुःख भोगता
ही रहता है, जिस प्रकार बन्धन सहित कुत्ता कसाइयों के हाथमें जाकर अनेक
कष्टोंको वा दुःख-दारिद्र भोग को ही भोगता रहता है उसी भाँति, सो नर अज्ञानी
मूढ़ ही जन्म धारण कर सब कुछ खोता है।
सो अब सो सब भी अज्ञानता नाश हो तथा सुमति प्रकाश हो इसलिए प्रार्थना
पूर्वक प्रभु स्तुति की सो कही है, सो अब कृपा कर के, हे प्रभु सब दोषों हरिये?
जिससे शुद्ध होकर तुम्हारे पादारविन्दों में मन स्थित होकर सदा आनन्दित रहे
तथा सदा सब सुखोंके दाता प्रभुकी शरण में सदा मन स्थिर रहे, सो यह
सत्य ज्ञान का प्रकाश सब जीवों द्वारा प्राप्त हो सो प्रभुने कृपा करके वेद रूप
ज्ञान प्रकाश, वेद, सो सब का सब सब के कल्याणार्थ सब जीवोंके सुखके हेतु रचा,
जिस, सब का उद्धार हो तथा सब अज्ञान रूपी अन्धकार मिटकर सत्यता रूप सब
जीवों को कल्याण का प्रकाश वा आनन्द सदा प्राप्त होवे सो प्रभुने सब जीवोंके
ऊपर कृपा करके सत्य ज्ञान का प्रकाश जो किया है? सो उसका सब प्रकार नित्य
अभ्यास सो जो करेगा, उस अभ्यास की दृढ़तासे मन शुद्ध होकर प्रभुके
स्वरूपका ध्यान करके जिससे उस पद मोक्ष पदको प्राप्त कर लेता है, सो जब
मनुष्य अज्ञानता को तजकर सब जीवोंको इस उत्तम मार्ग पर चलावे तथा
स्वयं सत्य स्वरूप को मन वचन कर्म द्वारा सेवन कर मोक्षपद, पद प्राप्त करे,
सो संसार में जो कुछ भी है सो परमात्मा सबको ही समान रूप देकर उपकार
है, सो सब मनुष्य, सब का सब, सब प्रकार का कल्याण ही चाहे
सो जो सज्जन ऐसा करते हैं सो उत्तम हैं, तथा जो केवल अपना कल्याण
ही चाहते तथा दूसरों सदा का अनिष्ट ही, विचार ही मन में, परोपकार ही,
अथवा परोपकार शून्य सो नर पशु रूप ही जानिए
आज का दिन इस बात का बड़ा भारी आनन्द हुआ जिसका वर्णन वाणी से
भी नहीं हो सके तथा चित्त आनन्द स्वरूप परमात्मा के चरणारविन्दों में मग्न
हो, प्रार्थना रूप सब सत्य सुखकारी शब्द रूप है? अतः सबको सन्मार्ग पर चलना
योग्य
इसलिए सब जीवों का यह परम कर्तव्य है कि सो भी, सब प्रकार के
भय को त्याग कर सर्वव्यापक ईश्वर के ऊपर, सम्पूर्ण भाव तथा दृढ़ विश्वास करके
सब जीवों अपने आत्मा के समान समझ-बूझके परोपकार ही करना यह ही सब का
मुख्य काम है। क्या राजा, प्रजा सब कोई, परस्पर सब मिलकर, एक-दूसरे
जीवोंके सुखार्थ सब प्रकार से मन धन तन से सहायतार्थ ही प्रवृत्तरहें, सो ही
उत्तम मनुष्य सब को कहा गया।
245